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Tuesday, September 28, 2021

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जमीन पर जंगलों की कटाई, सोशल मीडिया पर पर्यावरण प्रेम

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कल विश्व पर्यावरण दिवस था। ट्विटर, वॉट्सअप पर लोग पेड़ लगा रहे थे। सत्ताधारी भाजपा समेत तमाम विपक्षी दलों के नेता पेड़ पकड़कर फोटो खींचकर वीडियो बनाकर धड़ाधड़ सोशल मीडिया पर पोस्ट कर रहे थे। माने कल से धरती हरी भरी हो जायेगी। लेकिन एक पेड़ को लगाने और बड़े होने में वर्षों लगते हैं और काटने में चंद मिनट। ये बात लोगों के समझ में नहीं आ रही। गौरतलब है कि मौजूदा समय में पौधारोपण से ज़्यादा पेड़ों की कटाई हो रही है। पर्यावरण संरक्षण को लेकर कोर्ट जाने वाले लोगों पर कोर्ट जुर्माना लगा रहा है। कोई गरीब मजलूम मिल जाता है तो कोर्ट भी पर्यावरण प्रेम जाहिर कर देता है। कुल मिलाकर बात इतनी सी है कि राज्य की तमाम संस्थायें कार्पोरेट के पक्ष में खड़ी हैं और कार्पोरेट पर्यावरण के दुश्मन हैं। 

जबकि नागरिक समाज में पर्यावरणीय चेतना खत्म हो चुकी है और साल में एक बार जगती है तो सोशल मीडिया पर दम तोड़ देती है। हाल की कुछ घटनाओं पर ध्यानाकर्षित करना ही इस लेख रिपोर्ट का मकसद है।

दो पेड़ काटने पर जुर्माना, पूरा जंगल काटने के खिलाफ़ याचिकायें खारिज

विश्व पर्यावरण दिवस के ठीक एक दिन पहले यानि 4 जून को दिल्ली हाईकोर्ट ने 5G टेक्नोलॉजी का पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव को लेकर फिल्म एक्ट्रेस जूही चावला की याचिका को खारिज करते हुये उन पर 20 लाख का जुर्माना लगा दिया, ये कहते हुये कि ये याचिका कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है। ऐसा लगता है कि ये याचिका पब्लिसिटी के लिए दाखिल की गई थी।

जूही चावला की याचिका में दावा किया गया था कि इन 5जी वायरलेस प्रौद्योगिकी योजनाओं से मनुष्यों पर गंभीर, अपरिवर्तनीय प्रभाव और पृथ्वी के सभी पारिस्थितिक तंत्रों को स्थायी नुकसान पहुंचने का खतरा है। जूही चावला, वीरेश मलिक और टीना वचानी ने याचिका दायर कर कहा था कि यदि दूरसंचार उद्योग की 5जी संबंधी योजनाएं पूरी होती हैं तो पृथ्वी पर कोई भी व्यक्ति, कोई जानवर, कोई पक्षी, कोई कीट और कोई भी पौधा इसके प्रतिकूल प्रभाव से नहीं बच सकेगा।

इससे पहले 28 अप्रैल 2021 को मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के बम्होरी स्थित सिंघौरी अभ्यारण्य से दो सागौन के पेड़ काटने वाले छोटे लाल पर जुर्माना लगाया गया था। वन विभाग ने आरोपी छोटे लाल को एक करोड़ 21 लाख 7 हजार 700 रुपये का जुर्माना लगाकर कोर्ट में चालान पेश किया है, ताकि लोग पेड़ों के महत्व को समझ सकें। वन विभाग के अधिकारियों ने यह जुर्माना एक पेड़ की उम्र 50 साल मान कर तय किया है।

इतने भारी भरकम जुर्माने के बाबत डायरेक्ट जनरल इंडियन कौंसिल ऑफ फारेस्ट ट्री रिसर्च एंड एजूकेशन के अध्ययन की दलील दी गयी जिसके अनुसार एक पेड़ की उम्र 50 साल होती है। बम्हौरी वन परिक्षेत्र अधिकारी महेंद्र कुमार पलेचा ने बताया कि एक पेड़ की औसत उम्र 50 साल मानी जाती है। इस तरह एक पेड़ इन 50 सालों में हमें 52 लाख 400 रुपये की सुविधा प्रदान कर सकता है।

