संस्कृति-समाज

जन्मदिन पर विशेष: कोरोना में बेहद प्रासंगिक हो गया है चे ग्वेरा का सामाजिक चिकित्सा विज्ञान का सिद्धांत

संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे बड़े देश की तुलना में क्यूबा जैसे छोटे देश द्वारा कोरोना को बेहतर ढंग से प्रबंधित किया गया। क्यूबा की इन स्वास्थ्य नीतियों की नींव क्रांतिकारी डॉ. अर्नेस्टो ग्वेरा के सामाजिक चिकित्सा विज्ञान पर रखी गयी है। जिन्हें प्यार से चे ग्वेरा बुलाया जाता था। आज उसी क्रांतिकारी चे ग्वेरा का जन्मदिन है। गुरिल्ला युद्ध और राजनीतिक क्रांति पर चे ग्वेरा के विचार अधिक लोकप्रिय हैं, लेकिन सामजिक चिकित्सा विज्ञान में उनके योगदान की चर्चा कम होती है।

ऐसे समय में जब कोरोना काल में वैश्विक व्यवस्था विफल हो रही है, सामाजिक चिकित्सा और क्रांतिकारी चिकित्सा को फिर से जांचने और लागू करने की आवश्यकता है। चे की भावनात्मक और वैचारिक यात्रा का अध्ययन उन युवा डॉक्टरों द्वारा किया जाना चाहिए जो चिकित्सा शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं या पूरा कर चुके हैं और चिकित्सा सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। अगर कोई डॉक्टर एक क्रांतिकारी डॉक्टर से प्रेरणा लेता है, तो कम से कम हर समाज में स्वास्थ्य के क्षेत्र में कुछ बदलाव संभव है।

क्यूबा में, फिदेल कास्त्रो और चे ग्वेरा ने 1959 में तानाशाह फुलगेन्सियो बतिस्ता की सत्ता को उखाड़ फेंका और युवा क्रांतिकारियों के साथ एक बदलाव की शुरुआत की। एक ओर, क्रांतिकारियों को क्यूबा के पुनर्निर्माण और दूसरी ओर अमेरिकी साम्राज्यवाद का सामना करने की दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ा। चे को पता था कि स्वास्थ्य, शिक्षा, गरीबी, बच्चों की देखभाल और आर्थिक असमानता जैसी सभी समस्याएँ एक दूसरे को प्रभावित करती हैं। वे कहते हैं, “हमें यह देखना होगा कि डॉक्टर एक किसान होना चाहिए जो बीज बोएगा और फसल उगाएगा। उसे नए भोजन का स्वाद लेने की तीव्र इच्छा होनी चाहिए। दुनिया के सबसे समृद्ध देशों में से एक क्यूबा, जो कि कृषि के मामले में बहुत सीमित और कमजोर है उसे अपनी राष्ट्रीय पोषक संरचना में विविधता लाने में सक्षम होना चाहिए।

शिक्षा प्रणाली के अनुसार, हमें यह देखना होगा कि इस स्थिति में यह कैसे किया जा सकता है। डॉक्टरों को भी राजनेता बनना चाहिए। सबसे पहले हम लोगों के पास जाना चाहते हैं और उनके साथ अपनी बौद्धिकता आजमाना चाहते हैं वह गलत है। हमें लोगों के बीच जाना चाहिए यह दिखाने के लिए कि हम लोगों के साथ सीखने जा रहे हैं, यह दिखाने के लिए कि हम क्यूबा वासी एक महान और सुंदर समुदाय है। हम एक प्रयोग को आकार देने जा रहे हैं।” एक सामाजिक चकित्सा वैज्ञानिक की तरह चे का मानना है कि स्वास्थ्य समस्याएं केवल चिकित्सा अनुसंधान समस्याएं नहीं हैं, बल्कि यह कि किसी बीमारी का इलाज करने का एकमात्र तरीका उस परिस्थिति का इलाज करना है जिसमें यह होता है। यह बहुआयामी दृष्टिकोण चे को उन समस्याओं और राजनीतिक समस्याओं के समाधान खोजने के लिए प्रोत्साहित कर रहा था जो बीमारी और स्वास्थ्य समस्याओं को जोड़ते हैं।

सामाजिक चिकित्सा विज्ञान की उत्पत्ति

यद्यपि 19वीं शताब्दी में यूरोप में सामाजिक चिकित्सा पाई जाती है लेकिन यह लैटिन अमेरिका में अधिक प्रभावशाली रहा है। डॉ. रुडॉल्फ फिरकोउ एक प्रसिद्ध फिजीशियन और पैथोलोजिस्ट थे। वे राजनीति में भी सक्रिय रहे। वे जर्मनी के बर्लिन में चिकित्सा सेवा प्रदान किया करते थे। उन्होंने सिलेसिया के प्रशिया क्षेत्र में टाइफस का अध्ययन किया। इस बीमारी के प्रकोप को फलने में उन्होंने गरीबी, शिक्षा और लोकतंत्र की कमी जैसे मुख्य सामाजिक कारकों की भूमिका बताई। इससे उन्होंने सामाजिक चिकित्सा विज्ञान के अध्ययन को आगे बढ़ाया। उनके अनुसार सामाजिक चिकित्सा एक प्रकार का सामाजिक विज्ञान है जो सामाजिक परिस्थितियों से उत्पन्न होने वाले रोगों के अध्ययन पर बल देता है। उनके अनुसार, “डॉक्टरों को एक तरह से गरीबों के लिए अधिवक्ता के रूप में कार्य करना चाहिए।”

