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अल्पसंख्यक अधिकारों की रक्षा ही देगी हमारे लोकतंत्र को स्थायित्व

क्या हमारे लोकतंत्र को धीरे धीरे बहुमत के शासन में तब्दील किया जा रहा है? क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था का उपयोग बहुसंख्यक वर्ग की धार्मिक सर्वोच्चता स्थापित करने हेतु किया जा सकता है? क्या हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली में अंतर्निहित अपूर्णताओं का लाभ उठाकर धीरे धीरे अल्पसंख्यक समुदाय का प्रतिनिधित्व संसद और विधान सभाओं में समाप्त किया जा रहा है? क्या नागरिकता संशोधन विधेयक और एनआरसी को लाने का एक प्रमुख उद्देश्य यह है कि जिन चंद प्रदेशों में अल्पसंख्यक समुदाय की आबादी अधिक है वहां की बसाहट को इस प्रकार से पुनर्नियोजित किया जाए कि बहुसंख्यक समुदाय यहां भी अपना वर्चस्व स्थापित कर ले?

एनआरसी और नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर अल्पसंख्यक समुदाय आंदोलित है। पहली बार अल्पसंख्यक समुदाय के विरोध की कमान छात्रों के हाथ में है। इसे एक आशाजनक संकेत के रूप में परिभाषित किया जा सकता है क्योंकि हो सकता है ये आधुनिक और प्रगतिशील सोच वाले छात्र अल्पसंख्यक वर्ग के प्रतिरोध को एक तार्किक, जनोन्मुख और अराजनीतिक स्वरूप देने की सामर्थ्य रखते हों। लेकिन जैसा हर छात्र आंदोलन के साथ होता है, यह प्रतिरोध हिंसक रूप भी ले सकता है, इसे सरकारी दमन का भी सामना करना पड़ सकता है और परिजनों का दबाव या कैरियर की चिंता छात्रों को संघर्ष पथ त्यागने को विवश भी कर सकती है। किंतु इससे भी बड़ा खतरा यह है कि अल्पसंख्यक समुदाय में उपस्थित कट्टरपंथी ताकतें छात्रों के इस आक्रोश को उस रिलीजियस आइडेंटिटी पॉलिटिक्स की ओर मोड़ने में कामयाब हो सकती हैं जिसमें हिंदू कट्टरपंथी शक्तियों को महारत हासिल है।

भारत जैसा बहुजातीय, बहुधार्मिक, बहुभाषीय समाज तभी शांति और प्रगति के पथ पर अग्रसर हो सकता है जब हर व्यक्ति अपनी संकीर्ण जातीय, धार्मिक और भाषाई पहचान को यथासंभव त्यागने का प्रयास करे अथवा इसे शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के मार्ग में बाधा न बनने दे। संभव है कि हमारे देश के जीवन में धर्म की गहरी पैठ के कारण हमारे राजनेताओं ने सेकुलरिज्म की ऐसी परिभाषा गढ़ी जो जनता के लिए तो स्वीकार्य थी ही, इन राजनेताओं की स्वीकार्यता और इनकी राजनीतिक सफलता में भी सहायक थी। सेकुलरिज्म को सर्व धर्म समभाव के रूप में परिभाषित करने के अपने खतरे थे। सर्वधर्म समभाव की अवधारणा में कुछ भी गलत नहीं था किंतु भारतीय लोकतंत्र का दुर्भाग्य है कि सर्व धर्म समभाव की अवधारणा द्वारा जीवित रखी गई धार्मिक अस्मिताएं बार बार वोट बैंक की राजनीति के लिए प्रयुक्त की गईं और इन्हें इतना संवेदनशील बना दिया गया कि ये सेकुलरिज्म के लिए खतरा बन गईं हैं।

