Saturday, October 16, 2021

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देशवासियों! लड़ते रहो, आज़ादी आप के हाथ में है: सुभाष चंद्र

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8 अगस्त 1942 को इंडियन नेशनल कांग्रेस ने, जिस भारत छोड़ो आंदोलन का आगाज़ किया था, उसका विचार सबसे पहले नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने 1938 की दिसम्बर में ही कांग्रेस के अन्य बड़े नेताओं को दे दिया था। 1939 आते आते, यह तय हो गया था कि यूरोप में धुरी राष्ट्रों और मित्र राष्ट्रों के बीच एक बड़ा युद्ध संभावित है। नेताजी सुभाष की इच्छा थी कि, इसी अवसर पर, स्वाधीनता का एक निर्णायक संग्राम छेड़ा जाय औऱ वह गलती न दुहराई जाय जो प्रथम विश्वयुद्ध के समय ब्रिटिश हुक़ूमत पर भरोसा कर के, की गयी थी। लेकिन, गांधी जी अंग्रेजों द्वारा इस संबंध में उठाये जाने वाले किसी निर्णायक कदम की प्रतीक्षा में थे। कांग्रेस एक अलग रणनीति पर चल रही थी। इसी बीच, डॉ पट्टाभि सीतारमैया वाला विवाद हो गया और सुभाष 1939 में कांग्रेस से अलग हो गए और उन्होंने फॉरवर्ड ब्लॉक नामक एक नयी पार्टी का गठन किया। 

‘ आमार एकटा काज कौरते पारबे ? ( क्या तुम मेरा एक काम कर सकते हो ?) 5 दिसंबर की दोपहर को सुभाष ने, जब अपने 20 वर्षीय भतीजे शिशिर के हाथ को अपने हाथ में लेकर, यह वाक्य कहा था, तब किसी को भी पता नहीं था, एक ऐसी महान घटना घटने जा रही है जो ब्रिटिश सरकार सहित सबको स्तब्ध कर देगी। यह घटना थी सुभाष द्वारा देश से बाहर निकल जाने की। उस रोमांचक एडवेंचर की घटना का विवरण फिर कभी। सुभाष देश छोड़ कर कलकत्ता से गोमो, दिल्ली, पेशावर होते हुए काबुल पहुंचे और फिर सोवियत सीमा में घुसकर वहां से जर्मनी। यह देश के स्वाधीनता संग्राम की वह घटना है जिस पर कम चर्चा होती है। ‘क्या तुम मेरा एक काम करोगे?’ यह पूछे जाने पर, बिना यह जाने हुए कि काम क्या है शिशिर ने हामी भर दी थी। शिशिर उस महान पलायन के गवाह बने। उन्होंने द ग्रेट इस्केप नाम से एक किताब भी लिखी है। 

बर्लिन जर्मनी में ही सुभाष बाबू ने यह भाषण 31 अगस्त 1942 को आजाद हिंद रेडियो (जर्मनी) पर  देश को संबोधित करते हुए दिया था। तब तक भारत छोड़ो आंदोलन पूरी तेजी से चल रहा था और देश के हर हिस्से में फैल गया था। 

■ 

देशवासी!  लड़ते रहो!  “मैं, सुभाष चंद्र बोस आजाद हिंद रेडियो पर आप को संबोधित कर रहा हूँ। 

कामरेड ! जब मैंने लगभग दो सप्ताह पहले, आपसे पिछली बार बात की थी, तब से, भारत में आंदोलन जोश के साथ लगातार जारी है, और शहरों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक जंगल की आग की तरह फैल रहा है। महीने भर तो, ब्रिटिश प्रचार तंत्र, यह धारणा बनाने की कोशिश करता रहा कि, यह अभियान अब कम हो रहा है और चीजें शांत हो रही हैं। लेकिन उनका यह  प्रयास पूरी तरह से विफल रहा है, क्योंकि, ब्रिटिश सरकार ने निहत्थे आंदोलनकारियों पर गोली चलाई, यह खबर बीबीसी और उसके एजेंटों ने या तो खुद दी, या, उन्हें यह खबर देने के लिए मजबूर किया गया है। मैं आपको आश्वस्त कर सकता हूं कि, महान 1942 के इस वर्ष मे, भारत अब दुनिया के बाकी हिस्सों से अलग नहीं रह सकता है, चाहे ब्रिटेन वहां की घटनाओं पर कितना भी पर्दा डालने की कोशिश करे।  सच तो यह है कि भारत के राष्ट्रीय संघर्ष के बारे में अब हर खबर, जो, भारतीय कस्बों और गांवों में चाहे वह, रामनाथ में घटे या वर्धा में, बिक्रमपुर में घटे या लखनऊ में, पुलिस फायरिंग के हर मामले की खबर, पूरी दुनिया में तुरंत प्रसारित हो जाती है। उन सभी देशों में  इनका प्रसारण, रेडियो पर प्रसारित और प्रेस में प्रकाशित किया जाता है जो मित्र देशों की शक्तियों के प्रति शत्रुतापूर्ण हैं, या तटस्थ हैं।  

