Subscribe for notification
Categories: बीच बहस

ट्वीट अवमानना मामले में प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट से सुबूत पेश करने की स्वतंत्रता मांगी

प्रशांत भूषण ने गुरुवार को उच्चतम न्यायालय में एक अर्जी दायर की है। इसमें कहा गया है कि उनके दो कथित अपमानजनक ट्वीट से न्यायपालिका की अवमानना नहीं होने के बारे में दी गई उनकी दलीलों से उच्चतम न्यायालय यदि संतुष्ट नहीं है और उनके (प्रशांत भूषण) खिलाफ अवमानना कार्रवाई चलाने का फैसला करता है तो न्यायालय अवमान अधिनियम की धारा 17 (5) के तहत उन्हें सुबूत पेश करने की अनुमति दे।

इसके अलावा भूषण ने मुख्य न्यायाधीश के समक्ष पूरी कार्रवाई प्रस्तुत करने की प्रार्थना की है ताकि इस मामले की सुनवाई के लिए एक खंडपीठ का आवंटन किया जा सके।

अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने उच्चतम न्यायालय के समक्ष एक अर्जी दायर की है कि अगर अदालत अवमानना के लिए उनके खिलाफ आगे बढ़ने का फैसला करती है, तो उन्हें सबूत पेश करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। उच्चतम न्यायालय द्वारा उनके खिलाफ स्वत: संज्ञान के अवमानना मामले में आदेश सुरक्षित रखने के एक दिन बाद भूषण ने नई अर्जी दायर की है। भूषण ने महक माहेश्वरी की शिकायत की एक प्रति देने की भी मांग की है।

नई अर्जी में भूषण ने कहा कि माहेश्वरी की याचिका केवल चीफ जस्टिस एसए बोबडे  और हार्ले डेविडसन मोटरसाइकिल पर भूषण के ट्वीट के संबंध में थी। हालांकि, जिस दिन अदालत के समक्ष सुनवाई निर्धारित की गई, उस दिन “लोकतंत्र को नष्ट करने” से संबंधित दूसरा ट्वीट टाइम्स ऑफ़ इंडिया में पुन: प्रकाशित किया गया था और इन दोनों ट्वीट्स पर उन्हें नोटिस जारी किया गया था। इस दूसरे ट्वीट के संबंध में भूषण का कहना है कि यह कार्रवाई का एक अलग कारण है और अदालत को इस पर अलग कार्रवाई शुरू करने की आवश्यकता है।

वकील कामिनी जायसवाल के माध्यम से दायर इस नई अर्जी में भूषण ने कहा है कि अगर न्यायालय मेरे शुरुआती जवाब से संतुष्ट नहीं है और इस मामले में आगे कार्रवाई करना चाहता है तो मुझे शिकायतकर्ता महक माहेश्वरी की शिकायत की प्रति देने के बाद न्यायालय की अवमानना कानून, 1971 की धारा 17(5) के तहत और साक्ष्य पेश करने की अनुमति दी जाए।

अपने अनुरोध के समर्थन में फैसलों का हवाला देते हुए भूषण ने कहा है कि उन्होंने अपने ट्वीट के बारे में स्पष्टीकरण देने के लिए शुरुआती जवाब दिया और इस बारे में कानून सामने रखा कि उनके खिलाफ अवमानना का नोटिस टिक नहीं सकता।

इस अर्जी में कहा गया है कि दूसरे ट्वीट का माहेश्वरी द्वारा दायर अवमानना याचिका में जिक्र नहीं है और इसलिए इसे उचित पीठ के सामने सूचीबद्ध करने के लिए सीजेआई एसए बोबडे के पास भेजा जाए।

अर्जी में कहा गया है कि 27 जून के ट्वीट के संदर्भ में स्वत: जारी नोटिस के मामले में कार्रवाई विजय कुर्ले प्रकरण के पैरा 39 के अनुसार इसे उचित पीठ के आवंटन के लिए सीजेआई के सामने पेश करने का निर्देश दिया जाए। अर्जी में कहा गया है कि न्यायालय द्वारा दूसरे ट्वीट का संज्ञान लेने के कारण इसे अलग कार्रवाई के रूप में शुरू करने की जरूरत है।

