नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में आसाराम को राजस्थान हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है और राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ की डिवीजन बेंच ने आसाराम की अपील को नकारते हुए आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा है।
राजस्थान हाइकोर्ट की जोधपुर बेंच के जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित ने फैसले में उम्रकैद की सजा बरकरार रखते हुए आसाराम को आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया है।
हालांकि आसाराम पर भारतीय दंड संहिता की धारा 376 डी के तहत लगे गैंगरेप के आरोपों से आसाराम को बरी किया गया है। बताया गया है कि उपलब्ध सबूत गैंगरेप साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं, इसलिए उस धारा से राहत दी गई।लेकिन नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में दोषों और आरोपों को कायम रखा गया है।
साल 2018 में विशेष पॉक्सो अदालत ने आसाराम को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
आसाराम हाई कोर्ट के आदेशानुसार आसाराम को तुरंत सरेंडर करना होगा। फिलहाल वह पेरोल पर बाहर है।
सह-आरोपी शिल्पी और शरतचंद की अपीलों पर भी कोर्ट ने फैसला सुनाया और उन्हें राहत दी। निचली अदालत ने इन्हें भी इस अपराध में भागीदार माना था, लेकिन हाईकोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों की समीक्षा करने के बाद उन्हें राहत दी है। अदालत के अनुसार इस मामले में सामूहिक रूप से किसी साजिश या गैंगरेप की बात सिद्ध नहीं होती है।
कोर्ट ने आसाराम, सह-अभियुक्त शिल्पी और शरतचंद्र की ओर से दायर अपीलों पर सुनवाई पूरी करने के बाद 20 अप्रैल 2026 को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था, जो बुधवार को सुनाया गया।
पीड़ित पक्ष के वकील पीसी सोलंकी ने फैसले की जानकारी देते हुए बताया कि उच्च न्यायालय ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर माना कि सामूहिक दुष्कर्म और आपराधिक षड्यंत्र की धारा में दोष सिद्ध नहीं होता है, इसलिए आसाराम को उस आरोप से मुक्त किया गया है। लेकिन पीड़िता के साथ दुष्कर्म और पोक्सो एक्ट के तहत अन्य आरोप पर्याप्त रूप से साबित होते हैं, जिसके कारण उसकी बाकी की सजाओं में किसी प्रकार का बदलाव नहीं किया जाएगा।
आसाराम पर 2013 में जोधपुर स्थित आश्रम में एक नाबालिग छात्रा से दुष्कर्म का आरोप लगा था। पीड़िता के माता-पिता ने पुलिस में शिकायत दर्ज करायी थी जिसके बाद आसाराम और आसाराम के आश्रमों के खिलाफ जांच शुरू हुई थी।
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)