मिनिएचर नागरिक पोसने की कोशिश और जंतर मंतर का पलटवार

सदियों से जापानी उस्तादों ने मिनिएचर कला में महारत हासिल की है। वे एक विराट वृक्ष की बनैली, बेकाबू संभावनाओं को थामते हैं, उसकी टहनियों की छंटाई करते हैं, और उसकी शाखाओं को कठोर तांबे के तार से बांध देते हैं। नतीजा एक सजावटी वस्तु, एक अलंकृत बौना पेड़ होता है, जिसका आकार बिना दीवारों को तोड़े-फोड़े ड्राइंग-रूम की मेज पर रखने लायक होता है।

जापान जो काम वनस्पतियों के साथ करता है, वही आधुनिक भारतीय राज्य-तंत्र अब इंसानी संभावनाओं के साथ कर रहा है। पहले वह संरचनात्मक उपेक्षा के जरिए बच्चे के भौतिक शरीर को मुरझाने देता है। फिर, जो बच्चे जीवित बच जाते हैं, राज्य उनकी आलोचनात्मक सोच की क्षमता की काट छांट करता है, और मिथक, आज्ञाकारिता और सेनेटाइज्ड इतिहास के राजनीतिक तारों से उनके विकसनशील दिमाग को बांध देता है।

इस राजनीतिक प्रोजेक्ट का अंतिम लक्ष्य स्वतंत्र-चिंतकों की एक पीढ़ी को ऐसे नागरिकों में बदलना है जो इतने आज्ञाकारी हों कि सत्ता को कभी चुनौती न दे सकें।

गुजरात के मामले को देखें–एक ऐसा राज्य जिसे अक्सर विकास के आदर्श मॉडल के रूप में पेश किया जाता है। गुजरात की शिशु मृत्यु दर प्रति 1000 जीवित पैदाइशों पर 20 मौतें हैं, जबकि उत्तर प्रदेश में ये चौंका देने वाली 37 है। इससे पहले कि कोई भारतीय बच्चा पढ़ना सीखे, उसकी शारीरिक उत्तरजीविता राज्य की उदासीनता के ख़िलाफ़ एक ऊंची दांव वाली बाजी बन जाती है।

जो बच्चे शिशु मृत्यु और गंभीर कुपोषण की प्रतिकूलताओं को मात दे देते हैं, उनके लिए राज्य द्वारा डिजाइन की गई शिक्षा प्रणाली एक बड़े छलनी की तरह काम करती है। यह औपचारिक शिक्षा से लाखों छात्रों को उससे पहले ही बाहर कर देती है जब वे गहन बौद्धिक सवाल करना सीख पाएं।

गुजरात में माध्यमिक स्कूल ड्रॉपआउट दर 16.9% है। इस संकट को 1.6 लाख सरकारी प्राथमिक स्कूलों में केवल एक शिक्षक होने की भयावह वास्तविकता और बदतर बनाती है। यूपी में शैक्षणिक पतन और भी तेज है। बड़े पैमाने पर स्कूल बंद होने का नतीजा है कि यूपी के 2.6 लाख स्कूलों में से कक्षा 1 से कक्षा 12 तक की शिक्षा का निरंतर मार्ग देने वाले केवल 3% हैं। आधुनिक राज्य बच्चे के स्वास्थ्य को एक अनावश्यक वित्तीय खर्च और उनके बुद्धि को सीधा खतरा मानता है।

सबसे कपटपूर्ण छंटाई तो उनके लिए आरक्षित है जो शिक्षा में बने रहने में कामयाब होते हैं। राज्य-अनुमोदित पाठ्यपुस्तकों से मुगल काल को लगभग पूरी तरह से हटा दिया जाना इसका एक उदाहरण है। ऐसा करके राज्य दार्शनिक, कलात्मक और साहित्यिक लहर की उस परिघटना से बच्चे को वंचित कर देता है जिसने आरंभिक आधुनिक भारत को परिभाषित किया है। 

