राज्यों के पुलिस स्टेट बनने का उदाहरण : नोएडा-गुड़गांव-मानेसर श्रमिक असंतोष व दमन पर जन हस्तक्षेप की जाँच रिपोर्ट  

वर्ष 2026 की शुरुआत देश में श्रमिक असंतोष से हुई। बिहार (बरौनी), हरियाणा (पानीपत रिफाइनरी), मध्यप्रदेश (सिंगरौली), छत्तीसगढ़ (कोरबा में वेदांता), आंध्र प्रदेश (अल्ट्राटेक) और तमिलनाडु समेत अनेक राज्यों में स्थित उद्योगों में श्रमिकों और खासतौर पर ठेका मजदूरों ने न्यूनतम वेज बढ़ाने, काम के घंटे तय करने तथा दोगुना ओवर टाइम व बोनस देने जैसी मांगों को लेकर धरना, प्रदर्शन और हड़ताल की।

इसके बाद कुछ औद्योगिक कंपनियों में श्रमिकों को कहीं आश्वासन या राहत अथवा संघर्ष को और तेज करने की प्रेरणा मिली। इसके बाद वेज बढ़ाने, ओवर टाइम दोगुना करने, काम के घंटे तय करने, बोनस और सम्मान का सवाल हरियाणा के गुड़गांव-मानेसर, गुजरात के सूरत, उत्तर प्रदेश के औद्योगिक शहर नोएडा और फिर उत्तराखंड तक पहुंच गया। 

नोएडा, गुड़गांव अथवा अनेक मेट्रोपॉलिटन शहरों में बड़े-बड़े टावर, हाउसिंग सोसायटी, कॉलोनी में शानदार आवास बनाने, कारें और दो पहिया वाहन बनाने, कपड़े, जूते और मोबाइल आदि उपभोक्ता वस्तुएं बनाने वाले श्रमिक जिसका वह उत्पादन तो करते हैं, लेकिन उसके उपभोग का स्वप्न भी वह नहीं देख सकते, क्योंकि उन्हें जीने लायक भरपेट भोजन कर सकने जितना वेतन भी नहीं मिलता।

वह स्लम बस्तियों और झुग्गियों में जीवन बिताते हुए सिर्फ 2 जून की रोटी जुटाने में ही अपनी पूरी क्षमता और ऊर्जा खपा देते हैं, लेकिन अब उनका सवाल देश के दर्जनों शहरों के बड़े-छोटे कारखानों एवं औद्योगिक इकाइयों में प्रमुखता से उठना शुरू हो गया है। श्रमिक खास तौर पर ठेका श्रमिक और गिग वर्कर्स संगठित हो रहे हैं और अपने सवाल मुखरता से उठा रहे हैं।

अप्रैल 2026 के पहले सप्ताह से एनसीआर के श्रमिकों के बड़े आंदोलन देखे गए और उस पर पुलिस प्रशासन एवं कंपनी प्रबंधकों के गुर्गों द्वारा बड़े पैमाने पर संयुक्त हमले, लाठी चार्ज, आगजनी और गिरफ्तारियों की घटनाएं भी देखी गईं। खास तौर पर नोएडा में श्रमिकों का बड़े पैमाने पर दमन और गिरफ्तारियां हुईं। कॉरपोरेट मीडिया में श्रमिक असंतोष को सरकार के हवाले से पाकिस्तान प्रायोजित और देश विरोधी कह कर प्रचारित किया गया।

इसको देखते हुए नागरिक अधिकार संगठन “जन हस्तक्षेप” ने एक तथ्यान्वेषी टीम नोएडा, गुड़गांव-मानेसर भेज कर मौजूदा हालात और सभी घटनाओं का संपूर्णता में अध्ययन करने का फैसला किया। इसके लिए दो अलग-अलग जांच दल बनाए गए। एक टीम 24 अप्रैल 2026 को नोएडा और दूसरी ने 17 मई 2026 को गुड़गांव-मानेसर में दौरा किया। इसके अलावा नोएडा और गुड़गांव से बाद में भी कई श्रमिक कार्यकर्ताओं व नेताओं ने, जो गिरफ्तारी के कारण जेल में थे, जमानत पर छूटने के बाद जन हस्तक्षेप जांच दल से मुलाकात कर तथ्यों की जानकारी दी।

नोएडा-गुड़गांव-मानेसर में उद्योगों और श्रमिकों की स्थितियां

नेशनल कैपिटल रीजन (दिल्ली एनसीआर) बीते दशकों में देश का सबसे बड़ा औद्योगिक और भारी भरकम श्रमिक आबादी वाला क्षेत्र बन गया है। इसमें नोएडा और ग्रेटर नोएडा उत्तर भारत के सबसे बड़े औद्योगिक क्लस्टरों में गिना जाता है। ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल, गारमेंट्स, ऑटो मोबाइल पार्ट्स, आईटी हार्डवेयर, निर्माण, वेयरहाउसिंग, निर्यात उद्योग से संबंधित छोटी-बड़ी मिलाकर 15 से 20 हजार औद्योगिक इकाइयां हैं, जिसमें लगभग 17 लाख श्रमिक कार्यरत हैं।

इसमें 3 से 5 लाख नियमित और 10 से 12 लाख ठेका श्रमिक हैं। ठेका श्रमिकों की संख्या 75 प्रतिशत से अधिक है। यहां सेक्टर 63, 64, 65, फेज वन इंडस्ट्रियल एरिया, फेज 2 इंडस्ट्रियल एरिया, नोएडा स्पेशल इकोनामिक जोन, ईकोटेक 1-12, सूरजपुर इंडस्ट्रियल एरिया, कासना इंडस्ट्रियल एरिया, और ग्रेटर नोएडा इंडस्ट्रियल बेल्ट है। यहां मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ से आने वाले अप्रवासी मजदूर बड़ी संख्या में काम करते हैं।

नोएडा अथॉरिटी और उद्योग संगठनों के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार नोएडा में लगभग 11000 औद्योगिक इकाइयां हैं। इनमें से 9700 यूनिट चालू स्थिति में हैं और लगभग 7500 फैक्ट्री एक्ट के तहत रजिस्टर्ड हैं। नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेस-वे क्षेत्र में स्थित औद्योगिक यूनिट की संख्या 15000 के आसपास है।

इनमें मैन्युफैक्चरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, गारमेंट्स, ऑटो पार्ट्स, वेयरहाउस जैसी इंडस्ट्री हैं। नोएडा में कुल श्रमिक और औद्योगिक निर्माण क्षेत्रों को मिला कर 8 से 12 लाख श्रमिक काम करते हैं। हालांकि कोविड़ काल के समय श्रम विभाग ने सिर्फ ₹38000 निर्माण श्रमिकों का रजिस्ट्रेशन किया था। बड़ी संख्या में श्रमिक असंगठित हैं और बिना किसी रजिस्ट्रेशन के ठेका व कैजुअल आधार पर काम करते हैं।

हरियाणा का गुड़गांव और मानेसर क्षेत्र देश के सबसे बड़े ऑटोमोबाइल, ऑटो पार्ट्स, गारमेंट्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और निर्यात केंद्रित उद्योग के लिए जाना जाता है, लेकिन यहां उद्योगों की संख्या और कार्यरत श्रमिकों के बारे में अलग-अलग सरकारी और औद्योगिक स्रोतों से मिले आंकड़े हैं। हरियाणा श्रम विभाग के डेटाबेस के अनुसार गुड़गांव में लगभग 20 हजार छोटी-बड़ी औद्योगिक इकाइयां हैं। इनमें सरकारी औद्योगिक, निजी औद्योगिक क्षेत्र, और पुराने औद्योगिक क्लस्टर शामिल हैं।

केवल आईएमटी मानेसर में ही उद्योग संगठनों के अनुसार लगभग 3000 फैक्ट्रियां हैं। गुड़गांव के गैर नियमित औद्योगिक इलाकों दौलताबाद, बसई, कादीपुर, बहरामपुर में 5000 से अधिक लघु और मध्यम औद्योगिक इकाइयां हैं। इसमें अकेले आईएमटी मानेसर में साढ़े 3 से 4 लाख श्रमिक काम करते हैं। इनमें लगभग एक लाख से अधिक श्रमिक ठेके पर काम करते हैं। मानेसर की अनेक फैक्ट्रियों में ठेका श्रमिक बहुसंख्यक हैं, जो विभिन्न ठेका एजेंसियों अथवा ठेकेदारों द्वारा काम पर रखे जाते हैं।

ऑटोमोबाइल और ऑटो पार्ट्स उद्योग में पिछले डेढ़ दशक से ठेका श्रमिकों का अनुपात तेजी से बढ़ा है। अधिकांश कंपनियों में स्थाई श्रमिकों की संख्या ठेका मजदूरों की तुलना में कम होती गई है। हरियाणा के औद्योगिक संगठनों और श्रम विभाग के अनुमानों के अनुसार गुडगांव-मानेसर बेल्ट में कुल औद्योगिक श्रमिक लगभग 10 लाख हैं। इनमें 3 लाख श्रमिक स्थाई और 7 लाख ठेका पर काम करते हैं।

एनसीआर के गुरुग्राम, मानेसर, फरीदाबाद, ग्रेटर नोएडा, नोएडा, गाजियाबाद, बहादुरगढ़, नारायणा, वजीरपुर, मायापुरी, बवाना, नरेला सहित कुल 24 मान्यता प्राप्त औद्योगिक क्षेत्र हैं। इसके अलावा एनसीआर में सैकड़ों औद्योगिक क्लस्टर एरिया भी हैं। बहुत सारे लघु उद्योग रजिस्टर्ड भी नहीं हैं, जो रिहायशी इलाकों में चलते हैं। इसलिए वहां कोई श्रम कानून लागू नहीं होता।

