गांधी और आंबेडकर: सत्य का पाठ बनाम वास्तविक हकीकत

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इसी प्रकार, डा. शर्मा आम्बेडकर के बारे में भूमिका में संक्षेप में लिखते हैं — वे अपने समय के सबसे सुपठित व्यक्तियों में एक थे जिन्होंने संस्कृत का धार्मिक, पौराणिक और वेद संबंधी सारा वांगमय अनुवाद में पढ़ कर अनेक मौलिक स्थापनाएँ लोगों के सामने रखी थी । डा. शर्मा चूंकि खुद सीधे अथवा संकेतों में यह कहते रहे हैं कि आर्य भारत में बाहर से नहीं आए थे, इसीलिये इस बारे में आम्बेडकर के विचारों का उल्लेख उन्होंने भूमिका में भी किया है कि वे यह नहीं मानते थे कि आर्य बाहर से आए थे।

(यद्यपि अब आनुवांशिक वैज्ञानिक अध्ययनों के बाद तो इस बात में कोई शक ही नहीं रह गया है कि मध्य एशिया के मैदानी इलाके से आर्य भारत में आए थे ।) बहरहाल, आंबेडकर के वर्ण व्यवस्था के बारे में विचार पर डा. शर्मा कहते हैं कि “समाज की भौतिक परिस्थितियों को पहचानते हुए उन्होंने बताया कि यह प्रथा केवल भारत में नहीं, भारत के बाहर भी रही है । किंतु अधिकतर उनका झुकाव इस धारणा की ओर रहा है कि यह विशेषता केवल हिंदू धर्म की है ।”

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स्वतंत्रता आंदोलन के संदर्भ में डा. शर्मा लिखते हैं कि “उन्होंने स्वाधीनता आंदोलन के विरोध में अछूतों का नया अलग संगठन खड़ा किया । इससे स्वाधीनता आंदोलन कमजोर हुआ, बिखराव की ताकतें आगे बढ़ीं । साइमन कमीशन के आने के बाद आम्बेडकर में परिवर्तन दिखाई देता है । एक समय उन्होंने पाकिस्तान का समर्थन भी किया । जाति की परिभाषा उद्धृत करते हुए उन्होंने मुसलमानों को एक जाति कल्पित किया । किंतु 1947 के बाद उनमें फिर परिवर्तन हुआ । जब तक आर्थिक समानता न होगी तब तक वास्तविक जनतंत्र स्थापित नहीं हो सकता । एक बड़े विचारक में जैसे अंतरविरोध हो सकते हैं, वैसे अंतरविरोध आम्बेडकर में भी थे ।

आम्बेडकर यह भी जानते थे कि उद्योगीकरण से ऐसी परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं जिनमें बाप का पेशा बेटे के लिए अनिवार्य न हो। जाति प्रथा के विचार से वे अछूत थे। समाज में उन्हें बहुत अपमान सहना पड़ा था। परंतु वह मजदूर वर्ग में पैदा हुए थे। गांधीजी की तुलना में जातीय सम्मान के बारे में उनके विचार उलझे हुए थे। उन्होंने बौद्ध धर्म की जो व्याख्या की, वह बहुत कुछ भौतिकवाद के अनुसार की, और उनकी ग्रंथावली के संपादकों का कहना है कि उसे बौद्ध मतावलंबी स्वीकार नहीं करते थे। डॉ आम्बेडकर समाज के विवेकशील आलोचक थे। अंधविश्वासों के विरुद्ध संघर्ष करने में उनकी विवेकशीलता हमारा मार्गदर्शन कर सकती है।” (पृष्ठ – xi-xiii)

