कॉकरोच जनता पार्टी की मुहिम से मज़दूर वर्ग क्यों अनुपस्थित है?

(कॉकरोच जानता पार्टी संस्थापक अभिजीत दिपके के नाम कवयित्री, एक्टिविस्ट कविता कृष्णपल्लवी का पत्र) 

प्रिय अभिजीत,

सबसे पहले तो तुम धन्‍यवाद के पात्र हो कि तुमने छात्रों-युवाओं के मुद्दों को राष्‍ट्रीय चर्चा के पटल पर रख दिया। साथ ही तुम इस बात के लिए भी धन्‍यवाद के पात्र हो कि तुमने न्‍यायपालिका और विशेष तौर पर सर्वोच्‍च न्‍यायालय के माननीय मुख्‍य न्‍यायाधीश आदरणीय सूर्यकान्‍त की एक टिप्‍पणी पर बहुत ही रचनात्‍मक तरीक़े से प्रश्‍न उठाया और उसे देश के नागरिकों के बीच एक मुद्दा बना दिया।

इसके अलावा, इसके लिए भी तुम्‍हें शुक्रिया अदा करना होगा कि तुमने राजनीतिक भ्रष्‍टाचार के मसले को भी विमर्श के केन्‍द्र में लाया है। इन योगदानों के फलस्‍वरूप तुम्‍हारी ऑनलाइन मौजूदगी, तुम्‍हारे सोशल मीडिया हैण्‍डलों को जिस तरह से दबाया जा रहा है, वह घोर निन्‍दनीय है। इस दमन के विरुद्ध मैं तुम्‍हारे साथ हूँ।

जहाँ एक ओर साम्‍प्रदायिक नफ़रत फैलाने वाले तमाम सोशल मीडिया हैण्‍डल खुलेआम धड़ल्‍ले से जारी हैं और उन पर किसी सरकार को कभी कोई आपत्ति नहीं होती, वहीं दूसरी ओर वाजिब सवालों को उठाने के लिए तुम्‍हारे सोशल मीडिया हैण्‍डलों का सरकार दमन कर रही है।

यह दिखाता है कि सरकार देश में जनता के बीच बढ़ते गुस्‍से को लेकर भयाक्रान्‍त है और तुमने जनता के एक हिस्‍से के गुस्‍से को एक रचनात्‍मक अभिव्‍यक्ति दी है। इन चीज़ों के लिए वाकई तुम्‍हें हर ज़‍िम्‍मेदार छात्र-युवा व नागरिक धन्‍यवाद कहेगा और मैं भी कहूँगी। 

लेकिन इसके साथ मेरे कुछ दोस्‍ताना सवाल भी हैं। उम्‍मीद करती हूँ कि तुम इन सवालों को सही भावना से लोगे क्‍योंकि मेरा मक़सद तुम्‍हें निरुत्‍साहित करना कतई नहीं है। उल्‍टे, शायद (मैं उम्‍मीद करती हूँ कि) इन सवालों से तुम्‍हें अपनी मुहिम को और व्‍यापक बनाने में मदद मिले। इन्‍हीं सदिच्‍छाओं और दोस्‍ताना इरादों से ये सवाल तुम्‍हें भेज रही हूँ। 

कॉकरोच जनता पार्टी की मुहिम के माध्‍यम से तुमने जो पाँच-सूत्रीय चार्टर व घोषाणापत्र पेश किया है, उसमें उठाये गये अधिकांश मुद्दों से मेरी सहमति है, सिवाय कुछेक बिन्‍दुओं के। मसलन, यूएपीए जैसे क़ानून को ही रद्द कर दिया जाना चाहिए जो एक हिटलरी पुलिस स्‍टेट बनाने की ओर एक क़दम है। चुनाव आयुक्‍त द्वारा वैध वोटों को काटे जाने पर सख्‍़त से सख्‍़त सज़ा होनी चाहिए, तुम्‍हारी इस माँग से पूर्ण सहमति है। लेकिन उसके लिए यूएपीए की बात करना और इसी के ज़रिये उसे वैध ठहराना क्‍या उचित होगा?