अनेक स्थानों पर हमारा संविधान और कानून भी धर्म के विमर्श में उलझता नजर आता है। हमारा संविधान सिख, जैन और बौद्ध जनों को हिन्दू मानता है और इन धर्मों को हिंदू धर्म की शाखा। प्रारंभ में अनुसूचित जाति के आरक्षण का लाभ केवल हिंदुओं को इस आधार पर दिया गया था कि जाति प्रथा केवल हिन्दू धर्म में व्याप्त है किंतु बाद में इसे सिखों और बौद्धों के लिए भी इस आधार पर लागू किया गया कि ये धर्म हिन्दू धर्म के ही अंग हैं। भारतीय मुस्लिमों और ईसाइयों में भी जातिगत भेदभाव व्यापक रूप से व्याप्त है किंतु इनके लिए अनुसूचित जाति आरक्षण लागू नहीं है। वर्ष 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में कहा कि अनुसूचित जाति के वे मुस्लिम और ईसाई जो रीकन्वर्ट होकर वापस हिन्दू बने हैं आरक्षण का लाभ प्राप्त कर सकते हैं बशर्ते वे यह प्रमाणित कर दें कि उनके पूर्वज अनुसूचित जाति के थे। रीकन्वर्शन शब्द के प्रयोग द्वारा शायद घर वापसी जैसे अभियानों को नैतिक समर्थन मिला क्योंकि इससे यह ध्वनित होता है कि हिन्दू धर्म से अन्य धर्म में धर्मांतरण बलात ही होता है और इन धर्मांतरित लोगों की हिन्दू धर्म में वापसी एक न्यायोचित प्रक्रिया है एवं इसमें बलात धर्मांतरण का तत्व हो ही नहीं सकता।

कांग्रेस सरकार द्वारा 1956 में नियोगी कमीशन की स्थापना की गई जिसने ऐसे धर्मांतरण पर कानूनी रोक लगाने की सिफारिश की जो पूर्णतः स्वैच्छिक नहीं था। यद्यपि तत्कालीन केंद्र सरकार द्वारा इसकी सिफारिशों को लागू नहीं किया गया किंतु इस आयोग की सिफारिशों से प्रेरित होकर अनेक राज्यों ने धर्मांतरण रोधी कानून बनाए। ओडिशा फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट 1967 पहले पास हुआ फिर इसके अनुकरण में 1968 में मध्यप्रदेश सरकार ने ऐसा ही कानून बनाया। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भी 1977 में  संविधान के अनुच्छेद 25 का हवाला देते हुए धर्मांतरण पर कानूनी रोक का समर्थन किया गया। गुजरात,राजस्थान और हिमाचल प्रदेश में भाजपा शासन काल में अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों के धर्मांतरण पर कठोर दंड का प्रावधान किया गया। यद्यपि इन सारे कानूनी प्रावधानों के लिए संविधान के आर्टिकल 25 को आधार बनाया गया जो हमें धर्म पालन की स्वतंत्रता देता है किंतु इन सारे कानूनों से यह ध्वनित होता है कि हिन्दू धर्म से अन्य धर्म में धर्मांतरण अनैच्छिक, बलात और प्रलोभन जन्य ही होता है।

सर्वधर्म समभाव का राजनीतिक स्वरूप राजनेताओं द्वारा धर्म स्थलों और धार्मिक ट्रस्टों को दी जाने वाली उदार आर्थिक सहायता, विभिन्न धार्मिक उत्सवों और मेलों में सक्रिय भागीदारी एवं इनके वित्त पोषण तथा धार्मिक आयोजनों को अप्रत्यक्ष ढंग से प्रायोजित करने  के रूप में देखा जाता है। सर्वधर्म समभाव  अनेक बार राजनेताओं द्वारा धार्मिक कर्मकांडों के आडंबरपूर्ण पालन और उनकी अतिरंजित मीडिया कवरेज द्वारा भी अभिव्यक्त होता है। कई बार धार्मिक पर्वों पर सार्वजनिक अवकाश घोषित करने की प्रतिस्पर्धा होती है। धार्मिक भावनाओं के राजनीतिक हितों की सिद्धि के लिए तुष्टिकरण की इस परिपाटी का मुख्य लाभ बहुसंख्यक समुदाय को मिलता है किंतु इसकी चर्चा नहीं होती क्योंकि यह बहुसंख्यक समुदाय का विशेषाधिकार समझा जाता है किंतु जब अल्पसंख्यक समुदाय की धार्मिक अस्मिता का राजनीतिक हितों के लिए पोषण किया जाता है तो यह तुष्टिकरण की राजनीति के रूप में चर्चित और विवादित होता है। यह विश्लेषण उन प्रवृत्तियों की ओर संकेत मात्र करता है जो हमारे सेकुलरिज्म के अर्थ को ही बदल देती हैं, हमारे प्रजातंत्र में धर्म और राज्य के मध्य अपेक्षित दूरी कभी नहीं रह पाई। सर्वधर्म समभाव की सैद्धांतिक उदारता के पीछे धार्मिक अस्मिताओं को जीवित रखने की राजनीतिक अवसरवादिता हमेशा छिपी रही।

