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झारखंड विधानसभा चुनाव: बीजेपी में फूटे बगावत के सुर; सरयू राय ने इस्तीफा देकर रघुबर दास के खिलाफ किया चुनाव लड़ने का ऐलान

रांची। 81 विधानसभा सीटवाले झारखंड में बीजेपी के उम्मीदवारों के नामों की घोषणा के तीसरे चरण में भी भाजपा के वरिष्ठ व चर्चित शख्सियत सरयू राय का नाम नहीं आने पर उन्होंने पार्टी से इस्तीफा देकर मुख्यमंत्री रघुवर दास के खिलाफ जमशेदपुर ईस्ट से चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। इसके पहले आज ही उन्होंने मंत्रिमंडल से भी इस्तीफा दिया।

वैसे इसके पहले सरयू राय ने जमशेदपुर पश्चिमी के अपने विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने के लिये नामांकन पत्र खरीद लिया था। इसके साथ ही उन्होंने जमशेदपुर पूर्वी विधानसभा क्षेत्र से भी नामांकन पत्र खरीदा था।

बता दें कि जमशेदपुर पूर्वी विधानसभा क्षेत्र राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास का क्षेत्र है। पार्टी ने उन्हें वहीं से टिकट भी दिया है। लेकिन अब उनके खिलाफ सरयू राय मैदान में होंगे।

ऐसा होने पर रघुवर दास के लिए परेशान करने वाली परिस्थितियां पैदा हो जाएंगी। इसकी कई बड़ी वजहें हैं। पर सबसे बड़ी वजह यह होगी कि जहां सरयू राय लंबे समय से भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ते रहे हैं। वहीं रघुवर दास हाल के वर्षों में भ्रष्टाचार के आरोपियों को संरक्षण देने और भ्रष्टाचार, यौन शोषण जैसे आरोपों से घिरे नेताओं (ढुल्लू महतो, भानु प्रताप शाही, शशिभूषण मेहता) के पैरोकार के रूप में सामने आये हैं।

सरयू राय चुनाव के दौरान भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाने की कोशिश करेंगे। और अगर वह इसमें सफल हुए तो रघुवर दास को नुकसान उठाना पड़ेगा। सरयू राय मैनहर्ट का मुद्दा भी उठाने की कोशिश करेंगे, तब पूरे झारखंड में भाजपा के सीएम फेस को लेकर दिक्कतें हो सकती हैं।

भाजपा को एक दूसरा नुकसान यह होगा कि रघुवर दास अपने क्षेत्र में ही फंस कर रह जायेंगे। क्योंकि जैसी चर्चा है, इस परिस्थिति में विपक्ष अपने उम्मीदवार वापस भी ले सकता है।

वैसे सरयू राय ने मीडिया से कहा था कि उन्हें पार्टी पर विश्वास है। मगर वे अपनी बेइज्जती बरदाश्त नहीं कर सकते। इसलिए उन्होंने जमशेदपुर पश्चिमी से चुनाव लड़ने के लिए नामांकन पत्र खरीदा है।

जो परिस्थियां पैदा हो रहीं हैं वे भाजपा के लिए अच्छा संकेत नहीं दे रही हैं। पार्टी के भीतर टूट की स्थितियां पैदा हो गईं हैं। भाजपा का सहयोगी दल आजसू ने गठबंधन तोड़ दिया है और उसने अपने उम्मीदवार भाजपा के खिलाफ उतारने शुरू कर दिए हैं। मतलब भाजपा का नारा ‘अबकी बार 60 पार’ केवल नारा बनकर रह जाएगा।

बता दें कि जिस पशुपालन घोटाले में लालू प्रसाद अभी जेल में हैं, जिन्हें भाजपा का राजनीतिक रोड़ा समझा जाता है। सरयू राय वही शख्स हैं जिन्होंने पशुपालन घोटाले को पहली बार वर्ष 1994 में उठाया था।

