Subscribe for notification

बेशर्म सत्ता और लाचारी का इवेंट!

बेशर्म होना आसान नहीं होता। उसके लिये बड़ी साधना की ज़रूरत होती है। इसके लिये समय रहते सिर्फ़ आँखों की शर्म ही नहीं मारनी पड़ती क्योंकि ये तो बड़ा नेता, सेठ, अफसर, भक्त आदि होने की मूलभूत शर्त है ही। बल्कि समय-समय पर शारीरिक, आर्थिक और वैचारिक रूप से उन लोगों को भी मारना पड़ता है जिनके कारण शर्मिंदगी महसूस होने की आशंका हो। अपने इर्द-गिर्द देखिये तो कई ऐसे ज़िंदादिल लोग व्यवस्था के शिकार हो कर तस्वीरों में मुर्दा या ज़िंदा लाश बने नज़र आएंगे। मैं यहाँ पर उनके नाम दोहरा कर आपको उन्हें याद करने का मौका नहीं दूँगा ताकि सत्ता शर्म से कहीं गड़ न जाए।

ऐसे में जबकि आपदा ने सरकार को कई मोर्चों पर शर्मिंदगी से बचने का अवसर दिया है। वहीं एनआरसी विरोधी आंदोलन में मुखर रहे लोगों को सलाखों के पीछे धकेल कर पिछली शर्मिंदगी का बकाया चुकाने का वक़्त भी दिया है। अगर इस आपदा के अवसर पर ऐसा नहीं होता तो कसम से बेशर्मी पर से मेरा भरोसा हिल जाता।

शर्म की बात तो ये है कि अगर आप ज़िंदा हैं तो सवाल पूछेंगे, विवेकवान हैं तो सवाल उसी से पूछेंगे जिससे पूछना चाहिए और बुद्धिजीवी हैं तो विरोध के स्वरों को अलग-अलग माध्यमों से आम लोगों तक पहुँचाएंगे। आप पूछने लगेंगे कि आपदा में इंसानों की फिटनेस ज़्यादा ज़रूरी है या बसों की। फिर आप पूछेंगे कि बसें डीजल से चलती हैं या सत्ता की स्याही से। यानी कुल मिला कर शर्म की बात ये है कि आप अपनी ही सरकार को शर्मिंदा करने की कोशिश करेंगे। वो सरकार जो बेशर्मों की बदौलत सत्ता तक पहुँची हो वो भला किसी ज़िंदा तर्कवादी बुद्धिजीवी को शर्म की फसल उगाने का मौका क्यों दे?

अब देखिये ना। लॉकडाउन से पहले हालात की गंभीरता को न समझते हुए बड़ी तादाद में श्रमिकों और दिहाड़ी मज़दूरों को बड़ी ढिठाई से रोक दिया गया। उतनी ही बेशर्मी के साथ महामारी का मज़हब तलाशा गया। लेकिन हद तो तब हो गयी जब बीमारी के फैलाव और सरकारी इमदाद के भटकाव से हालात बिगड़ते देख लाचार मज़दूर अपने परिवारों को सामान की तरह समेट कर पैदल ही अपने गाँव की ओर निकल पड़े। गर्भवती महिलाएं रास्तों में ही बच्चे जनती रहीं, कहीं बच्ची चार दिन भूख से तड़प कर मर गयी तो कोई बाप अपने कलेजे के टुकड़े की लाश सीने से लगाये ढोता रहा। कोई और सरकार होती तो शर्म से डूब मरती लेकिन बेशर्मी में साहस तो दुस्साहस की हद भी पार कर जाता है। ताली, थाली, दिये और पटाखे जलवा कर सत्ता ने बेशर्मों का हौसला बढ़ा ही दिया था। इसलिए सारे बेशर्मों ने मिल कर भुखमरी, हादसे और बीमारियों की भेंट चढ़ने के बावजूद मुक्तिपथ पर बढ़े चले जा रहे मज़दूरों को ही राष्ट्रीय शर्म घोषित कर दिया।

अब तक सब पूरी बेशर्मी के साथ मैनेज हो रहा था। रेल की पटरियों पर बिखरा खून हो या सड़कों पर निर्जीव पड़े माँ-बाप से लिपट कर रोते मासूमों के आँसू, सब बड़ी सफाई से पोंछ दिये गये। राहत पैकेज हो या केयर फंड, कहीं भी पैसे और बेशर्मी की कोई कमी नहीं थी। शर्म सिक्कों की तरह मज़दूरों की फटी जेब से गिर रही थी तो बेशर्मी पूरे शबाब पर थी। लेकिन फिर एक घटना ऐसी हुई जिसकी बेशर्म सरकार को उम्मीद ही नहीं थी।
ज्योति पासवान नाम की एक बच्ची ने अपने अस्वस्थ पिता को साइकिल पर पीछे बैठा कर घर तक 1200 किलोमीटर लंबा सफ़र तय कर लिया। ये ख़बर भी बिना शर्म के मैनेज कर ली जाती। लेकिन सोशल मीडिया और इंटरनेशनल मीडिया में सुर्खियां बनने के बाद करीब-करीब तय था कि इस बार तो सरकार को शर्म से सिर झुकाना ही पड़ेगा।

