संसद में सुर सम्राज्ञी

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शायद इस सदी के शुरुआती वर्षों का कोई समय रहा होगा। पिछली सदी के आखिरी वर्ष में तो लता मंगेशकर राज्यसभा में मनोनीत ही की गयी थीं, इसके बावजूद कि तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के प्रति अगाध सम्मान के बाद भी उन्होंने शुरू में मनोनयन की इस पेशकश को ठुकराया था। कार्यकाल समाप्ति के कई साल बाद उन्होंने किसी चैनल से भेंट में कहा भी था कि किसी पार्टी से उनका कोई संबंध तो था नहीं और राजनीति के बारे में वह जानती ही क्या थीं।

लेकिन 2002 के प्रारम्भ में जब वाजपेयी सरकार ने न केवल विवादास्पद आतंकवाद निवारण विधेयक पेश किया, बल्कि मत-विभाजन में राज्यसभा में  विधेयक गिर जाने के बाद जब इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया और संसद के दोनों सदनों का संयुक्त अधिवेशन बुला लिया, तब लता जी दोनों मौकों पर मौजूद थीं- राज्यसभा में भी, संयुक्त अधिवेशन में भी। वह मनोनीत थीं, सत्तारुढ़ पार्टी या किसी भी दल के ह्विप से वह बंधी हुई नहीं थीं। फिर सदन की बैठकों में भाग लेने का उनका रिकार्ड भी, 1952 से ऊपरी सदन में कला, साहित्य, विज्ञान आदि तमाम क्षेत्रों से मनोनीत करीब 125 मशहूर हस्तियों में सबसे खराब था, इस मामले में शायद केवल चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन के रिकॉर्ड से होड़ करता हुआ, लेकिन उनकी इन अत्यल्प उपस्थितियों में से 2 बैठकें वे थीं, जिनमें सरकार की प्रतिष्ठा दांव पर थी।

आतंकवाद निवारण विधेयक राज्यसभा में रखा गया तो वह सदन में थीं, उन्होंने उसके प़क्ष में मतदान भी किया था और उस जमाने में हंगामे और सदस्यों के अपनी सीटों पर नहीं होने की बिना पर ऐसे विधेयकों को ध्वनि-मत से पारित करा लेने का चलन नहीं शुरू हुआ था, सो विधेयक सदन में गिर गया था। वाजपेयी सरकार ने इसी के बाद दोनों सदनों का संयुक्त अधिवेशन बुलाने का फैसला किया था। आाजादी के बाद दोनों सदनों का यह तीसरा ही संयुक्त अधिवेशन था और 1961 में दहेज लेने-देने पर निषेध के विधेयक के अनुमोदन के लिये आहूत संयुक्त अधिवेशन के बाद कोई कानून बनाने के लिये केवल दूसरा। बीच में 1978 में एक और संयुक्त अधिवेशन बुलाया गया था, लेकिन वह आपातकाल के काले दिनों में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में नियुक्तियों के लिये ‘बैंकिंग सेवा कमीशन’ बनाने का प्रावधन करने वाले एक कानून के निरसन के लिये बुलाया गया था, मोरारजी देसाई सरकार द्वारा।

निरस्त तो परवर्ती मनमोहन सिंह सरकार ने ‘पोटा’ को भी कर दिया था, लेकिन वाजपेयी सरकार ने यह कानून आतंकवादी गतिविधि में लिप्तता के आरोपों में मुकदमे के लिये विशेष अदालतों के गठन, आरोपी को बिना अदालती प्रक्रिया के 90 दिन और अदालत को कारणों की तफसील देकर और तीन महीने तक पुलिस हिरासत में रखने, आतंकवादी संगठन से संबंध के कानून प्रवर्तन एजेंसियों के आरोपों को बेबुनियाद साबित करने की जवाबदेही आरोपी पर डालने और अपराधी के लिये मृत्युदंड तक का प्रावधान करने के लिये किया था। दिलचस्प यह है कि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद बने ‘टाडा’ के दुरुपयोग के तमाम आंकड़ों और संसद भवन में आतंकी हमले के बाद लाये गये ‘पोटा’ के ऐसे ही दुरुपयोग की तमाम आशंकाओं के बीच संयुक्त अधिवेशन में जिन सवा चार सौ सदस्यों के समर्थन से यह कानून बना, उनमें लता मंगेशकर का भी ‘आइज’ शामिल था।