साथियों, मैं अच्छी तरह जानता हूं कि पिछले सभी अभियानों मे, हमें बाहरी दुनिया को, भारत में होने वाली घटनाओं और ब्रिटिश साम्राज्यवादियों द्वारा किए गए अत्याचारों के बारे में बताने में कितनी कठिनाई हुई।  आज ऐसी समस्या नहीं है, और यह मेरा पसंदीदा उद्देश्य है कि बाहरी दुनिया को भारत में घटने वाली सभी घटनाओं के बारे में बराबर अवगत कराते रहा जाए और भारत को, उसके चुनौती की इस घड़ी में सभी की, सहानुभूति और सहायता की आवश्यकता है। यदि आज आप अपनी आँखों से देख सकते और अपने कानों से सुन सकते, जो आपके मित्र विदेशों में भारत के इस महान संघर्ष के बारे में प्रचार कर रहे हैं, तो आप महसूस कर सकेंगे कि भारत को ब्रिटिश साम्राज्यवाद के दुश्मनों से कितनी सहानुभूति मिल रही है, और, भारत के लिए यह सहानुभूति, उसके संघर्ष की गुरुता और तीव्रता को बढ़ाने के लिए पर्याप्त है, क्योंकि ब्रिटिश साम्राज्यवाद आतंक और क्रूरता पर निर्भर है। हम अपनी राष्ट्रीय स्वाधीनता के संघर्ष में जितना अधिक कष्ट सहेंगे और जितना अधिक त्याग करेंगे, विश्व की दृष्टि में भारत का सम्मान उतना ही ऊँचा होगा।

कामरेडों, मैं आप को आगे यह बताना चाहता हूं कि अब, जब हमने दुनिया भर में, जनमत की नैतिक सहानुभूति, अपने स्वाधीनता संग्राम के पक्ष मे प्राप्त कर ली है, तो हमारे लिए विदेशों से भी यह संभव है कि हमें अपनी दासता से मुक्ति के लिए, किसी भी तरह की मदद की आवश्यकता पड़े। इसलिए, इस लड़ाई में आतंकवाद और क्रूरता के सभी आधुनिक रूपों के खिलाफ, यदि आप किसी भी समय यह महसूस करते हैं और, यदि आप चाहते हैं कि, आपके मित्र विदेश में आपकी सहायता करें, तो आपको केवल इतना ही करना है। लेकिन, वे मित्र जो भारत को स्वतंत्र देखने के लिए उत्सुक हैं, जब तक आपको उनकी आवश्यकता नहीं है, तब तक वे आप को अपनी सहायता की पेशकश नहीं करेंगे, और हमारे राष्ट्रीय सम्मान और स्वार्थ के लिए, हमें तब तक, उनसे कोई सहायता भी नहीं मांगनी चाहिए, जब तक हम उसके बिना, अपनी लड़ाई जारी रख सकते हैं।

इस संबंध में, मैं आपसे एक बार फिर यह अपील करना चाहूंगा कि, आप, भारत की आज़ादी के लिए, आप के कंधे से कंधा मिला कर काम करने वाले विदेशों में बसे अपने देशवासियों पर पूरा भरोसा रखें। हम, आज भारत के राष्ट्रीय सम्मान के रखवाले हैं, स्वतंत्र भारत के ‘अनौपचारिक राजदूत’ हैं । भारत में भी, और विदेश में भी, हम हमेशा आज़ादी के लिए खड़े हैं, और हम कभी भी किसी विदेशी शक्ति द्वारा अपनी राष्ट्रीय संप्रभुता पर किसी भी प्रकार के महत्वपूर्ण अतिक्रमण की अनुमति नहीं देंगे। वैचारिक विचारों के बहकावे में न आएं। दूसरे देशों की आंतरिक राजनीति की चिंता मत करो, वह हमारी चिंता का विषय नहीं है। जब मैं कहता हूं कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद के दुश्मन हमारे दोस्त और सहयोगी हैं, तब मेरी बातों का यकीन करो। ब्रिटिश साम्राज्य को टूटते हुए देखना, उनके हित में है, और भारत अब एक बार फिर आज़ाद होगा। वे यह बात, अच्छी तरह जानते हैं कि, जब तक भारत अंग्रेजों के अधीन रहेगा, तब तक वे कोई जंग नहीं जीत सकते हैं, और न ही कहीं शांति हो सकती है। राजनीतिक दृष्टिकोण से, विदेशी शक्तियों से सहानुभूति रखने की उम्मीद करने वाला, मुझे आखिरी व्यक्ति होना चाहिए, अगर ऐसा करना उनके अपने हित में न हो तो।

