Wednesday, December 8, 2021

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जन्मशती पर विशेष:साहित्य के आइने में अमृत राय

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अमृतराय (15.08.1921-14.08.1996) का जन्‍म शताब्‍दी वर्ष चुपचाप गुजर रहा था और उनके मूल्‍यांकन को लेकर हिंदी जगत में कोई चर्चा नहीं थी। ‘लमही’पत्रिका ने इस कमी को पूरा करते हुए उन पर सवा तीन सौ पृष्‍ठों का भारी-भरकम डिजिटल विशेषांक प्रकाशित किया है। इस अंक में उनके लेखकीय व्‍यक्तित्‍व के सभी आयामों पर बहुमूल्‍य, पठनीय, उपयोगी सामग्री प्रस्‍तुत की गई है।

अमृतराय की चर्चा सबसे ज्‍यादा प्रेमचंद की जीवनी ’कलम का सिपाही’के लिए की जाती है। 1962 में प्रकाशित इसी किताब पर उन्‍हें ‘साहित्‍य अकादमी’पुरस्‍कार भी प्राप्‍त हुआ। इसके बाद उनकी चर्चा हॉवर्ड फास्‍ट के ‘स्‍पार्टकस’उपन्‍यास के अनुवाद ‘आदि विद्रोही’ एवं अन्य अनुवादों के लिए की जाती है। प्रेमचंद जैसे वटवृक्ष के पुत्र होने के नाते, उनके जीवनीकार, शोधार्थी होने के नाते और उनकी तमाम लुप्तप्राय रचनाओं को खोज कर अनुवाद के माध्यम से सामने लाने के नाते उनकी चर्चा प्रेमचंद के संदर्भ में ही ज्‍यादा होती रही। इसके पीछे उनका अपना विशाल रचना संसार छिप सा गया। बाद के दिनों में खुद उनके मन में भी इस बात की कसक व्यापी रही कि उनसे उनके साहित्‍य पर बातचीत नहीं की जाती है।

प्रगतिशील लेखक संघ के माध्‍यम से प्रगतिशील चिंतन धारा को वैचारिक धार देना, उसकी रुढ़ियों का सामना करना, ‘हंस’,‘नई कहानियां’पत्रिकाओं के माध्‍यम से नई रचनाशीलता को सामने लाना और रचना का लोकतांत्रिक मंच तैयार करना, अपने समय की तमाम वैश्विक विचार धाराओं को हिंदी पाठकों तक ले जाना, अपने समय की विदेशी भाषाओं की महत्‍वपूर्ण कृतियों का सहज हिंदी में अनुवाद करना, तमाम साहित्यिक, सांगठनिक कार्यक्रमों को अंजाम देने के साथ ही उन्‍होंने सात उपन्‍यास, आठ कहानी संग्रह, तीन नाटक, पांच हास्‍य व्‍यंग्‍य संग्रह, एक यात्रा वृतांत, पांच आलोचनात्‍मक पुस्‍तकें लिखीं, जो उनके रचनात्‍मक व्‍यक्तित्‍व को बहुत बड़ा बनाते हैं।

हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी, बांग्‍ला पर उनका असाधारण अधिकार था। यह इनमें से किसी भी भाषा में समान अधिकार से बोल-लिख सकते थे। उन्‍होंने हिंदी, उर्दू पर अपना नजरिया साफ करते हुए ‘अ हाउस डिवाडेड’नामक पुस्‍तक अंग्रेजी में लिखी, जिसमें खड़ी बोली हिंदी, उर्दू, हिंदवी पर अपने शोध पूर्ण विचार भाषा वैज्ञानिक तरीके से रखे। उन्‍होंने उर्दू वालों को अरबी, फारसी का मोह तथा हिंदी वालों को संस्‍कृत का मोह छोड़ने की सलाह दी। ‘विचारधारा और साहित्‍य’में उन्‍होंने शिविरबद्धता की सीमा को इंगित करते हुए लिखा, ‘मेरा मन जैसा कुछ बना था, वैसी शिविरबद्धता मेरे लिए कभी संभव नहीं हो पाई। पर इसका मुझे कोई खेद नहीं है, क्‍योंकि मुझे लगता है कि अंतत: अपना विवेक ही सबसे अच्‍छा जीवन सहचर होता है।‘

