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गांधी स्मृति श्रृंखला (भाग-2): गोडसे को महिमामंडित करने के नये दौर की शुरुआत

यह अलग बात है कि कोलकाता की इन ख़बरों से गांधी कत्तई प्रसन्न नहीं हुए थे क्योंकि दिल्ली, पंजाब तथा देश के कई हिस्सों में अभी भी आग लगी हुई थी। और इसी उद्विग्नता में उन्होंने उन्हें मिल रही बधाइयों का जवाब देते हुए कहा था ‘मुबारकबाद से बेहतर होता उन्हें शोक संदेश दिए जाते।’

गांधी की मृत्यु शीर्षक से नाटक रचने वाले महान हंगेरियन नाटककार नेमेथ लास्लो ने अपने नाटक में इस अवसर पर गांधी का एक स्वागत भाषण पेश किया हैः

मुझे अपने जीवन के 78 वें जन्मदिन पर बधाइयां मिल रही हैं। मगर मैं अपने आप से पूछ रहा हूं इन तारों का क्या फ़ायदा? क्या ये सही नहीं होता कि मुझे शोक संदेश दिए जाते? एक वक्त था जब मैं जो भी कहूं, लोग उस पर अमल करते थे। आज मैं क्या हूं? मरुस्थल में एक अकेली आवाज़। जिस तरफ़ देखूं, सुनने को मिलता है हिंदुस्तान की यूनियन में हम मुसलमानों को बर्दाश्त नहीं करना चाहते। आज मुसलमान हैं, कल पारसी, ईसाई, यहूदी, तमाम यूरोपीय लोग इस तरह के हालात में इन बधाइयों का मैं क्या करूं?

नाटककार ने लिखा है कि गांधी ने ‘‘यह साबित कर दिखाया है कि परिशुद्ध औजारों से, नैतिक श्रेष्ठता के हथियारों से भी कोई ऐतिहासिक विजय पा सकता है, एक विशाल साम्राज्य को मुक्त करा सकता है, और औपनिवेशिकता की प्रक्रिया को उलट सकता है।’’ एक गुलाम राष्ट्र तथा टासिल्वैनिया में रहने वाले अल्पसंख्यकों – हंगेरियनों की तुलना करते हुए नेमेथ लास्लो ने कहा कि अल्पसंख्यक का जीवन एक पौधे की तरह है, जबकि बहुसंख्यक राष्ट्र एक शिकारी जैसा होता है।

गांधी के मृत्युस्थल से निरन्तर रही हमारी इस दूरी की गहरी विवेचना जरूरी है जो पूरे समाज की किसी गहरी कमी या असाध्य बीमारी की तरफ इशारा करती दिखती है, जो निरपराध/निरपराधों के हत्यारे की खुलेआम भर्त्सना करने के बजाय अचानक तटस्थ रुख अख्तियार करती है और बेहद शालीन, बुद्धिमत्तापूर्ण अन्दाज़ में हत्यारे के ‘सरोकारों’, उसकी ‘चिन्ताओं’ में झांकने लगती है।

यह अकारण नहीं कि हिन्दुत्व अतिवादी नथूराम गोडसे – जो उस आतंकी मोडयूल का अगुआ था जिसने महात्मा गांधी की हत्या की – का बढ़ता सार्वजनिक महिमामण्डन हमारे समय की एक नोट करने लायक परिघटना है। 

कोर्ट रूम में गोडसे और पीछे सावरकर को बैठे हुए
देखा जा सकता है।

नया इंडिया, नया हीरो?

‘‘…हमारे युग का नायक, सज्जनों, यह दरअसल एक चित्रा है, किसी एक व्यक्ति का नहीं, वह एक समूची पीढ़ी के दुर्गुणों का समुच्चय है जो पूरे शबाब पर है।’’

कुछ समय पहले ‘आल्टन्यूज’’ ने नाथूराम गोडसे पर एक स्टोरी की थी जहां गोडसे के हिमायतियों की बड़ी तादाद को उजागर किया था। लोग यह कहते हुए नज़र आए थे:

‘‘गोडसे को ईश्वर ने भेजा था’’, ‘‘गांधी को फांसी दी जानी चाहिए थी’’, ‘‘गांधी को मारने के गोडसे के वाजिब कारण थे।’’ ‘‘मैं इस बात को दोहराता हूं कि मैं गोडसे का फैन हूं, फिर क्या हुआ ?’’