यह इस बात के अध्ययन को भी हटा देता है कि कैसे एक विशाल, बहु-धार्मिक साम्राज्य को संस्थागत समझौतों के माध्यम से एकजुट रखा गया था। यह इतिहास विविधता की वास्तुकला को रोशन करता था, यह दिखाता था कि कैसे सत्ताधारी वर्ग को बहुसंख्यक या एकल गुट के कब्जे को रोकने के लिए बहुलवादी मोज़ेक के रूप में बनाया गया था। इस कथा को हटाना बहुलवादी राज-व्यवस्था की संस्थागत स्मृति का अंग-भंग है।

गांधी, नेहरू, पटेल और मौलाना आजाद जैसी शख्सियतों के अद्वितीय, सहयोगात्मक और जबरदस्त ढंग से ज़ेरे-बहस रहे योगदान पर बनी ऐतिहासिक सहमति को भी व्यवस्थित रूप से ध्वस्त किया जा रहा है। गांधी की सांप्रदायिक सद्भाव की आजीवन और मूलगामी खोज को बेहद कमतर दिखाया गया है। भारत के आधुनिक वैज्ञानिक मिज़ाज, धर्मनिरपेक्ष राज्य और औद्योगिक योजना के मुख्य वास्तुकार नेहरू को नियमित रूप से उन सार्वजनिक संस्थानों के इतिहास से बाहर कर दिया जाता है जिन्हें उन्होंने बनाया था।

आजाद, एक दिग्गज स्वतंत्रता सेनानी और भारत के पहले शिक्षा मंत्री, का नाम प्रमुख ऐतिहासिक संदर्भों से चुपचाप मिटा दिया गया है।

तीव्र बहसों और स्वतंत्रता संग्राम के भीतर सोच की पूर्ण विविधता को हटाकर, राज्य ये सुनिश्चित करता है कि एक बच्चा यह न सीखे कि समझौतों के रास्ते बहुलवादी लोकतंत्र कैसे सम्भव होता है।

हम इस तरह की बुनियाद पर सचमुच में ज्ञान-अर्थतंत्र कैसे निर्मित कर सकते हैं? देश को एक ऐसे शैक्षिक परिदृश्य की सख्त जरूरत है जिसकी जड़ें, टैगोर के प्रसिद्ध शब्दों में, “मस्तिष्क की स्वतंत्रता” में निहित हों। कक्षाओं को सक्रिय रूप से असहमति का जश्न मनाना चाहिए, कठोर तुलनात्मक ऐतिहासिक विश्लेषण को बढ़ावा देना चाहिए और वैज्ञानिक मिज़ाज को पुनर्स्थापित करना चाहिए।

लेकिन जब तक हम अपने बच्चों की प्राकृतिक जिज्ञासा को काटना-छांटना बंद नहीं करते और उनके शारीरिक कल्याण और बौद्धिक स्वतंत्रता दोनों में निवेश करना शुरू नहीं करते, तब तक अगली पीढ़ी अपनी प्राकृतिक और संभाव्य ऊंचाई हासिल नहीं कर पाएगी। 

उत्साहजनक बात ये है कि जेन ज़ी आंदोलन सही सोच रखनेवाले नागरिक के रूप में विकसित होने के अपने अधिकारों को रिक्लेम कर रहा है। वे स्वास्थ्यगत कमियों और नीतिगत नाकामियों के लिए सिस्टम को दोष दे रहे हैं और साथ ही अपने ही अतीत के विचारधारात्मक पुनर्लेखन पर सक्रिय रूप से सवाल उठा रहे हैं। इसके जवाब में, राज्य दमनकारी उपायों को लागू कर रहा है। यह संघर्ष एक अवज्ञाकारी पीढ़ी द्वारा छोटा किए जाने की कोशिशों को नकारते हुए बढ़ने के लिए खुली जगह की मांग को सामने रखने का संघर्ष है।

(तस्वीर : प्रतीकात्मक। साभार : नौजवान भारत सभा, महाराष्ट्र)

(5 अगस्त प्रकाशित अशोक लाल और नसीरुद्दीन शाह का लेख इंडियन एक्सप्रेस से साभार। हिंदी अनुवाद संजीव कुमार की फेसबुक वॉल से साभार)

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