कोविड-19: सरकार के साथ साझा करें सवाल

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प्रतीकात्मक फ़ोटो।

कोविड-19 को लेकर चल रहे विमर्श को सही दिशा प्रदान करने का महती उत्तरदायित्व आम जनता पर है। यदि हम निरन्तर सरकार के साथ संवाद नहीं कर रहे हैं, अपने मन में उठ रहे प्रश्नों को सरकार के साथ साझा नहीं कर रहे हैं, अपनी आशंकाओं और अपेक्षाओं तथा अपने सुझावों को सरकार तक नहीं पहुंचा रहे हैं तो हमें यह समझना होगा कि हमसे नागरिक कर्तव्यों के पालन में गंभीर चूक हो रही है। आइए हर संभव अवसर पर अपने मन की जिज्ञासाओं को सरकार के साथ साझा करें। यह महत्वपूर्ण प्रश्न बार-बार और लगातार पूछे जाने चाहिए।

डॉक्टर और नर्सिंग स्टॉफ की कोरोना संक्रमण से सुरक्षा के लिए पीपीई किट्स की उपलब्धता की स्थिति क्या है? शासकीय और निजी अस्पतालों में इनका कितना स्टॉक मौजूद है? क्या इस संबंध में हॉस्पिटल वाइज स्टॉक की दैनिक जानकारी उपलब्ध कराई जा सकती है? क्या पीपीई किट्स के निर्माण के लिए भारत की किसी कंपनी को अधिकृत किया गया है? यदि हां तो यह प्रतिदिन कितने पीपीई किट्स का निर्माण कर रही है? इन पीपीई किट्स को किस प्रकार हॉस्पिटल्स तक पहुंचाया जा रहा है?

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क्या विदेशों से भी पीपीई किट्स मंगाई गई हैं? यदि हां तो कहां से और कितनी संख्या में? यह भी कहा जा रहा है कि पीपीई किट्स को डिसइन्फेक्ट कर पुनः प्रयोग में लाया जा सकता है। इन्हें डिसइन्फेक्ट करने की सुविधा किन अस्पतालों में है? इन्हें डिसइन्फेक्ट करने में कितना समय लगता है? कितने समय बाद ये फिर से उपयोग के लायक हो जाती हैं? क्या यह समस्त जानकारी निजी अस्पतालों के संबंध में भी दी जा सकती है? 

कोविड 19 के लिए डायग्नोस्टिक टेस्ट किट्स हमारे देश में कितनी संख्या में उपलब्ध हैं? कोविड19 के डायग्नोस्टिक एनालिसिस के लिए  कितने सरकारी और निजी सेंटर्स को अधिकृत किया गया है? इनका राज्यवार विवरण क्या है? प्रत्येक सेंटर में कितनी डायग्नोस्टिक किट्स उपलब्ध हैं? क्या यहां उपलब्ध स्टॉक की दैनिक स्थिति सार्वजनिक की जा सकती है? क्या डायग्नोस्टिक टेस्ट किट्स का निर्माण हमारे देश में प्रारंभ हो गया है? यदि हां तो प्रतिदिन कितनी ऐसी किट्स तैयार हो रही हैं? क्या विदेशों से डायग्नोस्टिक किट्स मंगाई गई हैं? यदि हां तो कितनी संख्या में?

क्या ये हमें प्राप्त हो गई हैं? क्या स्वनिर्मित और आयातित टेस्ट किट्स की कार्य प्रणाली अलग अलग है? इनमें टेस्ट रिपोर्ट आने में लगने वाला समय कितना है? क्या इन टेस्ट किट्स के रिजल्ट्स विश्वसनीय हैं? क्या कोविड 19 के लिए अधिकृत किए गए निदान केंद्रों में उपलब्ध टेस्ट किट्स के स्टॉक की दैनिक जानकारी सार्वजनिक की जा सकती है? क्या यह उचित नहीं होगा कि कोविड-19 से जुड़े डॉक्टर्स और मेडिकल स्टॉफ का ड्यूटी प्रारंभ करने से पूर्व और ड्यूटी खत्म कर घर जाने से पहले कोविड 19 के लिए टेस्ट किया जाए जिससे यह ज्ञात हो सके कि वे संक्रमित नहीं हैं?

दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने सोशल डिस्टेन्सिंग के स्थान पर मॉस टेस्टिंग की रणनीति अपनाई और कोविड 19 को नियंत्रित करने में सफलता प्राप्त की। यह मॉडल हमारे देश में क्यों अनुकरणीय नहीं समझा गया?

