Subscribe for notification
Categories: बीच बहस

जेएनयू: अमित शाह ने कहा था- “टुकड़े- टुकड़े गैंग को सबक सिखाया जाना चाहिए”

जेएनयू की घटना क्या दो छात्र गुटों के आपसी वैमनस्य का नतीजा है? मुख्यधारा की मीडिया के इस दलील पर हां या ना में जवाब देने के पहले हमें हाल ही में गृहमंत्री अमित शाह के बयान पर ध्यान देना होगा।
अमित शाह 26 दिसंबर, 2019 को पूर्वी दिल्ली में कहते हैं, “कांग्रेस की अगुवाई वाले “टुकड़े टुकड़े गैंग” को दिल्ली की शांति भंग करने के लिए सबक सिखाया जाना चाहिए।” वह पूर्वी दिल्ली के बीजेपी के सांसद गौतम गंभीर के एक “ड्रीम प्रोजेक्ट” की आधारशिला रखने आए थे। लेकिन अपने “ड्रीम प्रोजेक्ट” को पूरा करने का संकेत दे गए। केंद्रीय गृह मंत्री के इस सार्वजनिक बयान के दस दिन ही बीते थे कि 5 जनवरी को संघी गुंडों नकाब पहन कर तालिबानी तर्ज पर देश और दुनिया में प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में शिक्षकों और छात्र-छात्राओं पर कातिलाना हमला कर गृहमंत्री के बयान को अमलीजामा पहना दिया।
एबीवीपी के आमंत्रण पर आए नकाबपोश बदमाशों ने प्रदर्शनकारी छात्रों को डंडे और लोहे की रॉड से बुरी तरह पीटा। वे करीब 3 घंटे तक कैंपस में कोहराम मचाते रहे। 100 नंबर डॉयल करने पर भी पुलिस नहीं आई। जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष आइशी घोष समेत कई शिक्षक और 35 छात्रों को गंभीर रूप से घायल कर दिया। एम्स ट्रामा सेंटर में भर्ती छात्र-छात्राओं को कई जगह फ्रैक्चर हैं।
छात्रों का आरोप है कि इस हमले को विश्वविद्यालय प्रशासन, पुलिस और विद्यार्थी परिषद के गुंडों ने मिलकर अंजाम दिया है। जेएनयू के छात्रों का कहना है कि संघ-बीजेपी सरकार जामिया की तरह जेएनयू के भी सबक सिखाना चाहती थी। इसलिए सुनियोजित तरीके से यह हमला किया गया। हमले के पहले एक व्हाट्सअप ग्रुप बनाया गया। उसमें मैसेज का आदान-प्रदान किया गया। घटना के पहले उक्त व्हाट्सअप ग्रुप का एक मैसेज- “बिल्कुल, एक बार ठीक से आर पार करने की जरूरत है। अभी नहीं मारेंगे सालो को तो कब मारेंगे, गंद मचा रखी है कौमियों ने।”
घटना के बाद दूसरे मैसेज में विजयोल्लास को साफ देखा जा सकता है- “जेएनयू में हम सभी कितने खुश हैं। मजा आ गया। इन साले देश द्रोहियों को मार कर।”