याद करें उसके हिमायतियों की तरफ से इस ‘‘महान देशभक्त’’ के मंदिरों का देश भर में निर्माण करने की योजना भी बनी है। वैसे यह बात चुपचाप तरीके से लम्बे समय से चल रही है। वर्ष 2015 में हिन्दू महासभा ने गोडसे के जीवन पर एक वेबसाइट भी शुरू की। संसद के पटल पर भाजपा के सांसद साक्षी महाराज ने गोडसे को ‘देशभक्त’ के तौर पर संबोधित किया था। 2014 के संसद के चुनावों में भाजपा की तरफ से प्रत्याशी रहे व्यक्ति ने यह लेख लिख कर खलबली मचा दी थी कि ‘गोडसे ने गलत निशाना साधा था उसे गांधी को नहीं बल्कि नेहरू को मारना चाहिए था। जैसी कि उम्मीद की जा सकती है, भाजपा – जो कुछ समय से गांधी का भी गुणगान करती रहती है – ने अपने इन दो ‘होनहारों’ के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की।

महाराष्ट्र एवं पश्चिमी भारत के कई हिस्सों से 15 नवम्बर के दिन – जिस दिन नाथूराम को फांसी दी गयी थी- हर साल उसका ‘शहादत दिवस’ मनाने के समाचार मिलते रहते हैं। मुंबई एवं पुणे जैसे शहरों में तो नाथूराम गोडसे के ‘सम्मान’ में सार्वजनिक कार्यक्रम भी होते हैं। लोगों को यह भी याद होगा कि वर्ष 2006 के अप्रैल में महाराष्ट्र के नांदेड़ में बम बनाते मारे गए हिमांशु पानसे और राजीव राजकोंडवार के मामले की तफ्तीश के दौरान ही पुलिस को यह समाचार मिला था कि किस तरह हिन्दुत्ववादी संगठनों के वरिष्ठ नेता उनके सम्पर्क में थे और आतंकियों का यह समूह हर साल ‘नाथूराम हौतात्म्य दिन’ मनाता था। गोडसे का महिमामण्डन करते हुए ‘मी नाथुराम बोलतोय’ शीर्षक से एक नाटक का मंचन भी कई साल से हो रहा है।

दरअसल चीजें इतनी बेधड़क आगे बढ़ रही हैं कि गोडसे के सम्मान में पोस्टर मिलना राजधानी में भी आम हो चला है।

निश्चित ही गोडसे कोई अपवाद नहीं है नायक को ‘गढ़ने’ की हिन्दुत्ववादियों की अन्तहीन सी लगने वाली कवायद में और जनता के एक मुखर हिस्से में उनकी स्वीकार्यता का।

मिसाल के तौर पर दो साल पहले शंभुलाल रैगर नाम से ‘‘युग के एक नये नायक’’ से हम सभी रूबरू हुए हैं।

किसी भी साधारण व्यक्ति के लिए यह जानना सुन्न करने वाला हो सकता था कि सैकड़ों की तादाद में लोग – जो किसी दक्षिणपंथी तंजीम से ताल्लुक रखते थे – न केवल इस हत्यारे की हिमायत में सड़कों पर उतरे बल्कि उन्होंने उसके मानवद्रोही कारनामे को सही ठहराया, जहां वह एक निरपराध व्यक्ति को अपनी कुल्हाड़ी से मारता दिखता है और उसका वीडियो भी जारी करता है, और किस तरह पांच सौ से अधिक लोगों ने ‘उसके परिवार की सहायता के नाम पर’ उसके बैंक खाते में लगभग 2.5 लाख रूपए भेजे। इतना ही नहीं बाद में राम नवमी के दिन निकलने वाली झांकी में भी शंभुलाल जैसे दिखने वाले व्यक्ति को बिठा कर उस रक्तरंजित प्रसंग को अभिनीत किया जा रहा था।

