झारखंड चुनावः ‘केंचुआ’ फिर सवालों के घेरे में

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झारखंड में चुनावी रणभेरी बज चुकी है। सियासत की शतरंजी बिसात पर सियासी सूरमाओं ने अपने-अपने मोहरे सजाने शुरू कर दिए हैं। इन सबके बीच सबसे अहम है निर्वाचन आयोग का हैरान करने वाला फैसला। आखिर क्या कारण है कि 288 विधानसभा सीटों वाले महाराष्ट्र और 90 सीटों वाली हरियाणा के विधानसभा चुनाव एक चरण में पूरे हो जाते हैं, लेकिन झारखंड जैसे छोटे राज्य का चुनाव पांच चरणों में होगा।

निर्वाचन आयोग के इस फैसले के दो पहलू हैं। पहला तो ये कि अगर आयोग का फैसला सही है तो ये बीजेपी के मुख्यमंत्री रघुवर दास और प्रधानमंत्री मोदी के तमाम बड़े-बड़े दावों की पोल खोल एपिसोड है। स्पष्ट है कि राज्य की विधि व्यवस्था या नक्सलवाद की समस्या से राज्य अब भी ग्रसित है, जबकि सरकारी दावे डंके की चोट पर राज्य से नक्सलवाद के खात्मे की बात कर रहे हैं। दूसरा पहलू यह है कि क्या निर्वाचन आयोग जैसी स्वायत्त संस्था गहरे दबाव में काम कर रही है? इसके पीछे का कारण महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनावों में सत्ता पक्ष को अपेक्षित सफलता न मिलना है? परिस्थितियां काफी संदिग्ध हैं। ये सत्ता और स्वतंत्र संवैधानिक संस्था के अघोषित गठजोड़ के विपक्षी आरोप को सत्यापित कर रहा है।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इस पूरे मामले में सबसे दिलचस्प पहलू ये है कि तमाम विपक्षी पार्टियों ने राज्य में एक चरण में चुनाव कराने की मांग की थी, जबकि अकेली बीजेपी ने पांच चरणों में चुनाव कराने की बात की और निर्वाचन आयोग ने उनकी बातों पर अपनी सहमति की मुहर लगा दी। पिछले लोकसभा चुनाव में भी इस संवैधानिक संस्था की कड़ी फजीहत हुई थी। अशोक लवासा प्रकरण व्यवस्था और आयोग के सत्ता सहयोगी रवैये पर अनेक सवाल खड़े किए थे।

पहले चरण के चुनाव से मतगणना की प्रक्रिया लगभग 23 दिनों की है। इसमें ईवीएम टैम्परिंग की बात एक बार पुनः उठना तय है। निर्वाचन आयोग के अड़ियल रुख ने स्पष्ट कर दिया है कि वर्तमान वैज्ञानिक डिजिटल युग में भले ही जितने तकनीकी स्कैम कर लिए जाएं, लेकिन ईवीएम बिल्कुल सेफ है। ये मृत्यु की तरह हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था का परम सत्य बन गया है। इसे फिलहाल तो कतई चुनौती नहीं दिया जा सकता।

एक अदद राज्य का चुनाव पांच चरणों में कराने की सिफारिश पर राष्ट्रवादी मीडिया में कोई चर्चा या डिबेट नहीं होती। कोई प्रश्न नहीं पूछे जाते। खैर मीडिया के बड़े समुदाय का प्रश्न तो केवल विपक्ष के लिए बना है। सरकार का तो केवल समर्थन प्रदर्शित करना है।

अब जबकि चुनावी बिगुल बज चुका है, सियासी मोहरे सजाए जा रहे हैं तो ये देखना काफी दिलचस्प होगा कि मीडिया अपने सत्ता सहयोगी एजेंडे को किस तरह से पेश करता है। विगत लोकसभा चुनाव में सारे जन मसले अपनी जगह पर धरे रह गए, लेकिन चुनाव का मुद्दा कुछ और ही बन गया। हरियाणा और महाराष्ट्र चुनाव में भी आम जनमानस और हताश विपक्षी दलों के तमाम प्रयास के वावजूद टीवी स्क्रीन पर न्यूज चैनलों के डिबेट तथा प्रिंट मीडिया से स्थानीय मुद्दों को बड़ी सफाई से किनारे लगा दिया गया।

देश में आजादी के बाद से अब तक का सबसे बड़ी आर्थिक मंदी, रिकार्ड स्तर की बेरोजगारी, खस्ताहाल सरकारी कंपनियां और निगम और उनका निजीकरण जैसे तमाम मुद्दे चुनावी रणभेरी के बजते ही गधे की सींग की तरह मीडिया की कवरेज से बड़े आराम से गायब कर दिए जाते हैं। टीवी डिबेट के मुद्दे और कैमरे अचानक पाकिस्तान की ओर कर दिए जाते हैं। हिन्दू-मुस्लिम डिबेट, सीमा पर तनाव आदि की भरमार आ जाती है। महराष्ट्र और हरियाणा चुनाव के समय भी भारत-पाक रिश्ते, सीमा पर गोलीबारी, कश्मीर, अनुच्छेद 370 जैसे मुद्दे राष्ट्रीय बहस बन गए।

अब देश का मीडिया एकटक सुप्रीम कोर्ट की ओर देख रहा है। आने वाले चंद दिनों में सुप्रीमकोर्ट में विवादित राम जन्म भूमि और बाबरी मस्जिद मुद्दे पर फैसला आने की पूरी उम्मीद है। फिर ऐसे में सुप्रीमकोर्ट का फैसला, झारखंड चुनाव का मुद्दा बन जाए तो इसमें कोई अचंभा नहीं होना चाहिए। सांप्रदायिक तनाव भरे माहौल के शोर-गुल के बीच राज्य के लोगों की असल समस्याओं और सत्ता विरोधी लहर को दबाना बीजेपी को बखूबी आता है।

वैसे लोग अभी इस बात को भूले नहीं हैं कि मुख्यमंत्री के तमाम बड़े-बड़े दावों के बीच एक बच्ची भात-भात कहते हुए भूख से तड़प कर बेबस परिजनों की गोद में दम तोड़ देती है। लोग अभी भूले नहीं हैं कि किस तरह एक उन्मादी सांप्रदायिक भीड़ ने तबरेज आलम जैसे युवा की ज़िंदगी को बेहरहमी से लील लिया। लोगों को पता है कि आज भी झारखंड के स्थानीय निवासियों की जमीन को सरकारी योजनाओं के लिए छीना जा रहा है। आज भी ‘जल, जमीन और जंगल’ के मुद्दे ज्यों के त्यों बने हुए हैं। जो झारखंड के उदभव के मुद्दे हैं।

यानि कुल मिलाकर देखा जाए तो स्पष्ट है कि अगर विपक्ष एकजुट होकर सरकार और मीडिया के उन्मादी एजेंडों के शोरगुल के बीच जनता से जुड़े मुद्दों और समस्याओं को उठा पाने में सफल रही तो मुख्यमंत्री रघुवर दास के दुबारा सत्तासीन होने का सपना एक सपना बनकर रह जाने वाला है और अगर सियासी षड्यन्त्रों और मीडिया के उन्मादी एजेंडों का पीछा किया तो बस पीछे चलते रह जाएंगे ये तय है।

दयानंद

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