इस तरह यहां छोटी बड़ी हजारों औद्योगिक इकाइयों, निर्माण क्षेत्रों सहित 80 लाख से डेढ़ करोड़ स्थाई और अस्थाई प्रवृत्ति के श्रमिक काम करते हैं। हालांकि कोई सरकारी आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, जो बता सके कि कितनी औद्योगिक इकाइयां हैं और उनमें कितने श्रमिक हैं। मीडिया रिपोर्ट्स, निजी अध्ययनों और इंटर नेट पर उपलब्ध आंकड़े ही एकमात्र अनुमानित स्रोत हैं। 

एनसीआर में बड़ी संख्या में कामगार अनौपचारिक हैं, क्योंकि कंपनी में वह कच्चे रजिस्टर पर हैं। बोनस, ईपीएफ, ईएसआई, अवकाश जैसी जरूरी सुविधाएं भी उन्हें नहीं मिलती, तो उनका कोई सरकारी रिकॉर्ड भी नहीं है। इसलिए वास्तविक आंकड़े उपलब्ध नहीं हो पाते। फिलहाल इतना साफ है कि दिल्ली-एनसीआर देश का सबसे बड़ा औद्योगिक और श्रमिक आबादी का केंद्र बन चुका है, जहां वह बेपनाह शोषण और अमानवीय स्थितियों में काम कर रहे हैं।

दो दशकों से देश के औद्योगिक श्रमिकों को संघर्ष और शहादत से मिले तमाम अधिकार समाप्त हो चुके हैं और फैक्ट्री मजदूर कंपनियों के नहीं ठेकेदारों के रहमो-करम पर निर्भर हैं। केंद्र सरकार द्वारा श्रम कानूनों को समाप्त कर, चार लेबर कोड लागू करने के बाद हालात और तेजी से बिगड़े हैं, जिससे श्रमिक असंतोष नोएडा-गुडगांव ही नहीं देश के कई राज्यों के औद्योगिक इलाकों में रह-रह कर भड़क रहा है।

गुड़गांव-मानेसर फैक्ट फाइंडिंग टीम के सदस्य

  • ईश मिश्र, पूर्व प्रोफेसर, हिंदू कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय)  
  • सिद्धार्थ, नागरिक अधिकार कार्यकर्ता 
  • अनिल दुबे, सहसंयोजक, जन हस्तक्षेप एवं वरिष्ठ पत्रकार  
  • हैदर नकवी, वरिष्ठ टीवी पत्रकार

जन हस्तक्षेप जांच दल को प्राप्त तथ्य

जन हस्तक्षेप की टीम ने तथ्यों की जांच में पाया कि मजदूरों का असंतोष लंबे समय से था, क्योंकि श्रमिकों और ठेका मजदूरों का न्यूनतम वेतन हरियाणा सरकार ने 10 वर्षों से नहीं बढ़ाया था। वेज बढ़ोतरी के लिए गुड़गांव-मानेसर औद्योगिक क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिक ट्रेड यूनियन निरंतर विरोध प्रदर्शन कर रही थीं। कम वेतन, बेतहाशा बढ़ रही महंगाई और गैस की कीमत चौगुनी होने से श्रमिक त्रस्त हो गए थे।

जांच दल ने अपने अध्ययन में पाया कि गुड़गांव-मानेसर में जुझारू मजदूर आंदोलनों का इतिहास रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में कंपनी मालिकों और आरएसएस-बीजेपी की सरकार ने श्रमिकों के जीने लायक न्यूनतम वेतन को ही नहीं समाप्त किया, बल्कि उनके यूनियन बनाने और विरोध प्रकट करने जैसे संवैधानिक एवं कानूनी अधिकारों को भी समाप्त कर दिया है। 

जन हस्तक्षेप की चार सदस्यीय टीम 17 अप्रैल 2026 को गुड़गांव पहुंची। टीम ने प्रभावित मजदूरों और भोंडसी जेल में बंद श्रमिक कार्यकर्ताओं की स्थिति, जेल से छूटे श्रमिक नेताओं, कार्यकर्ताओं और गिरफ्तार लोगों के परिजनों से मिल कर विस्तृत बातचीत की। यहां पुलिस प्रशासन ने 95 एफआईआर में 44 लोगों को गिरफ्तार किया था, जिसमें 22 महिलाएं भी थीं।

बाद में उन्हें जमानत पर छोड़ गया। इसके अलावा 94 एफआईआर में 17 लोग हिरासत में लिए गए थे। इसमें से कई को 307 के तहत भोंडसी जेल में रखा गया। जांच दल के लौटने के दूसरे दिन सोमवार 18 अप्रैल को वेल सोनिका यूनियन के जनरल सेक्रेटरी अजीत सिंह की जमानत हो गई। शेष लोग रिपोर्ट लिखे जाने तक जेल में थे और उनकी जमानत की कोशिशें जारी थीं।

जन हस्तक्षेप की टीम ने तथ्यों की जांच में पाया कि मजदूरों का असंतोष लंबे समय से था, क्योंकि श्रमिकों और ठेका मजदूरों का न्यूनतम वेतन हरियाणा सरकार ने 10 वर्षों से नहीं बढ़ाया था। वेज बढ़ोतरी के लिए गुड़गांव-मानेसर औद्योगिक क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिक ट्रेड यूनियन निरंतर विरोध प्रदर्शन कर रही थीं। कम वेतन, बेतहाशा बढ़ रही महंगाई और गैस की कीमत चौगुनी होने से श्रमिक त्रस्त हो गए थे। श्रमिकों के असंतोष को देखते हुए 2025 में वेज बढ़ाने को लेकर राज्य सरकार ने एक कमेटी बनाई थी।

इसमें कंपनियों का प्रबंधन एसोसिएशन, ट्रेड यूनियन और श्रम विभाग के प्रतिनिधि सदस्य थे। अंतिम बैठक दिसंबर में हुई, जिसमें न्यूनतम मजदूरी वृद्धि पर सहमति बनी। जिसे 1 अप्रैल 2026 से लागू करना था। बाद में हरियाणा सरकार ने कमेटी की रिपोर्ट में संशोधन करते हुए 3 अप्रैल को 15220 रुपए न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने पर सहमति दी और फिर 8 अप्रैल को उसका नोटिफिकेशन जारी किया। यहां एक गौरतलब तथ्य है कि इसी दौरान हरियाणा सरकार ने गुड़गांव-मानेसर सहित कई जिलों में बड़े पैमाने पर प्रशासनिक तबादले किए थे।

गुड़गांव-मानेसर में श्रमिक असंतोष की पृष्ठभूमि 

17 मई को जन हस्तक्षेप जांच दल की गुड़गांव में वेल सोनिका यूनियन के जनरल सेक्रेटरी अजीत सिंह से मुलाकात नहीं हो सकी थी, क्योंकि तब वह जेल में थे। जेल से छूटने के बाद 28 मई को जांच दल ने उनसे संपर्क किया, तो उन्होंने बताया कि यहां ऑटोमोबाइल और गारमेंट्स आदि सभी कंपनियों में ज़्यादातर ठेका श्रमिक हैं, जो दो से 5 वर्षों से कम कर रहे हैं। गारमेंट्स कंपनियों में तो लगभग 100% ठेका श्रमिक काम करते हैं।

बीते 10 वर्षों से हरियाणा सरकार ने न्यूनतम वेतन में कोई बढ़ोतरी नहीं की और उन्हें 11200 रूपए का वेज मिलता है। इस वेज में कोई महंगाई भत्ता नहीं जुड़ता। साथ ही यह वेतन भी पूरा श्रमिक के हाथ में नहीं आता, क्योंकि ईएसआई और फंड के नाम पर कंपनी पैसा काट तो लेती थी, जबकि ठेके पर होने के कारण उन्हें मेडिकल, बीमा या फंड की कोई सुविधा नहीं मिलती। इस तरह कटने के बाद ₹11000 या उससे कम ही वेतन उनके हाथ आता है।

उन्होंने बताया कि कुशल, अर्ध कुशल और पूर्ण कुशल श्रमिक की श्रेणी केवल नाम के लिए है। मशीन पर काम करने वाला कोई भी श्रमिक कुशल ही कहा जाएगा, लेकिन ठेका मजदूरों को वर्षों तक मशीनों पर काम करने के अनुभव के बाद भी अकुशल मानते हुए कंपनियां उन्हें ₹11000 ही देती रहीं।

10 वर्षों में कई गुना महंगाई बढ़ जाने से 11 हजार रुपए में श्रमिक परिवार नहीं चला सकता। इसलिए उसे 4 घंटे का ओवर टाइम करना ही पड़ता है। डबल ओवर टाइम भुगतान का नियम होने के बावजूद उन्हें सिंगल ओवर टाइम ही दिया जाता है। इसके अलावा जब कोई श्रमिक स्थाई तौर पर काम कर रहा है, तो उसे ठेका कर्मी नहीं कह सकते, लेकिन कंपनियां इस नियम को नहीं मानतीं। इसकी वजह यह है कि अब कंपनियों में एक अलग तरह का शासन तंत्र है।

मजदूरों को राहत यूनियन के जरिए ही मिल सकती है, लेकिन ठेका श्रमिकों को यूनियन बनाने या पहले से चल रही यूनियन में शामिल होने का भी अधिकार नहीं है। उनकी यूनियन ना होने से कार्यस्थल पर उनको सम्मान भी नहीं मिलता। अभी अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण महंगाई और गैस के मूल्यों में कई गुना बढ़ोतरी हो गई। ज्यादातर वर्कर गुड़गांव व मानेसर के गांवों में रहते हैं और जिन घरों में वह किराया देकर रहते हैं। वही मकान मालिक गैस व किराना की दुकान भी चलाता है और श्रमिक उसी से खरीदारी के लिए विवश है। वहां उनका एक अलग किस्म का शोषण होता है।

