Sunday, October 17, 2021

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सिर चढ़कर बोल रही हमारी मूर्खताओं का नतीजा हैं उत्तराखंड की तमाम तबाहियां

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नदियों की धार हमारे जीवन का आधार रही है। सारी दुनिया की सभ्यता का इतिहास नदी-घाटियों का इतिहास है। नदियों ने मनुष्यता को न केवल भौतिक, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक रूप से भी समृद्ध किया है। हर तरह के ज्ञान-विज्ञान, धर्म-आध्यात्म, साहित्य, संगीत, कला, संस्कृति का मूल स्रोत नदियां ही रही हैं। नदियां अर्थ-धर्म-काम-मोक्ष की धारणाओं और मंत्रों से लेकर यंत्रों तक की हमारी विकास-यात्रा की न केवल साक्षी, बल्कि सक्रिय भागीदार रही हैं। इनके उद्गम हिमनदों से लेकर समुद्र में इनके अवसान तक इनके इर्द-गिर्द ही जीवन अटखेलियां करता रहा है। देवदार, चीड़ और बांज के वनों से लेकर डेल्टाई दलदलों और विशालकाय मैंग्रोव वनों तक वनस्पतियों की असंख्य प्रजातियों और सूक्ष्मजीवों से लेकर जलचरों, उभयचरों और विशालकाय थलचरों तक अन्योन्याश्रित, समृद्ध, जटिल और विराट जीवनयोग्य पारिस्थितिकी-तंत्र का निर्माण नदियों ने ही किया है। दरअसल नदियों ने ही मनुष्य को मनुष्य बनाया है।

वही नदियां आज विक्षुब्ध हैं। वे बदली-बदली सी नजर आने लगी हैं। उनका व्यवहार अप्रत्याशित होने लगा है। जीवनदायिनी नदियां अकस्मात प्रलयंकारी बनने लगी हैं। उनके द्वारा लाई जाने वाली तबाही की घटनाएं न केवल प्रचंडता में, बल्कि संख्या में भी ज्यादा और बार-बार होने वाली परिघटनाएं हो गई हैं। दरअसल नदियों और पहाड़ों द्वारा सहस्राब्दियों में निर्मित और विकसित पारिस्थितिकी तंत्र कुछ ही दशकों, के भीतर इंसानी लोभ, स्वार्थ और विकास की एकांगी सोच की भेंट चढ़ चुका है।

7 फरवरी 2021 को उत्तराखंड के चमोली जिले की ऋषिगंगा घाटी में हुई तबाही इन नाजुक पहाड़ों में अंधाधुंध चलाई जा रही विकास परियोजनाओं के खिलाफ हिमालय की एक चेतावनी है। इस घटना में हिमखंड (ग्लेशियर) के टूटने से अचानक आई भीषण बाढ़ से प्रभावित 13.2 मेगावाट ऋषिगंगा परियोजना तो ध्वस्त हो ही गई, यहां तक कि एनटीपीसी की 480 मेगावाट तपोवन विष्णुगढ़ पनबिजली परियोजना भी काफी हद तक बरबाद हो गई। बड़ी संख्या में मजदूर सुरंग में जमा मलबे में फंसकर मर गए और सैकड़ों लोग सैलाब में बह गए, जिन्हें लापता बताया जा रहा है। कितने चरवाहे, उनके पालतू जानवर, माल-असबाब, घर, गांव इस सैलाब की चपेट में आए, उनके आंकड़े भी जुटाना मुश्किल है।

