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रूपानी सरकार ने कर दिया है कोरोना के सामने समर्पण!

अहमदाबाद। मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक की। बैठक में गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपानी भी शामिल थे। रूपानी ने बैठक में प्रधानमंत्री से लॉकडाउन खोलने की सिफारिश की। जबकि उन्हें प्रधानमंत्री से कहना चाहिए था कि “साहब अहमदाबाद के सिविल अस्पताल में कोरोना से लड़ रहे डॉक्टरों तथा अन्य स्टॉफ के पास PPE किट, N95 मास्क, टेस्टिंग किट नहीं है जिसके चलते सिविल अस्पताल के स्टॉफ ने सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया है। अहमदाबाद में वेंटिलेटर, ऑक्सीजन की भी कमी है।”

रूपानी को यह भी कहना चाहिए था, “अहमदाबाद नगर निगम द्वारा संचालित वाड़ी लाल अस्पताल की कीमत पर आप के द्वारा उद्घाटित PPP मॉडल पर बना आधुनिक SVP अस्पताल जहाँ हेलिकॉप्टर एंबुलेंस उतर सकता है, में भी सिविल अस्पताल जैसा ही हाल है। यहां डॉक्टरों के लिए N95 मास्क, PPE किट, टेस्टिंग किट इत्यादि की कमी है। इसके चलते उसके डॉक्टरों ने भी प्रदर्शन किया और सुविधाओं को मुहैया कराने की मांग को लेकर राज्य एवं निगम के सामने विरोध दर्ज किया है। रुपानी को राज्य में हो रही कोरोना से मौतों के बारे में भी प्रधानमंत्री को अवगत कराना चाहिए था।” साहब हमारा गुजरात मॉडल न केवल केरला मॉडल से पीछे है। बल्कि महाराष्ट्र जहाँ सबसे अधिक कोरोना के मामले हैं उससे भी ज्यादा हमारा स्वास्थ्य मॉडल पिछड़ा हुआ है।, गुजरात की हालत स्वास्थ्य के क्षेत्र में कांग्रेस शासित राजस्थान से भी बदतर है।

रूपानी प्रधानमंत्री को बताते कि हम कोरोना से लोगों की जान बचाने में असमर्थ हैं। मोदी जी विजय रूपानी पर थोड़ा गुस्सा होते लेकिन रूपानी कोरोना मृत्यु दर बताकर अपनी बात आसानी से साबित कर लेते जो इस समय 6 फीसद है। जबकि भारत की कोरोना मृत्यु दर 3.28 फीसद है। उद्धव ठाकरे के महाराष्ट्र की कोरोना मृत्यु दर गुजरात से लगभग आधा अर्थात 3.77 फ़ीसद है। स्वास्थ्य के मामले में भक्त भी केजरीवाल के भक्त हैं। दिल्ली की कोरोना मृत्यु दर 1.12 फीसद है। लेकिन विजय रूपानी ने यह सभी बातें मोदी जी से छिपा लीं। क्योंकि यदि इन बातों पर चर्चा हो जाती तो विजय रूपानी को अपनी कुर्सी से हाथ धोना पड़ सकता था।

आप को बता दें कि टेस्टिंग के मामले में गुजरात का रिकॉर्ड अच्छा नहीं है। सरकार और अहमदाबाद नगर निगम ने निर्णय लिया है कि संदेहास्पद व्यक्ति को पहले क्वारंटाइन में लिया जाएगा जब लक्षण दिखने लगेंगे तभी टेस्ट किया जायेगा। यानी इस तरह से मरीज़ के गंभीर अवस्था में पहुँचने के बाद ही उसका इलाज शुरू होता है। और यही बात मृत्यु का प्रमुख कारण बन रही है।

एजाज़ मरियम शेख जो एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं गुजरात में नशामुक्ति आंदोलन से जुड़े हैं और नागरिकता विरोधी कानून आंदोलन में भी बहुत सक्रिय भूमिका निभाई थी, 29 अप्रैल को सरदार वललभ भाई पटेल अस्पताल में दाखिल हुए थे। 30 को जब रिपोर्ट आई तो पॉज़िटिव थे। एजाज़ पिछले 14 दिनों से अस्पताल में हैं। बताते हैं, ” मेरे पॉज़िटिव आने के बाद मेरे परिवार के सभी 6 लोग अर्बन हेल्थ सेंटर जाँच के लिए गए। क्योंकि परिवार के अन्य तीन लोगों में कोरोना के लक्षण आ चुके थे। मेरे बड़े भाई, पत्नी और पिताजी को खाँसी और गले में दर्द हो रहा था।