लेकिन सरकार ने इस बार भी आपदा को अवसर में बदलने की अपनी स्किल का बेहतरीन प्रदर्शन किया। आप तो जानते ही हैं कि आलोचना को तमगे की तरह सजाने वाले अपनी शर्मिंदगी का बायस बने इतिहास में दर्ज कई काले पन्नों को अपनी बेशर्मी की चमक से सुनहरा कर चुके हैं। बेशर्मी ये अच्छी तरह जानती है कि शर्म को जड़ से मारना हो तो उसे तुरंत माला पहना दो, उसकी जय जयकार करो ताकि उसका अपना अस्तित्व बेशर्मी के इवेंट में लुप्त हो जाए। गांधी, नेहरू, पटेल, भगत सिंह, सुभाष, विवेकानंद जैसे नाम अगर इस वक़्त आपके दिमाग़ में आ रहे हों तो सावधान रहें। लगता है आप में अभी भी कुछ शर्म बाक़ी है।

खैर, तो मैं बात कर रहा था उस बिटिया की लाचारी को दर्शाती सुर्खियों पर छा रही सत्ता की बेशर्म मुस्कुराहट की। सत्ता में मौजूद बेशर्म लोगों ने शर्मिंदगी की बेल को उगने से पहले ही नोच फेंका और बिटिया की लाचारी को बहादुरी में बदल दिया गया। मुमकिन है का नारा एक बार फिर बेशर्मों के गले से राष्ट्रवाद की तान पर निकलने लगा। शर्मिंदगी को छिपाने के लिये एक बार फिर इस बेबस योद्धा पर फूल बरसाये जाने लगे ताकि उन नीतियों पर सवाल न उठे जिसने एक बच्ची को शिकार और बाप को लाचार बना दिया। सरकार को इस छोटी बच्ची से इतने बड़े हौसले की उम्मीद नहीं थी। लेकिन अब वो उससे उबर गयी है। उसे आगे भी इस देश के बच्चों से ऐसी कोई उम्मीद नहीं है। वैसे भी अगर किसी ने आइंदा ऐसा हौसला बिना सरकार की इजाज़त के दिखाने की कोशिश की तो ये उसके लिये शर्मनाक होगा। याद रहे बेशर्म सत्ता को शर्मिंदगी कतई बरदाश्त नहीं है।

(भूपेश पन्त वरिष्ठ पत्रकार है और आजकल देहरादून में रहते हैं।)

This post was last modified on May 26, 2020 10:42 am

Leave a Comment
Disqus Comments Loading...
Share

Recent Posts

हरियाणा में भी खट्टर सरकार पर खतरे के बादल, उप मुख्यमंत्री चौटाला पर इस्तीफे का दबाव बढ़ा

गुड़गांव। रविवार को संसद द्वारा पारित कृषि विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के साथ…

19 mins ago

छत्तीसगढ़ः पत्रकार पर हमले के खिलाफ मीडियाकर्मियों ने दिया धरना, दो अक्टूबर को सीएम हाउस के घेराव की चेतावनी

कांकेर। थाने के सामने वरिष्ठ पत्रकार से मारपीट के मामले ने तूल पकड़ लिया है।…

2 hours ago

किसानों के पक्ष में प्रदर्शन कर रहे कांग्रेस अध्यक्ष लल्लू हिरासत में, सैकड़ों कांग्रेस कार्यकर्ता नजरबंद

लखनऊ। यूपी में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू को हिरासत में लेने के…

2 hours ago

कॉरपोरेट की गिलोटिन पर अब मजदूरों का गला, सैकड़ों अधिकार एक साथ हलाक

नयी श्रम संहिताओं में श्रमिकों के लिए कुछ भी नहीं है, बल्कि इसका ज्यादातर हिस्सा…

2 hours ago

अगर जसवंत सिंह की चली होती तो कश्मीर मसला शायद हल हो गया होता!

अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार में अलग-अलग समय में वित्त, विदेश और…

4 hours ago

लूट, शोषण और अन्याय की व्यवस्था के खिलाफ भगत सिंह बन गए हैं नई मशाल

आखिर ऐसी क्या बात है कि जब भी हम भगत सिंह को याद करते हैं…

5 hours ago