Monday, August 8, 2022

ममता ने कतर दिए अभिषेक के पर

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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की चेयरपर्सन ममता बनर्जी ने अपने भतीजे एवं सांसद अभिषेक बनर्जी के पर कतर दिए हैं। अब अभिषेक बनर्जी तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव नहीं रह गए हैं। शनिवार को हुई एक बैठक में ममता बनर्जी ने सभी पदों को समाप्त कर दिया। किस पद पर किसे नियुक्त किया जाएगा यह अधिकार भी ममता बनर्जी को सौंप दिया गया। अभी तीन माह पहले तक किसी ने यह सोचा भी नहीं होगा कि तृणमूल कांग्रेस के महाबली अभिषेक बनर्जी को इस राह पर रवाना कर दिया जाएगा। तो क्या इसके साथ ही अभिषेक बनर्जी और ममता बनर्जी के बीच खुले जंग की शुरुआत हो गई है?

कभी करीब थे अब रकीब है कि यह कहानी एक त्रिकोण की है। इसमें एक तरफ ममता बनर्जी, दूसरी तरफ अभिषेक बनर्जी और तीसरी तरफ चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर हैं। एक व्यक्ति एक पद पर चर्चा पिछले साल नवंबर में दिल्ली में तृणमूल कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में हुई थी। इसकी पटकथा प्रशांत किशोर ने लिखी थी और अभिषेक बनर्जी ने इसका पुरजोर समर्थन किया था। बमुश्किल तीन माह में ही एक व्यक्ति एक पद का विवाद अब इस मुकाम पर पहुंच गया है कि तृणमूल कांग्रेस में विभाजन की चर्चा होने लगी है। अलबत्ता इस तीन माह के दौरान बहुत सारे गुल खिले और इस पर चर्चा बाद में करेंगे। इधर सियासत के गलियारे में पुरजोर चर्चा थी कि सोमवार को अभिषेक बनर्जी इसी मुद्दे पर राष्ट्रीय महासचिव के पद से अपना इस्तीफा दे देंगे। शायद इसी रणनीति के तहत शुक्रवार को ट्विटर पर एक व्यक्ति एक पद पोस्ट होने लगा।

इसकी शुरुआत अभिषेक बनर्जी के भाई और ममता बनर्जी की बहन की दो बेटियों ने की। इसके बाद अभिषेक बनर्जी के करीबी नेता देवांशु भट्टाचार्य और सुदीप साहा भी इससे जुड़ गए। इसके बाद तो ट्वीट की बाढ़ ही आ गई और शाम होते-होते यह आंकड़ा 20 हजार को पार कर गया। तब ट्विटर की आग को बुझाने के लिए कोलकाता नगर निगम के मेयर एवं मंत्री और ममता बनर्जी की बहुत करीबी फिरहाद हकीम ने मोर्चा संभाल लिया। उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी ने एक व्यक्ति एक पद की बात कही तो थी, लेकिन इसके साथ ही यह भी कहा था कि यह सब चेयर पर्सन की इच्छा पर निर्भर करेगा। इसके बाद ही तृणमूल कांग्रेस के नेता मैदान में उतर आए और ममता बनर्जी ने शनिवार को अपने आवास पर सात महत्वपूर्ण नेताओं की एक बैठक बुला ली। बैठक में अभिषेक बनर्जी भी थे। बैठक से पहले तृणमूल कांग्रेस की राज्य कमेटी के अध्यक्ष सुब्रत बख्शी के कार्यालय में एक मसौदा तैयार किया गया था।

शनिवार की बैठक में जब सुब्रत बख्शी ने यह मसौदा ममता बनर्जी को दिया तो उनका पहला वाक्य था कि इस पर अभिषेक से भी दस्तखत कराए। यानी बाकी के दस्तखत तो तय थे बस जो भी शक था वह अभिषेक पर था, लेकिन अभिषेक ने बिना झिझक दस्तखत कर दिया। इस मसौदे में कहा गया था कि तृणमूल कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यसमिति के सारे पद समाप्त किए जा रहे हैं और उन पर नए सिरे से नियुक्ति का अधिकार सर्वसम्मति से ममता बनर्जी को दिया जा रहा है। इस बारे में पूछे जाने पर तृणमूल कांग्रेस के नेताओं का जवाब था कि कब और किसकी नियुक्ति होगी यह फैसला ममता बनर्जी बाद में करेंगी। इस तरह अभिषेक बनर्जी की महासचिव के पद से विदाई हो गई। इसके साथ ही 20 सदस्यों की एक कार्य समिति भी बनाई गई है जिसमें गोवा और त्रिपुरा का कोई नेता नहीं है। यहां याद दिला दें कि इन दोनों राज्यों की जिम्मेदारी अभिषेक बनर्जी को सौंपी गई थी। दरअसल शनिवार को अफरा-तफरी में बैठक बुलाने की खास वजह थी। सियासत के गलियारों में यह चर्चा बड़ी जोर से हो रही थी कि एक व्यक्ति एक पद के सवाल पर अभिषेक बनर्जी सोमवार को इस्तीफा दे देंगे। पर ममता बनर्जी ने शनिवार को एक बैठक बुला ली और अभिषेक बनर्जी को शहीद होने का मौका ही नहीं दिया।