गुड़गांव-मानेसर आंदोलन की शुरुआत 

अजीत सिंह ने घटना की शुरुआत कैसे हुई, इस पर बताया कि होंडा ऑटोमोबाइल कंपनी के कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले श्रमिकों ने 2 अप्रैल 2026 को हड़ताल की थी। उनकी 4 मांग थी- वेतन ₹11000 से बढ़कर ₹20000 किया जाए, ओवर टाइम 2 गुना किया जाए, बोनस एक्ट के तहत दीपावली से पहले बोनस दिया जाए और उनकी चौथी मांग यह थी कि कार्य स्थलों पर उनके साथ सम्मानजनक व्यवहार किया जाए।

होंडा के ठेका श्रमिकों ने 2 तारीख को गेट पर हड़ताल की, तो कंपनी ने 5 सदस्यीय कमेटी बनाई, जिसमें जिला प्रशासन, कंपनी प्रबंधन, श्रम विभाग और श्रमिकों के प्रतिनिधि शामिल थे। कमेटी ने बातचीत के बाद ₹1500 की वेतन बढ़ोतरी का प्रस्ताव दिया, जिसे श्रमिकों ने ठुकरा दिया। रात को श्रमिक अपने घरों को चले गए और 3 अप्रैल को पुनः आए तो प्रशासन ने उन्हें गेट पर धरना देने से रोक दिया।

श्रमिक वहां से उठकर तहसील स्थित पार्क में आ गए, जहां परंपरागत रूप से आंदोलनकारी बैठते रहे हैं। इसके बाद प्रशासन और कंपनी प्रबंधन ने फिर से नई कमेटी बनाने का प्रस्ताव दिया और अपने प्रतिनिधि भेजे। 2 घंटे की वार्ता हुई जिसमें न्यूनतम वेज 16000 रुपए का प्रस्ताव स्वीकृत हो गया। उसमें डबल ओवर टाइम और बोनस देने के अलावा रात्रि ड्यूटी करने पर अतिरिक्त अलाउंस (भुगतान) देने पर भी सहमति बनी। कंपनी प्रबंधन ने यह भी वादा किया कि दो दिन की हड़ताल में शामिल किसी भी ठेका श्रमिक को नौकरी से नहीं निकाला जाएगा और ना उनके खिलाफ कोई कार्यवाही होगी।

उन्होंने बताया कि होंडा की मुख्य कंपनी के श्रमिकों की इस जीत के बाद होंडा की सहायक कंपनियों मुंजाल सोवा, जो होंडा के लिए शाकर बनाती है, उसके ठेका श्रमिक भी धरने पर बैठ गए। उन्होंने भी वही मांगे दोहराईं। इसके बाद हीरो ऑटोमोबाइल कंपनी की वेंडर कंपनी सत्यम के ठेका श्रमिक जिनकी संख्या लगभग 1000 है वह भी धरने पर बैठ गए। सभी कंपनियों के ठेका श्रमिक मानेसर तहसील पर जुटने लगे। उसमें 5 अप्रैल को रूप पॉलीमर के ठेका कर्मी भी शामिल हो गए।

इसके बाद 7 अप्रैल को गारमेंट सेक्टर की रिचा ग्लोबल कंपनी और उसकी सहायक कंपनियों रिचिको, मोडोलमा के श्रमिक भी तहसील मुख्यालय पर धरना देने पहुंचे। सभी कंपनियों के ठेका कर्मचारियों की वही मांगे थीं, जिसे होंडा कंपनी अपने ठेका श्रमिकों के लिए मंजूरी दे चुकी थी।

कई कंपनियों के ठेका श्रमिकों के संयुक्त होते जा रहे आंदोलन से वार्ता के लिए जिला प्रशासन, श्रम विभाग और कंपनी प्रबंधन के प्रतिनिधि श्रमिकों के साथ बैठ कर वार्ता करते रहे। हालांकि इस दौरान ट्रेड यूनियन या ठेका श्रमिकों के बीच काम करने वाले एक्टिविस्टों को धरना स्थल पर जाने से पुलिस प्रशासन और कंपनी प्रबंधन लगातार रोकता रहा। श्रमिकों के साथ हो रही वार्ताओं में किसी भी रजिस्टर्ड ट्रेड यूनियन को शामिल नहीं होने दिया गया।

यहां तक कि धरना स्थल पर भी उन्हें नहीं जाने दिया जा रहा था। 7 अप्रैल को अजीत सिंह, श्यामवीर, हरीश, राजू और विकास के अलावा इंकलाबी मजदूर केंद्र से संबंधित ट्रेड यूनियन लीडर आकाश, जो मुंजाल सोवा कंपनी में ठेका श्रमिक के तौर पर कार्यरत हैं। उनको हरियाणा सरकार की क्राईम इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (सीआईए) ने गिरफ्तार कर लिया। उसने 4 लोगों को धरना स्थल से और 2 को घर से गिरफ्तार किया। देर रात पूछताछ के बाद उन्हें यह चेतावनी देकर छोड़ा गया- “आप लोग मानेसर में दोबारा दिखाई ना दें।“

उन्होंने बताया कि इधर कई कंपनियों के ठेका श्रमिकों की हड़ताल 8 अप्रैल को भी जारी रही। कंपनियों ने पैसा बढ़ाने से इनकार कर दिया, लेकिन ओवरटाइम पर वार्ता करने की बात कही। हालांकि 8 अप्रैल को ही हरियाणा सरकार ने अकुशल श्रमिकों को 15200 और कुशल श्रमिक को 18000 रुपए के न्यूनतम वेज की घोषणा कर दी। पुलिस प्रशासन ने पूरे इलाके में 9 अप्रैल को धारा 144 लगा दी। श्रमिकों को भी लगा कि उनकी मांगे मान ली गई हैं। इसलिए वह भी धरना स्थल पर नहीं आए।

रिचा ग्लोबल मोगलामा एक्सपोर्ट कंपनी के ठेका कर्मचारियों ने कंपनी प्रबंधन से कहा कि सरकार ने वेज बढ़ा दिया है, तो कंपनी वेज बढ़ोतरी की नोटिस बोर्ड पर लगा दे। प्रबंधन ने नोटिस लगाने से मना कर दिया। अजीत सिंह ने बताया कि इसके तुरंत बाद प्रबंधन ने पुलिस बुला ली और फैक्ट्री गेट पर बैठे श्रमिकों पर बर्बर लाठीचार्ज कराया। लाठीचार्ज में महिलाएं भी बुरी तरह से घायल हुईं। पुलिस की मौजूदगी में तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाएं होने लगी, जबकि श्रमिक लाठी चार्ज के बाद वहां से भाग गए थे।

उन्होंने बताया कि इसी समय लाठीचार्ज की घटना की निंदा करने के लिए मैं 12 बजे दोपहर में ज्ञापन देने डिप्टी कलेक्टर ऑफिस गया था। वहां से लौटते समय मुझे गिरफ्तार कर लिया गया। इस बीच 30 ठेका श्रमिक जिनमें 10 महिलाएं भी शामिल थीं। अस्सिटेंट लेबर कमिश्नर के पास लाठी चार्ज की शिकायत लेकर पहुंचे। इन सभी को काफी चोटें लगी थीं। एएलसी को  ज्ञापन देकर लौटते समय उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया।

अजीत सिंह ने बताया कि हरीश, श्यामवीर और मुझे पुनः गिरफ्तार करके सीआईए के आफिस ले जाया गया। इसी समय 11 श्रमिक भी गिरफ्तार करके वहां लाए गए थे। रात 11 बजे मुझे 3 लोगों की जमानत के बाद छोड़ दिया गया। उन्होंने बताया कि गांव में छापे मार कर पुलिस ने 44 लोगों को गिरफ्तार किया, जिनमें महिलाएं भी शामिल थीं। रात भर पूरे इंडस्ट्रियल मॉडल टाउन शिप (आईएमटी) में पुलिस ने दहशत मचा रखी थी।

12 अप्रैल को मुझको और मेरे 6 अन्य साथियों को पुनः घरों से उठाकर सीआईए के नवयुरामपुर थाने में लाया गया और दूसरे दिन मीडिया में प्रचारित किया गया कि श्रमिकों को भड़काने और हिंसा के हम सब मास्टरमाइंड थे। उन्होंने बताया कि 94 एफआईआर में गिरफ्तार 17 श्रमिकों में से 15 अभी भी जेल में हैं और हम लोग न्यायिक कार्रवाई के साथ विरोध जारी रखे हुए हैं। यहां 10 मई को भी दो कंपनियों में हड़ताल हुई है, क्योंकि कई कंपनी ने बढ़ा वेतन देना शुरू नहीं किया है। वहीं हरियाणा इंडस्ट्रियल चैंबर ऑफ़ कॉमर्स ने साफ-साफ कह दिया है कि हम बढ़ा वेतन नहीं दे सकते।

फर्जी मुकदमे और जेल में मुलाकात मुश्किल

मारुति वेंडर कंपनी वेल सोनिका ऑटो कंपोनेंट इंडिया इंप्लाइज यूनियन के अध्यक्ष मोहिंदर कपूर ने बताया कि पुलिस ने दो महिला कांस्टेबल पर हमले के आरोप में जिन साथियों को गिरफ्तार किया है, उन पर हत्या के प्रयास जैसी गंभीर धाराएं लगाई गई हैं। लेकिन महिला कांस्टेबल की मेडिकल रिपोर्ट में किसी भी तरह की चोट अथवा उसका निशान होने का मेडिकल सर्टिफिकेट नहीं है।

