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मैनीपुलेशन से मिली सत्ता की कितनी है उम्र?

“भाजपा के लोग साफतौर पर ये समझ लें ये जो जनादेश है ये बदलाव का है। अगर थोड़ी सी भी अन्तरात्मा, नैतिकता नीतीश कुमार जी में बची होगी तो ये जो कुर्सी पर बैठने का शौक है -जोड़-तोड़, भाग-गुणा करके बैठने का शौक है कहीं न कहीं से उनको जनता के इस फैसले का सम्मान करते हुए हट जाना चाहिये”। तेजस्वी यादव ने ये शब्द 12 नवम्बर की अपनी प्रेस कांफ्रेंस के ज़रिये सुशासन बाबू और गुड गर्वनेंस पीएम तक पहुंचाए। मगर अफसोस, केसी त्यागी के सिद्धांतवादी नीतीश कुमार को सुनाई नहीं दिया और 16 नवम्बर को आखि़रकार, लगातार चौथी बार शपथ लेकर वो बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हो गए हैं। वैसे नीतीश ही क्या, सुना है बिहार के मीडिया को भी तेजस्वी और महागठबंधन दिखाई-सुनाई नहीं देता।

चुनाव के दौरान तो और नहीं। जहां मोदी-शाह की छाया हो वहां ऐसा ही होता है। सो, बिहार के लोकल मीडिया ने महागठबंधन को गायब किये रखा और एनडीए को बढ़ा-ढ़ाकर उभारा। हालांकि बाद में कुछ स्थान मिला तेजस्वी को जब दिल्ली के नेशनल और सोशल मीडिया ने तेजस्वी के तेज और महागठबंधन की ताकत को देश के सामने रखा। बिहार में बदलाव की बयार इतनी तेज थी कि मोदी मीडिया भी मजबूर हुआ। और अंत आते-आते आखि़र चाणक्य टीम को बचने का रास्ता मिल गया। मोदी नंगू-पंगू संघ मीडिया सर्वे फैक्टरी ने महागठबंधन को एनडीए पर जीत हासिल करवा दी। जिसका नतीजा होना था वही ढाक के तीन पात। एनडीए की जीत और बीजेपी की महाजीत।

सवाल है कि ओपिनियन पोल में मोदी मीडिया ने एनडीए को भारी बहुमत से जिताकर एग्ज़िट पोल में हरा क्यों दिया?

चुनाव प्रचार के पहले यक़ीनन मोदी एंड पार्टी को भनक भी नहीं थी कि तेजस्वी और महागठबंधन इस आक्रामकता से सामने आएंगे और उनके जनसरोकार के मुददों को बिहार की जनता हाथों-हाथ लेगी। रोज़गार और वो भी 10 लाख सरकारी रोज़गार का तेजस्वी का वादा न सिर्फ नौजवानों को बल्कि महंगाई और बदहाली झेल रहे उनके परिवारों को भी महागठबंधन की तरफ बहा ले गया।

महज विज्ञापनों की चकाचौंध और झूठों की भूल-भुलैया के सिंहासन पर विराजमान मोदी ने भांप लिया कि महागठबंधन का रोज़गार का ठोस वादा उन्हें इस बार धूल चटा सकता है। सो एग्ज़िट पोल की भ्रम फैलाने वाली गाथा की स्क्रिप्ट नंगू-पंगू मीडिया की लपलपाती जीभ पर पहले ही चिपका दी गई। जिसे उसने तुरंत गटक कर वापस एग्ज़िट पोल के रूप में कुछ इस अंदाज़ में उगला कि वो महागठबंधन और आरजेडी के पक्ष में भी दिखे और विपक्ष में भी। ध्यान से देखिये तो पाएंगे कि न वो महागठबंधन को जिताते हैं और न हराते हैं। शाह-मोदी की चाणक्य चाल के लिए बस जगह बनाते हैं। जिसे दास चुनाव आयोग और बिहार प्रशासन बेशर्मी से लागू करने को उतावले बैठे थे। आरजेडी की मानें तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की देखरेख में।