उन्होंने लोक नायक जयप्रकाश नारायण की जयंती के मौके पर बिहार सरकार के खिलाफ एक आरोप पत्र तैयार किया था। उस आरोप पत्र में देवघर-दुमका में पशुपालन विभाग में सरकारी राशि के बंदरबांट को भी प्रमुखता से उठाया गया था।

उस वक्त दुमका पशुपालन विभाग के क्षेत्रीय निदेशक शेष मुनि राम हुआ करते थे। शेष मुनि राम क्षेत्रीय निदेशक के साथ-साथ देवघर के जिला पशुपालन अधिकारी भी थे।

उन्होंने कागज के फटे चुटके में क्षेत्रीय निदेशक के रूप में निकासी का आदेश दिया और जिला पशुपालन अधिकारी के रूप में 50 लाख रुपये निकाल लिये थे। शेष मुनि राम ने अकेले इस घोटाले को अंजाम दिया था।

लालू प्रसाद तब बिहार के मुख्यमंत्री थे। उन्होंने इसकी जांच के मौखिक आदेश दिये थे। तब निगरानी के महानिदेशक डीएन सहाय हुआ करते थे। सहाय ने निगरानी जांच के लिए तत्कालीन मुख्य सचिव बसाक को पत्र लिखा। निगरानी जांच की प्रक्रिया बाद में हालांकि रुक गयी थी।

फिर विधानसभा की लोक लेखा समिति के सभापति जगदीश शर्मा की ओर से एक पत्र आया और जांच ने नया मोड़ लिया। लोक लेखा समिति ने लिखा था कि वह इस मामले में जांच कर रही है और ऐसे में निगरानी इस मामले की जांच नहीं कर सकता है। इसके बाद वह फाइल दब गयी। लालू प्रसाद के पास यह फाइल वर्षों तक रही, बाद में जब सीबीआई जांच शुरू हुई, तो मामला सामने आया। सीबीआई ने इस फाइल को बाद में हासिल किया।

देवघर-दुमका में अवैध निकासी के मामले में जब निगरानी जांच की प्रक्रिया रोकी गयी, तब भी सरयू राय ने सवाल उठाया था। सरयू राय ने कहा था कि 40 संबद्ध महाविद्यालय और वन विभाग के मामले में समिति के देखने के बाद भी उसकी जांच हो रही है। तत्कालीन बिहार सरकार ने इसे अनसुना कर दिया। आखिरकार निगरानी जांच नहीं हुई और बाद में मामला सीबीआई की पकड़ में आया।

घोटालेबाज एक लूट में व्यस्त थे। पूरा गिरोह व्यवस्था में हावी था। इधर, तीन वर्षों तक सीएजी की रिपोर्ट नहीं आयी। चार साल बाद जब सीएजी की रिपोर्ट आयी, तो घोटाला परत-दर-परत सामने आया। सरयू राय ने तब सरकार पर जो आरोप लगाये थे, वे सभी सीएजी की रिपोर्ट में दर्ज थे। पशुपालन विभाग में करोड़ों रुपये की अवैध निकासी का मामला सामने आ चुका था।

इतना ही नहीं सरयू राय ने झारखंड के मुख्यमंत्री रहे मधु कोड़ा के शासन काल में हुए कई घोटालों का पर्दाफाश किया है।

मधु कोड़ा के शासन काल में स्वास्थ्य मंत्री रहे भानु प्रताप पर 130 करोड़ के दवा घोटाले का आरोप लगा था, जिसके पर्दाफाश होने में सरयू राय की भी अहम भूमिका रही थी। इस मामले पर ईडी और सीबीआई ने आरोप पत्र दायर कर दिया है। केस ट्रायल पर है।

बीजेपी झारखंड के बड़े नेता अपने भाषणों में हमेशा मधु कोड़ा के शासनकाल को भ्रष्टाचार से लिप्त करार देते हैं। लेकिन उसी भ्रष्टाचार के आरोपी भानु प्रताप शाही को पार्टी ने टिकट देने में कोई गुरेज नहीं किया।

