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Thursday, September 16, 2021

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बेघर हो रहे कलाकार

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शहरी आवास और विकास मंत्रालय/विभाग ने देश के जाने-माने कलाकारों, जो पिछले कई सालों से दिल्ली के सरकारी फ्लैटों में रह रहे हैं, को 31 दिसंबर तक घर खाली करने के आदेश दिए हैं। दशकों पहले सरकार ने दिल्ली के कलाकारों के लिए 40 घर/फ्लैट आरक्षित रखे थे और यह संस्कृति मंत्रालय की सिफारिश पर कलाकारों को दिए जाते हैं।

इन कलाकारों में मशहूर कत्थक नर्तक बिरजू महाराज, संतूर वादक भजन सोपोरी, चित्रकार जतिन दास, ध्रुपद गायक फैयाज़ वसीफुद्दीन डागर, कुचीपुड़ी नर्तक जयराम राव और नृत्य शैलियों के इतिहासकार सुनील कोठारी शामिल हैं। सरकार कलाकारों को तीन वर्षों के लिए घर आवंटित करती थी और बाद में यह मियाद बढ़ा दी जाती थी। 2014 के बाद यह मियाद नहीं बढ़ाई गई और सरकार ने इन कलाकारों को घर छोड़ने या भारी-भरकम किराया देने के लिए कहा था।

कलाकारों और सत्ता के बीच रिश्ता हमेशा जटिल रहा है। यह दलील दी जा सकती है कि घर/फ्लैट अलॉट करने के मामले में पारदर्शिता नहीं बरती जाती रही और कई बार उन कलाकारों को घर अलॉट किए गए जिन्हें अलॉट नहीं किए जाने चाहिए थे। यह भी कहा जा सकता है कि सत्ता के गलियारों में पहुंच रखने वाले कई कलाकारों ने अपने लिए घर अलॉट करवा लिए हैं, पर इनमें से कुछ कलाकार तो विश्व और राष्ट्रीय स्तर के स्वीकृत उच्चस्तरीय कलाकार हैं। बिरजू महाराज को सरकार ने पद्म विभूषण से सम्मानित किया है और जतिन दास को पद्म भूषण से, जयराम राव, सुनील कोठारी और फैयाज़ वसीफुद्दीन डागर पद्मश्री से सम्मानित किए गए हैं।

कुछ विद्वान यह सवाल पूछते हैं कि इन कलाकारों ने सरकार से घर लिए ही क्यों; उनके अनुसार कलाकारों को हमेशा जनता के साथ खड़ा होना चाहिए; सत्ता-प्रतिष्ठान के साथ नहीं। यह दलील अपने आप में सही होने के बावजूद बहुत सरल और एक-तरफ़ा है। अन्य लोगों की तरह कलाकार भी आत्मविरोधों से भरी ज़िंदगी जीते हैं। करोड़ों लोग सरकारी नौकरियां करते सरकार की योजनाओं का फ़ायदा उठाते हैं और इसी तरह ऐसी योजनाएं योजनाओं में कलाकारों का भी कुछ हिस्सा होता है।

कुछ विद्वानों के अनुसार सरकार को कलाकारों के रहने के लिए कुछ प्रबंध तो करना चाहिए; यह सरकारों की सामाजिक जिम्मेदारी है। यह दलील भी दी जा रही है कि सरकार का यह अधिकार तो है कि आगे से कलाकारों को ऐसे फ्लैट/घर अलॉट करना बंद कर दें, पर जो कलाकार अब ऐसे फ्लैटों में रह रहे हैं, उन्हें मान-सम्मान देते हुए घर खाली करने के लिए नहीं कहना चाहिए। यह संवेदनशील मामला है और इस पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।

(लेखक पंजाबी कवि, नाटककार और पंजाबी ट्रिब्यून के संपादक हैं।)

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