शंभुलाल के इस महिमामण्डन ने हमें लगभग दो दशक पहले के एक अन्य प्रसंग की याद दिलायी थी जब कुष्ठरोग निवारण में मुब्तिला एक पादरी ग्राहम स्टेन्स एवं उसके दो बच्चों – फिलिप और टिमोथी – को सूबा ओड़िसा के मनोहरपुर में नींद में ही पचास से अधिक लोगों के समूह ने जिन्दा जला दिया गया था, जिस हत्यारे गिरोह की अगुआई रविन्दर पाल सिंह उर्फ दारा सिंह कर रहा था। इस हत्यारे पर एक मुस्लिम व्यापारी शेख रहमान और अन्य ईसाई पादरी अरूल दास की हत्या करने के भी आरोप लगे थे। ग्राहम स्टेन्स एवं उनके बच्चों की हत्या के जुर्म में उसे उम्र कैद की सज़ा सुनायी गयी थी। अगर शंभु द्वारा अफराजुल की हत्या को ‘‘लव जिहाद’’ का मुद्दा उठा कर ‘‘औचित्य’’ प्रदान किया गया था तो स्टेन्स की हत्या को ‘‘धर्मांतरण’’ के नाम पर ‘‘सही’’ ठहराया जा रहा था।

कोई भी व्यक्ति जो दक्षिण एशिया के परिदृश्य पर निगाह रखे हुए है बता सकता है कि ‘‘अतिवादी हत्यारों’’ का इस किस्म का महिमामण्डन यहां अपवाद नहीं है। हाल के समयों में कई सारे तर्कवादी, पत्रकार, विभिन्न आन्दोलनों के कार्यकर्ता किसी जिम्मेदारी के पद पर बैठे व्यक्तियों की ऐसे लोगों ने हत्या की है, जिसे दक्षिणपंथी दायरों में सेलिब्रेट किया गया है। पाकिस्तान/पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर – जो वहां के ईशनिन्दा कानून के खिलाफ थे तथा उसको हटाने की मांग कर चुके थे – के हत्यारे उनके अंगरक्षक मुमताज कादरी की कब्र के तीर्थस्थान में रूपांतरण हमारे सबके सामने है। हजारों की तादाद में लोग हर सप्ताह वहां पहुंच कर ‘‘धर्मरक्षक’’ कादरी के प्रति अपना सम्मान प्रगट करते हैं।

ईशनिन्दा कानून का विरोध करने वाले- जिसके चलते पाकिस्तान के हजारों लोगों की जिन्दगियां तबाह हुई हैं – व्यक्ति के हत्यारे का यह महिमामण्डन या आप पेशावर के मिलिटरी स्कूल में घुस कर इस्लामिस्टों द्वारा की गयी 150 से अधिक बच्चों की हत्या के कारनामे को देखें या बांगलादेश में अविजित रॉय जैसे कई ब्लॉगरों की इस्लामिस्टों द्वारा की गयी हत्या को देखें, मायनामार में रोहिंग्या मुसलमानों का नस्लीय शुद्धीकरण पर गौर करें या श्रीलंका में बौद्ध अतिवादियों द्वारा वहां के धार्मिक अल्पसंख्यकों – ईसाइयों, मुसलमानों और हिन्दुओं – का किया जा रहा उत्पीड़न देखें, आप बार-बार पाएंगे कि निशाना बना कर की जा रही इस हिंसा को जनसमर्थन हासिल है।

हम जुझारू पत्रकार एवं साम्प्रदायिकता विरोधी कार्यकर्ता गौरी लंकेश की अपने घर के दरवाजे पर की गयी हत्या को देख सकते हैं, जिसने समूचे मुल्क में उबाल पैदा किया था और इस हत्या का विरोध करने के लिए जगह-जगह प्रदर्शन हुए थे, मगर सबसे अधिक विचलित करने वाली बात थी कि कइयों ने इस बर्बर हत्या पर ‘‘खुशी प्रगट की थी’’।

अपने ट्वीट में जी न्यूज की पूर्व पत्रकार जागृति शुक्ला ने जो कहा वह इसी ‘‘खुशी’’ का एक नमूना था

‘‘..तो कम्युनिस्ट गौरी लंकेश की निर्ममतापूर्वक हत्या हुई। कहा जाता है कि आप के किए का फल आप को भुगतना पड़ता है। आमीन’’

इस मामले में सबसे विवादास्पद ट्वीट सूरत, गुजरात के एक व्यापारी निखिल दधीच का था जिसमें उसने गौरी को ‘‘कुतिया’’ कह दिया था। यह व्यापारी उन लोगों में शुमार था जिन्हें सत्ताधारी पार्टी के कई अग्रणी लोग फॉलो करते हैं जिसका जिक्र उसने पेज पर किया था।