आज अल्पसंख्यक समुदाय पर दो प्रकार से आधिपत्य स्थापित करने की कोशिश हो रही है –तीन तलाक बिल, सड़कों और स्मारकों तथा नगरों का नाम परिवर्तन, गोरक्षा के नाम पर मॉब लिंचिंग, मदरसों पर नियंत्रण, वंदे मातरम गाने और योग करने हेतु बाध्य करना, सड़कों पर नमाज अदा करने से रोकना, जय श्री राम कहने हेतु विवश करना आदि का संबंध मुस्लिम समुदाय की रिलीजियस आइडेंटिटी को कुरेदने और इस प्रकार मुस्लिम समुदाय को उग्र और असहिष्णु प्रतिक्रिया देने के लिए उकसाने से है। मुस्लिम समाज भी उसी तरह धार्मिक कट्टरता का शिकार रहा है जिस प्रकार हिन्दू समाज। यह आधुनिक भारतीय समाज का स्थायी भाव रहा है कि जैसे ही समाज का कोई तबका आर्थिक संपन्नता अर्जित कर लेता है और ऐश्वर्य के साधनों तक उसकी पहुंच बनने लगती है वैसे ही वह अपनी धार्मिक अस्मिता के प्रति अतिरिक्त सजगता प्रदर्शित करने लगता है।

इसके विपरीत जब वह विपन्न होता है और रोजी रोटी की जद्दोजहद में लगा रहता है तो वह अधिक खुलापन दर्शाता है। जब हिन्दू कट्टरपंथी मुस्लिम समुदाय की धार्मिक भावनाओं को कुरेदते हैं तो उनका उद्देश्य मुस्लिम समुदाय को कट्टरता से मुक्त कराना नहीं बल्कि उसे और अधिक कट्टरता की ओर धकेलना होता है। और दुर्भाग्य से ऐसा हो भी रहा है और मुस्लिम समुदाय अपने दरवाजे और खिड़कियां आधुनिक नागरिक सभ्यता के उदार विचारों हेतु खोलने के स्थान पर एक कट्टर और बन्द समाज बनने की प्रवृत्ति दर्शा रहा है।

अल्पसंख्यक समुदाय पर आधिपत्य स्थापित करने की दूसरी कोशिश विधिक प्रावधानों में संशोधन द्वारा शनैःशनैः नागरिक अधिकारों में कटौती करने के चरणबद्ध प्रयासों के रूप में दिखती है। धारा 370 के कतिपय प्रावधानों को अप्रभावी बनाना, नागरिकता संशोधन विधेयक और एनआरसी इसी रणनीति का हिस्सा हैं। आज जब छात्र समुदाय नागरिकता संशोधन विधेयक और एनआरसी के विरुद्ध आंदोलन कर रहा है तो न केवल हिन्दू कट्टरपंथी शक्तियां अपितु मुस्लिम कट्टरवादी भी इस बात का पूरा प्रयास करेंगे कि यह आंदोलन नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए चलाई जा रही राष्ट्रव्यापी मुहिम से रिलीजियस आइडेंटिटी पॉलिटिक्स के संकीर्ण स्वरूप में रिड्यूस कर दिया जाए।

अल्पसंख्यक समुदाय के लिए यह कठिन चुनौतियों का वक्त है। आसन्न संकट का मुकाबला करने के लिए उसके पास दो रास्ते हैं, एक मार्ग तो हिंसा और धार्मिक कट्टरता का है जिसका अनुसरण करने के नतीजे हम सब को पता हैं। दूसरा रास्ता हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था को अधिक रेस्पांसिबल और रिप्रेजेन्टेटिव बनाने के लिए आंदोलन छेड़ने का है। अल्पसंख्यक समुदाय शांतिपूर्ण अहिंसक तरीके से यदि अपने नागरिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए आंदोलन करेगा तो निश्चित ही विश्व समुदाय का उसे समर्थन भी हासिल होगा।