वर्तमान लॉक डाउन के कारण वायु सेवा, रेल सेवा और सड़क परिवहन बाधित है। यदि किसी छोटे शहर के व्यक्ति को कोरोना संक्रमण के लिए टेस्ट करना है तो उससे सैंपल कलेक्ट कर निकटतम डायग्नोस्टिक सेंटर तक भिजवाने और टेस्ट रिजल्ट प्राप्त करने में कितना समय लगेगा? क्या मरीज को अपने निकटतम हॉस्पिटल तक जाना होगा या होम कलेक्शन की सुविधा उपलब्ध होगी? इस टेस्ट के लिए मरीज से कितनी फीस ली जाएगी? क्या यह फीस निजी हॉस्पिटल और सरकारी हॉस्पिटल्स के लिए समान होगी?

क्या टेस्ट मुफ़्त किया जाएगा? क्या टेस्ट की राशि केंद्र और राज्य सरकार की स्वास्थ्य बीमा योजनाओं के अधीन रिफंडेबल होगी? क्या मरीज का इलाज  टेस्ट रिपोर्ट आने के पहले ही शुरू कर दिया जाएगा? क्या मरीज को कोरोना इन्फेक्शन के लिए दवाएं दी जाएंगी? यदि मरीज कोरोना पॉजिटिव नहीं निकलता तो क्या इन दवाओं के कोई साइड इफ़ेक्ट नहीं होंगे? 

क्या कोविड 19 के इलाज के लिए कोई प्रोटोकॉल तय किया गया है? यह कहा जा रहा है क्लोरोक्विन, हाइड्रोक्सी क्लोरोक्विन, टेमी फ्लू और एड्स रोगियों को दी जाने वाली कुछ दवाएं कोविड 19 के इलाज के लिए चिह्नित की गई हैं। जो भी दवाएं इलाज के दौरान दी जाएंगी क्या उनका उत्पादन हमारे देश में होता है? क्या इनका पर्याप्त स्टॉक हमारे पास उपलब्ध है? क्या यह दवाइयां मुफ़्त उपलब्ध कराई जाएंगी? क्या यह दवाइयां रोगियों को खरीदनी होंगी? क्या इनकी कीमत को अफोर्डेबल बनाने के लिए कोई दिशा निर्देश दिए गए हैं? क्या दवा विक्रेताओं तक इनकी पहुंच सुनिश्चित की गई है? 

आज की स्थिति में हमारे पास सरकारी और निजी क्षेत्र में कितने आईसीयू बेड्स हैं? आज की स्थिति में हमारे देश में सरकारी और निजी क्षेत्र में कितने वेंटिलेटर उपलब्ध हैं? क्या हम विदेशों से नए वेंटिलेटर मंगा रहे हैं? क्या ये हमें प्राप्त हो चुके हैं? यदि हां तो कितनी संख्या में? यदि नहीं तो ये कब हमें उपलब्ध होंगे? इनकी संख्या कितनी होगी? क्या हम अपने देश में वेंटिलेटर का निर्माण कर रहे हैं? यदि हां तो ये कब तक उपलब्ध हो जाएंगे?  किस हॉस्पिटल में कितने वेंटिलेटर हैं इसकी जानकारी उपलब्ध कराई जा सकती है? वेंटिलेटर का प्रयोग करने के लिए विशेष तकनीकी प्रशिक्षण आवश्यक होता है। आज की स्थिति में ऐसे कितने तकनीकी रूप से प्रशिक्षित व्यक्ति हमारे पास हैं? क्या हमारे सभी डॉक्टर्स वेंटिलेटर का प्रयोग करने में दक्ष हैं?

आईसीयू बेड्स और वेंटिलेटर के लिए निजी अस्पताल बहुत ज्यादा शुल्क लेते हैं? क्या निजी हॉस्पिटल्स को कोई स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि कोरोना पीड़ित मरीजों से कितनी रकम लेनी है? क्या निजी अस्पतालों को ऐसे कोई निर्देश दिए गए हैं कि कोरोना के मरीजों से कोई शुल्क न लिया जाए और उनका इलाज केंद्र और राज्य सरकार की स्वास्थ्य बीमा योजनाओं के अधीन होगा? यदि इलाज का खर्च इन योजनाओं के बीमा कवर से अधिक है तो उसकी भरपाई कौन करेगा?

क्या इस बात की आशंका नहीं है कि निजी अस्पताल कोरोना पीड़ितों को बेहतरीन इलाज मुहैया कराने में टालमटोल कर सकते हैं? कोरोना संक्रमित मरीजों को रखने से इन निजी अस्पतालों में अन्य मरीजों की आवाजाही कम हो सकती है जिससे इनकी आमदनी घट सकती है। इस कारण ये अपने यहां बेड की अनुपलब्धता या वेंटिलेटर और आईसीयू खाली न होने का बहाना बना सकते हैं। क्या यह उचित न होगा कि छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान की तरह प्राइवेट हॉस्पिटल्स को राज्य सरकारें टेक ओवर कर लें ताकि इनमें उपलब्ध इंफ्रास्ट्रक्चर और ह्यूमन रिसोर्सेज का सर्वोत्तम उपयोग कोरोना के मरीजों के इलाज के लिए किया जा सके? 

