सूफी परम्परा के “बाबा” फ़रीद और उत्तराखंड से उनका सम्बंध 

आजकल एक खास विचारधारा के लोग अपनी बात, अपने विश्वास और अपनी भावनाओं को दूसरों पर लादने के लिए जबर्दस्ती करने पर उतारू हैं। ऐसे एक रंगे तत्व चाहते हैं कि वो जैसा कहते हैं, सोचते, करते हैं….. वैसा ही सब मानें, वैसा ही करें, सब उनकी भावनाओं का सम्मान करें, और उनसे यह उम्मीद नहीं की जाए कि वो किसी की भावनाओं का सम्मान करेंगे। दुख की बात ये है कि पिछले कुछ सालों में इस तरह की तानाशाही प्रवृत्ति को लगातार प्रश्रय मिल रहा है।

कोटद्वार में हाल ही में ‘बाबा’ के नाम पर हुआ बवाल और विवाद भी इसी कड़ी की एक घटना है। जब मुस्लिम दुकानदार की दुकान का नाम “बाबा” देखकर भावनाएं ऐसी आहत हो गईं, जिससे शहर भर में अशान्ति हो गई।

अगर बाबा नाम की खोजबीन की जाए तो पता लगेगा कि दिव्य पुरुषों हस्तियों को जिस नाम से सबसे ज़्यादा पुकारा जाता है उसमें “बाबा” शब्द भी है, यह दक्षिण एशियाई देशों में सबसे लोकप्रिय और अहम नाम है।

यह बड़े आश्चर्य की बात है कि दक्षिण एशियाई देशों में जिन नामों से सबसे ज्यादा शैक्षणिक संस्थान हैं उनमें मुस्लिम सूफी “बाबा” फरीद का नाम भी है। ऐतिहासिक रूप से सिद्ध है कि बाबा फरीद का उत्तराखंड से सीधा नाता है।

‘बाबा’ शब्द सूफिज्म और सूफियों में सबसे ज़्यादा मक़बूल है , 11वीं सदी से भारतीय समाज में सूफियों और ख़ासकर सूफियों के चिश्तिया सिलसिले के साथ ‘बाबा’ लफ़्ज़ गहराई से जुड़ा है।

बाबा फरीद से शुरू हुआ ये सिलसिला उत्तराखंड के प्रसिद्ध कालू सैय्यद बाबा, बाबा बुल्ले शाह और बाबा ताजुद्दीन जैसे  “बाबा” तक चला है और अभी भी जारी है सैकड़ों सूफियों के नाम बाबा से जुड़े हुए हैं।

उत्तराखंड के एक जाने माने शैक्षिक संस्थान 

बाबा फरीद इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (BFIT), देहरादून में हजारों छात्र पढ़कर देश विदेश में रोजगार कर रहे हैं। जिसकी स्थापना  2002 में हुई थी,  इस तरह यह उत्तराखंड के सबसे पुराने निजी कॉलेजों में से एक है, यह एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय से संबद्ध और AICTE द्वारा मान्यता प्राप्त संस्थान है, जिसमें इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट, होटल मैनेजमेंट, कृषि और साइंस में डिप्लोमा, UG और PG कोर्स हैं।

यहाँ से जैव प्रौद्योगिकी (Biotechnology), खाद्य प्रौद्योगिकी, कृषि, कंप्यूटर साइंस, आईटी, मास कम्युनिकेशन, होटल मैनेजमेंट, और फॉरेस्ट्री जैसे विषयों में पास आउट बच्चों का बहुत अच्छा प्लेसमेंट है। कृषि, फॉरेस्ट्री और तकनीकी शिक्षा (Engineering) में इसकी रेटिंग अच्छी होने के कारण यह हर वर्ग के बच्चों में लोकप्रिय है इसीलिए यह उत्तराखंड के बेहतरीन कॉलेजों में गिना जाता है। 