पत्रिका के इस अंक में अमृतराय के लेखन के सभी पहलुओं पर प्रभूत सामग्री है। अभिमत के अंतर्गत विश्‍वनाथ त्रिपाठी, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, रेखा अवस्‍थी, चंचल चौहान, विभूति नारायण राय के विचार इस बात पर हैं कि क्‍या उनका सम्‍यक मूल्‍यांकन किया गया है। विष्‍णु खरे उन्‍हें पढ़े जाने का आग्रह करते हैं, यह स्‍वीकार करते हुए कि युवा काल में वह उनकी रचनाओं को नहीं पढ़ सके थे। ‘साहित्‍य में संयुक्‍त मोर्चा’ पर दूधनाथ सिंह और राजेंद्र कुमार के विचार बहसतलब हैं। अजित कुमार, सुधा चौहान, हरीश त्रिवेदी के लेखों में परिवार के मार्मिक प्रसंगों के साथ लेखकीय जीवन की भी अभिव्‍यक्ति है।

उपन्‍यासों पर हेमराज कौशिक, स्‍मृ‍ति शुक्‍ला, अनुराधा गुप्‍ता, उन्‍मेष कुमार सिन्‍हा, स्‍नेहा सिंह, धर्मेंद्र प्रताप सिंह, मुक्‍ता टंडन ने विचार किया है। कमल गुप्‍त, अली अहमद फातमी, संदानंद शाही की बातचीत पठनीय है। उनकी संपादन कला और संपादकीय चिंताओं पर कुमार वीरेंद्र ने विस्‍तार से शोधपूर्ण आलेख लिखा है। ओम निश्‍चल ने उनके ललित निबंधों पर विचार किया है और बताया है कि उनके निबंध परंपरागत ललित निबंधों से अलग महत्‍व रखते हैं। उनके अनुवादकर्म पर सुधीर सक्‍सेना, अंबरीश त्रिपाठी, अवनीश राय, नरेंद्र अनिकेत ने विचार किया है।

कहानियों पर शंभु गुप्‍त का आलेख उल्‍लेखनीय है। आलोचना कर्म पर सियाराम शर्मा, अरुण होता, नीरज खरे, अखिलेश कुमार शंखधर ने विचार किया है। अवधेश प्रधान ने ‘अमृतराय के प्रेमचंद’के बहाने से अपनी बात रखी है। अनिल राय, बटरोही, ईशमधु तलवार के संस्‍मरण दिए गए हैं। इसके अलावा कई ऐसे आलेख हैं जो अंक को समृद्ध करते हैं और उनके रचनाकर्म के अलग- अलग आयामों पर रोशनी डालते हैं। अंत में स्‍वयं अमृतराय का ‘आत्‍मकथ्‍य’ दिया गया है, जो उनके शब्‍दों में उन्‍हें जानने का अवसर देता है। प्रमुख घटनाओं की श्रृंखला भी दी गई है। सभी लेखों के साथ प्रासंगिक फोटोग्राफ, सभी किताबों-पत्रिकाओं के कवर चित्र अंक को आकर्षक, पठनीय, संग्रहणीय स्‍वरुप प्रदान करते हैं।

इस अंक से अमृतराय का समग्र अवदान सामने आता है, उनका मूल्‍यांकन न होने की क्षतिपूर्ति तो होती ही है, उनके अन्‍तर्विरोधों पर भी प्रकाश पड़ता है। यह जानने-समझने की खिड़की खुलती है कि आखिर उनके रचनात्‍मक साहित्‍य को व्‍यापक पठनीयता न मिलने का कारण उनके साहित्‍य में है या बाहर। यह भी कि वैचारिक आक्रांतता रचना में किस हद तक आए कि उसकी सहजता बची रहे, उसे पठनीयता भी मिले और स्‍वीकार्यता भी। विशेषांक का मूल्‍य 100 रुपए मात्र है। इसे www.notnal.com पर पढ़ा जा सकता है।

(संजय गौतम लेखक और समीक्षक हैं।)

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