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान से निकलने वाली ऋषिगंगा के ऊपरी क्षेत्र में हिमखंड टूट कर भारी मात्रा में बर्फ, जमी हुई गाद और मिट्टी ने संभवतः नदी का रास्ता बंद करके एक कृत्रिम झील बना दिया और जब इकट्ठा हुए पानी के भारी दबाव में यह रास्ता खुला तो धौलगंगा और अलकनंदा घाटी में तबाही मच गई। दूसरा अनुमान यह है कि कोई कृत्रिम झील नहीं बनी, बल्कि यह सारी बर्फ, मिट्टी, गाद और कीचड़ नीचे गिरती गई और रास्ते में पड़ने वाली नदी की चट्टानों को समेटते हुए प्रबल वेग और ऊर्जा अर्जित करते हुए रास्ते में पड़ने वाली हर चीज को उखाड़ती और ध्वस्त करती गई। इसके रास्ते में पड़ने वाले पेंग गांव और रैणी गांव, जहां ऋषिगंगा पनबिजली परियोजना स्थित थी, वहां की सड़क तथा चार झूला पुल बाढ़ की चपेट में आकर बह गए और सात गांवों का संपर्क टूट गया। यह वही रैणी गांव है जहां 1974 में गौरा देवी ने ‘चिपको आंदोलन’ चलाकर पेड़ों को बचाया था।

हिमालय में किए जा रहे ज्यादातर विकास कार्यों के दौरान न तो चट्टानों के भुरभुरेपन की परवाह की जा रही है, न भूकंप के प्रति उनकी संवेदनशीलता का ध्यान रखा जा रहा है, न हिमनदों के व्यवहारों के अध्ययन से कोई सबक लिया जा रहा है, न तो जलवायु परिवर्तनों की समझ को मद्देनजर रखा जा रहा है और न ही इन सभी कारकों के संयुक्त प्रभावों की चिंता की जा रही है। इन इलाकों की पारिस्थितिकी के इतिहास, क्या मिल रहा है और उसकी क्या कीमत चुकानी पड़ रही है, मिट्टी के उपजाऊपन, खेती और चरागाहों की जमीन पर पड़ने वाले प्रभाव तथा विनष्ट हो रही जैव-विविधता के समुचित आकलन के बिना ही तथाकथित विकास की एक अंधी दौड़ जारी है। पहले किसी भी परियोजना का ‘पर्यावरण प्रभाव निर्धारण’ स्वतंत्र विशेषज्ञों से कराया जाता था, लेकिन अब इसे एक सरकारी एजेंसी करती है जो कई विभागों के लिए काम करती है। लेकिन लॉकडाउन के दौरान सरकार ने इन मानकों को बदल दिया और महामारी के नाम पर श्रम कानूनों को भी कमजोर कर दिया, जबकि इन परियोजनाओं में काम करने वाले ज्यादातर मजदूर असंगठित क्षेत्र के हैं और इस तबाही में बड़ी संख्या में वही लोग मारे भी गए हैं। सच्चाई तो यह है कि पर्यावरण मंत्रालय को पर्यावरण की बिल्कुल भी चिंता नहीं है और वह पूरी तरह से कॉरपोरेटों की वकालत कर रहा है।

हर कुछ दिनों बाद घट रही ये घटनाएं इन कमजोर पहाड़ों में तथाकथित विकास के अंधसमर्थकों को हिमालय की चेतावनियां हैं। अध्ययनों के मुताबिक जलवायु परिवर्तन की रफ्तार पहाड़ों में ज्यादा होती है और हिमालय में यह रफ्तार दुनिया भर के सभी पहाड़ों में सबसे तेज है। इस साल काफी कम बारिश और बर्फबारी हुई है। यहां इस साल जाड़े का मौसम पिछले छह दशकों में सर्वाधिक गर्म रहा है। इसी वजह से पहाड़ों में जाड़े के मौसम में जंगलों में आग लगने की घटनाएं इस साल ज्यादा हुई हैं। वातावरण के गर्म होते जाने और प्रदूषित होते जाने की वजह से ‘केमिकल वेदरिंग’ की परिस्थितियां गंभीर होती जा रही हैं। इसमें प्रदूषित वायु के रासायनिक तत्व वर्षा के पानी और हिम में घुलकर चट्टानों की दरारों में घुसकर उनके खनिजों से रासायनिक अभिक्रिया करने लगते हैं जिससे कठोर चट्टानें भी कमजोर और भुरभुरी होने लगती हैं और अंततः बहुत कम दबाव तथा झटके भी भूस्खलन का कारण बनने लगते हैं।