ऐसा नहीं बाबा फरीद के नाम पर यह अकेला शैक्षणिक संस्थान है, या यह पहला शैक्षणिक संस्थान हैं, उत्तर भारत में बाबा फरीद के नाम पर बीसियों शैक्षिक संस्थान हैं;

जैसे, बाबा फ़रीद यूनिवर्सिटी ऑफ़ हेल्थ साइंसेज़ (BFUHS) – फ़रीदकोट, पंजाब,

बाबा फ़रीद कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी – बठिंडा, पंजाब

बाबा फ़रीद कॉलेज – देहरादून / रूपनगर / मुक्तसर (विभिन्न शाखाएँ)

बाबा फ़रीद पब्लिक स्कूल – पंजाब (कई ज़िलों में)

बाबा फ़रीद सीनियर सेकेंडरी स्कूल – फरीदकोट

बाबा फ़रीद डिग्री कॉलेज – मुक्तसर साहिब

बाबा फ़रीद मेमोरियल ट्रस्ट्स – (पंजाब क्षेत्र में विभिन्न सामाजिक कार्यों के लगी)

वगैरह वगैरह यह सूची अभी पूरी नहीं है अभी और बहुत से छोटे बड़े शैक्षणिक और सामाजिक संस्थान मिलेंगे।

बाबा फरीद का पूरा नाम बाबा फ़रीदुद्दीन मसूद गंज-ए-शकर है जिनका समय सन् 1173 से 1266 ई.तक का है, वो दक्षिण एशिया के प्रारंभिक और सर्वाधिक प्रभावशाली चिश्ती सूफ़ी संत थे। उनका जन्म मुल्तान क्षेत्र के पास कोठेवाला (आज के पाकिस्तान में) माना जाता है और उनकी आध्यात्मिक सक्रियता का मुख्य केंद्र अजोधन (आज का पाकपट्टन) रहा। जहां हर साल सिख तीर्थ यात्री यात्रा करते हैं।

वे दिल्ली के महान सूफ़ी हज़रत क़ुत्बुद्दीन बख़्तियार काकी के खलीफ़ा/शिष्य थे, जिनके गुरू अजमेर के ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती हैं। इस तरह बाबा फरीद अजमेर के ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले तीसरे बड़े स्तंभ माने जाते हैं। बाबा फरीद का उत्तराखंड से सीधा सम्बन्ध है। बाबा फरीद के दो बड़े शिष्य थे जिनमें एक अलाउद्दीन मख़्दूम साबिर पाक हैं जिनकी दरगाह कलियर रूड़की में है, साबिर पाक  तेरहवीं सदी में कलियर आ गए थे, दूसरे ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया रहे, जिनकी दरगाह दिल्ली में है और जहां हर साल बसंत और दीवाली बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है।

बाबा फरीद के लाडले भांजे और ख़लीफ़ा/शिष्य हज़रत अलाउद्दीन साबिर पाक की कलियर रुड़की स्थित दरगाह हर मज़हबो मिल्लत के दक्षिण एशियाई अक़ीदतमंदों के लिए बहुत मुक़द्दस है। साबिर पाक के सालाना उर्स में हर साल देश विदेश से हर मजहब के हजारों तीर्थयात्री आते हैं जिनके लिए उत्तराखंड सरकार खास इंतजाम करती है।

पंजाब सरकार तो साबिर पाक के सालाना उर्स में पंजाब पुलिस के बैंड के साथ सरकारी चादर चढ़ाने की रस्म अदा करती है।  पंजाब सरकार का बैंड चादर पोशी से पहले पूरे रुड़की में घूमता है।

बाबा फ़रीद ने चिश्ती सिलसिले को ख़ानक़ाही दायरे में सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे गाँव-क़स्बों, किसानों, कारीगरों, दस्तकारों बुनकरों और आम जनता तक पहुँचाया। उनकी शिक्षाओं में संयम, समानता, प्यार मुहब्बत और सौहार्द प्रमुख थी, भारत में उनकी शिक्षाओं का 12वीं सदी से 16वीं सदी तक बहुत असर रहा।

