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गांधी स्मृति श्रृंखला (भाग-1): “भारत में मैं मुस्लिम परस्त हूं तो पाकिस्तान में हिन्दू परस्त”

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गांधी स्मृति में गांधी जी की प्रतिमा।

(राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जन्म का 150वां साल चल रहा है। इस मौके पर गांधी की शिक्षा, विचार, सिद्धांतों और उनके रहन-सहन के तरीकों को लेकर देश में जिस तरह से विचार-विमर्श और आयोजन होने चाहिए थे। गोष्ठियों, सेमिनारों और कन्वेंशनों का जो दौर चलना चाहिए था। वह कहीं दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहा है।

इन सब मामलों में सरकारों से न केवल बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने की अपेक्षा की जाती है बल्कि उनकी अगुआई की जिम्मेदारी भी उनके कंधों पर होती है। लेकिन मामला इसके ठीक विपरीत दिख रहा है। औपचारिकता के लिए केंद्र ने भले ही इससे संबंधित एक कमेटी गठित कर दी हो। और उसमें तमाम दूसरे दलों और क्षेत्रों के प्रतिनिधियों को भी शामिल कर लिया हो। लेकिन शायद यह मंशा का ही मामला है। अभी तक गांधी पर देश में एक भी बड़ा आयोजन नहीं हुआ है। इसके पीछे के कारणों को समझना कठिन नहीं है। दरअसल संघ के आदर्श गांधी नहीं बल्कि सावरकर और गोडसे हैं। दो विपरीत ध्रुवों पर खड़े इन दोनों में से एक के खात्मे पर ही दूसरे का अस्तित्व टिका है।

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संघ के आदर्शों को लागू करने वाली मोदी से गांधी के विचारों को प्रचारित और प्रसारित करने की उम्मीद करना ही बेमानी है। लिहाजा किसी सरकार के बजाय इस काम को अब समाज को अपने हाथ में लेना होगा। इसी नजरिये से जनचौक ने यह पहल की है। लेखक और मार्क्सवादी चिंतक सुभाष गाताडे ने गांधी पर “गांधी स्मृति: कितनी दूर, कितनी पास” शीर्षक से एक किताब लिखी है। आज से उसी किताब के कुछ हिस्सों को श्रृंखलाबद्ध तरीके से यहां दिया जाएगा। पेश है उसकी पहली किस्त-संपादक)  

30 जनवरी 1948। शाम पांच बज कर 15 मिनट का वक्त़ हो रहा था।

गांधीजी बेहद तेजी से बिड़ला हाउस के प्रार्थनासभा की ओर जा रहे थे। उन्हें थोड़ी देरी हुई थी। उनके स्टाफ के एक सदस्य गुरूबचन सिंह ने अपनी घड़ी निकालते हुए कहा कि ‘‘बापू आज आप को थोड़ी देरी हो रही है।’ गांधीजी ने हंसते हुए जवाब दिया था- जो देरी करते हैं कि उन्हें उसकी सज़ा अवश्य मिलती है।

किसको यह गुमान हो सकता था कि चन्द कदम दूर मौत उनके लिए मुन्तज़िर खड़ी है।

दो मिनट बाद ही अपने बेरेटा पिस्तौल से नाथूराम गोडसे ने उन पर गोलियां दागी थीं और गांधीजी ने अन्तिम सांस ली थी।

गांधी हत्या को याद करते हुए प्रस्तुत आलेख में कुलदीप नैयर का 2 संस्मरण उद्धृत किया गया है, जो उन दिनों ‘अंजाम’ नामक अख़बार में काम कर रहे थे:

जब मैं वहां पहुंचा तो वहां कोई सिक्योरिटी नहीं थी। बिरला हाउस का गेट हमेशा की तरह खुला हुआ था। उस समय मैंने जवाहरलाल नेहरू को देखा। सरदार पटेल को देखा। मौलाना आज़ाद कुर्सी पर बैठे हुए थे ग़मगीन। माउंटबेटन मेरे सामने ही आए। उन्होंने आते ही गांधी के पार्थिव शरीर को सैल्यूट किया। माउंटबेटन को देखते ही एक व्यक्ति चिल्लाया- गाँधी को एक मुसलमान ने मारा है। माउंटबेटन ने ग़ुस्से में जवाब दिया- यू फ़ूल, डोन्ट यू नो, इट वॉज़ ए हिंदू! मैं पीछे चला गया और मैंने महसूस किया कि इतिहास यहीं पर फूट रहा है। मैंने ये भी महसूस किया कि आज हमारे सिर पर हाथ रखने वाला कोई नहीं है।