कपूर ने बताया कि भोंडसी जेल में बंद लोगों से उनके परिजन तभी मुलाकात कर सकते हैं, जब जेल में बंद व्यक्ति किस परिजन से मिलना चाहता है, उसका ब्योरा परिजन और जेल प्रशासन को खुद दे। ऐसे में मुलाकात का संदेश परिवार तक भेजने में काफी समय लग रहा है और मुलाकात नहीं हो पाती। उन्होंने बताया कि पुलिस के लाठी चार्ज के बाद श्रमिक भंगरोला, नाहरपुर, बांसगांव आदि गांवों में जहां वह रहते थे, अपने घरों में चले गए थे। पुलिस ने गांवों में घुसकर लोगों को पीटा और गिरफ्तार किया। 

उन्होंने बताया कि श्रमिकों में लंबे समय से असंतोष था और वह वेज बढ़ाने की मांग करते रहे हैं। इसीलिए हरियाणा सरकार ने 2025 में वेज को लेकर एक कमेटी बनाई, जिसमें कंपनी प्रबंधन, प्रशासनिक अधिकारी, श्रम विभाग और ट्रेड यूनियन के प्रतिनिधियों को रखा गया था। दिसंबर में कमेटी ने आम सहमति से 23096 रूपए न्यूनतम वेज तय किया था। इसे 1 अप्रैल से लागू करना था, लेकिन बाद में हरियाणा सरकार ने उसे घटा कर 15220 रुपए कर दिया।

इस बढ़ोतरी का नोटिफिकेशन 8 अप्रैल को किया गया। उन्होंने कहा कि यदि सभी कंपनी मालिक बढ़े वेज का नोटिस लगा देते, तो ठेका श्रमिकों को कुछ संतोष मिलता, जबकि होंडा कंपनी ने पहले ही वेज बढ़ा कर दे दिया था। इससे श्रमिकों का असंतोष काफी बढ़ गया।

वेल सोनिका यूनियन के कोषाध्यक्ष पिंटू कुमार यादव को भी भोंडसी जेल में रखा गया है। उनकी पत्नी रुक्मणी ने बताया कि 12 अप्रैल को 12 बजे रात में सादी वर्दी में कुछ लोग आए और उनके पति को गिरफ्तार कर लिया। इस दौरान वह भद्दी गलियां दे रहे थे। उन्होंने गिरफ्तारी का कोई कागज नहीं दिखाया। सुबह यूनियन के लोगों के साथ सेक्टर 7 मानेसर थाने पर गए तो वहां भी गालियां दी गईं और कुछ नहीं बताया गया। बाद में पता चला कि पिंटू कुमार को पुलिस लाइन में रखा है और 307 का केस लगाया गया है। इसी रात को अजीत सिंह सहित अन्य लोग भी गिरफ्तार कर लिए गए।

ठेका श्रमिक आकाश की पत्नी दिव्या ने बताया कि उनके पति को रात में गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी के लिए गेट तोड़ दिया और गालियां देते हुए घर में घुस गए। इसके बाद हमने 100 नंबर पर फोन किया, तो दूसरे दिन पता चला कि आकाश को गिरफ्तार करू जेल भेज दिया गया है। 15 अप्रैल को बहुत मुश्किल से जेल में आकाश से मुलाकात हो सकी। उनको दूसरे अन्य आपराधिक मामलों में बंद कैदियों के साथ रखा गया है।

जेल में श्रमिकों को घर से साबुन, तेल, टूथपेस्ट आदि दैनिक उपयोग की वस्तुएं देने की भी अनुमति नहीं दी गई है और यह सब चीजें कैदियों को जेल कैंटीन से खरीदनी पड़ रही है, जो बहुत महंगी हैं। उन्होंने बताया कि इसके पहले 7 अप्रैल को भी आकाश को पूछताछ के लिए गिरफ्तार किया गया था और फिर निजी मुचलके पर छोड़ा था। यह सारी गिरफ्तारियां सीआईए ने की। जन हस्तक्षेप जांच दल को बताया गया कि सभी गिरफ्तार लोगों के मोबाइल आदि उपकरण अभी तक जप्त हैं।

महेंद्र कपूर ने बताया कि गुड़गांव-मानेसर आंदोलन की पृष्ठभूमि में श्रमिकों का लंबे समय से असंतोष है। बहुत ही कम वेतन, ओवरटाइम दुगना ना देना, कार्यस्थलों पर असम्मानजनक व्यवहार, बेतहाशा बढ़ रही महंगाई और फिर एलपीजी की कीमतों में चार गुना वद्धि ने माचिस का काम किया। जांच टीम के इस सवाल पर कि श्रम कानूनों की यहां क्या स्थिति है? उन्होंने बताया कि ठेका श्रमिकों को यूनियन बनाने का अधिकार नहीं है और यदि कोई यूनियन उन्हें सदस्य बनाती है, तो कंपनी प्रबंधन की शिकायत पर श्रम विभाग यूनियन की मान्यता रद्द कर देता है।

उन्होंने बताया कि अपनी ट्रेड यूनियन में ठेका कर्मियों को, जब सदस्य बनाना शुरू किया, तो प्रबंधन की नोटिस पर ट्रेड यूनियन रजिस्ट्रार ने मुझे नोटिस दिया कि ठेका श्रमिक को निकालिए नहीं तो मान्यता रद्द हो जाएगी। मैंने ऐसा नहीं किया, तो उन्होंने यूनियन की मान्यता रद्द कर दी और कंपनी प्रबंधन ने नई यूनियन बना दी। अब यह मामला हाई कोर्ट में विचाराधीन है। 

जांच दल के एक सवाल के ज़वाब में उन्होंने बताया कि श्रमिकों में बड़े पैमाने पर असंतोष और आंदोलन की बड़ी वजह 4 लेबर कोड का सरकार द्वारा व्यापक प्रचार भी रहा है, क्योंकि इधर सरकार ने 4 श्रम संहिता को श्रमिकों के पक्ष में बताते हुए व्यापक प्रचार किया था कि इससे सभी तरह के श्रमिकों का न्यूनतम वेतन बढ़ जाएगा और ओवर टाइम दोगुना कर दिया जाएगा। श्रमिकों को कई महीनों से अपेक्षा थी कि यह जल्द ही लागू हो जाएगा, लेकिन कंपनियों ने इसको पूरी तरह नजरअंदाज किया।

अजीत सिंह ने बताया कि आंदोलन में कम वेतन और बेतहाशा बढ़ रही महंगाई प्रमुख कारण है और वह असंतोष अभी भी बना हुआ है। कोरोना के पहले तक श्रमिकों की स्थिति इतनी बुरी नहीं थी। 2019 में वेल सोनिका कंपनी ने 450 पुराने श्रमिकों को निकाल दिया। होंडा ने भी आर्थिक मंदी का हवाला देकर 2000 से अधिक ठेका कर्मियों को नौकरी से निकाला था और वह सभी लगभग 10 वर्षों से कम कर रहे थे।

उन सभी ने धरना देना शुरू किया, तो बातचीत के टेबल पर श्रमिकों को मुआवजे के तौर पर कुछ भुगतान देकर मामला सुलझाया गया। उन्होंने बताया कि वह सभी श्रमिक 15 से लेकर 30 हजार रुपए तक का वेतन पाते थे। उस समय उनकी यूनियन भी थी, लेकिन कोरोना खत्म होने के बाद कंपनियों ने नये श्रमिकों को ठेके पर नौकरी दी, तो उन्हें 11 हजार रुपए ही देना शुरू किया। 

उन्होंने बताया कि यह ट्रेंड दूसरे अन्य उद्योगों की कंपनियों में भी शुरू हो गया। ठेका श्रमिक यूनियन से नहीं जुड़ सकते, क्योंकि वह ठेकेदारों के माध्यम से आते हैं। कंपनी प्रबंधन का यूनियनों पर दबाव है कि वह ठेका श्रमिकों को अपना सदस्य नहीं बना सकते, अधिकांश कंपनियों में यूनियन है, लेकिन उसमें ठेका श्रमिक सदस्य नहीं बन सकते और ठेका श्रमिकों के सवाल पर मान्यता प्राप्त बड़ी ट्रेड यूनियन खामोश रहती हैं, जिन छोटी ट्रेड यूनियनों ने ठेका श्रमिकों को सदस्य बनाने का साहस किया तो उनकी मान्यता समाप्त कर दी।

वेल सोनिका कंपनी की ट्रेड यूनियन इसका बड़ा उदाहरण है, जिसने ठेका कर्मियों को सदस्य बनाया तो कंपनी ने उसकी मान्यता लेबर आफिस (ट्रेड यूनियन रजिस्ट्रार) से शिकायत कर समाप्त करवा दी और कंपनी ने नई यूनियन बनवा दी। 

उन्होंने कहा कि ट्रेड यूनियन एक्ट 1926 के तहत किसी भी यूनियन का पंजीकरण होता है। उसमें श्रमिकों की श्रेणी ठेका, स्थाई, कुशल अथवा अर्ध कुशल के तौर पर नहीं होती। वह सिर्फ श्रमिक होते हैं, लेकिन अब श्रम विभाग व कंपनी प्रबंधकों की मिलीभगत से ट्रेड यूनियन और श्रमिकों की परिभाषा ही बदल दे रहे हैं। इसी तरह कॉन्ट्रैक्ट वर्कर भी मशीन पर काम करता है, तो उसे कुशल माना जाना चाहिए, लेकिन वर्षों तक काम करने के बाद भी वह अकुशल ठेका श्रमिक ही बना रहता है।

अजीत सिंह ने बताया कि ठेका श्रमिक शब्द पहली बार 1970 में कॉन्ट्रैक्ट वर्कर रेगुलेशन एक्ट में आया था। उस समय सरकार ने यह दलील दी थी कि इसे इसलिए लाया जा रहा है ताकि कुछ अस्थाई किस्म के काम जैसे कंपनी में रंगाई, पुताई अथवा अन्य निर्माण संबंधी कार्यों के लिए बाहर से लाए गए श्रमिकों के लिए मिनिमम वेज का नियम और भुगतान व्यवस्थित रहे।