PTI11_1_2018_000197B

उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को सुनवाई पूरी करते हुए भूषण की अलग से दाखिल वह अर्जी खारिज कर दी थी, जिसमें उन्होंने 22 जुलाई का आदेश वापस लेने का अनुरोध किया था। इसी आदेश के तहत न्यायपालिका की कथित रूप से अवमानना करने वाले दो ट्वीट पर अवमानना कार्रवाई शुरू करते हुए नोटिस जारी किया गया था।

पीठ भूषण का पक्ष रख रहे वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे के इस तर्क से सहमत नहीं थी कि अलग अर्जी में अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल की राय लिए बिना अवमानना कार्रवाई शुरू करने पर आपत्ति की गई है और उसे दूसरी पीठ के पास भेजा जाए।

भूषण ने इस मामले में हलफनामे पर अपने 142 पेज के जवाब में अपने दो ट्वीट पर कायम रहते हुए कहा था कि विचारों की अभिव्यक्ति, ‘हालांकि मुखर, असहमत या कुछ लोगों के प्रति असंगत’ होने की वजह से अदालत की अवमानना नहीं हो सकती।

जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस कृष्ण मुरारी की पीठ ने प्रशांत भूषण के इन ट्वीट को लेकर उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई शुरू की थी और 22 जुलाई को कारण बताओ नोटिस जारी किया था। पीठ ने बुधवार को इस मामले की सुनवाई पूरी करते हुए कहा था कि इस पर फैसला बाद में सुनाया जाएगा।

इस पीठ के सामने भूषण की ओर से बहस करते हुए सीनियर एडवोकेट दुष्यंत दवे ने बुधवार को दलील दी थी कि ये ट्वीट जजों के व्यक्तिगत आचरण के बारे में थी और इन्होंने न्याय के प्रशासन में बाधा नहीं डाली थी। दवे ने यहां तक कहा कि केवल कुछ न्यायाधीशों को ही राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामले की सुनवाई के लिए दिए जाते हैं। उदाहरण के लिए जैसे जस्टिस नरीमन है, उन्हें कभी ऐसे मामले नहीं सौंपे जाते हैं!

उन्होंने न्यायपालिका की प्रभावशीलता को प्रभावित किया है जैसे कि अनुच्छेद 370 के मामलों पर कोर्ट का उदासीन भरा रवैया, बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर कोई कार्रवाई न करना आदि। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका के ऐसे रवैये पर ‘किसी को भी पीड़ा होगी।

दवे ने यह भी कहा कि पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई के खिलाफ लगाए गए यौन उत्पीड़न के मामले में जिस तरीके से व्यवहार किया गया है, उससे भी संस्था पर बुरा असर पड़ा है। उसे (शिकायतकर्ता को) बहाल कर दिया गया था और सभी आरोपों को हटा दिया गया था, जो यह दर्शाता है कि वह सच बोल रही थी। क्या उसके खिलाफ कोई अवमानना की कार्रवाई की गई थी? इससे क्या धारणा बनी है? हमें इन गंभीर मुद्दों पर अवश्य ध्यान देना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि जस्टिस गोगोई को उनकी सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद राज्यसभा सीट और जेड प्लस सुरक्षा भी दी गई। जिसने राफेल, अयोध्या, सीबीआई निदेशक आदि जैसे मामलों में दिए गए फैसलों पर सवालिया निशान उठाया है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

Donate to Janchowk!
Independent journalism that speaks truth to power and is free of corporate and political control is possible only when people contribute towards the same. Please consider donating in support of this endeavour to fight misinformation and disinformation.

Donate Now

To make an instant donation, click on the "Donate Now" button above. For information regarding donation via Bank Transfer/Cheque/DD, click here.

This post was last modified on August 7, 2020 10:48 am

Share