क्या तेजस्वी यादव बिहार के अगले मुख्यमंत्री होंगे? अबकी बार तेजस्वी का बिहार? जैसे जुमलों से भरे मोदी मीडिया के एग्ज़िट पोल तमाम जगह छाए रहे।

रिपब्लिक टीवी का जन की बात एग्टिज पोल

महागठबंधन – 138 से 118, एनडीए –  91 से 117

वोट शेयर – एनडीए 39-37 प्रतिशत,

महागठबंधन 40-43 प्रतिशत, एलजेपी 7-9 प्रतिशत, अन्य 14-11 प्रतिशत

टीवी 9 भारतवर्ष –

महागठबंधन 115-125, एनडीए- 110-120 (बीजेपी 70-75, आरजेडी 90-95, कांग्रेस 15-20, जेडीयू 35-40, एलजेपी 3-5, अन्य 20-23)

न्यूज़ एक्स – महागठबंधन 122, एनडीए 112, एलजेपी 3, अन्य 6,

टाइम्स नॉऊ सी वोटर्स – महागठबंधन 120, एनडीए 116, अन्य 7,

(बीजेपी 70, आरजेडी 85, कांग्रेस 25, जेडीयू 42, एलजेपी 0, लेफट – 10, हम 2, अन्य 2)

एबीपी सी वोटर्स महागठबंधन – 108-131, एनडीए 104-128,, अन्य 4-8 (बीजेपी 66-74, आरजेडी 81-89, कांग्रेस 21-29, जेडीयू 38-46, एलजेपी 1-3, वाम पार्टी 6-13, हम 0-4, वीआईपी 0-4)

सी वोटर्स ने टाइम्स नाउ और एबीपी दोनों के लिए सर्वे किया है। और दोनों के परिणाम अलग-अलग हैं। ध्यान दें तो पाएंगे कि एबीपी के सर्वे में चुनाव आयोग के नतीजों को पहले ही घोषित कर दिया गया है। महागठबंधन को नीचे की तरफ और एनडीए को ऊपर की तरफ। यहां बीजेपी को अधिकतम 74 सीट दी गई है। चुनाव आयोग का नतीजा भी हूबहू यही है। एनडीए को अधिकतम 128 सर्वे दे रहा है और चुनाव आयोग बस 3 कम। सर्वे महागठबंधन को कम से कम 108 दे रहा है। चुनाव आयोग ने 110 कर दिया। अधिकतम सर्वे में 131 सीटें दी गई हैं तेजस्वी का दावा है कि पोस्टल बैलेट की सही गितनी से वो 130 सीटें पा रहे हैं। क्या नहीं लगता कि अपनी हार का पता था सो बड़ी बारीक़ी से जीतने वाले को हरा दिया गया। सईयां भये कोतवाल तो डर काहे का।

2015 में आरजेडी ने 80 सीटें जीती थी। जेडीयू ने 71 और बीजेपी 53 पर थी। 71 सीटें जेडीयू को एमवाई यानि यादव-मुस्लिम आदि को मिलाकर मिली थी। इस बार ये फैक्टर हट जाने से अगर नीतीश को 43 सीटें मिली हैं तो क्या ये कम हैं? शायद नहीं। और नीतीश भी ये जानते-मानते हैं।

नीतीश की हार और बीजेपी की बड़ी जीत इस चुनाव को क्यों बताया जा रहा है समझ नहीं आ रहा। 2015 में ठाकुर, ब्राह्मण, भुमिहारों के एकतरफा वोट पाकर बीजेपी 53 पर थी। इस बार अगर नीतीश, कुशवाहा, चिराग, मांझी फैक्टर भी साथ हैं तो भी 74 पर है यानि कुल 21 सीटें ज़्यादा। उधर तेजस्वी का दावा है कि महागठबंधन के साथ कम से कम 20 सीटों का घपला किया गया है। बगैर नीतीश के भी आरजेडी को सिर्फ 5 सीट का नुकसान हुआ है। 20 सीटों की धांधली के बावजूद।