1990 के बाद शुरू हुई आर्थिक उदारीकरण की नीतियां लागू होने के बाद कंपनियों ने अपने पूरे उत्पादन से संबंधित कार्यों वाली नौकरियों पर ही उसे लागू करते हुए ठेका व्यवस्था कर दिया। नयी आर्थिक नीतियों और ग्लोबलाइजेशन का श्रमिकों के लिए यह सबसे बड़ा झटका था।

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जन हस्तक्षेप नोएडा फैक्ट फाइंडिंग टीम के सदस्य

  • एस.एस. नेहरा, सीनियर एडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट 
  • अशोक शर्मा, विदेश सेवा के पूर्व अधिकारी, 
  • ईश मिश्र, पूर्व प्रोफेसर, हिंदू कॉलेज (डीयू) 
  • अनिल दुबे, सहसंयोजक, जन हस्तक्षेप और वरिष्ठ पत्रकार, 
  • एम.जेड. अली, सीनियर एडवोकेट

जन हस्तक्षेप जांच टीम 13 अप्रैल 2026 को नोएडा में श्रमिकों के आक्रोश और उस पर पुलिस दमन की घटना के 11 वें दिन प्रभावित क्षेत्रों में पहुंची। टीम ने श्रमिक आंदोलन से संबंधित सभी पक्षकारों से संपर्क की कोशिश की। खासतौर पर हमारी बातचीत श्रमिकों से ही हो सकी, क्योंकि कंपनी प्रबंधन और प्रशासन से कोशिश के बाद भी मुलाकात नहीं हो सकी। टीम ने श्रमिकों के कार्यस्थलों और आवासीय इलाकों का भी दौरा किया और बहुत सारे नये पहलू उजागर हुए।

मसलन श्रमिकों को नौकरी के दौरान मिलने वाले कम वेतन, कार्य स्थलों पर असम्मान, (महिला श्रमिकों के संदर्भ में) सामाजिक, शैक्षणिक और स्वास्थ्य सुरक्षा, विश्राम के घंटे आदि। श्रमिकों की आवासीय स्थिति को भी हमने देखा। श्रमिकों के नोएडा स्थित आवास आसपास के गांवों और हिंडन नदी के डूब क्षेत्रों में बनी कॉलोनियों में है, जिन्हें स्लम कहना ज्यादा उपयुक्त है। आमतौर पर एक कमरे में ही पूरा परिवार रहता है। अथवा 8 बाई 10 के कमरे में 5-7 श्रमिकों का रहन-सहन और खाना पीना होता है।

नोएडा में श्रमिकों के भड़के असंतोष को टीम ने उपरोक्त तथ्यों की रोशनी में देखने की कोशिश की है कि 15 से 20 वर्षों से श्रमिक 10-11 हजार रुपए की नौकरी कर रहे हैं। किस तरह से मजदूरों के अंदर बीते दशकों से असंतोष पनप रहा था और उनके विरोध प्रदर्शन के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने 1 अप्रैल 2026 से न्यूनतम वेतन में 21% की वृद्धि की घोषणा की, जो प्रतिशत में बहुत, लेकिन रुपए में बहुत मामूली है।

वृद्धि के अनुसार नोएडा में अकुशल मजदूरों का वेतन 13690 रूपए, अर्ध कुशल का 15059 और कुशल श्रमिकों का 16864 रुपए प्रतिमाह किया गया है। बेतहाशा बढ़ रही महंगाई में नाम मात्र की हुई इस वृद्धि को भी कंपनियां लागू करेंगी या नहीं ? सरकार ने इसको सुनिश्चित करने के लिए अभी तक कोई घोषणा नहीं की है।

हालांकि जांच दल को बाद में बताया गया कि अधिकांश कंपनियों में वृद्धि लागू हो गई है, लेकिन कुछ कंपनियां कभी भी न्यूनतम वेज देने का नियम नहीं मानतीं। फिर भी यह वृद्धि जलते तवे पर बूंद के समान है, जिससे श्रमिक संतुष्ट नहीं हैं। श्रमिकों की मांग न्यूनतम वेतन प्रतिमाह ₹20000 की है।

नोएडा श्रमिक आंदोलन की शुरुआत और तथ्य

टीम ने पाया कि पुलिस द्वारा बड़े पैमाने पर किए गए एक्शन और लगभग 1000 महिला-पुरुषों की गिरफ्तारी के बाद कुछ दिनों तक उन्हें और उनके परिजनों को प्रताड़ित और अपमानित किया गया। इसके बाद उनमें से लगभग 100 लोगों को छोड़ कर, बाकी को रिहा कर दिया। घटना के 11 दिन बाद भी बड़े पैमाने पर पुलिस बलों की पूरे क्षेत्र में, बाजारों, श्रमिकों के आवासीय इलाकों और कंपनियों के आसपास तैनाती थी।

इससे श्रमिक डरे हुए थे और जांच दल से बातचीत करने से कतरा रहे थे। यही नहीं, जिन प्रशासनिक अधिकारियों से टीम ने बातचीत करनी चाही, उन्होंने मिलने और बातचीत से इंकार कर दिया। बल्कि रिपोर्ट में मुलाकात करने की कोशिश का उल्लेख करने से भी मना किया। उनका कहना था कि “ऊपर” से आदेश है कि श्रमिक आंदोलन के संदर्भ में किसी से कोई बात ना की जाए।

श्रमिकों, उनके परिजनों एवं प्रशासनिक अधिकारियों में व्याप्त भय और सत्ता के कथित “ऊपरी” आतंक की इस स्थिति को देखते हुए जन हस्तक्षेप की टीम ने सर्वसम्मति से तय किया कि वह अपनी नोएडा संबंधी रिपोर्ट में किसी भी श्रमिक, उनके परिजन, प्रशासनिक अधिकारी और घटनास्थल के गवाहों के असली नाम व काम का उल्लेख नहीं करेगी। इसलिए आगे रिपोर्ट में सभी नामों को संबंधित व्यक्तियों की इच्छा के अनुरूप परिवर्तित कर दिया गया है। 

जन हस्तक्षेप की टीम को एक कंपनी में काम कर रहे बलिया से आए कामगार रतनलाल ने बताया की यहां बहुत सारी ऐसी कंपनियां हैं, जिसमें सिर्फ मालिक ही हैं ! कंपनियां ठेकेदारों को चेक से पैसा देती हैं और फिर ठेकेदारों के अकाउंट से श्रमिकों को भुगतान होता है। इस तरह कंपनी कोई सैलरी स्लिप या नियुक्ति का कागज नहीं देती। यहां तक की हाजिरी रजिस्टर भी कच्चा होता है।

घटना की शुरुआत किस तरह हुई, इस पर उन्होंने बताया कि रिचा ग्लोबल गारमेंट्स कंपनी जो स्पोर्ट्स और कपड़े बनाती है। उसकी ब्रांच व सहायक कंपनियां गुड़गांव में भी है। उसने एक ब्रांच नोएडा 83 में भी खोला है। हरियाणा में वह जो वेज देती है, नोएडा में नहीं देती। इसको लेकर कर्मचारियों में असंतोष पहले से था कि एक ही कंपनी कुछ किलोमीटर की दूरी पर अलग-अलग वेज क्यों दे रही है। इधर गुड़गांव-मानेसर में आंदोलन और वेज बढ़ने की खबरें भी नोएडा पहुंच रही थी।

9 अप्रैल 2026 को वेतन मिलने के बाद कर्मचारियों ने कंपनी के गेट पर धरना देना शुरू कर दिया। पुलिस ने कंपनी के गेट पर और सड़कों को बैरिकेड लगाकर ट्रैफिक जाम कर दिया। इससे आम लोगों को काफी परेशानी हुई। 

रतनलाल ने बताया कि 13 तारीख सोमवार को सड़क पर सुबह से ही जाम में फंसे आम लोगों ने पुलिस द्वारा रास्ता रोके जाने का विरोध करना शुरू किया। इससे हंगामे की स्थिति पैदा हो गई, तो पुलिस ने बल प्रयोग किया। जाम में फंसे आम लोग कंपनी गेट की तरफ भी भागे। इससे धरने पर बैठे श्रमिकों में भगदड़ हो गई। इसके बाद तो हालात बेकाबू हो गए।

ज्ञात हो कि यह वही रिचा कंपनी है जिस पर 2020 में आरोप लगा था कि उसने मुस्लिम कामगारों को काम देने से मना कर दिया था। उस समय यह खबर द हिंदू और अन्य अखबारों ने प्रकाशित की थी।

उन्होंने आगे बताया कि कंपनी ने धरने पर बैठे कुछ श्रमिकों को 10 तारीख को ही गिरफ्तार करा दिया था। इससे भी मजदूरों में आक्रोश था। उनके अनुसार बीते 10-15 वर्षों से नोएडा सस्ती मजदूरी का हब बन गया है। दिल्ली, गुड़गांव व राजस्थान की बहुत सारी कंपनियां यहां आई हैं, जो ठेका श्रमिकों से बहुत कम वेज पर काम करा रही हैं।

गारमेंट और एक्सपोर्ट यूनिट में कार्यरत एक अन्य महिला कामगार अनीता मौर्या ने बताया कि 9 तारीख को जब यह खबर पहुंची, कि मानेसर में गारमेंट कंपनी ने बढ़ी तनख्वाह लोगों को दी है, तो यहां के श्रमिकों खास तौर पर गारमेंट व एक्सपोर्ट से जुड़ी कंपनियों के श्रमिकों में असंतोष फैल गया। उन्होंने प्रबंधन से बढ़ी दर पर वेतन देने की मांग की।