भूकंप, भूस्खलन, हिमस्खलन, मृदा-अपरदन, जंगल में आग और बाढ़ पहाड़ों की आम परिघटनाएं हैं। लेकिन इनमें से भूकंप को छोड़कर अन्य सबकी बढ़ोत्तरी के पीछे विकास के नाम पर पहाड़ों में किए जा रहे मानवीय हस्तक्षेप की बड़ी भूमिका है। सड़कों, बांधों, बैराजों और सुरंगों से पहाड़ों को खोद डाला जा रहा है और उनके सीने छलनी कर दिए जा रहे हैं। दुनिया में ऐसी तकनीकें भी उपलब्ध हैं जिनसे न्यूनतम ध्वंस के साथ इस काम को किया जा सकता है, लेकिन लागत ज्यादा होने की वजह से सस्ती और विध्वंसक तकनीकें इस्तेमाल की जा रही हैं। जहां एक तरफ नदियों के पेट को विकास के मलबे से पाट दिया जा रहा है जो कि नदियों के प्रवाह में बाधा डालकर उनकी उग्रता और प्रचंडता को बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी तरफ अन्य स्थानों पर मिट्टी, रेत और पत्थरों के निरंतर खनन के कारण नदियों की धार ज्यादा प्रबल हो रही है जिससे उनका स्वभाव बदला-बदला सा दिख रहा है।

जब हम नदियों को उनके स्वाभाविक प्रवाह में नहीं बहने देते और उन पर बड़े-बड़े बांध बनाकर उन्हें रोक देते हैं, जब हम जंगलों को उनके प्राकृतिक बाशिंदों, जीव-जंतु-वनस्पतियों के स्वाभाविक साहचर्य में खलल डालते रहते हैं, पहाड़ी चट्टानों की नज़ाकत का ख्याल किए बिना उनमें सड़कों का जाल बिछाने और पुरानी सड़कों को चौड़ा करने के लिए उनमें डायनामाइट के विस्फोट कराते रहते हैं और चट्टानों और मिट्टी को खोदते हुए इस मलबे को नीचे बह रही नदियों में फेंकते रहते हैं, तो इन पहाड़ों, जंगलों और नदियों का व्यवहार भी बदलने लगता है।

स्थानीय लोगों ने विष्णुगंगा परियोजना का भी विरोध किया था, इसके बावजूद स्थापित की गई। 2013 की बाढ़ में तबाह होने के बावजूद इस फिर से खड़ा किया गया। रैणी गांव के लोगों ने ऋषिगंगा परियोजना का भी विरोध किया था क्योंकि उन्हें इस नदी की बाढ़ का इतिहास मालूम था। वे लोग इसके खिलाफ उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय तक गए। 2013 में आई केदारनाथ आपदा के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र तथा राज्य सरकारों को उत्तराखंड में किसी भी पनबिजली परियोजना को पर्यावरण मंजूरी न देने का निर्देश दिया था। न्यायालय ने पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को यह भी निर्देश दिया था कि वह एक विशेषज्ञ निकाय का गठन करे जो इस बात का आकलन करे कि क्या उत्तराखंड में काम कर रही और निर्माणाधीन पनबिजली परियोजनाओं ने वहां के पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया है, और कितना नुकसान पहुंचाया है, और क्या केदारनाथ त्रासदी में इसकी भूमिका रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्देश अलकनंदा पनबिजली परियोजना की क्षमता को 200 मेगावाट से बढ़ाकर 330 मेगावाट करने और इसके लिए प्रस्तावित बांध की ऊंचाई बढ़ाने की याचिका की सुनवाई के दौरान दिया था।