दरअसल यह सब अचानक नहीं हुआ, क्योंकि इसकी भूमिका पिछले कई महीनों से बन रही थी। इसकी शुरुआत डायमंड हार्बर मॉडल बनाम ममता बनर्जी मॉडल से हुई थी। डायमंड हार्बर अभिषेक बनर्जी का संसदीय क्षेत्र है। यानी आग तो सुलग रही थी पर बस धुआं भर निकल रहा था। कोरोना के दौरान अभिषेक बनर्जी भीड़भाड़ वाले कार्यक्रम के साथ ही पालिका चुनाव पर भी रोक लगाने के पक्ष में थे पर ममता बनर्जी को यह मंजूर नहीं था। अभिषेक बनर्जी ने डायमंड हार्बर क्षेत्र में सख्ती लगाई और संक्रमण दर घट कर तीन फ़ीसदी से नीचे आ गई।

इसके बाद से डायमंड हार्बर मॉडल पर चर्चा होने लगी और यह बात ममता बनर्जी को नागवार लगी। इसका नतीजा भी सामने आ गया। इसके बाद अभिषेक बनर्जी के बेहद करीबी जहांगीर खान को दी गई पुलिस सुरक्षा वापस ले ली गई और इसकी कोई वजह भी नहीं बताई गई। इतना ही नहीं चार नगर निगम और 108 पालिकाओं के चुनाव के लिए जो कोआर्डिनेशन कमेटी बनाई गई उसमें भी अभिषेक बनर्जी को शामिल नहीं किया गया। इसी तरह अभिषेक बनर्जी के कुछ मुद्दों पर सहमति जताने के कारण बुजुर्ग सांसद सौगत राय को भी राष्ट्रीय कार्यसमिति में नहीं लिया गया। इसके अलावा गोवा और त्रिपुरा से भी किसी नेता को कार्यसमिति में स्थान नहीं मिला है। इन दोनों राज्यों की जिम्मेदारी अभिषेक बनर्जी को सौंपी गई थी। यानी उन्हें अभिषेक बनर्जी की मौजूदा हैसियत के बारे में बता दिया गया है।

अब सवाल उठता है कि क्या अभिषेक बनर्जी को फिर से महासचिव बनाया जाएगा। या फिर कई महासचिव में उन्हें भी शामिल कर दिया जाएगा। पर ममता बनर्जी का ट्रैक रिकॉर्ड यही बताता है कि वे चुनौती देने वालों को कभी माफ नहीं करती हैं। बहरहाल अभिषेक बनर्जी की हैसियत का अंदाजा रविवार सुबह से ही मिलने लगा है। अभी तक तृणमूल कांग्रेस की जितनी भी रैलियां निकलती थीं उनमें ममता बनर्जी के साथ-साथ अभिषेक बनर्जी जिंदाबाद का नारा भी लगता था। रविवार को पालिका चुनाव के कारण रैलियां तो निकलीं पर उनमें अभिषेक का नाम नहीं था। अभी तक तृणमूल कांग्रेस के जितने भी पोस्टर छपते थे उन पर ममता बनर्जी के साथ साथ अभिषेक बनर्जी की तस्वीर भी हुआ करती थी। पर हालात से तो ऐसा नहीं लगता है कि अब ममता बनर्जी के साथ तृणमूल कांग्रेस के पोस्टरों पर अभिषेक बनर्जी भी नजर आएंगे। इन सबके बावजूद बाकी लोग तो मुखर हैं पर अभिषेक बनर्जी खामोश हैं। शायद यही कहना चाहते हैं : वक्त आने पर तुझे बता दूंगा ऐ आसमां, अभी से क्या बताऊं क्या हमारे दिल में है।

(कोलकाता से वरिष्ठ पत्रकार जेके सिंह की रिपोर्ट।)

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