निरपराधों के खिलाफ, ‘‘अन्यों’’ के विरोध में हिंसा का महिमामण्डन बढ़ता सामान्यीकरण हमारे जैसे समाजों के नैतिकता के ताने-बाने को उजागर करता है। अब वक्त़ आ गया है कि ऐसे हत्यारों को या ऐसी घटनाओं को हम व्यक्ति तक सीमित न रखें, अलग-थलग करके न देखें बल्कि उसे एक समग्र रूप में समझने की कोशिश करें। यह एक ऐसा मसला है जिस पर गहरे विचार-विमर्श की जरूरत है। जर्मन नात्सी अधिकारी आइशमैन (19 मार्च 1906- 1 जून 1962) – जिस पर यहूदियों के कत्लेआम में सहभागिता आदि मुददों पर इस्त्राएल में मुकदमा चला था और जिसे बाद में मौत की सज़ा सुनायी गयी थी – के बारे में लिखते हुए हन्ना आरेन्डट लिखती है:

आइशमैन प्रसंग की सबसे बड़ी उलझन यह है कि कितने सारे लोग उसके जैसे थे, और वे तमाम लोग न परपीड़क थे और न ही विकृत मस्तिष्क के थे। वह उस वक्त़ भी और आज भी जबरदस्त रूप में सामान्य लोग थे। अपनी कानूनी संस्थाओं के नज़रिये से देखें और अपने फैसलों के अपने नैतिक पैमानों को टटोलें तो उन तमाम अत्याचारों के समक्ष भी यह सामान्य स्थिति बहुत-बहुत डरावनी थी।

हमारे युग के ‘नए हीरो के आविर्भाव’ से हम इस स्थिति से शायद पहली बार रूबरू हो रहे हैं। प्रश्न उठता है कि क्या हम सभी इसे देख पा रहे हैं?

‘जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध’

अगर ‘गांधी स्मृति’ को लेकर हमारे बढ़ते स्मृतिलोप के प्रसंग की ओर फिर लौटें तो क्या यह कहना वाजिब होगा कि इसमें हमें हिंसा/जनसंहार की घटनाओं को लेकर भारतीय समाज की अपनी गहरी बेरुखी/असम्पृक्तता दिखती है, जो बड़े-बड़े जनसंहारों को भी जज्ब़ करती आयी है। उल्टे ऐसी हिंसा के अंजामकर्ताओं को हम गौरवान्वित करते आए हैं, हृदय सम्राट के तौर पर नवाज़ते आए हैं और कभी-कभी तो सत्ता की बागडोर भी सौंपते आए हैं।

– आजादी के बाद दलितों के पहले जनसंहार कहे गए किझेवनमनी का जनसंहार इसकी नजीर रहा है जिसमें दलित परिवारों के लगभग चालीस लोगों को – जिनमें मुख्यतः महिलाएं एवं बच्चे शामिल थे – भूस्वामियों ने जिन्दा जला दिया था। (1969) तमिलनाडु के तंजावुर जिले में उन दिनों कम्युनिस्ट पार्टी की अगुआई में खेत-मजदूरों का आन्दोलन चल रहा था, जिसका दमन करने के लिए भूस्वामियों ने यह कदम उठाया था। इस काण्ड में अदालत का फैसला विचलित करने वाला था? अदालत ने सारे अपराधियों को बाइज्जत बरी किया था और यह तर्क दिया था कि ‘इस बात पर यकीन नहीं किया जा सकता कि ऊंची जाति के ये लोग पैदल बस्ती तक गए होंगे।’

– उधर दलित-आदिवासी अत्याचार के ऐसे तमाम काण्डों की फेहरिस्त पेश की जा सकती है जिसमें हम पाते हैं कि तमाम सबूतों, गवाहों के बावजूद अदालत ने कोई तकनीकी कारण दिखा कर दलितों-आदिवासियों के उत्पीड़कों को बचा लिया। जनता के खिलाफ अपराधों के मामलों में न्याय करने में भारतीय अपराध न्याय व्यवस्था की क्षमता पर अक्सर प्रश्न चिन्ह खड़ा होता है।