लैटिन अमेरिका पर प्रभाव

रुडॉल्फ फिरकोउ के सामाजिक चिकित्सा विज्ञान के दृष्टिकोण को अपनाने वाले अधिकांश अनुयायी 20 वीं शताब्दी की शुरुआत में लैटिन अमेरिका में आकर बस गए। वे ज्यादातर चिली और अर्जेंटीना में बस गए। वे चिली के विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य में शामिल हो गए और आगे चल कर उन्होंने चिकित्सा विज्ञान की पढ़ाई कर रहे चिली के भावी राष्ट्रपति डॉ. सल्वाडोर अलांदे को प्रभावित किया। डॉ. अलांदे ने चिली की सामाजिक चिकित्सा विज्ञान की उन्नति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1939 में वे पॉपुलर फ्रंट की सरकार में स्वास्थ्य मंत्री बने। उन्होंने एक कार्यक्रम के माध्यम से लैटिन अमेरिका में सामाजिक चिकित्सा की नींव रखी।

उन्होंने तर्क दिया कि व्यापक संरचनात्मक परिवर्तनों के बिना, स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार सफल नहीं होंगे। पूंजीवादी साम्राज्यवाद, विशेष रूप से बहुराष्ट्रीय निगम जो चिली के प्राकृतिक संसाधनों और श्रम से लाभ का दोहन करते हैं, के प्रति उन्होंने कड़ा रुख अपनाया। जिसमें उनका कहना था कि पॉपुलर फ्रंट सरकार को स्वास्थ्य देखभाल में सुधार के लिए पूंजीवादी शोषण को समाप्त करना चाहिए। इन सभी घटनाओं का चे ग्वेरा पर गहरा प्रभाव पड़ा।

14 जून, 1928 को अर्जेंटीना में जन्मे चे ग्वेरा ने अपनी चिकित्सा शिक्षा वहीं प्राप्त की, उन्हें अर्जेंटीना में सामाजिक चिकित्सा विज्ञान की एक उच्च परंपरा विरासत में मिली। स्वयं अस्थमा के रोगी होने के कारण चिकित्सा शिक्षा के प्रति उनका झुकाव स्वाभाविक था। सामाजिक चिकित्सा के पैरोकार डॉ. बर्नार्डो हाउसे उस विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे जहां चे पढ़ रहे थे। डॉ. बर्नार्डो हाउसे राजनीति में भी सक्रिय थे जिसकी वजह से अर्जेंटीना के तानाशाह यूआन पेरोन ने उन्हें पद से बेदखल कर दिया था। चे इन सभी घटनाओं के गवाह थे। चिकित्सा शिक्षा से समय निकालकर चे अपने दोस्त के साथ मोटरसाइकिल पर लैटिन अमेरिका के दौरे पर गए। यही यात्रा मोटरसाईकिल डायरी के नाम से प्रसिद्ध है। अलांदे की तरह, चे पेरू की राजधानी लीमा के एक कुष्ठ रोग विशेषज्ञ डॉ. उगो पेस से प्रभावित हुए। वह एक राजनीतिक कार्यकर्ता और पेरू की कम्युनिस्ट पार्टी के सक्रिय सदस्य थे।

चे ग्वेरा ने स्वयं छह सौ से अधिक कुष्ठ रोगियों का इलाज किया। चे आश्वस्त हो गए कि लैटिन अमेरिकी देशों में सामाजिक और आर्थिक असमानता और कुष्ठ रोग जैसी इसी तरह की अन्य बीमारियों के बीच घनिष्ठ संबंध है। राजनीतिक समाजवाद और उसके चिकित्सा अनुसंधान का संयोजन सामाजिक चिकित्सा विज्ञान का आधार है। चे ने इस आधार का समर्थन करके इसे क्रांतिकारी रूप दिया। चे, न केवल मनुष्य के रोगों को ठीक करना चाहते थे बल्कि वह एक अपरिपक्व समाज में मनुष्य की निरंतर पीड़ा को भी ठीक करना चाहते थे। उनका मानना था कि मार्क्सवाद-लेनिनवाद के सिद्धांत अन्याय को समाप्त करेंगे और उनकी कल्पना में एक नए तरह के इंसान, “सामाजिक मनुष्य (social Man)” का निर्माण करेंगे। 1956 में चे ग्वेरा एक चिकित्सा सहायक के रूप में मेक्सिको में फिदेल कास्त्रो के क्रांतिकारी समूह में शामिल हो गए, जो बाद में एक सफल क्रांतिकारी के रूप में उभरे।