यह बात सही है कि हमलावर अपने चेहरे को नकाब से ढंके थे। लेकिन बाकी सारी चीजें और घटनाएं शीशे की तरह साफ है। लोकतंत्र के आइने में छात्र-छात्राओं पर हमला करने और साजिश रचने वाले हर शख्स का चेहरा कैद है। यह अलग बात है कि दिल्ली पुलिस अभी तक एक भी हमलावर की गिरफ्तारी की कौन कहे, पहचान तक नहीं कर पाई है।
मुख्यधारा की मीडिया इसे विश्वविद्यालय के छात्रों के दो गुटों के बीच भिड़ंत करार दे रही है। लेकिन बात इतनी तक नहीं है। इसका उत्तर पाने के लिए हमें देश के सत्तारूढ़ दल की वैचारिकी और जेएनयू के वैचारिकी और दोनों के राजनीतिक संबंधों की पड़ताल आवश्यक है। यह कहा जा सकता है कि जेएनयू और सत्तारूढ़ दल के विचार में दो ध्रुवों की दूरी है। राजनीतिक रूप से भी जेएनयू संघ-बीजेपी के लिए कभी उर्वर नहीं रहा। ऐसे में संघ-बीजेपी का जेएनयू से एक दूरी स्वत: बन जाती है। पिछले छह वर्षों से केंद्र और भाजपा शासित प्रदेशों की सरकारों और मंत्री-विधायकों ने जेएनयू पर अनर्गल आरोपों की बौछार लगाते रहे। लेकिन यह तरीका भी काम नहीं आया और छात्रों के मन में जेएनयू की गरिमा लेश मात्र भी कम नहीं हुआ। ऐसे में संघ-बीजेपी जेएनयू की अस्मिता नहीं अब अस्तित्व पर ही हमलावर हो गई।
जेएनयू के इतिहास-भूगोल से वाकिफ हर शख्स मुनिरिका से अनजान नहीं होगा। मुुनिरिका में रहने वाले जेएनयू के पूर्व छात्र का कहना है कि रविवार होने की वजह से मैं अपने कमरे पर था। दो बजे के आस-पास से परिसर का माहौल बिगड़ना शुरू हुआ और शाम होते –होते कई युवक डंडा, हॉकी औऱ रॉड लेकर परिसर के अंदर जा रहे थे, हम लोग अपनी आंखों से इसे देख रहे थे। लेकिन कोई सुरक्षाकर्मी उन्हें अंदर जाने से मना नहीं कर रहा था। गेट का माहौल ऐसा था मानो आज सुरक्षाकर्मी नकाबपोशों को अंदर घुसाने के लिए ही तैनात किए गए हैं।
वाइस चांसलर एम.जगदीश कुमार ने विश्वविद्यलय की सुरक्षा का ठेका “कुख्यात राष्ट्रवादी” मेजर जीडी बक्शी की सुरक्षा एजेंसी को दी है। मेजर बक्शी को समाचर चैनलों पर अक्सर पाकिस्तान को सबक सिखाते और जेएनयू के प्रति नफरत फैलाते देखा जा सकता है।
हमलावरों में न तो भय था और न ही वे जल्दी में थे। वे इत्मिनान से अपने ऑपरेशन को अंजाम देने की सुपारी लेकर आए थे। जेएनयू के प्रो. विक्रमादित्य ने एनडीटीवी से बातचीत में बताया कि जिस वक्त यह हमला हुआ मैं घर पर था। मेरी पत्नी बाजार में कुछ खरीददारी करने गईं थीं। बाजार में उनको कुछ बदमाशों ने दौड़ाया और उनके पीछे-पीछे हमारे घर तक आ गए। कुछ बदमाशों ने हमारा दरवाजा पीटा और यह धमकी देकर गए हैं कि आज रात में तुम्हारे घर को आग लगा दी जाएगी। उन्होंने कहा कि हमारे पास फोन आ रहे हैं कि आप घर खाली कर दें, मदद के लिए पुलिस नहीं आएगी। प्रो. विक्रमादित्य कहते हैं कि, “उन्होंने दिल्ली पुलिस को इसकी जानकारी दे दी है और अब तक उनके पास कोई मदद नहीं पहुंची है।”
इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष लालबहादुर सिंह कहते हैं, “जेएनयू ने देश के दूर- दराज इलाकों से आने वाले सामान्य, अति सामान्य, वंचित परिवारों से आने वाले अनगिनत युवक-युवतियों की ज़िंदगी को संवारा है, असंख्य प्रतिभाओं को निखारा है, न जाने कितने गुदड़ी के लाल दिए हैं। पिछले छह वर्षों से अनवरत जेएनयू को बदनाम करने, उसे अलगाव में डालने, उसके नेतृत्व को कुचल देने, उसके शैक्षणिक ढाँचे को तहस-नहस कर देने और अंततः सामान्य, वंचित परिवारों से आने वाले छात्रों को प्रवेश से रोक देने के लिए फीस में अनाप-शनाप बढ़ोत्तरी की साजिश की गईं।लेकिन जब जेएनयू को फतह करने की सारी साजिशें नाकाम हो गईं, जब जेएनयू को वैचारिक-राजनैतिक मोर्चे पर पराजित नहीं किया जा सका, जब प्रशासनिक तिकड़मों से, आंदोलनों पर भीषण पुलिसिया जुल्म से नहीं जीता जा सका तब रात के अंधेरे में जेएनयू पर सुनियोजित हमला किया गया।”