– आज़ादी के बाद के दौर में हजारों दंगे हुए हैं और इतना ही नहीं प्रोफेसर पाल आर ब्रास का अध्ययन यही बताता है कि हमारे देश में ‘संस्थागत दंगा प्रणालियां’ विकसित हुई हैं जो कभी भी दंगे कराने में ‘सक्षम’ हैं। आम तौर पर यही देखने में आता है कि ‘दैनंदिन आधार पर नज़र आ रही इन जन हत्याओं’ के बावजूद अभी भी दंगों के असली मास्टरमाइंड/योजना बनाने वाले शायद ही पकड़े गए हैं और विभिन्न न्याय आयोगों की रिपोर्टों के बावजूद अपने पद पर रह कर लापरवाही करने वाले पुलिस या प्रशासकीय अधिकारियों पर किसी भी किस्म की कार्रवाई शायद ही हुई है।

क्षेपक के तौर पर एक प्रसंग को और याद किया जा सकता है 30 जनवरी 2014 को महात्मा गांधी की हत्या के 66 साल पूरे होने के अवसर पर देश भर में कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा था, उस दिन गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे की ‘आवाज़’ में एक आडियो वाटसअप पर मोबाइल के जरिए लोगों तक पहुंचाया गया था। इस मेसेज में उस हत्यारे का महिमामण्डन करने की और निरपराधों को मारने की अपनी कार्रवाई को औचित्य प्रदान करने की कोशिश दिखाई दे रही थी। एक अग्रणी अख़बार ने बताया था कि ऐसा मैसेज उन लोगों के मोबाइल तक पहुंच चुका था, जो एक ‘बड़ी पार्टी से ताल्लुक रखते हैं और वही लोग इसे आगे भेज रहे हैं।’ मेसेज की अन्तर्वस्तु गोडसे का स्पष्टतः महिमामण्डन की दिख रही थी, जिसमें आज़ादी के आन्दोलन के कर्णधार महात्मा गांधी की हत्या जैसी कार्रवाई को औचित्य प्रदान करने की कोशिश की गयी थी। इतना ही नहीं एक तो इस हत्या के पीछे जो लम्बी चौड़ी साजिश चली थी, उसे भी दफनाने का तथा इस हत्या को देश को बचाने के लिए उठाए गए कदम के तौर पर प्रस्तुत करने की कोशिश की गयी थी।

क्या हमारी यह बेरुखी इस वजह से उपजी है क्योंकि इस हत्या को औचित्य प्रदान करने में कहीं न कहीं हम खुद शामिल रहते आए हैं जो विभिन्न रूपों में अभिव्यक्त होती रही है। ‘आज़ादी तक तो सबको साथ ले चलने की बात ठीक थी, मगर आज़ादी के बाद खास समुदाय की हिमायत क्यों की जाए’, ‘गांधी महान शख्स रहे हैं, हमारी आज़ादी के आन्दोलन के अगुआ रहे हैं, मगर 55 करोड़ का हठ करके उन्होंने कुछ लोगों को नाराज तो किया था’’ गोडसे के मानवद्रोही कारनामे का औचित्य प्रदान करने वाले या उसमें कुछ तर्क ढूंढने वाले लोग सार्वजनिक जीवन में भी रहते आए हैं।

एक तरीका इस मानवद्रोही कारनामे को लेकर तटस्थ दिखने का होता है, जो निश्चित ही कहीं न कहीं हत्या को औचित्य प्रदान करता प्रतीत होता है।

मिसाल के तौर पर एक अग्रणी न्यूज पोर्टल के जाने माने स्तंभकार का तर्क यह रहा है कि गांधी की हत्या की बहस के संदर्भ में हमारे लिए यह जरूरी है कि हम ‘अच्छे और बुरे की बाइनरी/दुविधा’ से परे जाएं। उनकी दलील रफता-रफता सार्वजनिक अवधारणा और सापेक्षतावाद की तरफ बढ़ती है:

‘अगर किसी को गांधी के महिमामण्डन का अधिकार है, तो निश्चित ही बाकियों को उनकी आलोचना करने का अधिकार है या उनका जो हश्र हुआ उसकी प्रशंसा करने का अधिकार है ? अगर आज हम रावण /राम नहीं/ की कहानी के काल्पनिक पक्ष को बयां करते हुए किताबें लिख सकते हैं तो निश्चित ही हम उन लोगों के विचारों के साथ भी जी सकते हैं जो गोडसे को पूरी तरह खराब नहीं मानते थे।’’