गांधी स्मृति।

..बापू हमारे ग़मों का प्रतिनिधित्व करते थे, हमारी ख़ुशियों का और हमारी आकांक्षाओं का भी। हमें ये ज़रूर लगा कि हमारे ग़म ने हमें इकट्ठा कर दिया है। इतने में मैंने देखा कि नेहरू छलांग लगाकर दीवार पर चढ़ गए और उन्होंने घोषणा की कि गांधी अब इस दुनिया में नहीं हैं।

गांधी हत्या का तत्काल असर यह हुआ था कि दंगे रूक गए थे, अल्पसंख्यकों पर जारी हमलों का सिलसिला रूक गया था, और महज हिन्दोस्तां में ही नहीं बल्कि पाकिस्तान में भी।

11 फरवरी, 1948 को वाशिंगटन में आयोजित एक स्मृति सभा को भेजे अपने संदेश में आईनस्टाइन ने कहा,

‘वे सभी लोग जो मानव जाति के बेहतर भविष्य के लिए चिंतित हैं, वे गांधी की दुखद मृत्यु से अवश्य ही बहुत अधिक विचलित हुए होंगे। अपने ही सिद्धांत यानी अहिंसा के सिद्धांत का शिकार होकर उनकी मृत्यु हुई। उनकी मृत्यु इसलिए हुई कि देश में फैली अव्यवस्था और अशांति के दौर में भी उन्होंने किसी भी तरह की निजी हथियारबंद सुरक्षा लेने से इनकार कर दिया। यह उनका दृढ़ विश्वास था कि बल का प्रयोग अपने आप में एक बुराई है, और जो लोग पूर्ण शांति के लिए प्रयास करते हैं, उन्हें इसका त्याग करना ही चाहिए। अपनी पूरी जिंदगी उन्होंने अपने इसी विश्वास को समर्पित कर दी और अपने दिल और मन में इसी विश्वास को धारण कर उन्होंने एक महान राष्ट्र को उसकी मुक्ति के मुकाम तक पहुंचाया। उन्होंने करके दिखाया कि लोगों की निष्ठा सिर्फ राजनीतिक धोखाधड़ी और धोखेबाजी के धूर्ततापूर्ण खेल से नहीं जीती जा सकती है, बल्कि वह नैतिक रूप से उत्कृष्ट जीवन का जीवंत उदाहरण बनकर भी हासिल की जा सकती है।’

आप गए हैं ‘गांधी स्मृति’ ?

गांधी का इन्तक़ाल हुए इकहत्तर साल बीत चुके हैं। और यह गांधी के जन्म का 150 वां साल भी है। पूरे देश में यह साल मनाया जा रहा है।

इस पृष्ठभूमि में यह अदद सवाल पूछना समीचीन हो सकता है कि गांधी स्मृति – जो दिल्ली के तीस जनवरी मार्ग पर स्थित है / जिसे पहले बिड़ला हाउस के नाम से जाना जाता था/ – जहां गांधी ने अपनी जिन्दगी के आखरी 144 दिन गुजारे और उसी जगह पर 30 जनवरी की शाम हिन्दुत्व आतंकी गोडसे ने उनकी हत्या की थी- कितने लोगों ने देखा है? दिल्ली के बाशिन्दे हों या दिल्ली दर्शन के लिए भारत के अलग-अलग हिस्सों से आने वाले लोग हों – जो यहां के तमाम ‘दर्शनीय’ स्थलों की यात्रा कर लौटते हों, जिनमें राजघाट की गांधी की समाधि रहती हो या इंदिरा गांधी का वह मकान शामिल रहता हो, जहां आततायियों ने उन पर गोलियां दागी थीं, मगर बहुत कम लोग ऐसे मिलेंगे, जिन्होंने यहां की यात्रा की हो।

मेरे मित्र एवं प्रसिद्ध जन बुद्धिजीवी अपूर्वानन्द इस प्रश्न को अपनी कई सभाओं में उठा चुके हैं। उनका यह भी कहना है कि दिल्ली के तमाम स्कूलों में उन्होंने यह जानने की कोशिश की, और उन्होंने यही पाया कि लगभग 99 फीसदी छात्रों ने इस स्थान के बारे में या ठीक से सुना तक नहीं है और वहां जाने की बात तो दूर रही।  