बता दें कि पिछले दिनों विपक्ष के कई नेताओं सहित भानु प्रताप शाही ने भी भाजपा का दामन थाम लिया।

भानु प्रताप शाही राज्य की भवनाथपुर सीट से नौजवान संघर्ष मोर्चा के विधायक रहे हैं। 2014 के चुनावों में वे भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार अनन्त प्रताप देव को 2661 वोटों के अंतर से हराकर निर्वाचित हुए थे।

शाही ने बीजेपी की सदस्यता ग्रहण करने के साथ-साथ अपनी पार्टी का भी बीजेपी में विलय करा दिया है। बीजेपी में शामिल होने के बाद मीडिया से बातचीत में भानु प्रताप शाही ने कहा कि ”बीजेपी से बहुत दिनों का संबंध रहा है। राजनीतिक परिपक्वता आने के बाद मैंने समझा कि देश की सुरक्षा सबसे बड़ी चीज है और देश की सुरक्षा पीएम नरेंद्र मोदी के हाथों में ही सुरक्षित है। इन्हीं विचारों से प्रभावित होकर बीजेपी में शामिल हुआ हूं।” वे आगे कहते हैं कि ”मैं पहले जिनके साथ था, उन्होंने मुझे गलत मुकदमों में फंसाया। अब मुझसे गलतियां नहीं होंगी।”

शाही नौजवान संघर्ष मोर्चा के टिकट पर 2005 में पहली बार गढ़वा की भवनाथपुर सीट से विधानसभा चुनाव लड़े और जीते। हालांकि 2009 में वे चुनाव हार गये, लेकिन 2014 में फिर से जीते। वे मधु कोड़ा सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहे। इसी दौरान हुए दवा घोटाले और आय से अधिक संपत्ति मामले में शाही का नाम आया। फिलहाल दोनों मामलों पर सीबीआई कोर्ट में सुनवाई जारी है। शाही और उनके रिश्तेदारों पर वर्ष 2005 से 2009 के बीच अज्ञात स्रोतों से सात करोड़ 97 लाख रुपये की संपत्ति एकत्रित करने का आरोप है।

वैसे भाजपा के दस विधायकों का टिकट कटा है जिसमें बोरियो से ताला मरांडी, सिमरिया से गणेश गंझू, चतरा से जयप्रकाश भोक्ता, सिंदरी से फूलचंद मंडल, झरिया से संजीव सिंह, घाटशिला से लक्ष्मण टुड्डू, गुमला से शिवशंकर उरांव, सिमडेगा से विमला प्रधान, मनिका से हरिकृष्ण सिंह और छतरपुर से राधाकृष्ण किशोर शामिल हैं।

भाजपा ने उम्मीदवारों की पहली सूची जारी करने के साथ ही इन सिटिंग 10 उम्मीदवारों की जगह दूसरों के नाम की घोषणा कर दी, जिनमें दूसरे दल से आए 5 नेता भी शामिल हैं। जिसमें बहरागोड़ा से कुणाल षाड़ंगी (जेएमएम), भवनाथपुर से भानुप्रताप शाही (नौजवान संघर्ष मोर्चा के प्रमुख), पांकी से शशिभूषण मेहता (जेएमएम), मांडू से जेपी पटेल (जेएमएम) और बरही से मनोज यादव (कांग्रेस) का नाम शामिल है।

जिसमें दवा घोटाला और आय से अधिक संपत्ति मामले में भानुप्रताप शाही पर मामला चल रहा है वहीं शशिभूषण मेहता वर्ष 2012 के चर्चित सुचित्रा मिश्रा हत्याकांड के आरोपी हैं।

बताते चलें कि ऑक्सफोर्ड स्कूल की वार्डेन सुचित्रा की 11 मई 2012 को हत्या हुई थी। जांच के दौरान मोबाइल सर्विलांस और कॉल डिटेल्स के आधार पर ऑक्सफोर्ड स्कूल के डायरेक्टर शशिभूषण मेहता का नाम इस हत्याकांड में शामिल हुआ था।