गौरतलब है कि दो साल पहले दिल्ली के एक एनजीओ दिल्ली ग्रीन्स ने 2013 में एक अध्ययन किया था। अध्ययन के अनुसार एक स्वस्थ पेड़ वर्ष में जितना ऑक्सीजन देता है, यदि हम खरीदने जाएं तो उसकी कीमत 30 लाख रुपए से भी अधिक होगी। दो साल पहले दिल्ली के एक एनजीओ दिल्ली ग्रीन्स ने 2013 में एक अध्ययन किया। उसके अनुसार एक स्वस्थ पेड़ वर्ष में जितनी ऑक्सीजन देता है, यदि हम खरीदने जाएं तो उसकी कीमत 30 लाख रुपए से भी अधिक होगी। एक अध्ययन में यह भी सामने आया था कि एक पेड़ एक साल में 100 किग्रा तक ऑक्सीजन देता है। एक व्यक्ति को सालभर में 740 किग्रा ऑक्सीजन की ज़रूरत होती है।

अध्ययन के अनुसार इन 50 सालों में एक पेड़ 11 लाख 97 हजार 500 रुपये का ऑक्सीजन पर्यावरण में छोड़ता है, जो लोगों के लिए प्राण वायु का काम करती है। यह पेड़ इन सालों में 23 हजार 68 हजार 400 रुपये वायु प्रदूषण नियंत्रण में हमारे लिए मददगार बनता है। जबकि 19 लाख 97 हजार 500 रुपये मूल्य की भू-क्षरण नियंत्रण व उर्वरता बढ़ाने में सहयोग प्रदान करता है। एक पेड़ बारिश के पानी को रोकने, कटाव रोकने और जल की रिसाइकिल करने में 4 लाख 37 हजार रुपये की मदद देता है।

मुंबई का फेफड़ा कहे जाने वाले Aarey के जंगलों को पेड़ों की कटाई को रोकने के लिए दायर एक जनहित याचिका को बंबई हाईकोर्ट ने 4 अक्टूबर 2019 को खारिज कर दिया। और आधी रात महाराष्ट्र की भाजपा सरकार ने पूरे दल बल के साथ ऑरे जंगल पर हमला कर दिया था।

लोग ऑरे जंगल को बचाने के लिये उग्र हुए, तो उन्हें हिरासत में लेते हुए पुलिस ने Aarey के आस-पास के कई इलाकों में धारा 144 लागू कर दिया था। गौरतलब है कि ऑरे जंगल को काटकर वहां मेट्रो ट्रेन के कोच की पार्किंग की जगह के तौर पर चिन्हित की गयी थी। 

इसी के तहत मुंबई मेट्रो रेल कारपोरेशन ने फ्लोर स्पेस इंडेक्स बनाने की मांग शुरू कर दी। इस परियोजना के लिए 23,136 करोड़ रुपए का बजट तैयार किया गया। बस यहीं से आरे जंगल के करीब 2 हज़ार पेड़ काटे जाने की बहस शुरू हो गई।

 सुप्रीम कोर्ट ने लिखी 19 लाख आदिवासी, वनवासियों को भगाने की पटकथा

22 फरवरी, 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने देश के करीब 16 राज्यों के 19.39  लाख से अधिक आदिवासी परिवारों और जंगल में रहने वाले अन्य लोगों को जंगल की ज़मीन से बेदख़ल करने का आदेश सुनाया था। अदालत ने यह आदेश एक वन्यजीव समूह द्वारा दायर की गई याचिका के संबंध में दिया था जिसमें वन अधिकार अधिनियम की वैधता पर सवाल उठाया गया था। इस याचिका में यूपीए के पहले कार्यकाल के दौरान पास किए गए वन संरक्षण अधिनियम (2006) को चुनौती दी गई है। इसमें सरकार ने पारम्परिक वनवासियों को उनके गाँव की सीमाओं के भीतर वनों तक पहुँचने, प्रबंधन और शासन करने का अधिकार दिया था।

गौरतलब है कि जनजातीय मामलों के मंत्रालय द्वारा एकत्र आंकड़ों के अनुसार 30 नवंबर, 2018 तक देश भर में 19.39 लाख दावों को खारिज कर दिया गया था।

राज्यों द्वारा दायर हलफनामों के अनुसार, वन अधिकार अधिनियम के तहत अब तक अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासियों द्वारा किए गए 11,72,931 भूमि स्वामित्व के दावों को विभिन्न आधारों पर खारिज कर दिया गया था। तीन राज्य – मध्य प्रदेश, कर्नाटक और ओडिशा – भूमि के स्वामित्व के कुल दावों का 20% हिस्सा हैं जिन्हें अस्वीकार कर दिया गया ।