आखिर ऐसी क्या वजह है कि दिल्ली के तमाम स्कूल जब अपने विद्यार्थियों को दिल्ली दर्शन के लिए ले जाते हैं, तो उस जगह पर ले जाना गंवारा नहीं करते, जो गांधी के अंतिम दिनों की शरणगाह थी, जहां रोज शाम वह प्रार्थना सभाओं का आयोजन करते थे और जहां उन्होंने अपने जीवन की आखिरी लड़ाई लड़ी थी- आमरण अनशन के रूप में। ताकि दिल्ली में अमन चैन कायम हो जाए।

कभी एक दूसरे के कंधे से कंधा मिला कर लड़ रहे लोगों को एक दूसरे के खून का प्यासा होते देख उन्होंने अन्त तक कोशिश की और कम से कम यह तो दावे के साथ कहा जा सकता है कि उनकी कुर्बानी ने इसे एक हद तक पूरा भी किया था।

ऐसी यात्रा कम से कम छात्रों के लिए अपने ही इतिहास के उन तमाम पन्नों को खोल सकती है और वह जान सकते हैं कि आस्था के नाम पर लोग जब एक दूसरे के खून का प्यासा हो जाते हैं तो क्या हो सकता है। छात्र अपने इतिहास के बारे में जान सकते हैं कि धर्म और राजनीति का संमिश्रण किस तरह खतरनाक हो सकता है। वे जान सकते हैं कि गोहत्या पर सरकारी कानून बनाने को लेकर उनके विचार क्या थे और देशद्रोह की बात को वह किस नज़रिये से देखते थे ?

यह बात अब इतिहास हो चुकी है कि सितम्बर 1947 में महात्मा गांधी कोलकाता से दिल्ली पहुंचे थे, जहां उन्होंने अपने इसी किस्म के संघर्ष के बलबूते विभिन्न आस्थाओं की दुहाई देने वाले दंगाइयों को झुकने के लिए मजबूर किया था। 4 सितम्बर की शाम कोलकाता के हिन्दू, मुस्लिम, सिख नेताओं को सम्बोधित करते हुए – जो 72 घंटे से चल रही गांधी की भूख हड़ताल से आपसी समझौते तक पहुंचे थे और उन्होंने कोलकाता को दंगों से दूर रखने का आश्वासन गांधी को दिया था – गांधी ने साफ कहा था कि

‘कोलकाता के पास आज भारत में अमन चैन कायम होने की चाभी है। अगर यहां छोटी सी घटना होती है तो बाकी जगह पर उसकी प्रतिक्रिया होगी। अगर बाकी मुल्क में आग भी लग जाए तो यह आप की जिम्मेदारी बनती है कि कोलकाता को आग के हवाले जाने से बचाएं।’

रेखांकित करने वाली बात यह है कि कोलकाता का यह ‘चमत्कार’ कायम रहा था, भले ही पंजाब या पाकिस्तान के कराची, लाहौर आदि में अभी स्थिति अधिक बदतर होने वाली थी, मगर कोलकातावासियों ने अपने वायदे को बखूबी निभाया था। कोलकाता में उनके साथ मौजूद उनके पुराने मित्र सी राजगोपालाचारी – जो बाद में देश के पहले गवर्नर जनरल बने – ने लिखा था ‘गांधी ने तमाम चीजों को हासिल किया है, मगर कोलकाता में उन्होंने बुराई पर जो जीत हासिल की है, उससे आश्चर्यजनक चीज़ तो आज़ादी भी नहीं थी।’

याद रहे दिल्ली से पाकिस्तान जाने का उनका इरादा था ताकि वहां अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों के खिलाफ वह आवाज़ बुलन्द कर सकें। दिल्ली के इस अंतिम प्रवास में जब वह मुसलमानों की हिफाजत के लिए सक्रिय रहे तब हिन्दूवादियों ने उन पर यह आरोप लगाए थे कि वह ‘मुस्लिमपरस्त’ हैं, तो उन्होंने सीधा फार्मुला बताया था: भारत में मैं मुस्लिम परस्त हूं तो पाकिस्तान में हिन्दू परस्त हूं। अर्थात कहीं कोई अल्पमत में है और इसी वजह से उस पर हमले हो रहे हैं तो वह उसके साथ खड़े हैं। ऐसे लोगों को वह नोआखाली की अपनी कई माह की यात्रा का अनुभव भी बताते जहां वह कई माह रूके थे और मुस्लिम बहुमत के हाथों हिन्दू अल्पमत पर हो रहे हमलों के विरोध में अमन कायम करने की, आपसी सद्भाव कायम करने की उन्होंने कोशिशें की थीं।