तो क्या तेजस्वी की सभाओं में उमड़ी भीड़ को एवेईं बताने वाली मोदी मीडिया का प्रोपेगेंडा फेल हुआ कि ये भीड़ वोट में नहीं बदलेगी। कि बिहार का जाति फैक्टर से निकलना नामुमकिन है। इस बार बीजेपी का वोट प्रतिशत 19.46 प्रतिशत है। आरजेडी का 23.08 प्रतिशत। 2015 में बीजेपी 24.40 प्रतिशत पर थी और आरजेडी 18.4 प्रतिशत पर। मतलब, बीजेपी के ब्राह्मण, ठाकुर, भुमिहारों का वोट भी आरजेडी को गया है। यानि जाति के बीज ने रोज़गार की मिट्टी कुबूल की है इस बार।

सोशल मीडिया के ज़रिये लोकतंत्र की रक्षा में जुटे, संघ की घृणा, बंटवारे की नीति के खि़लाफ़ डटकर खड़े चैनलों, वरिष्ठ पत्रकारों ने मोदी मीडिया के सर्वे हाथों-हाथ लिए। और अपने तर्कों से सजाकर महागठबंधन और तेजस्वी यादव की जीत को दर्शकों को परोस दिया।

मजे़ की बात है कि जितनी जल्दी इन्होंने मोदी मीडिया के एग्ज़िट पोल को मान लिया उतनी ही जल्दी मोदी-शाह के आधी रात में बिहार जीतने के दावों को भी मान लिया!

कुछ घंटों पहले जो तेजस्वी को 10 में से 10 प्रचार और रणनीति पर पकड़ बनाए रखने के लिए दे चुके थे। उन्होंने ज़रा वक़्त नहीं लगाया तेजस्वी और महागठबंधन की हार के कारण गिनवाने में।

फिर एक बार ध्यान दीजिये। संघी मीडिया ने जो तर्क परोसे सब उन्हीं तर्कों की जुगाली कर उल्टी करने लग गए।

चुनाव परिणाम से पहले तेजस्वी को बदलाव की राजनीति का हीरो बता रहे थे। बिहार को जाति-धर्म के हवाई मुददों से ऊपर उठ कर रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य के मुददों पर वोट करने के लिए, बाकी राज्यों के लिए नजीर बता रहे थे। एग्ज़िट पोल पेश करते वक़्त तक कांग्रेस के प्रदर्शन से किसी को शिकायत नहीं थी। पर चुनाव परिणाम आने के बाद बिहार फिर जातिवादी हो गया। कांग्रेस की 70 सीटों की औक़ात नहीं थी। तेजस्वी के ‘‘बाबूराज” के बयान ने उन्हें वोट देने वाले अपरकास्ट बाबुओं को नाराज़ कर दिया। और उन्हें तुरंत एहसास हो गया कि मोदी सही कह रहे हैं कि उन्हें जंगलराज के युवराज से डरना चाहिये। और फिर वो बीजेपी-नीतीश की तरफ मुड़ गए, हालांकि घर से निकले थे तेजस्वी के लिए। और इस हल्की सी भूल से महागठबंधन को भारी नुक्सान उठाना पड़ा। वरिष्ठ पत्रकारों तक ने ऐसे ख़यालात ज़ाहिर किए।

ये हताशा थी, बेखयाली या कुछ और? अपनी आंखों देखे, कानों सुने जनता के बदलाव के बयानों, बेबसी, अपमान, बेरोज़गारी से छुटकारा पाने की उनकी लालसा-आक्रोश की गवाही को यूं इतनी आसानी से बीजेपी प्रायोजित नतीजों के कूड़ेदान में पटक दिया!

बीजेपी को और क्या चाहिये? जो पहले उनके खि़लाफ़ “लोकतंत्र बचाओ, संविधान बचाओ” का युद्ध छेड़े हुए थे अब वहीं उनके द्वारा रचे गए नाटक में अभिनेता बन कर उनके द्वारा लिखे डायलाग हू-ब-हू दोहराए जैसे कि लिखे गए हैं तो फिर मसला ही क्या है। 11 नवंबर को कुछ भारी मन से और कुछ निष्पक्षता का दिखावा करते हुए अमित शाह के हाथों में कठपुतली की तरह खेलते नज़र आए। क्या ये सवाल अपने आप में भयानक नहीं है कि क्या हमारा बुद्धिजीवी वर्ग इतना खोखला, गै़रज़िम्मेदार है?