बाबा फ़रीद की शिक्षाएँ (Teachings)

बाबा फ़रीद की शिक्षाएँ किसी दार्शनिक ग्रंथ की भाषा में नहीं, बल्कि लोक-बोली, कहावतों प्रतीकों और जीवन के अनुभव में व्यक्त होती हैं। उन्होंने अपनी प्रमुख शिक्षाओं में फक़्र और ज़ुह्द को खास तवज्जो दी है,

बाबा फ़रीद ने फ़क़्र (आध्यात्मिक दरिद्रता) को धन-संपत्ति से विमुखता नहीं, बल्कि अहंकार-त्याग के रूप में समझाया। उनके लिए सच्चा सूफ़ी वही है जो भूखा रह सकता है, पर किसी से न तो कुछ मांगता है और न किसी का दिल तोड़ता है।

उन्होंने जिंदगी की तकलीफों को ईश्वर की परीक्षा नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि का साधन माना। उनकी शिक्षा में शिकायत नहीं, हर हाल में ईश्वर की रज़ा सब्र को उन्होंने अन्तिम माना।

बाबा फ़रीद के यहाँ ईश्वर-भक्ति का रास्ता इंसान से होकर जाता है। वे कहते हैं—जो इंसान को कष्ट देता है, वह इबादत में चाहे जितना आगे हो, अधूरा है।

उन्होंने फ़ारसी के साथ-साथ पंजाबी/हिंदवी में भी काव्य रचा। यह अपने-आप में एक सांस्कृतिक क्रांति थी, क्योंकि इससे सूफ़ी संदेश पहली बार आम जनता की भाषा में उतरा।

बाबा फ़रीद दक्षिण एशिया के उन विरले मुस्लिम सूफ़ियों में है, जिनका कलाम सिखों के पवित्र ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल है। यह तथ्य अपने-आप में उनकी सर्वधर्मीय स्वीकृति और नैतिक ऊँचाई को दर्शाता है।

गुरु ग्रंथ साहिब में “श्लोक फ़रीद” के नाम से उनके लगभग 112 श्लोक सम्मिलित हैं।

ये श्लोक जीवन, मृत्यु, अहंकार, समय की नश्वरता और आत्मिक शुद्धता पर आधारित हैं।

एक प्रसिद्ध भावार्थ (हिंदी में):

“फ़रीदा, मिट्टी से दोस्ती कर, मिट्टी सब कुछ सह लेती है।

जो मिट्टी जैसा हो गया, वही खुदा के क़रीब पहुँचा।”

इन श्लोकों की भाषा सरल, प्रतीकात्मक और गहरी है। यहाँ न इस्लामी फ़िक़्ह की जटिलता है, न कर्मकांड—बल्कि नैतिक आत्मसंवाद है। यही कारण है कि सिख परंपरा में भी बाबा फ़रीद को अत्यंत सम्मान प्राप्त है।

बाबा फ़रीद ने दक्षिण एशिया में सूफ़ी-भक्ति संवाद की नींव रखी थी यह समझना बहुत ज़रूरी है सूफियों ने कि इस्लाम की शिक्षाओं को तलवार या सत्ता से नहीं अख्लाक, इश्कों मुहब्बत, समानता सौहार्द और करुणा से पेश किया था। और भाषा, लोकगीत और कहावतों के माध्यम से अध्यात्म को जन-संस्कृति का हिस्सा बनाया

उनके प्रभाव के बिना न बाबा बुल्ले शाह को समझा जा सकता है, न गुरु नानक के समय के सांस्कृतिक वातावरण को।

बाबा फरीद उस महान सूफी परम्परा का हिस्सा हैं जिसने दक्षिण एशिया में इंसानियत और मुहब्बत की मशाल को आगे बढ़ाया। उनकी वाणी ऐसी मीठी थी कि उसने उत्तर भारत ख़ासकर पंजाब की मिट्टी को इश्को मुहब्बत से सराबोर कर दिया‌। बाबा फरीद के दो सदी बाद सिखों के प्रथम गुरु नानक ने बाबा फरीद की इस वाणी को समझा और अपनी ‘उदासियों’ में उसे अपने परमेश्वर के प्रेम के प्रचार में इनका इस्तेमाल किया। बाद में उनकी वाणी गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल हुई।