शाहदरा स्टेशन पर उन्हें लेने उनके अनन्य सहयोगी और नव स्वाधीन मुल्क के प्रथम गृहमंत्री वल्लभभाई पटेल पहुंचे थे। 12 जनवरी की प्रार्थना सभा में जबकि वह अगले ही दिन से अपने आखिरी अनशन की शुरूआत करने वाले थे, उन्होंने लोगों को बताया था कि सितम्बर में जब वह दिल्ली पहुंचे थे तो दिल्ली के हालात कितने ख़राब थे। उन्होंने बताया था कि हमेशा हंसमुख रहने वाले पटेल का चेहरा थोड़ा उतरा हुआ था, उन्होंने गांधी को बताया था कि दिल्ली के हालात दिन ब दिन खराब होते जा रहे हैं, पाकिस्तान से आए हिन्दू एवं सिख शरणार्थी मुसलमानों के घरों पर, प्रार्थनास्थलों पर हमले कर रहे हैं, उन पर कब्जा कर रहे हैं। मेहरौली के दरगाह पर हिन्दुओं ने कब्जा कर लिया है और वहां के खादिमों को वहां से भगा दिया है। उसी वक्त़ उन्होंने फैसला लिया था कि वह दिल्ली में ही रहेंगे और जब तक दिल्ली में शान्ति कायम नहीं होती तब तक आगे नहीं जाएंगे। और वह वहीं डटे रहे। उसके बाद 144 दिनों की उनकी कोशिशें – जब वह शरणार्थी शिविरों में गए, तमाम दंगा पीड़ितों से मिलते रहे और अन्त में दिल्ली में अमन कायम करने के लिए उन्होंने जनवरी माह में आमरण अनशन किया था, अपनी जिन्दगी की अंतिम भूख हड़ताल की थी।

दिसम्बर माह में अपने एक मित्र को लिखे पत्र में, जो गांधी स्मृति में बने म्यूजियम में रखा गया है, गांधी ने बिड़ला हाउस में रहने के अपने निर्णय के बारे में लिखा था:

‘‘दिल्ली एक मुर्दा शहर था। फिर एक बार दंगे शुरू हुए थे और ‘भंगी कालोनी’ – / जैसा कि ‘वाल्मिकी बस्ती’ को उन दिनों जाना जाता था – लेखक/ शरणार्थियों से भरी थी। सरदार पटेल ने इसलिए तय किया था कि मेरे रूकने का इन्तज़ाम बिड़ला हाउस में करेंगे .. दिल्ली में टिकने के पीछे मेरा मुख्य उददेश्य मुसलमानों को थोड़ी बहुत सांत्वना प्रदान करना था। इस मकसद को यहां रह कर ठीक से पूरा किया जा सकता था। मुसलमान दोस्तों को यहां पहुंचना अधिक सुरक्षित लगता था।

लगभग एक माह बाद दिल्ली के मुसलमानों का एक समूह उनसे वहां मिलने पहुंचा था, जिन्होंने ‘इंग्लैण्ड जाने में मदद’ करने के लिए गांधी से गुजारिश की थी। दरअसल वह पाकिस्तान जाना नहीं चाहते थे मगर हालात जैसे-जैसे बदतर हो रहे थे, भारत में रहना मुश्किल हो रहा था। गांधी को लगा कि वह पराजित हो रहे हैं। और फिर उन्होंने एक बार आमरण अनशन करने का फैसला लिया था।

अपनी जिन्दगी का लम्बा हिस्सा उपनिवेशवादी ताकतों के खिलाफ संघर्ष में बिताए गांधी उस वक्त़ एक अलग किस्म के संघर्ष में उलझे हुए थे, जब वह अपने ही लोगों के खिलाफ खड़े थे, जो एक दूसरे के खून के प्यासे हो चुके थे। जिस गांधी के नाम की जय कभी पूरे हिन्दोस्तां में लगती थी, वहां गांधी मुर्दाबाद के नारे लग रहे थे, बिड़ला हाउस के बाहर शरणार्थी गांधी की कोशिशों का विरोध करते थे।