प्रत्याशी के जीतने की क्षमता को आधार बनाकर भाजपा ने अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को लोकसभा और विधान सभा के चुनावों में टिकट देना लगभग बंद ही कर दिया है। भाजपा के इस फॉर्मूले की कामयाबी ने विपक्षी दलों पर इतना अधिक दबाव बना दिया है कि अल्पसंख्यकों को टिकट देना उनके लिए भी मुश्किल हो गया है। इस कारण संसद और विधान सभाओं में आज अल्पसंख्यक समुदाय का प्रतिनिधित्व न केवल उनकी आबादी के अनुपात के आधार पर न्यूनतम स्तर पर है बल्कि यह आशंका भी होने लगी है कि यह पूर्णतः समाप्त भी हो सकता है। अल्पसंख्यक समुदाय को यह आंदोलन करना चाहिए कि संसद में उन्हें आबादी के मुताबिक उपयुक्त प्रतिनिधित्व दिया जाए। इसे कैसे संभव बनाना है यह सोचना राजनीतिक दलों का काम है।

अल्पसंख्यक समुदाय को प्रभावित करने वाला कोई भी बिल लाने से पहले अल्पसंख्यक समुदाय के साथ विचार विमर्श करने के लिए संसद को कानूनी रूप से बाध्य किया जाना चाहिए। दक्षिण अफ्रीका में कतिपय समुदायों के हितों से संबंधित बिलों के विषय में संसद इन समुदायों के साथ विचार विमर्श हेतु बाध्य होती है। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि अल्पसंख्यक समुदाय को प्रभावित करने वाला कोई भी कानून बिना इस समुदाय की सहमति के पास नहीं हो सकता। चाहे इसके लिए अल्पसंख्यक जन प्रतिनिधियों की राय ली जाए या फिर जनमत संग्रह कराया जाए। ऐसे बिलों पर वोटिंग के समय अल्पसंख्यक जन प्रतिनिधियों के वोटों को अतिरिक्त भार या वेटेज दिया जा सकता है। अल्पसंख्यक हितों को प्रभावित करने वाले बिलों पर अल्पसंख्यक जन प्रतिनिधियों को वीटो पावर दी जानी चाहिए। स्लोवेनिया में वहां के दो समुदायों को इस प्रकार का वीटो पावर प्राप्त है।

अल्पसंख्यक वर्ग की राजनीतिक पार्टियों को मान्यता के लिए वोट प्राप्ति की न्यूनतम अर्हता में छूट दी जाए। इस प्रकार की छूट सर्बिया की अल्पसंख्यक पार्टियों को दी जाती है। कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका में अल्पसंख्यक समुदाय को उनकी जनसंख्या के मुताबिक प्रतिनिधित्व मिले इस हेतु सभी दलों पर दबाव बना कर आवश्यक संवैधानिक प्रावधान कराए जाएं। सेना और पुलिस में अल्पसंख्यक वर्ग को समुचित प्रतिनिधित्व मिले इस हेतु भी उपाय किये जायें। अल्पसंख्यक समुदाय को नागरिक जीवन के सबसे महत्वपूर्ण – विकास के अधिकार- की मांग करनी चाहिए। सच्चर समिति की सिफारिशें अल्पसंख्यकों के आर्थिक-सामाजिक-शैक्षिक विकास के लिए कई महत्वपूर्ण बिंदुओं का समावेश करती हैं, इन्हें अविलंब लागू करने के लिए आंदोलन होना चाहिए। भारतीय जनसंख्या की यह खूबी रही है कि अनेक प्रदेशों में अल्पसंख्यक समुदाय बहुसंख्यक है।

(डॉ. राजू पांडेय चिंतक और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और आजकल रायगढ़ में रहते हैं।)

This post was last modified on December 18, 2019 2:45 pm

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