जैसा कि तुम्‍हारे जैसा जागरूक युवा साथी पहले ही जानता होगा, इस क़ानून का इस्‍तेमाल अधिकांश मामलों में राजनीतिक विरोध और असहमति को दबाने के लिए होता रहा है और इसमें कन्विक्‍शन रेट 2 से 6 प्रतिशत के बीच रहा है। बाक़ी मामलों में आरोप बेबुनियाद सिद्ध हुए हैं, लोग रिहा हुए हैं। लेकिन उनके रिहा होने से पहले महीनों और कई बार वर्षों तक उनके जीवन के क़ीमती समय को जेल में बरबाद कर दिया गया।

जैसा कि वक़ीलों और कई न्‍यायाधीशों ने भी कहा है, यूएपीए और एनएसए जैसे क़ानूनों में प्रक्रिया ही सज़ा होती है, क्‍योंकि बिना किसी मुक़दमे या सबूत के, पुलिस किसी को भी महीनों और कुछ मामलों में सालों तक जेल में रख सकती है। जैसा कि तुम जानते ही होगे, ऐसे क़ानूनों का मूल ढाँचा और सिद्धान्‍त अंग्रेज़ों के दमनकारी क़ानून रोलैट एक्‍ट से लिया गया है, जिसके ख़‍िलाफ़ जलियाँवाला बाग़ का प्रदर्शन हुआ था, जिस पर अंग्रेज़ों ने गोलियाँ बरसाकर सैकड़ों (कुछ आकलनों के अनुसार, हज़ार से भी ज्‍़यादा) भारतीय लोगों को शहीद कर दिया था।

लेकिन शर्म की बात है कि आज़ाद भारत में भी ऐसे दमनकारी क़ानून मौजूद हैं जो औपनिवेशिक गुलामी के दौर में बने क़ानूनों से भी ज्‍़यादा ख़तरनाक और दमनकारी हैं। ऐसे में, तुमसे आग्रह होगा कि इस पर विचार करो। केन्‍द्रीय चुनाव आयुक्‍त पर एसआईआर की तानाशाहाना फ़ासिस्‍ट कार्रवाई के लिए निश्‍चय ही कठोरतम क़ानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन इस प्रक्रिया में किसी एनएसए या यूएपीए जैसे क़ानूनों को वैधता देना, अन्‍तत: जनता को ही नुक़सान पहुँचायेगा। 

इसके अलावा, कुछ और भी अहम सवाल हैं, जिन पर विचार करना ज़रूरी है। कॉकरोच जनता पार्टी के पाँच बिन्‍दुओं वाले घोषणापत्र में कुछ बेहद सटीक और वाजिब मुद्दे हैं। लेकिन इसके साथ देश की बहुसंख्‍यक मेहनतकश आबादी को प्रभावित करने वाले बेहद अहम मुद्दे अनुपस्थित भी हैं। उनकी तरफ़ तुम्‍हारा ध्‍यान खींचने की इजाज़त चाहूँगी। 

जिस दौरान तुमने यह मुहिम शुरू की, उसी दौरान देश के मज़दूर पानीपत से सालेम तक, बरौनी से भरूच तक, नोएडा से गुड़गाँव-मानेसर तक, हर जगह जीवनयापन योग्‍य मज़दूरी और दोगुनी दर से ओवरटाइम के भुगतान व अन्‍य श्रम अधिकारों के लिए सड़कों पर उतर रहे थे और अभी भी देश के बहुत-से हिस्‍सों में वे अपनी इन क़ानूनी और जायज़ माँगों के लिए लड़ रहे हैं। इन संघर्षों में उन्‍हें भयंकर पुलिसिया दमन का भी सामना करना पड़ा है।

उनका वेतन 12-12 घण्‍टे काम करने के बाद भी 10 हज़ार से लेकर 14-15 हज़ार प्रति माह के बीच है। नोएडा में सैंकड़ों मज़दूरों को योगी सरकार ने जेल में डाल दिया।

मज़दूरों के पक्ष में खड़े होने वाले जाने-माने जनबुद्धिजीवी सत्‍यम वर्मा, श्रम अधिकार कार्यकर्ता और इंजीनियर आदित्‍य आनन्‍द, एक ऑटो चालक और एकता संघर्ष समिति के रूपेश राय, छात्र कार्यकर्ता हिमांशु ठाकुर और आकृति चौधरी (दोनों दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के मेधावी छात्र), शान्ति निकेतन से शिक्षा-प्राप्‍त जानी-मानी युवा कलाकार सृष्टि गुप्‍ता और एक स्‍त्री मज़दूर कार्यकर्ता मनीषा को भी नोएडा पुलिस ने योगी सरकार के इशारे पर जेल में डाल दिया।

इन्‍हें जेल में क़रीब डेढ़ महीने से ज्‍़यादा वक्‍़त बीत चुका है। इसके अलावा, इनमें से दो लोगों, सत्‍यम वर्मा और आकृति चौधरी पर उत्‍तर प्रदेश सरकार ने राष्‍ट्रीय सुरक्षा क़ानून (एनएसए) भी लगा दिया है, ताकि उन्‍हें अधिक से अधिक समय के लिए जेल में रखा जा सके। यानी, अगर मज़दूरों के जायज़ हक़ों के पक्ष में कोई आवाज़ उठायेगा तो उसे जेल में डाल दिया जायेगा, उन पर फर्जी मुक़दमे लगा दिये जायेंगे। इनमें से आदित्‍य आनन्‍द, रूपेश राय और हिमांशु ठाकुर को हिरासत में पुलिसिया हिंसा और यातना का शिकार भी होना पड़ा। 