यह बात छात्रों को बताने की जरूरत महसूस क्यों नहीं की जाती रही है। ताकि वह बचपन से ही जानें कि सत्य की हिफाजत के लिए, न्याय की हिफाजत के लिए कभी अकेले भी खड़े रहना पड़ता है और अपनी जान की बाजी भी लगानी पड़ती है। और यह ऐसा सबक है जो न केवल सार्वजनिक जीवन में बल्कि व्यक्तिगत जीवन में, अध्ययन में, नयी नयी बातों के अन्वेषण की तरफ झुकने के लिए उन्हें प्रेरित कर सकता है। आज के वक्त़ में जबकि उन्हें बुनियादी मसलों से दूर करके हिन्दू-मुस्लिम की डिबेट में उलझाए रखा जा रहा है, बकौल रवीश कुमार उन्हें दंगाई बनाने के प्रोजेक्ट पर लगातार काम हो रहा है, ऐसे समय में यह सरल सी लगने वाली बात कितनी जरूरी लगती दिखती है।

इन्सानियत की तवारीख/इतिहास कितनी सूनी हो जाएगी अगर अपने उसूलों की हिफाजत के लिए जहर का प्याला पीने वाले महान दार्शनिक सुकरात या चर्च के आदेश पर जिन्दा जला दिए गए ब्रूनो – जिन्होंने बाइबिल के इस सिद्धांत को चुनौती दी थी कि सूर्य पृथ्वी के इर्द-गिर्द नहीं घूमता है बल्कि पृथ्वी सूर्य के इर्द-गिर्द घूमती है – या हिन्दू-मुसलमानों के बीच आपसी सद्भाव बना रहे, धर्म के नाम पर राष्ट्र का निर्माण नहीं हो सकता – इस उसूल के लिए, जिसकी सच्चाई अब बार बार प्रगट हो रही है, हत्यारे की गोली झेलने वाले गांधी हों, इन सभी का जिक्र उसके पन्नों से हटा दिया जाए। 

रविन्द्रनाथ टैगोर का वह गीत गांधी को बहुत प्रिय था कि

‘यदि डाक सुने कोई ना रे तो एकला चलो, एकला चलो, एकला चलो रे’’

अर्थात ‘अगर तुम्हारी आवाज़ का साथ देने के लिए कोई नहीं है तो अकेले ही आगे बढ़ो’ 

पौधे की तरह अल्पसंख्यक का जीवन !

आखिर 20वीं सदी के इस महान शख्स – जिसने हमारी आज़ादी के आन्दोलन की अगुआई की तथा अपने अंतिम दिनों में बहुसंख्या के खिलाफ, अपने ही लोगों के खिलाफ संघर्ष किया तथा अपनी जान तक दे दी – उसकी मृत्यु के स्थान के देखने से हम क्यों बचते आए हैं ?

गांधी की सुनियोजित और सुचिंतित हत्या से एक जागरूक कहलाने वाले समाज की एक सचेतन दूरी अपने समाज के बारे में कई प्रश्न खड़े करती है। क्या हम उस घटनास्थल पर पहुंचने से इस वजह से बचते रहे हैं क्योंकि हम उन तमाम असुविधाजनक प्रश्नों का सामना नहीं करना चाहते, जो वहां जाकर हमारे या हमारे करीबियों के बीच में ही उठ सकते हैं, ऐसी बातों को सार्वजनिक दायरे में उठाने के जोखिमों से आप वाकिफ हों।

याद कर सकते हैं कि गांधी हत्या के महज चार दिन बाद हिन्दुत्ववादी जमातों पर पाबन्दी लगाने वाला आदेश जारी हुआ था -जब वल्लभभाई पटेल गृहमंत्री थे – जिसमें लिखा गया था कि ऐसे संगठनों के –

..सदस्यों की तरफ से अवांछित यहां तक कि खतरनाक गतिविधियों को अंजाम दिया गया है। यह देखा गया है कि देश के तमाम हिस्सों में इनके सदस्य हिंसक कार्रवाइयों में – जिनमें आगजनी, डकैती, और हत्याएं शामिल हैं – मुब्तिला रहे हैं और वे अवैध ढंग से हथियार एवं विस्फोटक भी जमा करते रहे हैं। वे लोगों में पर्चे बांटते देखे गए हैं, और लोगों को यह अपील करते देखे गए हैं कि वह आतंकी पद्धतियों का सहारा लें, हथियार इक्ट्ठा करें, सरकार के खिलाफ असन्तोष पैदा करें।