हीरे के लिये 40 हजार सागौन समेत 2.15 लाख पेड़ों की आहुति, रिपोर्ट बदली गयी

दो महीने पहले एक ख़बर लगभग मीडिया द्वारा बॉयकॉट कर दी गयी। ख़बर थी कि मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले के बकस्वाहा के जंगल की जमीन में 3.42 करोड़ कैरेट हीरे दबे होने का अनुमान है। अब इन्हें निकालने के लिए 382.131 हेक्टेयर का जंगल खत्म किया जाएगा। वन विभाग ने जंगल के पेड़ों की गिनती की, जो 2,15,875 हैं। इन सभी पेड़ों को काटा जाएगा। इनमें 40 हजार पेड़ सागौन के हैं।  इसके अलावा केम, पीपल, तेंदू, जामुन, बहेड़ा, अर्जुन जैसे औषधीय पेड़ भी हैं। अभी तक देश का सबसे बड़ा हीरा भंडार पन्ना जिले में है। यहां जमीन में कुल 22 लाख कैरेट के हीरे हैं। इनमें से 13 लाख कैरेट हीरे निकाले जा चुके हैं। 9 लाख कैरेट हीरे और बाकी है। बकस्वाहा में पन्ना से 15 गुना ज्यादा हीरे निकलने का अनुमान है।

बंदर डायमंड प्रोजेक्ट के तहत इस स्थान का सर्वे 20 साल पहले शुरू हुआ था। दो साल पहले प्रदेश सरकार ने इस जंगल की नीलामी की। आदित्य बिड़ला समूह की एस्सेल माइनिंग एंड इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने सबसे ज्यादा बोली लगाई। प्रदेश सरकार यह जमीन इस कंपनी को 50 साल के लिए लीज पर दे रही है। इस जंगल में 62.64 हेक्टेयर क्षेत्र हीरे निकालने के लिए चिन्हित किया है।

यहीं पर खदान बनाई जाएगी लेकिन कंपनी ने 382.131 हेक्टेयर का जंगल मांगा है, बाकी 205 हेक्टेयर जमीन का उपयोग खनन करने और प्रोसेस के दौरान खदानों से निकला मलबा डंप करने में किया जा सके। इस काम में कंपनी 2500 करोड़ रुपए खर्च करने जा रही है। पहले आस्ट्रेलियाई कंपनी रियोटिंटो ने खनन लीज के लिए आवेदन किया था। मई 2017 में संशोधित प्रस्ताव पर पर्यावरण मंत्रालय के अंतिम फैसले से पहले ही रियोटिंटो ने यहां काम करने से इनकार कर दिया था।

हीरे निकालने के लिए पेड़ काटने से पर्यावरण को भारी नुकसान होगा साथ ही वन्यजीवों पर भी संकट आ जाएगा। मई 2017 में पेश की गई जियोलॉजी एंड माइनिंग मप्र और रियोटिंटो कंपनी की रिपोर्ट में तेंदुआ, बाज (वल्चर), भालू, बारहसिंगा, हिरण, मोर इस जंगल में होना पाया था लेकिन अब नई रिपोर्ट में इन वन्यजीवों के यहां होना नहीं बताया जा रहा है। दिसंबर में डीएफओ और सीएफ छतरपुर की रिपोर्ट में भी इलाके में संरक्षित वन्यप्राणी के आवास नहीं होने का दावा किया है।

मोदी राज में विकास के लिये काटे गये 1.09 करोड़ पेड़

26 जुलाई 2019  को भाजपा सांसद रवि किशन और राजीव प्रताप रूड़ी द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में पर्यावरण राज्य मंत्री बाबुल सुप्रियो ने बताया था कि साल 2014 से 2019 के बीच पर्यावरण मंत्रालय ने विकास कार्यों के लिए 1.09 करोड़ पेड़ काटने की अनुमति दी। इसमें से सबसे ज्यादा साल 2018-19 में 26.91 लाख पेड़ काटने की इजाजत दी गई थी। बाबुल सुप्रियो ने कहा कि जंगल में आग लगने की वजह से नष्ट हुए पेड़ों की जानकारी मंत्रालय द्वारा नहीं रखी जाती है।