1604 में जब सिखों के आदिग्रन्थ गुरु ग्रंथ साहिब का गुरु तेग बहादुर द्वारा पहला प्रकाशोत्सव हुआ तो उसमें बाबा फरीद के 112 श्लोक व 4 शबद  में भी दर्ज हुए। 

सूफी बाबा फरीद की रचनाएं सिखों के आदिग्रन्थ गुरु ग्रंथ साहिब में इसलिए शामिल हुईं हैं कि उनकी वाणी इन्सानियत के हक में इश्को मुहब्बत से भरी हुई थी। बाबा फरीद के नाम से गंज-ए-शकर लफ़्ज़ भी जुड़ा है, इसी शक्कर के मीठे पन और मुहब्बत ओ इश्क का पैग़ाम अब सिख अक़ीदत से बाबा फरीद के नाम पर  बांट रहे हैं।

यह अपने आप में महत्वपूर्ण है कि सिख तीर्थ यात्री पाकिस्तान में ननकाना साहिब और कीरतपुर के साथ साथ पाकपट्टन स्थित बाबा फरीद की दरगाह की भी यात्रा करते हैं। इस तरह बाबा फरीद भारत की मिली-जुली गंगा जमुनी तहज़ीब के अहम किरदार हैं। यूं तो सिख सभी सूफ़ी संतो का बहुत एहतेराम करते हैं और सिख परम्परा में बाबा फरीद के जुड़े हर रिश्ते को अहमियत देते है।

हज़रत बख़्तियार काकी जो कि बाबा फरीद के पीरोमुर्शिद/गुरु हैं, उनकी दरगाह महरौली दिल्ली में है, हज़रत बख़्तियार काकी बाबा फरीद से ख़ास मुहब्बत रखते थे। दिल्ली में ही बाबा फरीद के दूसरे महबूब ख़लीफा/शिष्य हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया महबूबे इलाही की दरगाह है। जबकि बाबा फरीद के दादा पीर शेखुल हिंद ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ शेख मुईनुद्दीन चिश्ती हैं जो  सिख परम्परा में बहुत सम्मानित हैं। जिनके सालाना उर्स में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा चादर भेजी जाती है।

ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ की दरगाह अजमेर में जो फानूस लगी है वो दरबार साहब/स्वर्ण मंदिर से भेजी गई है, जो यह बताती है कि सिखी का सूफियों से कितना नज़दीक सम्बन्ध है। दरगाहों और गुरुघरों के तोशखानों में ऐसी बहुत सी धरोहर सहेजी गई हैं। दरबार साहब खुद में कौमी यकजहती का अहम मरकज़ है। जिसकी नींव सूफ़ी मियां मीर के हाथों रखी गई थी। मियां मीर के वंशजों के परिवार के करीब 200 लोग गुरु नानक देव जी की मक्का मदीना व बगदाद की यात्रा (जिसे सिखी में उदासी कहा जाता है) के दौरान उनसे प्रभावित होकर पंजाब में आकर बस गए थे।

इसलिए बाबा शब्द भारतीय परम्परा का ऐसा सम्मानित शब्द है जिसकी विरासत सभी के लिए महत्वपूर्ण है। जिसपर कोई एक वर्ग एकाधिकार करके दूसरों को वंचित या रोक नहीं सकता।

(लेखक पत्रकार के रूप में इस्लाम हुसैन 1976 से सक्रिय हैं,  और उत्तराखंड में मुस्लिम समाज के जानकार हैं। अनेक राष्ट्रीय संस्थाओं से जुड़े वो गांधी विचार की शीर्ष संस्था अखिल भारतीय सर्व सेवा संघ की राज्य इकाई उत्तराखंड सर्वोदय मण्डल के अध्यक्ष हैं।)

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