अगर नहीं तो 12 नवंबर को तेजस्वी यादव ने प्रेस कांफ्रेंस करके जो सवाल चुनाव आयोग पर दागे उन पर किसी ने बात क्यों नहीं की? क्यों नहीं जवाब मांग रहे? तेजस्वी के सीधे साफ सवाल हैं-

“जो पोस्टल बैलेट वोट रद्द हुए हैं वो क्यो हुए हैं?

इलेक्शन कमीशन की गाइडलान के मुताबिक पोस्टल बैलेट शुरु में गिने जाने चाहिये। फिर अंत में गितनी क्यों की गई?

प्रत्याशियों को मांगने पर लिखित में लिखकर क्यों नहीं दिया गया?

हमें पोस्टल बैलेट प्रक्रिया की वीडियो सीडी चाहिये।

लगभग बीस सीटों पर हम लोगों को हराया गया है।

हम मान रहे हैं कि कम से कम 130 सीटें महागठबंधन को मिली हैं।

हमारी सीधी सी मांग है कि चुनाव आयोग द्वारा प्रत्याशियों के सवालों के जवाब देकर उन्हें संतुष्ट किया जाए। ये चुनाव आयोग की ड्यूटी है। अगर चुनाव आयोग प्रत्याशियों को संतुष्ट नहीं करेगा तो वो अदालत भी जा सकते हैं”।

आखि़र इन सवालों में अब किसी को दिलचस्पी क्यों नहीं है? और दिलचस्पी ना लेना किसके हक़ में जा रहा है?

क्या सभी ज़िम्मेदारों के अपने उन सवालों-सच्चाइयों का अब कोई मतलब नहीं जिन्हें वो खुद उठा रहे थे कि –

15 सालों में क्या हर साल आने वाले बाढ़ के महाकाल का कोई ईलाज कर पाई मोदी-नीतीश सरकार? या अब आगे करने का वादा किया है? क्या भ्रष्टाचार से लोग लालू यादव के राज में ही मिले थे? और अब भ्रष्टाचार उनके लिए किसी चिड़िया का नाम हो गया है। क्या वाकई कोरोना के दौरान जान-माल-मान का नुकसान, पलायन, बेरोज़गारी से त्रस्त आम बिहारियों को मोदी से कोई शिकायत नहीं रही? बीजेपी-चिराग ने कहा जनता के हर दर्द का बस नीतीश ज़िम्मेदार तो जनता ने मान लिया हां, सिर्फ नीतीश ज़िम्मेदार। मोदी ने एहसान जताया कि उसने कोरोना में बिहार के घरों में अनाज भिजवाया तो अपने पति, बेटे, भाई, रिश्ते  दार को बंगाल, दिल्ली, महाराष्ट्र, बिहार, गुजरात से उधार पैसा लेकर घर बुलाने का जुगाड़ करने वाली महिला मोदी की इतनी कर्ज़दार हो गई कि वोट तो मोदी को ही देती। बिना शिक्षकों के कॉलेज-स्कूल, बिना डॉक्टरों-दवाईयों के अस्पताल, बिन सिंचाई के खेत कौन सी बड़ी मुसीबतें लगती हैं जब पता चले कि पुलवामा पाकिस्तान ने ही करवाया था। और कि गलीच बस्तियों, टूटे-फूटे झोंपड़ों में भूख-प्यास से जैसे-तैसे सांसों को छुपाते-बचाते भोजपुरिये अब मोदी की मेहरबानी से धरती के स्वर्ग कश्मीर में ज़मीन ख़रीद सकते हैं। बिहार के अपने गांव के खेत में धान नहीं उगा पाते तो क्या हुआ? हर साल बाढ़ में बहती जाती झोपड़ी बर्तन-भाड़े नहीं बचा पाते तो क्या आफत।

मोदी ने कहा उन्हें तो साइलेंट वोटरों ने जिता दिया। बोलने वाले भाड़ में जाएं। और सब भाड़ में चले गए!

(वीना जनचौक की दिल्ली हेड हैं। इसके साथ ही वह व्यंग्यकार और डाक्यूमेंट्री निर्माता हैं।)

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This post was last modified on November 17, 2020 2:39 pm

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