बाबुल सुप्रियो ने बताया था कि “विभिन्न कानूनों में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार सक्षम अधिकारियों की अनुमति से विभिन्न विकास कार्यों के लिए पेड़ों को काटा जाता है। हालांकि, जंगल की आग के कारण नष्ट हुए पेड़ों के संबंध में मंत्रालय के पास आंकड़े नहीं हैं।”

सरकार द्वारा सदन में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक साल 2014-15 में 23.30 लाख, साल 2015-16 में 16.90 लाख, साल 2016-17 में 17.01 लाख और साल 2017-18 में 25.50 लाख पेड़ों को काटने की अनुमति पर्यावरण मंत्रालय द्वारा दी गई थी।

सुप्रियो ने बताया कि पिछले चार साल में 12 राज्यों को ग्रीन इंडिया मिशन के तहत 87113.86 हेक्टेयर भूमि पर वनीकरण के लिए 237.07 करोड़ रुपये जारी किए गए। इसके अलावा राष्ट्रीय वनीकरण कार्यक्रम के तहत, पिछले चार वर्षों (2015-16 से 2018-19) के दौरान राज्यों को 94,828 हेक्टेयर के नए क्षेत्र पर पौधे लगाने के लिए 328.90 करोड़ रुपये की राशि जारी की गई है। ये मोदी सरकार ने 5 साल में काटे गये 1,09,75,844 पेड़ों की भरपायी के लिये था।

कोयले, लौह, अभ्रक अयस्क के लिये जंगल की पारिस्थितिकी उजाड़ने की कवायद

छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र, उड़ीसा, तमिलनाडु, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में जहां जंगल और वनक्षेत्र ज़्यादा सघन हैं वहां खनिजों के खनन के लिये नियमगिरी, नंदराज, बैलाडीला पर्वत श्रृंखला और जैव विविधता वाले हसदेव अरण्य जैसे जंगलों को लालच की भेंट चढ़ा दिया गया।

22 मई 2018 को तमिलनाडु के तूतीकोरिन में वेदांता की स्टरलाइट कॉपर यूनिट को बंद करने की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे लोगों पर गोलियां चलाकर 9 लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया था। जबकि अगले ही दिन 4 और लोगों की इसी तरह से जिंदगी खत्म कर दी गयी थी।

गौरतलब है कि इस कारख़ाने से निकलने वाला प्रदूषण पूरे इलाके को अपनी जद में ले चुका था। इसका दुष्प्रभाव लाखों लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा था और है। आंदोलनकारी लोगों का यह भी आरोप था कि स्टरलाइट कॉपर यूनिट की वजह से पूरे इलाके का भूजल स्रोत प्रदूषित हो गया है।

छत्तीसगढ़ का हसदेव वन्य क्षेत्र अपनी जैव विविधता और विशेष तौर पर हाथियों के झुंड़ों के लिए काफी प्रसिद्ध है। यहां हजारों प्रजाति के वन्य जीव के साथ माइग्रेटरी चिड़ियों का भी बसेरा है। इतना ही नहीं, हसदेव बांगो बैराज का कैचमेंट क्षेत्र है जहां से छत्तीसगढ़ की 4 लाख हेक्टेयर खेतों में सिंचाई की जाती है। पर्यावरण की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण जंगल इस समय कोयला खदान की वजह से अस्तित्व का संकट झेल रहा है। दो साल पहले छत्तीसगढ़ के सरगुजा स्थित परसा कोल ब्लॉक से उत्खनन के लिए केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने अनुमति दी थी। इस कोल ब्लॉक से अदानी समूह की कंपनी ओपनकास्ट माइनिंग के जरिये कोयला निकालना है। 2100 एकड़ में फैला यह कोल ब्लॉक राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड को आवंटित हुआ है, लेकिन एमडीओ यानी खदान के विकास और ऑपरेशन का अधिकार अडानी के पास है। संरक्षित व सघन वन क्षेत्र होने के कारण इस कोल ब्लॉक के आवंटन का शुरू से विरोध हो रहा है।