इस निर्देश के आधार पर उत्तराखंड के ‘पीपुल्स साइंस इंस्टीच्यूट’ (जन विज्ञान संस्थान) के वैज्ञानिक और निदेशक रवि चोपड़ा की अध्यक्षता में गठित विशेषज्ञ निकाय ने अप्रैल 2014 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी और इस पूरे क्षेत्र को संवेदनशील बताया था और प्राकृतिक आपदाओं की आशंका व्यक्त किया था। इस समिति ने कहा था कि ‘पैराग्लेशियल ज़ोन’ में कोई भी परियोजना न लगाई जाए। ये वह इलाक़े हैं जहां पहले ग्लेशियर थे लेकिन अब अपने पीछे वे बड़ी मात्रा में मलबा, चट्टानें और विशालकाय शिलाखंडों को छोड़ते हुए ऊपर की ओर खिसक चुके हैं। जब भी बारिश या हिमपात होता है और बर्फ पिघलती है तो पानी, बर्फ और हिम का एक घातक मिश्रण तैयार होता है जो अपने रास्ते के इस ठोस मलबे और विशाल शिलाखंडों को नीचे लुढ़काने की ताकत हासिल कर लेता है और प्रबल वेग तथा बेहिसाब ऊर्जा के साथ भयानक तबाही का बायस बन जाता है। न्यायालय के निर्देशानुसार इस रिपोर्ट के बाद पर्यावरण, जल-संसाधन तथा ऊर्जा मंत्रालयों को भी आपसी विचार-विमर्श के बाद न्यायालय के समक्ष संयुक्त रूप से अपना रुख स्पष्ट करना था, जो अभी तक नहीं रखा गया है।

दो साल पहले प्रधानमंत्री कार्यालय में हुई बैठक में यह निर्णय लिया गया था कि उत्तराखंड में गंगा तथा उसकी सहायक नदियों पर किसी भी नई तथा ऐसी पनबिजली परियोजनाओं, जिनका निर्माण अभी आधे से कम हुआ है, पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया जाए तथा हर तरह के खनन और क्रशिंग (पत्थर तोड़कर गिट्टी बनाने) के काम को रोक दिया जाए। लेकिन उत्तराखंड सरकार ने इस निर्णय को ठंडे बस्ते में डाल दिया और मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा कि राज्य की ऊर्जा सुरक्षा तथा रोजगारों के लिए ये परियोजनाएं जरूरी हैं। उन्होंने लिखा कि 2012 में गोमुख और उत्तरकाशी के बीच के इलाके को ‘भागीरथी ईकोसेंसिटिव जोन’ घोषित कर देने तथा 2013 के सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के कारण कुल 4084 मेगावाट की क्षमता वाली 34 पनबिजली परियोजनाएं अधर में लटकी हुई हैं। रावत ने अगस्त 2020 में सर्वोच्च न्यायालय में दी गई बयानहल्फी में 2013 के उसके निर्देश को बदलने तथा पनबिजली परियोजनाओं को फिर से शुरू करने की मांग की।

उत्तराखंड में गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ को जोड़ने वाली 899 किलोमीटर लंबी ‘चारधाम परियोजना’ की सड़कों की चौड़ाई वर्तमान 5.5 मीटर से बढ़ाकर 10 मीटर करने के खिलाफ एक एनजीओ ‘सिटिजन्स फॉर ग्रीन दून’ के विरोध के मद्देनजर सर्वोच्च न्यायालय ने 16 सदस्यीय उच्चाधिकार समिति गठित किया। राजनीतिज्ञों, बाबुओं और ठेकेदारों की लॉबी समिति-गठन के निर्णय के खिलाफ थी। इस समिति ने 31 दिसंबर, 2020 की अपनी रिपोर्ट में बहुमत से परियोजना के पक्ष में निर्णय दिया, जबकि समिति के अध्यक्ष रवि चोपड़ा तथा दो अन्य लोगों ने राजमार्ग को और चौड़ा करने का विरोध किया और बताया कि इस प्रक्रिया में बड़ी संख्या में पेड़ों को काटे जाने तथा पहाड़ों को तोड़े जाने से इस नाजुक पहाड़ी क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र को अपूरणीय क्षति पहुंचेगी। सरकार ने परियोजना के पक्ष में बहुमत के फैसले का समर्थन किया।