अब हम आते हैं अरुंधति रॉय की किताब में व्यक्त विचारों पर । डा. शर्मा के ठीक विपरीत अरुंधति रॉय आम्बेडकर को जाति व्यवस्था के मूल, हिंदू धर्म का कट्टर विरोधी बताते हुए गांधी को हर मायने में उनके धुर प्रतिपक्ष के रूप में पेश करती हैं। उनके शब्दों में “दुनिया के सर्वाधिक प्रसिद्ध भारतीय, मोहनदास करमचंद गांधी, आंबेडकर से असहमत थे । उनका विश्वास था कि जाति, भारतीय समाज की प्रतिभा का प्रतिनिधित्व करती है।” (पृ:21)

“वे यथास्थिति के संत हैं।” (पृ: 35)

“समस्या यह है कि गांधी ने ‘सब कुछ’ कहा और ‘सब कुछ’ का उलटा भी बोल दिया।” (पृ: 36)

“गांधी, जो वैश्य थे, और एक गुजराती बनिया परिवार में जन्मे, विशेषाधिकार प्राप्त जातियों के हिन्दू समाज सुधारकों और उनके संगठनों में नवीनतम सुधारक थे । उन्होंने खुद को एक दूरदर्शी, रहस्यवादी, नैतिकतावादी, और महान मानवीय व्यक्ति के रूप में पेश किया जिसने सच्चाई और पवित्रता के हथियारों से एक शक्तिशाली साम्राज्य को धराशायी कर दिया। हम कैसे सामंजस्य स्थापित करें अहिंसावादी गांधी के विचार का। गांधी — जिसने शक्ति को सत्य से टक्कर दी, गांधी — अन्याय का प्रतिकार, विनम्र-गांधी, नर-मादा—गांधी, गांधी—एक माँ, गांधी—जिसके लिए कहा जाता है कि उन्होंने राजनीति का स्त्रीकरण किया, और स्त्रियों के लिये राजनीति में आने की जमीन तैयार की, पर्यावरणविद्—गांधी, वाक् पटु गांधी और महान वाक्य बोलने वाला गांधी—इन सबका हम गांधी के जाति के प्रति विचार (और कारनामों) से कैसे सामंजस्य स्थापित करें ? हम इस नैतिक धर्म की संरचना का क्या करें, जो अविचलित, पूरी तरह से क्रूर संस्थागत अन्याय पर टिकी हुई है?” (पृ: 37-38)

“एक विशेषाधिकार प्राप्त सवर्ण बनिया यह कैसे दावा कर सकता था कि वह ही साढ़े चार करोड़ भारतीय अछूतों का असली प्रतिनिधि है, अगर उसे यह यकीन हो कि वह वास्तव में ही महात्मा है ? …इसी ने गांधी को अपनी स्वच्छता की स्थिति, अपने आहार, अपने मल-त्याग, अपने एनिमाओं और यौन जीवन के दैनिक प्रसारण की स्वीकृति दी । जनता को अपनी अंतरंगता के जाल में खींचने की, ताकि बाद में उसका उपयोग और जोड़-तोड़ का लाभ वे ले सकें, जब वे अपने उपवास और आत्म-दंड देने का काम करें । इसने उन्हें छूट दी, खुद का बार-बार खंडन करने की, और फिर कहा : “मेरा उद्देश्य यह नहीं है कि मेरा हर बयान, मेरे पिछले बयान की कसौटी पर खरा उतरे, लेकिन मेरा हर बयान सत्य की कसौटी पर खरा होना चाहिए, जिस भी रूप में सत्य उस पल मेरे सामने प्रस्तुत हो । इसका परिणाम यह हुआ है कि मैं एक सत्य से दूसरे सत्य तक पहुंचता रहा हूं ।”

“आम राजनीतिज्ञ एक राजनीतिक मुनाफे से दूसरे राजनीतिक मुनाफे के बीच झूलता रहता है । सिर्फ एक महात्मा है जो एक सत्य से दूसरे सत्य तक पहुंचता है । उस पीढ़ी का व्यक्ति जो गांधी की संत-जीवनी की खुराक पर पला-बढ़ा है (मेरे समेत), यह जानकर कि दक्षिण अफ्रीका में क्या हुआ, न सिर्फ परेशान होगा, बल्कि हक्का-बक्का रह जाएगा ।” (पृ: 60-61)