यह बताया गया है कि रेल विभाग ट्रेन के कोचेस को आइसोलेशन बेड्स का रूप दे रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि हर राज्य कोरोना मरीजों के लिए बड़ी संख्या में अतिरिक्त बेड्स की व्यवस्था कर रहा है। क्या इन बेड्स के साथ आवश्यक चिकित्सा और जीवन रक्षक उपकरणों की भी व्यवस्था कर ली गई है? इन बेड्स में रखे गए मरीजों की देखभाल के लिए डॉक्टर्स और सपोर्ट स्टॉफ की एक बड़ी संख्या आवश्यक होगी। क्या इनका प्रबंध कर लिया गया है?

लॉक डाउन के दौरान विशेषकर कोरोना प्रभावित क्षेत्रों में कई निजी चिकित्सक अपने क्लीनिक बन्द कर चुके हैं। इनमें से कुछ मोबाइल पर उपलब्ध हैं और मरीजों को मेडिकल एडवाइस दे रहे हैं। फोन द्वारा मेडिकल एडवाइस देने की अपनी सीमा है। हर मरीज बहुत स्पष्टता से अपने लक्षण बता नहीं सकता। भौतिक परीक्षण और पैथोलॉजिकल टेस्ट्स के अभाव में डॉक्टर बहुत सही परामर्श भी नहीं दे सकता। अनेक हॉस्पिटल्स में कोरोना के भय से ओपीडी बन्द कर दी गई है।

यह भी संभव है कि अन्य प्राणघातक बीमारियों से ग्रस्त रोगियों को सही मेडिकल असिस्टेंस और गाइडेंस न मिल पाने के कारण उनकी हालत बिगड़ी हो और उनकी मृत्यु भी हुई हो। संभवतः ऐसे मरीजों के कोई आकड़े सरकार के पास उपलब्ध नहीं होंगे। क्या कोरोना के भय से स्वास्थ्य सेवाओं को इस प्रकार बाधित करना ठीक है? क्या कोई वैकल्पिक उपाय ढूंढा जा सकता है? 

पिछले दिनों बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर लॉक डाउन के बाद अपने घरों को लौटने की कोशिश में सड़कों पर पैदल ही निकल पड़े थे। क्या इन सब मजदूरों के लिए भोजन, आवास और चिकित्सा की व्यवस्था कर दी गई है? क्या इनके परिजनों को आर्थिक मदद दी जा चुकी है? क्या सरकार राज्यवार विवरण दे सकती है कि किस राज्य में किस राज्य के कितने मजदूर अस्थायी शिविरों में रखे गए हैं? कितने प्रवासी मजदूर ऐसे हैं जो अपने गृह जिले में पहुंच चुके हैं और इन्हें बाहर किसी स्थान में 14 दिन के लिए अलग रखा गया है? कितने प्रवासी मजदूर ऐसे हैं जिन्हें उनके एम्प्लॉयर्स से बात कर वापस उन्हीं शहरों में भेज दिया गया है जहाँ से उन्होंने पलायन किया था?

क्या इन मजदूरों के स्वास्थ्य की नियमित जांच हो रही है? क्या इन मजदूरों में किसी में कोरोना के लक्षण पाए गए हैं? विभिन्न समाचार माध्यमों की अलग अलग रिपोर्ट्स यह दर्शाती है कि लॉक डाउन के बाद सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा पर पैदल ही निकल पड़े इन मजदूरों में से अनेक सड़क दुर्घटनाओं में मारे गए, अनेक की थकान और बीमारी से मृत्यु हो गई। क्या सरकार के पास इस तरह जान गंवाने वाले मजदूरों की कोई सूची है? क्या इन मृतकों की संख्या से हमें अवगत कराया जा सकता है? क्या इन्हें कोई आर्थिक मदद दी गई है? 

स्वास्थ्य राज्य सरकारों का विषय है। यद्यपि केंद्र और राज्य सरकारें बहुत अच्छे समन्वय से कार्य कर रही हैं किंतु कोविड 19 पैनडेमिक की गंभीरता को देखते हुए क्या यह उचित नहीं होगा कि इसके लिए सैन्य बलों की भांति एक यूनिफाइड कमांड गठित की जाए जिससे कि मेडिकल, फाइनेंशियल और लॉ एंड आर्डर के मामलों पर तत्काल निर्णय लेकर उनका क्रियान्वयन किया जा सके?

(डॉ. राजू पाण्डेय लेखक और चिंतक हैं आप आजकल छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में रहते हैं।)

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