7 फरवरी, 2021 को ऋषिगंगा क्षेत्र में आई बाढ़ और तबाही की घटना के बाद एक बार फिर रवि चोपड़ा ने ‘चारधाम परियोजना’ से इसका संबंध जोड़ते हुए समिति के अल्पमत की आपत्तियों को जायज ठहराया, जिस पर सरकार ने न्यायालय में उनकी आपत्तियों को दुर्भाग्यपूर्ण और बकवास बताते हुए खारिज कर दिया तथा यह कहते हुए इस परियोजना को जरूरी बताया कि इससे जरूरत पड़ने पर सेना तथा सैन्य सामग्री को चीन सीमा पर पहुंचाना आसान होगा। इस सरकारी रुख से उस लॉबी के प्रभाव और ताकत का पता चलता है जो प्रकृति और पर्यावरण के पक्ष में उठने वाली हर आवाज को दबा देने और नजरअंदाज कर देने पर आमादा है। रवि चोपड़ा समित की चेतावनी के साथ भी पिछले छह साल से यही हो रहा है। इस ‘चारधाम परियोजना’ में अब तक 700 हेक्टेयर जंगल के 47043 पेड़ काटे जा चुके हैं।

2013 में केदारनाथ की उतनी भीषण त्रासदी में जितनी बड़ी संख्या में मौतें हुई थीं और जितने बड़े पैमाने पर तबाही हुई थी, वैसा पहले कभी नहीं हुआ था। उस साल मानसून मौसम विभाग के अनुमान से कम से कम दो हफ्ते पहले आ गया था और उसके अनुमान से 300 से 400 प्रतिशत ज्यादा बारिश हुई थी, लेकिन हालत यह है कि आठ साल गुजर जाने के बाद भी अभी तक इस बात की कोई जांच तक नहीं हुई है कि उस मामले में मौसम विभाग के अनुमान इस कदर असफल क्यों हुए थे।

हमने विकास की जिस अवधारणा और रास्ते को चुना है वह ऊर्जा की बेहिसाब खपत पर टिका हुआ है। हमारे महानगर दिन दूनी और रात चौगुनी गति से क्षैतिज और ऊर्ध्व, सभी दिशाओं में बढ़ रहे हैं और उसी गति से उनकी ऊर्जा की भूख भी बढ़ती जा रही है। उत्तर भारत के अधिकांश महानगर इस हिमालयीय क्षेत्र से नजदीक हैं। पनबिजली ऊर्जा का सबसे सस्ता स्रोत है। इसलिए इस विकास की कीमत उत्तराखंड के इन इलाक़ों को चुकानी पड़ रही है। 

उत्तराखंड इस समय लगभग 98 पनबिजली परियोजनाओं से 4000 मेगावाट बिजली पैदा करता है। 2009 से इस राज्य में लगभग 350 अन्य बांधों के निर्माण के क़रारों पर दस्तखत हो चुके हैं। इन परियोजनाओं में से अधिकांश निजी क्षेत्र की हैं। हिमालय के ऊपरी इलाकों में ये परियोजनाएं नदियों के स्वाभाविक बहाव को रोककर, उनके रास्ते बदलकर उन्हें सुरंगों से गुजारकर उनसे टरबाइन चलाती हैं जिनसे बिजली पैदा होती है।

तमाम चेतावनियों और न्यायालय के हस्तक्षेप के बावजूद जिस तरह से सारी परियोजनाओं पर न केवल काम जारी है, बल्कि जल्दी से जल्दी इन्हें पूरा करने का एक उतावलापन दिख रहा है, उससे साफ पता चलता है कि एक काफी ताकतवर लॉबी है जो इसे जारी रखना चाहती है। हलांकि इन तबाहियों का खामियाजा उन्हें नहीं बल्कि हमेशा कुछ मासूम और बेगुनाह लोगों को भुगतना पड़ता है। इस बार भी जो मजदूर मारे गए हैं वे सभी तो केवल एक बेहतर जिंदगी की तलाश में यहां आए थे।