“(दक्षिण अफ्रीका में) भारतीय समुदाय के प्रवक्ता के रूप में गांधी ने इस बात में हमेशा सावधानी बरती और खयाल रखा कि वे ‘पैसेंजर इंडियंस’ की भारतीय ‘इडेंचर्ड’ (जो भारतीय बँधुआ मजदूर के रूप में दक्षिणी अफ्रीका लाए गए थे) से दूरी बनाए रखें ।”(पृ:62-63)

“गांधी का हमेशा कहना था कि वह गरीबों में भी सबसे गरीब की तरह जीना चाहते थे । सवाल यह है कि जो गरीब नहीं है क्या वह सचमुच गरीब का रूप ले सकता है ? दक्षिण अफ्रीका में गांधी की गरीबी कायम रखने के लिए हजारों एकड़ जमीन और फलों से लदे हजारों वृक्ष मौजूद थे ।

“दरिद्र और निर्बल की जंग, उन चीजों को वापस पाने की जंग है जो उनसे छीन ली गई है । त्यागने की जंग नहीं है । लेकिन गांधी कामयाब धार्मिक बाबाओं की तरह एक चतुर राजनीतिज्ञ थे । …अलबत्ता, वे भारतीय व्यापारियों के हक की लड़ाई जरूर लड़ रहे थे कि कैसे वे अपने कारोबार का विस्तार ट्रांसवाल में कर सकें और ब्रिटिश व्यापारियों का मुकाबला कर सकें।” (पृ : 74-75)

फिर भी, अरुंधति के शब्दों में — “गांधी के महात्मापन की ओढ़नी राष्ट्रीय आंदोलन पर ऐसे छाई रही जैसे किसी कश्ती का बादबान । वे पूरी दुनिया के दिलो-दिमाग पर हावी थे । उन्होंने हजारों लोगों को जागृत करके सीधे राजनीतिक सक्रियता के मैदान में उतार दिया । वे सबकी आंखों का ध्रुवतारा थे, राष्ट्र की आवाज थे ।” (पृ : 60)

“गांधी जाति-व्यवस्था के प्रशंसक थे, लेकिन वे यह भी मानते थे कि जातियों में ऊंच-नीच की श्रेणी नहीं होनी चाहिए । सभी जातियों को समान माना जाना चाहिए ।” (पृ : 22)

“गांधी के राजनीतिक अन्तराभास, सियासी समझ, ने कांग्रेस की खूब बढ़िया सेवा की । उनके मन्दिर-प्रवेश कार्यक्रम ने अछूत आबादी की एक बड़ी संख्या को कांग्रेस से जोड़ने का काम किया ।” (पृ : 133)

और आंबेडकर !

वे एक अछूत परिवार में जन्मे, वर्ण व्यवस्था की तमाम जिल्लतों को खुद सहते हुए अपनी मेहनत और लगन के बल पर अपने समय की उच्चतम शिक्षा हासिल की । हिन्दू समाज को उन्होंने एक ऐसी डरावनी मीनार की संज्ञा दी जिसमें न सीढ़ी है और न कोई प्रवेश द्वार । इसमें जो जहां जन्मेगा वह वहीं पर मरने के लिये अभिशप्त होगा । “अछूतों के लिए हिन्दू धर्म सही मायने में एक नर्क है ।”

“आंबेडकर गांधी के लिये सबसे खौफनाक विरोधी था । आंबेडकर ने गांधी को न केवल राजनीतिक या बौद्धिक चुनौती दी, बल्कि नैतिक चुनौती भी दी ।”