क्यूबा में सफल प्रयोग

चे अपनी संकल्पना को साकार करने के लिए जीवित नहीं रहे, लेकिन फिदेल कास्त्रो ने क्यूबा में इसे सफलतापूर्वक लागू किया। चे ने कांगो में और बाद में बोलीविया में क्रांतिकारी मुहिम में हिस्सा लिया, लेकिन 1967 में बोलिवियाई सरकार की मदद से अमेरिका की इंटेलिजेंस एजेंसी CIA द्वारा जंगल में लड़ते हुए उनकी हत्या कर दी गई। वह केवल 39 वर्ष की छोटी अवधि तक जीवित रहे। दुनिया को उनके क्रांतिकारी विचारों को खासकर आज कोरोना जैसी स्थितियों में कई क्षेत्रों में फिर से देखने की जरूरत है जिसकी प्रासंगिकता आज भी है।

क्यूबा में क्रांति के बाद चे ने पहाड़ और तटीय समुदायों में काम करने के लिए 750 डॉक्टरों, सभी चिकित्सा प्रशिक्षुओं को भेजा। उन्होंने मोबाइल मेडिकल टीमों की स्थापना की। चिकित्सा शिक्षा के साथ-साथ अन्य सभी शिक्षा को निःशुल्क बनाकर डाक्टरों के प्रशिक्षण की नींव मजबूत की। विभिन्न प्रांतों में चिकित्सा और नर्सिंग शिक्षा संस्थान स्थापित करके लोगों को स्थानीय स्थानों पर सेवाएं देने के लिए प्रोत्साहित किया गया।

चे ग्वेरा के विचारों को आगे बढ़ाते हुए, 1976 में, क्यूबा के संविधान के अनुच्छेद 50 में स्वास्थ्य का बुनियादी अधिकार शामिल किया और सभी को समान स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान की गईं। क्यूबा ने निजी स्वास्थ्य बीमा, स्वास्थ्य सेवाओं और अस्पतालों का राष्ट्रीयकरण किया। दवा की कीमतों को कम करके दवा कंपनियों का राष्ट्रीयकरण किया गया। पॉलीक्लिनिक ने शहर के प्रमुख अस्पतालों के विकल्प के रूप में समुदायों को विशेष सेवाएं प्रदान कीं। क्यूबा अंग प्रत्यारोपण, हृदय बाईपास और अन्य जटिल चिकित्सा सेवाओं के लिए एक महत्वपूर्ण देश के रूप में उभरा है। 1966 के भूकंप संकट के मद्दे नजर क्यूबा ने चिली में एक चिकित्सा दल भेजा।

इजरायल के खिलाफ फिलिस्तीनी लोगों के संघर्ष का समर्थन करते हुए, क्यूबा ने छात्रों को चिकित्सा शिक्षा सहित मुफ्त शिक्षा की पेशकश की। क्यूबा ने तेल के बदले 40,000 डॉक्टरों को भेजकर वेनेजुएला के साथ सहयोग बढ़ाया। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर क्यूबा की नीति को ‘चिकित्सा कूटनीति’ के नाम से जाना जाने लगा। क्यूबा ने अमेरिका के आक्रामक अमानवीय प्रचार का मानवीय जवाब दिया। 1959 की क्रांति से पहले, क्यूबा में केवल 3,000 डॉक्टर थे। वर्तमान में प्रति 1000 लोगों पर 9 डॉक्टर हैं। जबकि भारत में हर 1511 लोगों पर 1 डॉक्टर है। कोरोना महामारी के दौर में भी क्यूबा ने अपनी जनता के स्वास्थ्य का ख्याल रखते हुए अपने डाक्टरों की टीम को अन्य देशों में सहयोग के लिए भेजा।

भारत जैसे विकासशील देशों में एक सामाजिक चिकित्सा विज्ञान के दृष्टिकोण की तत्काल आवश्यकता है। कोरोना महामारी में कॉरपोरेट्स की संपत्ति में 35 फीसदी का इजाफा हुआ, लेकिन शेष 99% ने रोजगार के रूप में, वेतन कटौती के रूप में, या परिवार के सदस्य की जिन्दगी के रूप में कुछ न कुछ गंवा दिया है। यह समझना जरूरी है कि किसी भी बीमारी या प्रकोप का शिकार सिर्फ मासूम गरीब ही क्यों होते हैं। सामाजिक असमानता, आर्थिक असमानता और स्वास्थ्य व्यवस्था को जोड़कर इसका अध्ययन किया जाना चाहिए। दलितों, आदिवासियों, वंचितों और उन्नत समुदाय के स्वास्थ्य स्तर के बीच के अंतर का विश्लेषण किया जाना चाहिए तभी इससे सही निष्कर्ष निकल पाएगा। कोरोना से त्रस्त समाज को सामाजिक चिकित्सा विज्ञान को एक आन्दोलन के रूप में आगे लेकर जाना होगा।

(गिरीश फोंडे पीएचडी शोधार्थी हैं और वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ डेमोक्रेटिक यूथ के वैश्विक उपाध्यक्ष रह चुके हैं।)

This post was last modified on June 14, 2021 9:38 am

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