उन्होंने बताया कि नोएडा में ऐसी भी फैक्ट्रियां हैं, जो पहले दिल्ली में थीं और 2010 में शीला दीक्षित सरकार के समय 35% की वेतन वृद्धि हुई, तो बहुत सारी कंपनियां नोएडा शिफ्ट हो गईं। जब तक वह कंपनियां दिल्ली में थीं, तो वह बढ़ा वेतन दे रही थीं, लेकिन नोएडा आने के बाद उन्होंने वेतन में कटौती कर दी।

वैसे भी कंपनी बहुत सारे लोगों को 9 महीने काम कराने के बाद कुछ दिनों के लिए निकाल देती है और वापस फिर काम पर रख लेती है। दूसरी बार नौकरी देते समय वेतन और भी कम कर दिया जाता है और श्रमिक मजबूरी में काम करते हैं। 

इस सवाल पर कि महंगाई का क्या असर है? उन्होंने उल्टे सवाल किया कि 10-15 वर्ष से आपकी तनख्वाह में बढ़ोतरी न हो या 100-200 रूपए की ही बढ़ोतरी हो, तो आप क्या करेंगे? जबकि मकान का किराया और गैस के दाम कई गुना ज्यादा बढ गये हैं। उनके पति भी फैक्ट्री में नौकरी करते हैं। अनीता मौर्या से चाय की दुकान पर मुलाकात हुई थी। उनकी मां फुटपाथ पर ही रोटी, सब्जी का ढाबा चलाती हैं। अकेले रहने वाले श्रमिक उनसे ही रोज खाना पैक करा कर ले जाते हैं।

अनीता की मां राजलक्ष्मी मौर्या ने कहा कि इस छोटे से होटल से ही उनका घर चलता है। एक दूसरी बेटी इंटर पास करके अब होटल में ही उनका हाथ बंटाती है, क्योंकि आर्थिक तंगी के कारण वह अब उसे आगे और नहीं पढ़ा सकतीं। उन्होंने कहा कि श्रमिकों की हालत दयनीय है और उनकी बर्दाश्त करने की ताकत घटी गई है। इसीलिए लोग सड़कों पर उतरे। पुलिस ने भी बहुत प्रताड़ना की है, फिर भी लोग डर नहीं रहे हैं।

एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाले और ट्रेड यूनियन नेता राजवीर ने बताया कि 20 वर्ष पहले नोएडा और ग्रेटर नोएडा में वेज का सवाल ही नहीं था, क्योंकि दूसरे राज्यों की तुलना में यहां श्रमिकों को ज्यादा वेतन मिलता था। ठेकेदारी प्रथा नहीं थी। उन्होंने डेंसो कंपनी का उल्लेख करते हुए बताया कि वहां टेक्नीशियन की भी सैलरी 1 लाख रुपए के आसपास होती थी। इसी तरह एशियन पेंट और बहुत सारी कंपनियां हैं, जो वेज से ज्यादा वेतन देती थीं।

उन्होंने बताया कि 1995 और फिर 2000 के बाद बहुत तेजी से बदलाव आया। वेज कम होने लगा और फिर नोट बंदी, जीएसटी और कोरोना के दौरान इंडस्ट्री ठप पड़ने लगी, श्रमिकों का वेतन घटने लगा। उन्होंने बताया कि अब यहां पूरी तरह ठेकेदारी व्यवस्था हो गई है। बहुत सारी कंपनियां दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान से आई हैं, जो रेगुलर कर्मचारी नहीं रखतीं और ठेकेदारों के माध्यम से लाए गए ठेका श्रमिकों से काम कराती हैं।

2004-05 से हाउसकीपिंग, कैंटीन, ड्राइवर, स्टोर कीपर जैसे काम ठेकेदारों को दिए जाने लगे और वह कामगारों को 10 से ₹15000 का वेतन देता है। बीते 20 वर्षों से उनका यही वेतन चल रहा है। इसी तरह प्रोडक्शन यूनिटों में भी ठेका श्रमिकों से ही काम कराया जाने लगा।

एक चाय की दुकान पर बैठे श्रमिकों ने बताया कि मामला गारमेंट और एक्सपोर्ट फैक्ट्री से शुरू हुआ था, जो इलेक्ट्रॉनिक्स, मैन्युफैक्चरिंग, पैकिंग और सप्लाई चैन यूनिट तथा फैल गया। नोएडा में सबसे पहली हड़ताल रिचा कंपनी से हुई और इसी गारमेंट कंपनी रिचा से ही 9 अप्रैल को विनय नामक श्रमिक को गिरफ्तार किया गया था। फिर उसे छोड़ दिया गया और बाद में 13 तारीख को बड़े पैमाने पर हुए प्रदर्शन के बाद पुनः गिरफ्तार किया गया।

श्रमिकों ने बताया कि नोएडा के सेक्टर 2, 59, 60, 62, 83, 84 के फैक्ट्री श्रमिकों में विरोध की एक लहर सी दौड़ गई। बलिया से यहां काम करने आए नागेंद्र ने बताया कि बहुत जगह तो हंगामा कंपनी के मालिकों, प्रबंधकों और पुलिस की मिलीभगत से हुआ। जिन कारखानों या कंपनियों में कोई मामला नहीं था।

वहां के श्रमिकों को भी पुलिस बुलाकर बल प्रयोग करना शुरू कर दिया था। ऐसा लग रहा था मानो सभी कंपनियां श्रमिकों को सबक सिखाना चाहती हों। फिर इससे हालात और ज्यादा बिगड़ गये। उन्होंने बताया कि नोएडा की अधिकांश गारमेंट-एक्सपोर्ट यूनिट में ठेकेदारी व्यवस्था के तहत ही श्रमिक काम करते हैं और वह ठेकेदार के कर्मचारी होते हैं। 

चाय नाश्ते की एक दुकान चलाने वाले महावीर सिंह भी बताते हैं कि रिचा कंपनी से शुरू हुआ मामला ऑटो पार्ट्स बनाने वाली कंपनी मदरसन ग्रुप तक पहुंचा, तो वह एक बड़ा ट्रिगर प्वाइंट बन गया, क्योंकि यहां सबसे ज्यादा ठेका मजदूर काम करते हैं। जिन कंपनियों में कोई विरोध प्रदर्शन नहीं हो रहा था। उन कंपनियों ने भी अपने कर्मचारियों को सड़कों पर निकाल दिया। जिन कंपनियों में कोई विरोध नहीं था वहां के मालिकों ने भी अपने कुछ श्रमिकों को पुलिस बुलाकर गिरफ्तार कराया।

इससे श्रमिक भड़क गए और जल्द ही 30 से 40 हजार मजदूर नोएडा की सड़कों पर दिखाई देने लगे। उन्होंने बताया कि श्रमिकों के नारों में- जीने लायक वेतन दो, ठेका प्रथा समाप्त करो, परमानेंट करो, महिलाओं को समान काम का समान वेतन दो, 8 घंटे की शिफ्ट करो, ओवरटाइम भुगतान दुगना करो, पीएफ व ईएसआई सुविधाएं मजदूरों को दो, दुर्घटना व बीमारी की सुरक्षा दो, नौकरी की सुरक्षा और बिना कारण छटनी बंद करो, यूनियन बनाने की आजादी दो, महंगाई के हिसाब से वेतन बढ़ोतरी करो जैसी मांगे शामिल थीं।

जौनपुर से वर्षों पहले आए महावीर बताते हैं “भैया उनकी हालत बहुत खराब है। इनको मैं दिन-रात देखता हूं। एक-एक पैसे को वह मोहताज रहते हैं। उधारी पर जिंदगी चलती है।“

वहीं बैठे एक दूसरे श्रमिक सीताराम से यह पूछने पर कि अब तो वेतन बढ़ गया है आप खुश हैं? उन्होंने कहा कि दो-तीन हजार की बढ़ोतरी से क्या होगा? गैस का दाम 4 गुना बढ़ गया है। उन्होंने कहा कि सरकार ने बढ़ोतरी तो की है, पर वह मिलेगा कि नहीं इस पर कंपनी से कोई नोटिस या जानकारी नहीं मिली है। उन्होंने बताया कि कुछ कंपनियों ने बढ़ा वेतन देने का नोटिस लगा दिया है, पर ज्यादातर कंपनियों में ऐसा नहीं हुआ है। इसलिए सभी कर्मचारियों को अगला वेतन मिलने का इंतजार है।

उन्होंने कहा की जीने लायक वेतन तो ₹30000 होना चाहिए। यहां ऐसा कोई श्रमिक परिवार नहीं है, जहां दो-तीन लोग नौकरी ना करते हों। पति, पत्नी या बच्चों में से कोई एक नौकरी करता है। बच्चों की पढ़ाई नहीं हो सकती। महंगी फीस देने के बजाय 18 वर्ष से पहले ही अधिकांश परिवार बच्चों को किसी काम पर लगा देते हैं। ऐसे में 10-11 हजार से बढ़ कर 13 या 16 हजार वेतन हो भी गया, तो राहत नहीं मिलनी।

उन्होंने कहा कि यही कारण है कि कामगार डबल ड्यूटी या ओवरटाइम करते हैं, लेकिन भुगतान डबल नहीं होता। सिर्फ 5-6 हजार ही अतिरिक्त मिल पाते हैं। अब दो-तीन हजार बढ़ भी जाएगा, तो ओवर टाइम बंद होने की बात है। यदि ऐसा हुआ तो श्रमिकों की हालत और खराब हो जाएगी। उन्होंने कहा कि यदि 30000 वेतन हो तो ओवर टाइम की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।