स्तंभकार/सम्पादक महोदय यह भी जोड़ते हैं कि

‘‘गोडसे के बारे में सबसे गलत बात थी कि उसने महात्मा से बहस करने के बजाय और भारत की जनता को अपनी तरफ मोड़ने के बजाय उन्हें गोलियों से खतम कर दिया। मगर वह ऐसा समय था जब जनता गांधी की दीवानी थी और वह दूसरों की बात सुनने के लिए तैयार नहीं थी। गोडसे के विचार गांधी की लोकप्रियता के आगे टिक नहीं सकते थे और इसी निराशा ने उसे हत्या की तरफ धकेला।’’

संघ के एक सुप्रीमो थे राजेन्द्र सिंह। उनसे जब पूछा गया कि गांधी के हत्यारे गोडसे के बारे में वह क्या सोचते हैं तो उनका जवाब था:

‘‘गोडसे अखंड भारत के दर्शन से प्रेरित था। उसके मन्तव्य अच्छे थे पर उसने अच्छे उद्देश्य के लिए गलत मेथड इस्तेमाल किया।’

क्या यह कहा जाना वाजिब होगा कि नैतिक सापेक्षतावाद का यही वह जड़ मूल चिन्तन है जो किसी ‘महाभारत’ में अपने ही आत्मीयों के खिलाफ अस्त्र उठाने के लिए विवश किसी ‘अर्जुन’ के द्वंद्वों से रूबरू होने के बजाय उसे यह समझा देता है कि यह आसन्न हिंसा दरअसल हिंसा है ही नहीं !

गांधी स्मृति से हमारी दूरी महज भौतिक नहीं है बल्कि मानसिक भी है।

लाजिम है कि हम इतना तो जानते हैं 30 जनवरी को गोडसे की गोली से गांधी मारे गए, जिसे आज़ाद भारत की पहली आतंकवादी कार्रवाई के तौर पर जाना जाता है और हमें अधिक से अधिक इतना याद रहता है कि उसके पहले 20 जनवरी को गांधी को मारने का प्रयास उसी आतंकी मोडयूल ने किया था, जब उन्होंने बिड़ला हाउस पर बम फेंका था और जिस असफल कार्रवाई में मुब्तिला मदनलाल पाहवा इसमें पकड़ा गया था।

‘संसद मार्ग पर स्थित पुलिस स्टेशन के अपने सेल में मदनलाल अब अपने कुख्यात होने की कीमत अदा करता दिख रहा था। थके मांदे उसने उन तीन पुलिसकर्मियों के सामने सच्चाई को उगलना शुरू किया, जो पिछले दो घंटे से उससे पूछताछ कर रहे थे। .. उसने कबूला कि वह कोई पागल पंजाबी शरणार्थी नहीं है जो अकेले ही इस मुहिम में जुटा था बल्कि एक हत्यारों के समूह का हिस्सा है। उसने इस साजिश में शामिल लोगों की संख्या भी बतायी, सात। उन्होंने गांधी को मारने की योजना इसलिए बनायी क्योंकि ‘वह शरणार्थियों पर दबाव डाल रहे थे कि वह मस्जिदों को खाली कर दें, वह पाकिस्तान को उसके रूपए देने के लिए जिम्मेदार हैं और हर तरीके से मुसलमानों की मदद करते रहते हैं।

अधिकतर पढ़े लिखे लोग भी इस हक़ीकत से परिचित ही नहीं रहते हैं कि तीस के दशक के मध्य से ही जब आज़ादी का आन्दोलन अपने उरूज पर था तभी से हिन्दुत्ववादी जमातें गांधी हत्या के षड्यंत्र में मुब्तिला थीं और उन्हें मारने की एक दो नहीं बल्कि छह कोशिशें हुई थीं, जिनमें से दो कोशिशों में नथूराम गोडसे खुद शामिल था।

फिर स्वतंत्रता सेनानी भिलारे गुरूजी को कौन जानेगा जिन्होंने गोडसे की एक ऐसी ही कोशिश को विफल किया था, जब वह छूरा लेकर गांधी को मारने दौड़ा था।

(“गांधी स्मृति श्रृंखला” के तहत दी जा रही यह दूसरी कड़ी लेखक सुभाष गाताडे की किताब “गांधी स्मृति-कितनी दूर, कितनी पास” से ली गयी है।)

श्रृंखला का
पहला भाग।

This post was last modified on October 3, 2019 8:55 pm

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