27 फरवरी 1948 को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को लिखे अपने ख़त में -जबकि महात्मा गांधी की नथूराम गोडसे एवं उसके हिन्दुत्ववादी आतंकी गिरोह के हाथों हुई हत्या को तीन सप्ताह हो गए थे – पटेल ने लिखा था:

‘सावरकर के अगुआई वाली हिन्दू महासभा के अतिवादी हिस्से ने ही हत्या के इस षड्यंत्र को अंजाम दिया है…..जाहिर है उनकी हत्या का स्वागत हिन्दूवादी संगठनों के लोगों ने किया जो उनके चिन्तन एवं उनकी नीतियों की मुखालफत करते थे।’’

उन्हीं पटेल ने 18 जुलाई 1948 को हिन्दू महासभा के नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी को लिखा था:

‘‘..हमारी रिपोर्टें इस बात की पुष्ट करती हैं कि ऐसे संगठनों की गतिविधियों के चलते ..मुल्क में एक ऐसा वातावरण बना जिसमें ऐसी त्रासदी (गांधी जी की हत्या) मुमकिन हो सकी। मेरे मन में इस बात के प्रति तनिक सन्देह नहीं कि इस षड्यंत्र में हिन्दू महासभा का अतिवादी हिस्सा शामिल था। ऐसे संगठनों की गतिविधियां सरकार एवं राज्य के अस्तित्व के लिए खतरा हैं। हमारी रिपोर्ट इस बात की पुष्टि करती हैं कि पाबन्दी के बावजूद उनमें कमी नहीं आयी है। दरअसल जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा है इनके कार्यकर्ता अधिक दुस्साहसी हो रहे हैं और अधिकाधिक तौर पर तोड़फोड़/विद्रोही कार्रवाइयों में लगे हैं।

गांधी से आप की लाख वैचारिक असहमतियां हो सकती हैं, मगर आप इस सत्य से कैसे इन्कार कर सकते हैं कि साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए कुर्बानी देकर उन्होंने एक तरह से समूचे उपमहाद्वीप में अमन कायम किया था। उनकी हत्या के बाद भारत के अन्दर ही नहीं बल्कि पाकिस्तान के अन्दर अल्पसंख्यकों पर हमले बन्द हुए थे, सरहद के दोनों ओर तमाम मासूमों की जान बची थी।

और जैसा कि हम पहले ही जिक्र कर चुके हैं आज़ादी के बाद उनकी पहल पर चली कोशिशों का ही नतीजा था कि नव स्वाधीन मुल्क में कई जगहों पर मासूमों का खून बहने से रुका था।

कोलकाता की मिसाल आप के सामने है।

2 अक्तूबर 1947 – जो गांधी का आखरी जन्मदिन साबित हुआ – उस दिन सी राजगोपालाचारी ने – जो सितम्बर माह में उनकी पहल पर कायम शांति से वैसे भी गद्गद् थे – उन्हें कोलकाता से ही निकलने वाले दो मुस्लिम अख़बारों के सम्पादकीय भेजे थे, जिनका लब्बोलुआब यही था कि किस तरह गांधी की कोशिशों से शहर में कायम साम्प्रदायिक सद्भाव का माहौल अभी भी बरकरार है जबकि देश के शेष हिस्सों में उन्माद उरूज पर है। ‘मॉर्निंग न्यूज’ नामक अख़बार ने कहा था:

‘कोलकाता गांधीजी द्वारा अंजाम दी गयी उन अतिमानवीय कोशिशों को कभी नहीं भूलेगा जब उन्होंने शहर में संयम/स्थिरबुद्धिता कायम करने में सफलता हासिल की थी जबकि उन दिनों उसके तमाम नागरिकों से उसने फौरी विदाई ली थी .. अपने करिश्माई व्यक्तित्व के बलबूते उन्होंने अपनी वास्तविक महानता का परिचय दिया था जब उन्हें कोलकाता के अपराधियों के भी हृदयपरिवर्तन करने में सफलता मिली थी.. आज गांधीजी जब 79 वें साल में दाखिल हो रहे हैं और उनके नाम तमाम कामयाबियां दर्ज हैं, उन्हें इस बात को लेकर अत्यधिक सुकून हो सकता है कि उन्होंने दुनिया की सबसे शक्तिशाली सैन्यशक्ति के सामने उसी तकनीक का प्रयोग सफलता से किया’।

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