जन हस्तक्षेप जांच दल का निष्कर्ष

  • जन हस्तक्षेप फैक्ट फाइंडिंग टीम ने नोएडा के प्रशासनिक अधिकारियों से बातचीत की कोशिश की, लेकिन वह तैयार नहीं हुए। एक जेल अधिकारी ने गलती से मुलाकात तो कर ली, लेकिन उन्होंने रिपोर्ट में उसका उल्लेख करने से मना कर दिया। फिलहाल विभिन्न स्रोतों से मिली जानकारी के अनुसार मौजूदा स्थिति यह है कि लगभग 1000 लोगों को पुलिस ने 107, 151 शांति भंग के आरोप में लोगों को जेल भेजा था, उन्हें काफी प्रताड़ना के बाद छोड़ दिया गया। लगभग 100 से कुछ कम लोग अभी भी गौतम बुद्ध नगर के कासना जेल में बंद है।
  • इनमें से अधिकांश संख्या उनकी है, जो ट्रेड यूनियन एक्टिविस्ट, समर्थक छात्र, पत्रकार हैं या तोड़फोड़ में सीसीटीवी फुटेज में देखे गए अथवा कंपनी प्रबंधकों द्वारा पुलिस को श्रमिकों की दी गयी सूची में शामिल थे। उन सबको विभिन्न धाराओं में गिरफ्तार किया गया है, जिनमें पुलिस पर हमला, संपत्ति का नुकसान, आगजनी, हत्या का प्रयास, विस्फोटक रखने जैसी धाराएं हैं।
  • सबसे खास बात यह है कि जिन पुलिस कर्मियों को घायल बताया गया है, उससे संबंधित कोई मीडिया रिपोर्ट दिखाई नहीं देती, जबकि श्रमिकों पर हत्या का प्रयास करने वाली 307 जैसी धाराएं लगाई गई हैं। जेल से छूटने के बाद एक श्रमिक ने बताया कि उन्हें सामान्य कैदियों के साथ रखा गया था और प्रशासन के इशारे पर दूसरे कैदी उनके साथ मार- पिटाई और दुर्व्यवहार करते थे।
  • नोएडा, गुड़गांव व मानेसर में श्रमिक असंतोष को पुलिस ने जिस बर्बर तरीके से कुचला है, वह राज्यों के “पुलिस स्टेट” बन जाने का बड़ा उदाहरण है। हालांकि उत्तर प्रदेश पुलिस पहले भी अल्पसंख्यकों और दलितों को लेकर यही रवैया अपनाती रही है, लेकिन इस बार धर्म, जाति या संप्रदाय नहीं बल्कि इसका इस्तेमाल श्रमिकों के खिलाफ किया गया। अधिकारियों को तथाकथित “ऊपर” से मिले आदेश के बाद सड़क पर गुजरने वाले स्त्री, पुरुष और बच्चों को भी नहीं बख्शा गया।
  • मीडिया रिपोर्ट के अनुसार 14 साल के एक बच्चे को जेल भेजा गया। पुलिस ने यह भी नहीं देखा कि कोई बीमार अस्पताल जा रहा है या कोई घर का सामान लेकर लौट रहा है, उसे भी गिरफ्तार किया। ऐसे बहुत से उदाहरण वकीलों, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट में भी दिखाई देती है।
  • नोएडा-गुड़गांव-मानेसर के अलावा अन्य राज्यों में बीते महीनों में शुरू हुए श्रमिक आंदोलनों ने वर्षों से मजदूर आंदोलन में आए ठहराव को तोड़ दिया है। न्यूनतम वेतन में बढ़ोतरी, काम के घंटे 8 करने ओवरटाइम दोगुना करने, बोनस देने, कार्यस्थलों पर सम्मानजनक व्यवहार की मांग अखिल भारतीय स्वरूप ले चुकी है। श्रमिक असंतोष यूपी, हरियाणा ही नहीं अन्य राज्यों में जहां भी भड़का, वहां यही चार प्रमुख मांगे दिखाई देती हैं।
  • “विश्व गुरु” बनने और दुनिया की “तीसरी सबसे बड़ी इकोनॉमी” बनने की दौड़ में शामिल देश के मजदूरों के अंदरूनी हालात, शोषण और बदहाली ने देश ही नहीं दुनिया का भी ध्यान आकर्षित किया है। आर्थिक उदारीकरण ने देश में मिडिल क्लास का बहुत ही सीमित पैमाने पर उभार तो किया, लेकिन 2004 के बाद देश के श्रमिकों की हालत बद से बद्तर होती गई है।
  • 2014 में केंद्र में आरएसएस- बीजेपी की सरकार आने के बाद से वह और दिनों दिन बुरी हुई है। नोट बंदी, जीएसटी और फिर कोरोना महामारी ने सबसे ज्यादा चोट श्रमिक वर्ग को पहुंचाई। महामारी के दौरान देश भर के शहरों से अप्रवासी श्रमिकों का बड़े पैमाने पर हुआ पलायन उनकी बेबसी और अब श्रमिक आंदोलनों के विस्फोट के रूप में उनका आक्रोश दिखाई दे रहा है।
  • नोएडा में विरोध प्रदर्शन को सरकार ने असाधारण ढंग से कुचला और उसे किसान आंदोलन की तरह बदनाम करने के लिए पाकिस्तान प्रायोजित बता कर श्रमिकों की समस्याओं को सीमित और छोटा करके आंका है, जबकि यह भारतीय औद्योगिक अर्थव्यवस्था के भीतर वर्षों से पनप रहे असंतोष का चरम विस्फोट है।
  • यह आंदोलन दिखाता है कि मौजूदा अर्थव्यवस्था जिसमें गुड़गांव, मानेसर और नोएडा मुख्य तौर पर निर्यातोन्मुखी प्रोडक्शन खास तौर पर होता है, उसे ठेका श्रमिक और कर्मचारी कर रहे हैं। नोएडा-गुड़गांव-मानेसर के विशाल मैन्युफैक्चरिंग कॉरिडोर में इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबलिंग प्लांट, कपड़ों का निर्यात करने वाली इकाइयां, दवा उद्योग, जूते बनाने वाली फैक्ट्रियां, ऑटोमोबाइल और उसकी सहायक कंपनियां तथा मोबाइल फोन बनाने वाली अथवा असेंबलिंग करने वाली इकाइयां हैं, जो मुख्य रूप से निर्यात करती हैं।
  • इन्हीं इकाइयों में शोषित ठेकाकर्मियों और असंगठित क्षेत्र के निर्माण श्रमिकों से नोएडा और गुड़गांव जैसे शहरों की चकाचौंध है। बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, असम, मध्य प्रदेश, राजस्थान व अन्य पिछड़े क्षेत्रों से आए लाखों अप्रवासी मजदूरों के शोषण और खून पसीने पर ही इन मेट्रोपॉलिटन सिटी के विशालकाय टावर, मल्टीप्लेक्स, मल्टीनेशनल कंपनियों के आसमान छूते टावर्स, चकाचौंध करते माल और अट्टालिकाएं शान से इतराती हैं।
  • 10 से ₹13 हजार रूपए हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी यहां के श्रमिक जीने लायक वेतन नहीं पाते। शिफ्ट 8 घंटे नाम के लिए है, श्रमिकों को औसतन 10 से 12 घंटे काम करना होता है। ओवरटाइम (डबल शिफ्ट) में काम करना अनिवार्य जैसा है, जिसका भुगतान मनमाना है। गांवों या मैदानों में ठेकेदारों अथवा गांव के चौधरियों द्वारा बनाए गए छोटे-छोटे आवास या झुग्गियों में  रहने वाले श्रमिकों को घर के मालिकों अथवा उनके रिश्तेदारों या उसके परिवार द्वारा खोली गई किराना दुकानों से ही खाने पीने की चीज़ें और छोटे गैस सिलेंडर लेने और फिर भरवाने पड़ते हैं।
  • गुड़गांव-मानेसर के आसपास के गांवों में श्रमिकों की यही तस्वीर है। गांव से नौकरी के लिए आने के बाद किराए की कोठरी लेने और खाने-पीने की चीज़ें उधार लेने से बना कर्ज, एक अलग ही भीषण शोषणकारी चक्र है, जिसमें फंस कर श्रमिकों को अपने परिवार को प्रतिमाह कुछ निश्चित रकम भेजना नामुमकिन हो जाता है, जिसके लिए वह अपना गांव और घर- परिवार छोड़ कर आया था। ठेका श्रमिकों में किसी के पास लिखित कॉन्ट्रैक्ट नहीं होता। उनके पास कोई सामाजिक सुरक्षा या संरक्षण नहीं है और अधिकांश श्रमिक पेड लीव के भी हकदार नहीं हैं।
  • नोएडा में श्रमिकों के असंतोष का तात्कालिक कारण पड़ोसी राज्य हरियाणा से आया। गुड़गांव और मानेसर जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में श्रमिकों द्वारा लगातार किए जा रहे विरोध प्रदर्शनों और वेतन वृद्धि की मांग को लेकर चलाए गए आंदोलनों के कारण हरियाणा सरकार द्वारा वेतन में वृद्धि की घोषणा हो गई और कुछ कंपनियों ने उसे लागू भी कर दिया।
  • यह ख़बर नोएडा और ग्रेटर नोएडा के श्रमिकों में तेजी से फैली, जिसका परिणाम भारी विरोध प्रदर्शनों से हुआ। गुड़गांव, मानेसर, फरीदाबाद, नोएडा और ग्रेटर नोएडा यह सभी एनसीआर क्षेत्र में आते हैं। श्रमिकों को भी लगा कि कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित कपड़ा, ऑटोमोबाइल और अन्य औद्योगिक इकाइयों में एक ही काम के लिए अलग-अलग वेतन नहीं होना चाहिए। इस बात ने उन्हें विरोध के लिए प्रेरित किया, लेकिन उनकी एकजुटता और विरोध को हिंसक बनाने में कंपनी प्रबंधकों और प्रशासन की प्रमुख भूमिका स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
  • एनसीआर के श्रमिक आंदोलन से निपटने का जो तरीका सरकारों खास तौर पर उत्तर प्रदेश प्रशासन ने अपनाया और सत्ता का इस्तेमाल जिस कठोरता से किया वह किसी भी नागरिक समाज के लिए घोर चिंता का विषय है। सरकार ने समस्या की गंभीरता को ना समझते हुए उसे देश विरोधी और अंतर्राष्ट्रीय षड्यंत्र बताया। जिला, पुलिस और जेल प्रशासन ने स्वतंत्र मीडिया, वकीलों, नागरिक समाज के कार्यकर्ताओं से भी मिलने से मना कर दिया।
  • पुलिस और जिला प्रशासन ने बार-बार कहा कि श्रमिकों के असंतोष में बाहरी ताकतें शामिल हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सार्वजनिक रूप से कहा कि प्रदेश शांति और विकास के रास्ते पर चल रहा था, लेकिन बाहरी षड्यंत्रकारी गड़बड़ी फैला कर औद्योगिक क्षेत्रों में अस्थिरता पैदा करने की कोशिश कर रहे थे। 
  • श्रमिकों के मार्च के दौरान पुलिस ने पुरुष श्रमिकों के साथ महिलाओं पर भी बर्बरता पूर्वक लाठी चार्ज किया। जेल से रिहा होने के बाद कुछ श्रमिकों ने बताया कि गिरफ्तारी के बाद जेल में भी उनके साथ मारपीट की गयी और सामान्य कैदियों के साथ रखा गया, जो प्रशासन के इशारे पर उनके साथ दुर्व्यवहार करते थे। नोएडा में गिरफ्तार श्रमिकों के साथ जेल में दुर्व्यवहार के कई मामले विभिन्न स्रोतों से जांच दल को मिले हैं। भय के माहौल के कारण रिपोर्ट में उन स्रोतों का खुलासा नहीं किया जा रहा है।
  • नोएडा में 1000 से अधिक लोग गिरफ्तार हुए थे और अभी भी 100 से कुछ कम लोग जेल में हैं, जिनमें श्रमिकों के हमदर्द कार्यकर्ता, पत्रकार, छात्र और श्रमिक शामिल हैं। इन सभी पर अत्यंत गंभीर मामले दर्ज किए गए हैं ताकि उनकी जल्द जमानत न हो सके।
  • सत्यम वर्मा दिल्ली में पत्रकार रहे हैं और इन दिनों लखनऊ में रह रहे थे। उन्होंने भगत सिंह के समग्र लेखन का संकलन प्रकाशित करने के अलावा अनेक विश्व प्रसिद्ध किताबों का अनुवाद किया है। वह स्वयं भी लेखक हैं। उन पर एनएसए जैसा काला कानून लगाया गया है। इसके अलावा छात्र आकृति चौधरी पर भी एनएसए लगाया है। इन लोगों को बिगुल मजदूर दस्ता का कार्यकर्ता बताया जा रहा है। वैसे, गौर करने लायक बात यह है कि बिगुल मजदूर दस्ता कोई प्रतिबंधित संगठन नहीं है। नोएडा आंदोलन का मास्टरमाइंड बताते हुए पुलिस ने सत्यम वर्मा को लखनऊ से गिरफ्तार किया, जबकि सोशल मीडिया पर उनके समर्थक कह रहे हैं कि वर्मा बीते एक दशक से नोएडा नहीं गए। 
  • नोएडा में श्रमिकों का बड़ा विरोध मार्च 13 अप्रैल को हुआ था और उसी दिन पुलिस और कंपनी प्रबंधकों के षड्यंत्र से हिंसक घटनाएं हुईं, जिसकी पुष्टि रिपोर्ट में कुछ प्रत्यक्षदर्शियों ने की हैं। दूसरे दिन 14 अप्रैल को छिटपुट प्रदर्शन ही हुए, लेकिन पुलिस और कंपनी प्रबंधकों की मिलीभगत से  23 अप्रैल को कई अज्ञात लोगों को आरोपी बनाते हुए एफआईआर दर्ज की गई, जिसके तहत अभी भी गिरफ्तारियां हो रही हैं।
  • पुलिस छात्र नेताओं, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को निशाना बना रही है, ताकि श्रमिकों के समर्थन में कोई बोल ना सके। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ का चुनाव लड़ चुके योगेश मीणा नामक एक छात्र नेता को भी नोएडा श्रमिक मार्च के डेढ़ माह बाद गिरफ्तार किया गया है। निश्चित रूप से यह लोगों को संविधान द्वारा प्राप्त अभिव्यक्ति की आजादी और विरोध के उनके लोकतांत्रिक अधिकारों का खुला हनन है।
  • रिचा ग्लोबल से जुड़े दो मजदूर करीम और आकाश सक्सेना को पिछले दिनों घटना के लगभग दो माह बाद गिरफ्तार किया गया और उन पर गंभीर धाराएं लगाई गई हैं। 13 अप्रैल के बाद भी यह दोनों श्रमिक गिरफ्तारी के पहले तक रिचा ग्लोबल में काम कर रहे थे। ज्ञात हो कि 13 अप्रैल के कई दिनों बाद रिचा ग्लोबल के एचआर प्रबंधन द्वारा एफआईआर दर्ज कराई गई थी।
  • कंपनी प्रबंधन के इशारे पर पुलिस द्वारा गंभीर आरोपों में दोनों मजदूरों को घटना के दो माह बाद गिरफ्तार किया जाना बेहद चिंता जनक और दमनात्मक कार्रवाई है। 13 अप्रैल को श्रमिकों के विशाल शांतिपूर्ण मार्च में शामिल मजदूरों और उनके समर्थकों के खिलाफ आगजनी, हत्या के प्रयास और विस्फोटक पदार्थ रखने जैसी धाराओं में मामले दर्ज किए गए हैं, ताकि उनको जल्दी जमानत न मिल सके। पुलिस ने सभी को अदालत में तो पेश किया, लेकिन अभी तक चार्जशीट दायर नहीं की।
  • 13 अप्रैल के बाद आज लगभग दो माह बाद जब जांच दल ने नोएडा में कुछ श्रमिकों से संपर्क किया तो पता चला कि पुलिस दमन अथवा कंपनी प्रबंधन के भय से नोएडा छोड़कर वापस गांव लौट गए श्रमिक अभी तक वापस काम पर नहीं लौटे हैं। उनमें से जो कुछ लौटे भी हैं, उन्हें उसी कंपनी में काम नहीं मिला, जहां वह पहले काम कर रहे थे। इसी तरह उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा की गई मिनिमम वेज की बढ़ोतरी को अधिकांश कंपनियों ने लागू कर दिया है, लेकिन काफी कंपनियों में उसे लागू नहीं किया गया है।
  • गुड़गांव, मानेसर और नोएडा में पुलिसकर्मियों पर हमले और उनके घायल होने संबंधी मामलों का उल्लेख ना तो कहीं मीडिया में दिखाई दिया और ना ही मेडिकल रिपोर्ट में घायल होने की पुष्टि हो सकी है।

