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Categories: बीच बहस

नौकरशाही की रगों में दौड़ता सांप्रदायिकता का खून

भ्रष्टाचार का पर्याय बन चुकी नौकरशाही में अब खुले तौर पर सांप्रदायिक स्वर सुनाई देने लगे हैं। ऐसा नहीं था कि नौकरशाही में सांप्रदायिक मानसिकता के लोग नहीं थे, या कि वो सांप्रदायिक भावना से प्रेरित होकर काम नहीं करते थे। लेकिन इतना तो था ही कि वो सार्वजनिक मंचों और सोशल मीडिया पर नफ़रती बयान या ‘हेट स्पीच’ देने से बचते थे। लेकिन ये पर्दा भी अब हट गया है। 

पिछले साल सीबीआई डायरेक्टर पद से रिटायर हुए आईपीएस ऑफिसर एम़. नागेश्वर राव ने स्वामी अग्निवेश की मौत पर खुशी जाहिर करते हुए कल ट्वीट करके लिखा- “बढ़िया है छुटकारा मिला। स्वामी अग्निवेश, आप भगवा पोशाक में हिंदू विरोधी थे। आपने हिंदूवाद का बड़ा नुकसान किया। मुझे शर्म आती है कि आप तेलुगु ब्राह्मण के रूप में पैदा हुए थे।” इसके अलावा राव ने उन्हें हिरन की खाल में छिपा भेड़िया भी बताया। उन्होंने संस्कृत में लिखा, ‘गोमुख व्याग्रं।’ फिर आगे कहा, ‘हिरन की खाल में भेड़िया। मुझे यमराज से शिकायत है कि उन्होंने इतना लंबा इंतजार क्यों किया!’

इतना ही नहीं आलोचना करने पर प्रसिद्ध इतिहासकर इरफान हबीब को जवाब देते हुए एम नागेश्वर राव ने और जहरीली भाषा में लिखा-“ पूरी दुनिया जानती है कि आप क्या फिक्शन लिखते हो और इतिहास के नाम पर चेंप देते हो। तुम्हारे जैसे परजीवी धर्मांध से प्राचीन हिंदू सभ्यता, हिंदुइज्म और हिंदुत्व पर शिक्षा नहीं चाहिए। कृपया जाओ और ये पढ़ाओ कि पारसी कैसे गायब हो गए, ये तुम्हारे द्वारा ताउम्र किए गए धोखबाज़ी का पश्चाताप होगा।”

एम नागेश्वर राव के इन ट्वीट को पढ़ने के बाद माथा ठनक जाता है कि मुस्लिम समुदाय के लोगों के खिलाफ़, या उन लोगों के खिलाफ़ जो सांप्रदायिक नफ़रत और अंधविश्वास के खिलाफ़ होंगे इसने बतौर सीबीआई चीफ या आईपीएस ऑफिसर क्या गुल खिलाए होंगे?

मोदी सरकार के आने के बाद नौकरशाही में सांप्रदायिकता का ग्राफ बेतहाशा बढ़ता हुआ दिखता है। सतपाल सिंह और ओपी चौधरी जैसे नौकरशाहों ने भाजपा की सांप्रदायिक राजनीति को ज्वाइन करने के लिए अपनी नौकरी तक छोड़ दी। और कई नौकरशाहों द्वारा रिटायरमेंट के बाद बड़ा पैकेज मिलते देख जैसे नौकरशाहों में ज़्यादा जहरीला होने की होड़ सी लगी हुई है।

गोडसे को गांधी की हत्या के लिए शुक्रिया कहने वाली आईएएस अधिकारी

17 मई, 2019 को महिला आईएएस और बृहन्मुंबई महानगर पालिका की उप निगमायुक्त निधि चौधरी ने अपनी ट्विटर हैंडल पर गांधी के शव की फोटो लगाते हुए लिखा- “गांधी की 150 वीं जन्मतिथि को इतना विशेष करके क्यों मनाया जा रहा है। समय आ गया है भारतीय करेंसी से उनके चेहरे और दुनिया भर में लगी उनकी मूर्तियों को हटाकर उनके नाम वाली सड़कों और संस्थाओं का नाम बदल देना चाहिए। 30.01.1948 के लिए गोडसे को धन्यवाद।”

सरकारी नौकरी पर रहते राम मंदिर बनाने की कसम

इससे पहले उत्तर प्रदेश में डीजी स्तर के सरकारी आईपीएस अधिकारी सूर्य कुमार शुक्ला राम मंदिर बनवाने को लेकर हुए कार्यक्रम में मंदिर बनवाने की कसम खाते दिखे थे। 26 जनवरी, 2018 को लखनऊ में हुए एक कार्यक्रम में मंदिर बनवाने के लिए शपथ ली गई। शपथ लेने वालों में होमगार्ड के डीजी सूर्य कुमार शुक्ला भी शामिल थे। बता दें कि सूर्य कुमार शुक्ला 1982 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं

डार्विन और न्यूटन को नकारकर हिंदुत्व को प्रमोट करने वाला पूर्व मुंबई कमिश्नर

मुंबई कमिश्नर के पद से इस्तीफ़ा देकर भाजपा की राजनीति को अंगीकार करने वाले सतपाल सिंह ने शिक्षा राज्य मंत्री रहते खुद को विज्ञान को वेद में खोजने वाले नरेंद्र मोदी क्लब में शामिल करते हुए डार्विनवाद और न्यूटन पर नारियल फोड़ा।

सतपाल सिंह ने चार्ल्स डार्विन के मानव विकासवाद को नकारते हुए कहा था कि स्कूल-कॉलेजों के पाठ्यक्रमों में बदलाव की आवश्यकता महसूस हो रही है। डार्विन के इवोल्यूशन के सिद्धातों को वैज्ञानिक रूप से ख़ारिज़ करते हुए उन्होंने कहा था कि “बंदर से इंसान बनने की डार्विन की थ्योरी गलत है और इसे नहीं पढ़ाया जाना चाहिए। हमारे किसी भी पूर्वज ने लिखित या मौखिक रूप में यह नहीं कहा है कि उन्होंने बंदर को मानव बनते देखा है। इंसान दुनिया में शुरुआत से ही इंसान के रूप में ही आया था।”

इसके अलावा उन्होंने कहा था, “विदेशों के 99 फीसदी विश्वविद्यालय हिंदुत्व की झूठी और जानबूझकर गलत अनुवादित परिभाषा पढ़ा रहे हैं। उन्होंने कहा, मैं एक किताब लिख रहा हूं और उसमें इस पर एक अध्याय होगा”।

केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड (CABE) की 65वीं बैठक में मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री सतपाल सिंह ने कहा था कि गति के नियमों (लॉज ऑफ मोशन) के न्यूटन द्वारा खोजे जाने से पहले भारतीय ‘मंत्रों’ में इनके बारे में बता दिया गया था। इसलिए पारंपरिक ज्ञान को भी हमारे पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। स्कूल-कॉलेजों की इमारतों का वास्तु भी सीखने के लिए जरूरी हैं। ये बातें केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड में कही गई थीं, बता दें कि शिक्षा के क्षेत्र में CABE सबसे बड़ा सलाहकार बोर्ड है जो शिक्षा नीति बनाने के लिए सलाह देता है। अब आप जान लीजिए कि नई शिक्षा नीति-2020 कैसी बनी होगी।

51 नौकरशाहों ने CAA, NRC के समर्थन में राष्ट्रपति को लिखा था पत्र

17 फऱवरी, 2020 को 154 प्रख्यात लोगों ने भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए लाए गए मोदी सरकार के असंवैधानिक सीएए, एनआरसी के समर्थन में राष्ट्रपति को पत्र लिखा था। मजे की बात ये कि इसमें 24 रिटायर्ड आईएएस, 11 रिटायर्ड आईएफएस, 16 रिटायर्ड आईपीएस शामिल थे। और हां इसमें 11 सेवानिवृत्त जज भी शामिल थे। इतनी बड़ी संख्या में नौकरशाहों द्वारा सीएए जैसे सांप्रदायिक और असंवैधानिक कानून और हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले एनआरसी जैसे हथियार के समर्थन में पत्र लिखना इस बात का सूचक है कि भारतीय नौकरशाही में सांप्रदायिकता अपनी जड़ जमा चुकी है।

भारत के कोने-कोने में भय को फैलाया गया है जो कि राष्ट्र को नुकसान पहुंचाने के लिए प्रेरित और एक ख़तरनाक मंसूबे के साथ किया गया है। इसके लिए “समन्वित तरीके” से अभियान चलाया जा रहा है, जिससे हिंसक विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं जिसमें सार्वजनिक और निजी संपत्ति नष्ट हो गई है।

पत्र में आगे कहा गया है कि- “नागरिकों का कहना है कि हाल ही में बनाए गए सीएए जैसे कानून तथा एनपीआर और एनआरसी के विचार के खिलाफ़ भ्रामक और कुटिल नैरेटिव गढ़ी गई है। सीएए लागू होने के बाद, एनपीआर और एनआरसी का विचार जो कि आजादी के बाद से भारतीय विमर्श का एक हिस्सा रहा है, को लागू किया जाना बाकी है।”

पत्र में आगे एनआरसी-सीएए के खिलाफ़ हो रहे विरोध प्रदर्शन पर कहा गया है कि – “प्रोटेस्ट ने सुरक्षा के लिहाज से गंभीर संकट खड़े कर दिए हैं और यह हमारी मातृभूमि के लिए अच्छा नहीं है। ये विरोध-प्रदर्शन जिसमें भारत सरकार की नीतियों का विरोध करने का दावा किया जा रहा, वो दरअसल इस देश के ताने बाने को नष्ट करने और देश की एकता और अखंडता को नुकसान पहुंचाने के इरादे से किया जा रहा है।”

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

This post was last modified on September 13, 2020 8:52 pm

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