बता दें कि हसदेव अरण्य को वर्ष 2009 में “केंद्रीय वन पर्यावरण एवं क्लाइमेट चेंज मंत्रालय” ने खनन के लिए नो गो क्षेत्र घोषित किया था।  वर्ष 2011 में तत्कालीन केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने इस क्षेत्र में 3 कोल ब्लॉक तारा, परसा ईस्ट,केते बासन को यह कहते हुए सहमति दी थी कि इसके बाद हसदेव अरण्य में किसी अन्य खनन परियोजना को स्वीकृति प्रदान नहीं की जाएगी। हालांकि वर्ष 2014 में माननीय नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने सुदीप श्रीवास्तव की याचिका पर निर्णय देते हुए परसा ईस्ट केते बासन की वन स्वीकृति को भी निरस्त कर दिया। लेकिन फिर वर्ष 2014 में केंद्र में मोदी सरकार ने हसदेव अरण्य के नो गो प्रावधान को दरकिनार करते हुए खनन परियोजनाओं को स्वीकृति देना शुरू कर दिया।

दो साल पहले छत्तीसगढ़ दंतेवाड़ा जिले के बैलाडीला पर्वत श्रृंखला के नंदाराज पहाड़ पर स्थित एनएमडीसी की डिपाजिट 13 नंबर खदान को 25 साल के लिये अडानी को सौंप दिया गया था। जिसका आदिवासियों ने भारी विरोध किया था। बैलाडीला के डिपाजिट 13 में 315.813 हेक्टेयर रकबे में लौह अयस्क खनन के लिए वन विभाग ने वर्ष 2015 में पर्यावरण क्लियरेंस दिया है।

सड़क, हाईवे, खनन, कारखाने के लिये साफ होते जंगल

दिसंबर 2019 में भारतीय वन सर्वेक्षण द्वारा जारी इंडियन स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट ( आईएसएफआर 2019) के मुताबिक सरकारी रिकॉर्ड में वन क्षेत्र के 7,67,419 वर्ग किलोमीटर में से 2,26,542 वर्ग किलोमीटर में फॉरेस्ट कवर नहीं है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि करीब 30 प्रतिशत जंगल विहीन इलाके पर सड़क निर्माण, खनन और खेती की जा रही है। मतलब ये कि यह क्षेत्र फाइल में तो जंगल के रूप में दर्ज है लेकिन वहां असल में जंगल नहीं है।

बता दें कि वन नियमों के मुताबिक उस भूभाग को फॉरेस्ट कवर कहा जाता है जिसका दायरा एक हेक्टेयर का हो और जिसमें वृक्ष वितान (कैनपी) की सघनता दस प्रतिशत से ज्यादा है। लेकिन वन विभाग के दस्तावेजों में जो जमीन जंगल की है वो जंगल क्षेत्र में मान ली जाती है लिहाजा मापन में उस इलाके को भी वनक्षेत्र में शामिल कर लिया जाता है जहां वस्तुतः सघन वृक्ष उपस्थिति है भी नहीं।

वन विभाग ऐसे क्षेत्र में निर्माण कार्य की अनुमति देते हुए ये शर्त भी जोड़ देता है कि परिवर्तित ज़मीन का वैधानिक दर्जा यथावत यानी जंगल का ही रहेगा। जंगल रहे न रहे जमीन वन विभाग के अधिकार में ही रहती है। जंगल की कानूनी वैधता, उसकी तकनीकी पहचान और वन नियमावलियां अपनी जगह हैं लेकिन वन संरक्षण और आदिवासी हितों से जुड़े संगठनों और विशेषज्ञों का कहना है कि परिवर्तित भूमि को फॉरेस्ट कवर के रूप में डालकर निर्वनीकरण या वन कटाई की गतिविधियों का हिसाब कैसे रखा जा सकता है ये उसका सटीक उदाहरण है। निर्माण कार्यों और जंगल क्षरण से होने वाले नुकसान की अनदेखी कर परिवर्तित भूमि को भी वन में आंकना गलत है।

इधर देश और समाज में तमाम संस्थाओं द्वारा जंगल को लेकर गलत अवधारणायें गढ़कर जंगलों के प्रति जनचेतना को कुंठित करने का काम किया गया है। जजों से लेकर आम जनमानस तक में जंगलों को लेकर नकारात्मक सोच व्याप्त है। 10 मार्च 2021 को सुप्रीमकोर्ट की संजय किशन कौल, और आर सुभाष रेड्डी की खंडपीठ ने एक रेप और हत्यारोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुये कहा कि हम समाज को जंगल नहीं बनने दे सकते। इतना ही नहीं किस, भी राज्य की क़ानून व्यवस्था बिगड़ती है या अपराध होता है तो उसे ‘जंगलराज’ के विशेषण से नवाज दिया जाता है।

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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