इन सब पर उत्‍तर प्रदेश पुलिस ने मज़दूरों में हिंसा भड़काने का आरोप लगाया, जो पुलिस हमेशा ही श्रम अधिकार कार्यकर्ताओं पर लगाती है। लेकिन कुछ राष्‍ट्रीय मीडिया संस्‍थानों द्वारा किये गये स्टिंग ऑपरेशन में पता चला कि हिंसा भड़काने में स्‍वयं पुलिस की भूमिका है! लेकिन इसकी कोई भी जाँच कोई सरकारी एजेंसी नहीं कर रही है!

इसी प्रकार, गुड़गाँव में हुए मज़दूर आन्‍दोलन का भी दमन किया गया और वहाँ भी तमाम मज़दूर कार्यकर्ताओं पर मुक़दमे दर्ज किये गये, जिसमें आदित्‍य आनन्‍द भी शामिल हैं। यानी, फर्जी मुक़दमों में फँसा कर ऐसे न्‍यायप्रिय युवाओं, लेखकों, बुद्धिजीवियों, इंजीनियरों आदि को सरकार “अनुशासित” करने का प्रयास कर रही है कि मज़दूरों और ग़रीबों के लिए न्‍याय की आवाज़ मत उठाओ!

यह वह अदृश्‍य आबादी है जो मीडिया के विमर्श, कला, फिल्‍म, आदि सभी से ग़ायब है, लेकिन जो देश को चलाने के लिए ज़रूरी हर वस्‍तु और सेवा का उत्‍पादन अपनी मेहनत से करती है। जब तक यह अदृश्‍य आबादी सालों तक चुपचाप खटती रहती है और अमीरज़ादों की ज़‍िन्‍दगी की हर सहूलियत पैदा करती रहती है, कमरतोड़ मेहनत करती रहती है, आधे पेट खाकर काम चलाती रहती है, अपने बच्‍चों को स्‍तरीय शिक्षा और इलाज नहीं दिलवा पाती, तब तक किसी को कोई परवाह नहीं होती।

लेकिन जैसे ही वह कहती है, “बस, अब बहुत हुआ! हमें एक इज्‍जत और आसूदगी की ज़‍िन्‍दगी चाहिए! हम भी इंसान हैं!” तो सारा आसमान टूट पड़ता है। उन पर “पाकिस्‍तानी”, “देशद्रोही”, “नक्‍सली”, “आतंकवादी” आदि होने के आरोप लगा दिये जाते हैं। आज देश के करोड़ों मेहनतकशों के साथ यही हो रहा है। 

अभिजीत, यह देश का सबसे बड़ा वर्ग है। गाँव और शहर के मज़दूरों को मिला दिया जाय, तो उनकी आबादी साठ-पैंसठ करोड़ से ज्‍़यादा है। यह वर्ग आज भुखमरी और कुपोषण की कगार पर जी रहा है। उनके भीतर भारी गुस्‍सा और असन्‍तोष है। क्या उनकी आकांक्षाओं को, उनके रोष को, उनको सपनों को भी अभिव्‍यक्ति नहीं मिलनी चाहिए?

लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी की मुहिम से भी यह वर्ग अनुपस्थित है। यह एक बड़ी कमी लगती है। उसके घोषणापत्र में इन मज़दूरों की आवाज़ होनी चाहिए, जो फिलहाल नहीं है। तुम एक न्‍यायप्रिय व्‍यक्ति हो, मुझे भरोसा है कि तुम इस आलोचना को एक दोस्‍ताना आलोचना के तौर पर लोगे और देश के करोड़ों ग़रीब मेहनतकश मज़दूरों और छोटे किसानों की आवाज़ को भी अपनी इस मुहिम में जगह दोगे, उनके मसले भी उतने ही पुरज़ोर तरीक़े से उठाओगे। सबसे रेज़‍िलियेण्‍ट कॉकरोचेज़ यही हैं और इन्‍हीं में वह ताक़त है, जो बदलाव ला सकती है। 

तुम्‍हारे जवाब के इन्‍तज़ार में,

– कविता कृष्‍णपल्‍लवी

(कविता कृष्णपल्लवी के फ़ेसबुक पेज से)

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