अर्बन हेल्थ सेंटर ने यह कहते हुए टेस्ट से मना कर दिया कि टेस्ट क्वारंटाइन सेंटर पर हो जायेगा”। क्वारंटाइन सेंटर पर पहुँचने के बाद उन्हें बताया गया कि यहां आपका टेस्ट नहीं होगा। आप लोगों को 14 दिनों तक यहां केवल क्वारंटाइन में रखा जायेगा। तो उन्होंने अपने भाई से कहा वहाँ से निकलो वापस अर्बन हेल्थ सेंटर जाओ और टेस्ट करवाओ। जब ये लोग वहाँ पहुंचे तो इन्हें समझाया गया। आप लोगों को मनोवैज्ञानिक भय है। कुछ नहीं है। फिर ये लोग सिविल अस्पताल पहुंचे तो केवल उनके बड़े भाई का टेस्ट हुआ। पॉज़िटिव रिपोर्ट आई और सिविल में इलाज के लिए दाखिल कर लिया गया। उन्होंने बताया कि उनके पिता और पत्नी का टेस्ट नहीं हुआ तो उन्होंने पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी से संपर्क किया उनकी मदद से पिता और पत्नी को पालड़ी स्थित कमांड एंड कंट्रोल सेंटर भेजा गया। जहां केवल उनकी पत्नी का टेस्ट हुआ वह भी पॉज़िटिव आईं।

उनके पिता के लक्षण पहले से दिख रहे थे फिर भी मनोवैज्ञानिक असर और टेस्टिंग किट की कमी बताकर टेस्ट को बार-बार टाला गया। जब पूरी तरह से बीमारी गंभीर हो गई तब टेस्ट हुआ और अस्पताल में दाखिला मिला। वह अब गंभीर अवस्था में ICU में हैं।” एजाज़ एक रिसर्च स्कॉलर हैं जो आईआईएम के एक प्रोफेसर की निगरानी में Phd कर रहे हैं। जो शख्स कोरोना से उत्पन्न स्थिति को समझता है। उसे और उसके परिवार को टेस्ट के लिए अगर इतना संघर्ष करना पड़ा तो उन लोगों का क्या हाल होता होगा जो पढ़े लिखे नहीं हैं। और अफवाहों पर बहुत जल्द यकीन कर लेते हैं।

अहमदाबाद के सुंदरम नगर के रहवासी अब्दुल हमीद वली मोहम्मद अंसारी सोमवार को सांस में तकलीफ और खाँसी के कारण सिविल अस्पताल में दाखिल हुए। दाखिला तुरंत मिल गया और टेस्ट का सैंपल लेकर जाँच के लिए भी भेज दिया गया। परंतु आज तीसरे दिन अभी तक खाना नहीं दिया गया। कोरोना अस्पताल में मरीज़ की देख-रेख के लिए परिवार के किसी सदस्य को रुकने की अनुमति नहीं है। अंसारी ने अपने परिवार को जब बताया कि तीन दिन से उन्हें अस्पताल ने खाने को भी नहीं दिया है तो परिवार विधायक गयासुद्दीन शेख से संपर्क किया। शेख ने सिविल अस्पताल सुपरिटेंडेंट से बात की।

उसके बाद अंसारी तक खाना पहुंचा। गयासुद्दीन शेख बताते हैं, “SVP अस्पताल में जगह नहीं है। निजी अस्पताल इतने महंगे हैं कि आम आदमी वहाँ जा नहीं सकता। सरकारी अस्पताल के डॉक्टर N95 मास्क और PPE किट के लिए अस्पताल में ही विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। मैंने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर अस्पताल को सुविधाएं और किट की कमी को पूरी करने की मांग की है। अस्पताल का प्रबंधन बिगड़ा हुआ है। अन्य गंभीर बीमारियों से पीड़ित मरीजों को भी सही से इलाज नहीं मिल पा रहा है। सरकार और अस्पताल ने इस बीमारी के आगे घुटने टेक दिये।”

पिछले 24 घंटों में कोरोना से 24 मृत्यु हो चुकी है। राज्य में अब तक 8903 कोरोना पॉज़िटिव केस आ चुके हैं। तथा 537 लोगों की मृत्यु हुई है। जबकि राष्ट्रीय स्तर पर 74281 केस हैं और 2415 मृत्यु हुई है। सरकार का पक्ष जानने के लिए हमने मुख्यमंत्री के दोनों मोबाइल नंबर पर संपर्क किया लेकिन उनकी तरफ से अभी तक कोई उत्तर नहीं मिल पाया है। उप मुख्यमंत्री नितिन पटेल से भी संपर्क करने की कोशिश की गई लेकिन उनकी तरफ से भी उत्तर नहीं मिला है।

(अहमदाबाद से जनचौक संवाददाता कलीम सिद्दीक़ी की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on May 13, 2020 6:53 pm

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