लेकिन जब संसद की कार्यवाहियों को कवर कर रहे एक संवाददाता की हैसियत से मैंने संसद भवन में उनसे ‘पोटा’ के समर्थन का उनका तर्क जानना चाहा था, तब उनका संक्षिप्त जवाब था, ‘‘बस कर दिया’’। यह उस महान गायिका का जवाब था, जिसे सुनते हुये हम और हमसे आगे-पीछे की दो पीढ़ियां बड़ी हुई हैं और जिनके बारे में मेरा अब भी साफ मत है कि अगर लता, आशा, रफी, किशोर नहीं होते तो दुखों, संकटों और सामाजिक कुरीतियों, वर्जनाओं से बजबजाते हमारे पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में जीवन असह्य ही होता। दशकों पहले मैंने अपनी नानी को लता के कई गाने सुनते हुये पल्लू से आंखों के पोर साफ करते देखा था। उनके और उनकी पीढ़ी के दूसरे गायकों-गायिकाओं के अलग-अलग गानों पर आपने भी अपनी नानियों-दादियों-माओं और तमाम परिजनों-दोस्तों को ऐसे ही देखा होगा, खुशी से चहकते, उत्साह से छलकते, उद्वेग में दीवाने, जबकि उनमें शायद ही किसी पर आंकड़ों का दबाव रहा हो, शायद ही किसी को पता भी रहा हो कि लता ने 36 भाषाओं में 25,000 से अधिक गाने गाये थे।

पर उस दिन, संसद की सीढ़ियों से उतरते लता जी में वह लता कहीं नहीं थीं, जिसके बारे में संभवतः विष्णु खरे ने कहीं लिखा है कि हिन्दी फिल्मों ने पारसी थियेटर की बर्बादी की जो इबारत लिख दी, जिस दीनानाथ मंगेशकर को पैसे-पैसे का मोहताज बना दिया और उनकी जिस बेटी को 13 साल की उम्र में स्टेज पर आने को मजबूर कर दिया, उसी बेटी ने फिल्म संगीत से ऐसा हसीन बदला लिया कि वह सुर- साम्राज्ञी और स्वर- कोकिला और जाने किन- किन विशेषणों से और दादा साहब फाल्के से लेकर पद्म श्री, भारत रत्न जैसे उच्चतम पुरस्कारों तक से नवाजी गयीं।

पता नहीं लता मंगेशकर को यह अहसास था या नहीं। या कि तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री सुषमा स्वराज को ही। ज्यां पॉल सार्त्र को तो था। कहते हैं कि फ्रांस के इस महान दार्शनिक को 1964 में जब साहित्य का नोबल पुरस्कार देने की घोषणा की गयी तो एक पत्रकार से चर्चा में उन्होंने कहा था कि नोबल पुरस्कार को सार्त्र मिला है। और उससे करीब दो दशक पहले फ्रांस की अंतरिम सरकार में राष्ट्रपति रहे चार्ल्स द’गॉल को भी। नागरिक अवज्ञा के एक मामले में सार्त्र की गिरफ्तारी पर हस्तक्षेप करते हुये द’गॉल ने यों ही नहीं कहा होगा कि ‘आप वॉल्तेयर को तो नहीं गिरफ्तार कर सकते’।

पर उस दिन लता मंगेशकर का उत्तर बता रहा था कि देश-दुनिया में उनकी ‘आइकॉनिक’ उपस्थिति ने उन्हें हर सवाल से परे पहुंचा दिया था,  ‘बस कर दिया’ की बेफिक्री में वह लगभग सुषमा स्वराज की छत्रछाया में सीढ़ियां उतर रहीं थीं, इस बात से बेखबर कि कोई भी राजनीतिक पद, कोई मनोनयन उनके कद से बहुत छोटा है, कि निधन के केवल दो वर्ष बाद आज सुषमा स्वराज सार्वजनिक स्मृति से ही नहीं, उन्हीं की पार्टी के शासनकाल में पूरी राजनीतिक फिजां से भी लगभग अनुपस्थित हैं। हमारे समय में राजनीति ने भले एक सर्वग्रासी किस्म की खुदाई अख्तियार कर ली हो, हर राजनीतिक हस्ती की स्मृति देर-सबेर धुंधला जाने को अभिशप्त है, जबकि कल पंचतत्व में विलीन लता जी सदियों हमारे वजूद का हिस्सा बनी रहेंगी, उनकी आवाज, उनके गाने हमें और आने वाली कई पीढ़ियों को जीने का संबल देते रहेंगे।

(राजेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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