“इस संभावना से कि भारत के अछूतों पर भारत के मुख्य रूप से हिन्दू लोगों के दयावान हृदयों का ही शासन होगा, आंबेडकर का माथा भन्ना गया । उनको आने वाला डरावना भविष्य साफ नजर आ रहा था । आंबेडकर भविष्य के प्रति चिन्तित हो उठे, बेकरार होकर वे किसी तरह से संविधान सभा का सदस्य बनने का जुगाड़ बिठाने लगे ।”(पृ : 40)

“आंबेडकर का महान योगदान यह है कि एक ऐसे जटिल, बहुमुखी राजनीतिक संघर्ष में, जिसमें जरूरत से ज्यादा सम्प्रदायवाद था, अन्धकारवाद था, ठगी थी, वे प्रबुद्धता लेकर आए । (पृ : 42)

“आंबेडकर को अतीत के अन्याय का दर्द भरा अहसास था, लेकिन उससे दूर जाने की अपनी जल्दबाजी में, वे पश्चिमी आधुनिकता के विनाशकारी खतरों को पहचानने में नाकाम रहे ।” (पृ : 46)

“दुर्भाग्य से आदिवासी समुदाय को उदारवादी चश्मे से देखने से, आंबेडकर का लेखन, जो अन्यथा आज के सन्दर्भ में बहुत प्रासंगिक है, अचानक पौराणिक हो जाता है ।

“आदिवासियों के बारे में आंबेडकर की राय जानकारी और समझ की कमी दर्शाती है ।” (पृ : 117)

जाति का विनाश में एक जगह आंबेडकर यूजनिक्स की भाषा का सहारा लेते हैं, वह विषय जो यूरोपियन फासिस्ट लोगों में अत्यधिक लोकप्रिय था : “शारीरिक रूप से बोला जाए तो हिन्दू C3 लोग हैं । वे एक बौनी और ठिगनी नस्ल है, कद-काठी के अवरुद्ध विकास वाले, और कमजोर लोग ।” (पृ : 118)

“हालाँकि आंबेडकर बेहद प्रज्ञावान और बुद्धिमन्त थे, लेकिन उनके पास समयबोध नहीं था, शातिरपना भी नहीं था, धूर्तता नहीं थी और अनैतिक रास्तों पर चलना तो उनकी फितरत में था ही नहीं— वे सभी गुण जो एक ‘अच्छे राजनीतिज्ञ की परम आवश्यकता होते हैं ।” (पृ : 133)

“दुर्भाग्य से उनकी दूसरी पार्टी शैड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन 1946 के प्रांतीय विधायिकाओं के चुनावों में पराजित हो गई । पराजय के नतीजे में आंबेडकर ने अन्तरिम मंत्रालय की कार्यकारी परिषद् में, जो अगस्त 1946 में गठित हुई थी, अपना स्थान खो दिया । यह एक गंभीर झटका था क्योंकि आंबेडकर पूरी शिद्दत से चाहते थे कि अपने उस पद का इस्तेमाल करके वे कार्यकारी परिषद की उस समिति का हिस्सा बन जाएँ, जो भारतीय संविधान का मसौदा तैयार करेगी । …कांग्रेस ने आंबेडकर को संविधान समिति में नियुक्त कर दिया ।” (पृ : 136-137)

“गांधी इस बात को बखूबी समझते थे, आखिर वे एक राजनेता थे, जो आंबेडकर नहीं थे ।” (पृ :128)

इस प्रकार गंभीरता से देखें, तो पायेंगे कि मामला वही, जैसा कि हमने शुरू में ही कहा, लेखन के परिप्रेक्ष्य की समस्या का है । डा. शर्मा के लेखन के सामने गांधी की तरह ही, परिप्रेक्ष्य था भारत का स्वतंत्रता आंदोलन । और अरुंधति राय के बेनकाब-लेखन के लिये है, बाकी हर चीज से अलग-थलग — दलित समस्या । अर्थात आंबेडकर का अपना खास विषय । एक ऐसा विषय जो नि:संदेह आजादी की तमाम अन्य प्रतिश्रुतियों की तरह ही पूरी न होने वाली एक प्रमुख प्रतिश्रुति है, आजादी के 72 साल बाद भी कुछ हद तक अनसुलझा विषय और आज की दलित राजनीति का सर्वप्रमुख जीवंत विषय । यह कुछ वैसे ही जैसे आज सांप्रदायिकता भी राजनीति का एक प्रमुख विषय है ।