जैसे ही शशिभूषण मेहता के बीजेपी में शामिल होने की सूचना मिली सुचित्रा मिश्रा के दोनों बेटे अभिषेक मिश्रा और आशुतोष मिश्रा ने अपनी मामी के साथ प्रदेश बीजेपी कार्यालय पहुंच कर जमकर हंगामा किए थे और मेहता के बीजेपी की सदस्यता लेने का विरोध किया था।

अनुशासनशील और भ्रष्टाचारमुक्त होने का डींग हांकने वाली भाजपा का आलम यह है कि क्षेत्र के विभिन्न थानों में लगभग तीन दर्जन मामलों के आरोपी बाघमारा से भाजपा विधायक ढूलु महतो को पार्टी ने अपनी पहली सूची में ही टिकट दे दिया। जबकि चुनाव घोषणा के बाद बोकारो से भाजपा विधायक बिरंची नारायन का एक अश्लील वीडियो के वायरल होने के बाद भी पार्टी ने अपनी तीसरी सूची में उन्हें टिकट दे दिया। जबकि कयास लगाया जा रहा था कि वायरल वीडियो के बाद पार्टी बिरंची को टिकट देकर खतरा नहीं मोल लेगी। शायद यही कारण था कि बोकारो के टिकट लिए कई दावेदारों का नाम उभर कर सामने आया था, जिसमें पूर्व आईएएस विमल कीर्ति सिंह और पूर्व आईपीएस और अपने कार्यकाल के विवादित डीजीपी डीके पांडेय मुख्य रूप से चर्चे में थे।

उल्लेखनीय है कि विधायक ढुल्लू महतो के नाम का कोयलांचल में इतना दबदबा है कि धनबाद कोयलांचल क्षेत्र में बिना इनकी मर्जी के कोयले एक टुकड़ा भी इधर से उधर नहीं होता है। कोयला उठाव का मामला हो या ओपेनकास्ट के तहत आउटसोर्सिंग का काम, बिना इनकी इजाजत के मजदूर भी काम नहीं करते हैं। जिन कंपनियों के लिये मजदूर काम करते हैं वे कंपनिया मजदूरों की मजदूरी का एक बड़ा हिस्सा विधायक को देते हैं।

जिससे तंग आकर बाघमारा विधानसभा के केके रेलवे साइडिंग में कोयले से पत्थर अलग करने वाले मजदूरों ने पिछले दिनों राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास से गुहार लगायी थी कि ढुल्लू महतो को इस बार टिकट नहीं दिया जाए। उनका आरोप था कि उन्हें कंपनी द्वारा 12 हजार रुपये मजदूरी मिलना चाहिए, मगर कंपनी तीन-चार हजार रूपये ही देती है बाकी पैसा विधायक के पास बतौर रंगदारी जाता है। आउटसोर्सिंग कंपनियां मजदूरों का पैसा काटकर विधायक को रंगदारी देती हैं।

बताते चलें कि ढुलू महतो व बिरंची नारायन का रघुवर दास से काफी गहरा रिश्ता है, यही वजह है कि इस तरह के मामलों के बाद भी उन्हें टिकट दे दिया गया।

सरयू राय की उपेक्षा के मामले में बीजेपी और झारखंड की राजनीति को नजदीक से देखने वाले लोगों का मानना है कि शायद सरयू राय का मौजूदा सरकार से पंगा लेना उनको भारी पड़ा है।

क्योंकि सरयू राय बतौर कैबिनेट मंत्री सरकार से नाराज चल रहे थे। फरवरी के बाद से ही वो कैबिनेट की बैठक में शामिल नहीं होने लगे थे। इसके अलावा सीएम के विभाग के साथ-साथ दूसरे विभागों की गड़बड़ियों को सरयू राय मीडिया के जरिए सार्वजनिक करते रहे थे।

तत्कालीन सीएस राजबाला वर्मा के कार्यकाल की कई गड़बड़ियों को सरयू राय ने उजागर किया था।

(वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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