जो भी पार्टी यहां सत्ता में आती है, उसे अपने कार्यकर्ताओं, समर्थकों, चंदा देने वालों और निवेशकों को तुष्ट करने के लिए सड़क-निर्माण और खनन के ठेके-पट्टे देने के अलावा ज्यादा विकल्प भी नहीं मौजूद हैं। हमने जिस तरह के लोकतंत्र का रास्ता चुना है वह पार्टी आधारित है और पार्टियां अल्पकालिक और लोकलुभावन राजनीति ही करती हैं। पर्यावरण के विनाश पर आधारित विकास के इस रास्ते का विरोध कर रहे वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों पर विकास-विरोधी का लेबल चस्पा करके खलनायक बना देना राजनेताओं के लिए सबसे आसान काम है। टिहरी बांध बनाने तथा बाद में उसकी ऊंचाई बढ़ाने का विरोध कर रहे लोगों के प्रति शासन-प्रशासन के नजरिये को हम देख ही चुके हैं। किसी भी पार्टी के एजेंडे पर पर्यावरण, पारिस्थितिकी-तंत्र और जलवायु जैसे प्रकृति और समाज के दूरगामी हितों को प्रभावित करने वाले मुद्दे नहीं हैं, इसकी भी क़ीमत धरती के अन्य सभी इलाकों की तरह उत्तराखंड को भी चुकानी पड़ रही है।

उत्तराखंड के दुरूह स्थानों पर स्थित इन तीर्थस्थलों की यात्राएं किसी किसी समय मनुष्य की आस्था और जिजीविषा की कसौटी हुआ करती थीं। अपनी घर-गृहस्थी और कारोबारी दुनिया को त्याग कर इन यात्राओं का निर्णय लेना मोक्ष के रूप में जीवन के चतुर्थ पुरुषार्थ को हासिल करने के लिए की गई तपस्या का हिस्सा होता था। लोग इसके लिए दुष्कर और दुरूह पहाड़ी पगडंडियों पर महीनों पदयात्राएं किया करते थे। लेकिन जैसे-जैसे धर्म धंधा बनता गया, वैसे-वैसे जहां पैसे के बल पर सब कुछ सहज और सरल तरीके से हासिल कर लेने की प्रवृत्ति बढ़ती गई, वहीं इनको हासिल करा देने का कारोबार भी फलता-फूलता गया। देश और प्रदेश में सत्ता की बागडोर संभालने वाली वर्तमान पार्टी की राजनीति की बुनियाद ही आध्यात्म-विहीन धर्म की छिछली भावुकता-भरी अपील और धर्म के इस धंधे पर आधारित कॉरपोरेटपरस्त पूंजीवादी विकास के गठजोड़ पर टिकी हुई है। धर्म के प्रति नजरिये में आए इस बदलाव की क़ीमत भी उत्तराखंड को चुकानी पड़ रही है।

यों भी उत्तराखंड का अभिजात तबका, जो हर सरकार में किसी न किसी रूप में यहां के सत्ता प्रतिष्ठान का हिस्सा बना रहता है और जिसकी बात सुनी जाती है, उसकी बड़ी संख्या पहाड़ों को छोड़कर नीचे आ बसी है। हर समय फायदे और मुनाफे के गणित में उलझे इन स्वार्थी लोगों की पहाड़ों की प्राकृतिक समृद्धि में कोई दिलचस्पी नहीं है, न ही पहाड़ों के प्रति किसी भी तरह का भावनात्मक-रागात्मक लगाव है। ऐसे में केदारनाथ त्रासदी के बाद इतने कम समय के भीतर ऋषिगंगा की इस तबाही के परिदृश्य के बीच रैणी गांव के पास फिर से कोई गौरा देवी भी नहीं है। इसलिए जहां सत्ता के इर्द-गिर्द का शोरगुल नक्कारखाने से भी ज्यादा प्रचंड हो चुका है, वहीं आज रैणी की आवाज तूती से भी पतली साबित हो रही है। 

(शैलेश स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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