अरुंधति ने अपनी किताब में एक ‘जर्मन यहूदी’ की किताब से चिपके ‘किताबी’ कम्युनिस्टों के साथ आंबेडकर के रिश्तों के बारे में भी अपने क्रांतिकारी तेवर में कई बातें लिखी है । इसमें ‘ब्राह्मण’ ईएमएस नम्बूदरीपाद की किताब ‘भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष का इतिहास’ से आंबेडकर और वामपंथियों के बीच टकराव पर एक बहुत वेधक टिप्पणी को उन्होंने उद्धृत किया है — “ वह स्वतंत्रता आंदोलन को एक बड़ा झटका था । इसने लोगों का ध्यान पूर्ण स्वतंत्रता के महत्वपूर्ण मकसद से भटकाकर हरिजन (अछूत) के उत्थान के महत्वहीन मुद्दे की ओर कर दिया ।”(पृ : 114)

कुल मिला कर प्रश्न वही है — क्या महत्वपूर्ण था और क्या उतना महत्वपूर्ण नहीं, अर्थात अनुषंगी था !

अंत में हम यहां, इसी परिप्रेक्ष्य के सवाल पर हमारे स्वतंत्रता आंदोलन के अनन्य इतिहासकार बिपन चंद्रा को उद्धृत करके अपनी बात को खत्म करेंगे । वे लिखते हैं —

“भारत का राष्ट्रीय आंदोलन नि:संदेह आधुनिक समाज के लिये सबसे बड़े जन-आंदोलन में से एक था । …

“वस्तुत: सिर्फ भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन से ही एक अर्द्ध-जनतांत्रिक अथवा जनतांत्रिक प्रकार की राजनीतिक संरचना को सफलता के साथ हटाने या बदलने का वास्तविक ऐतिहासिक उदाहरण मिलता है । सिर्फ यही वह आंदोलन है जिसमें मोटे तौर पर वार ऑफ पोजीशन के ग्राम्शी के सिद्धांत पर सफलता के साथ अमल किया गया था ; जहां क्रांति के एक ऐतिहासिक क्षण में राजसत्ता पर कब्जा नहीं किया गया था, बल्कि एक नैतिक, राजनीतिक और विचारधारात्मक स्तर पर दीर्घकालीन लोकप्रिय संघर्ष के जरिये किया गया था ; जिसमें प्रति-प्रभुत्व की एक-एक ईंट को एक के बाद एक चरण में रखा गया था ; जिसमें ‘निष्क्रियता’ के प्रत्येक चरण के बाद ही संघर्ष का चरण आता था ।” (India’s Struggle for Independence, Introduction, page –13)

सचमुच, जो भी किसी पूरी श्रृंखला की सिर्फ एक कड़ी को लेकर ही बाजार में उतर आने को आतुर रहते हैं, उनके लिये भारत के स्वतंत्रता संघर्ष की समग्रता के प्रतीक पुरुष गांधी इसी प्रकार नफरत के पात्र, अबूझ ही रहेंगे। अरुंधति के इस लेखन के तेवर को देखते हुए अंत में हम यही कहेंगे कि विमर्शमूलक विखंडन और कोरी उकसावेबाजी में कभी-कभी विभाजन की रेखा बहुत महीन हुआ करती है।

(अरुण माहेश्वरी वरिष्ठ लेखक और स्तंभकार हैं आप आजकल कोलकाता में रहते हैं।)

समाप्त।

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