जांच दल की मांग

जन हस्तक्षेप जांच दल एनसीआर में श्रमिकों के मौजूदा हालात को देखते हुए इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि उत्तर प्रदेश और हरियाणा सरकार को श्रमिकों की मांगों को तत्काल स्वीकृति देनी चाहिए, जो इस प्रकार हैं –

  • श्रमिक आंदोलन से संबंधित सभी श्रमिकों पर से तत्काल सभी मुकदमे वापस लिए जाएं व गिरफ्तार लोगों को रिहा किया जाए।
  • नोएडा की जेल में श्रमिकों के साथ हुए दुर्व्यवहार और मारपीट जैसे आरोपों की जांच हो और मजदूरों के जब्त मोबाइल आदि उपकरण वापस दिए जाएं।
  • श्रमिकों को बढ़े वेतन का जो आश्वासन दिया गया है, सरकार उसका भुगतान 1 अप्रैल से कराना सुनिश्चित करे।
  • श्रमिकों की चार प्रमुख मांगे- जीने लायक वेतन, काम के घंटे 8, ओवर टाइम का दोगुना भुगतान, प्रतिवर्ष बोनस और कार्य स्थलों पर सम्मानजनक व्यवहार की मांग, लोकतांत्रिक और संविधान सम्मत अधिकार है। इसलिए उसको लागू कराने के लिए सरकार उचित कार्रवाई करे।
  • कंपनियों में ठेका पद्धति पूरी तरह समाप्त किया जाए और कंपनी श्रमिकों को सीधे नौकरी दे।
  • श्रमिक विरोधी 4 श्रम संहिताओं को तत्काल निरस्त कर श्रम कानूनों एवं श्रम अधिकारों को लागू किया जाए, जिसमें यूनियन बनाने का अधिकार भी शामिल है, को लागू कराना सुनिश्चित करे।
  • नोएडा, गुड़गांव व मानेसर में स्थित सभी छोटी-बड़ी औद्योगिकी इकाइयों का ब्यौरा एकत्र किया जाए और वहां काम करने वाले श्रमिकों का रजिस्टर बनाया जाए।
  • श्रमिकों को जीने लायक वेतन दिया जाए और इसके लिए उनके वेतन वृद्धि को महंगाई दर से जोड़ा जाए। उनके पीएफ और ईएसआई कार्ड बनवाया जाए।

संयोजक                                                                                                                  

डॉ विकास बाजपेई (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय)

सहसंयोजक

अनिल दुबे (वरिष्ठ पत्रकार)

(कंटेंट के स्तर पर रिपोर्ट जस की तस प्रस्तुत की गई है केवल वर्तनी, लेआउट के कारण मामूली संशोधन किए गए हैं और शीर्षक में बदलाव किया गया है।)

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