विश्वविद्यालय में छात्र लगभग दो महीने से फीस बढ़ोतरी के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। आंदोलनकारी छात्रों की अपील पर छात्र अपनी सेमेस्टर परीक्षा में रजिस्ट्रेशन नहीं करा रहे हैं। इससे विश्वविद्यालय प्रशासन का हाथ-पांव फूल गया था। प्रशासन छात्रों के अहिंसक प्रदर्शन को किसी हद पर जाकर तोड़ना चाहता था। प्रशासन के लाख उकसावे के बावजूद फीस वृद्धि का विरोध कर रहे छात्र हिंसक नहीं हो रहे थे।
बंधुआ मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष स्वामी अग्निवेश कहते हैं कि, “जेएनयू जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में छात्रों पर इस तरह का हमला लोकतंत्र की अत्मा पर हमला है। इसकी जितनी निंदा की जाए कम है। विश्वविद्यालय प्रशासन का अभी तक गोलमोल जवाब आया है और पुलिस की हमलावरों की गिरफ्तारी तो क्या भी तक पहचान नहीं कर पाई है। दिल्ली पुलिस ने जांच के लिए ज्वाइंट कमिश्नर की अगुआई में टीम गठित की। लेकिन छात्र जिस तरह से आरोप लगा रहे हैं उसे देखते हुए पुलिस जांच न होकर इसकी न्यायिक जांच होनी चाहिए। ”
मुख्यधारा की मीडिया जिस तरह से तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर इसे छात्रों का आपसी संघर्ष बताने पर लगी है बात दरअसल उतनी नहीं है। इसके पीछे संघ-भाजपा की गहरी साजिश है। घटना के बाद जिस तरह से मीडिया देश को गुमराह करने की कोशिश में लगी है उससे अंदाजा लगाया जा सकता है।
संघ-बीजेपी सरकार का लक्ष्य मात्र जेएनयू की गरिमा और अस्मिता को गिराना नहीं है बल्कि वह जेएनयू और जेएनयू जैसे संस्थानों और सोच के अस्तित्व को ही जमींदोज करना चाहती है। पिछले छह वर्षों से संघ-बीजेपी के शीर्ष नेता से लेकर लगुए-भगुए तक जेएनयू की अनुपयोगिता पर भाषण देते मिल जाते हैं।
दरअसल, जेएनयू कुछ सौ एकड़ में सीमित एक संस्थान भर नहीं है। जेएनयू एक विश्वविद्यालय ही नहीं एक विचार और दर्शन भी है जो संघ के विचार-दर्शन के एकदम विपरीत खड़ा है। एक नहीं जेएनयू की कई खूबियां संघ परिवार को बेचैन करने वाली हैं। जिसमें परिसर के अधिकांश प्राध्यापक-छात्र और शोधार्थियों का वाम और प्रगतिशील विचारों और मूल्यों से जुड़ा होना है। लाख कोशिशों के बाद भी छात्रसंघ पर कब्जा न जमा पाना। जेएनयू की सस्ती शिक्षा शिक्षा के निजीकरण में आज भी रोड़ा बना हुआ है। जेएनयू एक हद तक मिनी इंडिया है जिसमें पूर्वोत्तर राज्यों से लेकर सुदूर दक्षिण के केरल और तमिलनाडु और कश्मीर के छात्र शिक्षा लेते हैं। जेएनयू संघ-बीजेपी के विरोधी पं. जवाहर लाल नेहरू के नाम पर है। संघ-बीजेपी सरकार जेएनयू और जवाहर लाल नेहरू के ऊपर छह वर्षों से अतार्किक और अधकचरा आरोप लगा कर जब उनके गरिमा और उपयोगिता को नहीं कम कर सकी तो अब उसके अस्तित्व को ही मिटाने का सत्तापोषित षड्यंत्र कर रही है।

This post was last modified on January 7, 2020 8:31 am

प्रदीप सिंह

लेखक डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और जनचौक के राजनीतिक संपादक हैं।

Share