कामरेडों, आपने देखा होगा कि पिछले कुछ महीनों के दौरान ब्रिटिश साम्राज्य अपने सबसे बुरे समय से कैसे गुजर रहा है। वे दिन गए, जब लंदन दुनिया का महानगर था। वे दिन गए, जब राजाओं और राजनेताओं को, अपनी समस्याओं को हल करने के लिए लंदन जाने पर, वहां भटकना पड़ता था। वे दिन गए, जब अमेरिकी राष्ट्रपति को ब्रिटिश प्रधानमंत्री से मिलने के लिए यूरोप आना पड़ता था । जैसा कि अंग्रेजी कवि, टेनीसन ने खुद कहा है, ‘पुरानी व्यवस्था नयी उपज के लिये, स्थान बदल देती है  , और भगवान खुद इसे, कई तरीकों से पूरा करते हैं।’ नतीजतन, ब्रिटिश प्रधानमंत्री को अब न्यूयॉर्क और वाशिंगटन भागना पड़ता है और ब्रिटेन में अमेरिकियों को ब्रिटिश कानूनों के अधिकार क्षेत्र से बाहर घोषित किया जाता है, और अमेरिकी सैन्य अधिकारियों ने तो, ब्रिटिश सेना की कमान में काम करने तक से इंकार कर दिया है। युद्ध के कई मोर्चे खुल गए हैं। इस प्रकार, ब्रिटेन और उसका साम्राज्य, रूजवेल्ट के ‘नए साम्राज्य’ का उपनिवेश बनने की ओर तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन भारत की, अब पुराने ब्रिटिश साम्राज्य में रहने की कोई इच्छा नहीं है, और इसलिए उसे अब नए और पुराने दोनों साम्राज्यवाद से लड़ना होगा। इस कायापलट का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि, ब्रिटिश साम्राज्य जो, साम्राज्यवाद का सबसे बड़ा नेतृत्व और भारतीय राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा विरोधी है, के प्रधानमंत्री, विंस्टन चर्चिल, जो खुद को, समाजवाद के सभी रूपों का स्वघोषित विरोधी कहते हैं को, अपमान का घूंट पी कर, मास्को में क्रेमलिन के दरवाजे पर आज खड़ा होना पड़ रहा है। 

क्या यह महत्वपूर्ण नहीं है कि, ब्रिटिश साम्राज्यवाद के इस प्रतिनिधि को इस हताशा से उबरने के लिये कुछ कदम उठाना चाहिए, लेकिन किसी भी परिस्थिति में वे भारत की स्वतंत्रता को मान्यता देने के बारे में नहीं सोचेंगे। भारत, ब्रिटिश साम्राज्य का गहना है, और इसे बनाए रखने का हर संभव प्रयास वे करेंगे। इस गहने के लिये, ब्रिटिश अंत तक हमसे लड़ेंगे। इसलिए, भारतीय लोगों को, और विशेष रूप से हमारे स्वाधीनता संग्राम के नेताओं को, यह भ्रम दूर कर लेना चाहिए कि ब्रिटेन भारत को आज़ाद करने की मांग को स्वीकार कर लेगा, और इस संघर्ष को तब तक जारी रखना चाहिए जब तक कि, अंतिम ब्रिटिश व्यक्ति को, भारत से निकाल बाहर नहीं कर दिया जाता। मैं जानता हूँ, हमारे इस अभियान के अंतिम दिनों में बहुत दुख, उत्पीड़न, हत्यायें, दमन और नरसंहार होंगे । लेकिन यह सब, आज़ादी की कीमत है और हमें इसे चुकाना होगा। यह स्वाभाविक है कि अपने अंतिम समय में घायल ब्रिटिश बाघ और संकट उत्पन्न करेगा, आक्रामक होगा, पर यह तो मरते हुए बाघ की फ़ितरत है, और हमें इससे बचे रहना है ।

कामरेडों, इस महत्वपूर्ण घड़ी में हमारी रणनीति, परिणाम की परवाह किए बिना, अपनी स्वतंत्रता के लिए लड़ाई जारी रखने की होनी चाहिए। ब्रिटिश साम्राज्य जल्द ही ढह जाएगा और युद्ध के सभी मोर्चों में पराजय के फलस्वरूप वह, टूट जाएगा और जब अंतिम विघटन होगा तो, शक्ति स्वतः ही भारतीय लोगों के हाथों में आ जाएगी। हमारी अंतिम जीत अकेले हमारे प्रयासों की बदौलत ही, होगी। हमारे लिये यह कम मायने नहीं रखता कि हम भारत में अस्थायी झटके झेलते हैं, विशेष रूप से तब, जब हमारा सामना मशीनगनों, बमों, टैंकों और हवाई जहाजों से होता है। हमारा काम है कि सभी बाधाओं और असफलताओं के बावजूद, मुक्ति की घड़ी आने तक राष्ट्रीय संघर्ष जारी रखना।

यह निराश होने का कोई कारण नहीं है कि, हमारे नेता जेल में हैं।  इसके विपरीत, जेल में उनके कष्ट, पूरे देश के लिए एक सतत प्रेरणा के रूप में काम करेंगे। मैं पिछले 20 वर्षों से, ऐसा ही, अभियान चलाने की पेशकश कर रहा हूं, तब भी जब सभी जेल में बंद कर दिए जाएं। इसके अलावा, जो अब जेलों में नहीं बंद किये जा सके हैं, उनका यह दायित्व है कि वे उस योजना पर कार्यवाही करें, जो उनके नेताओं ने जेल जाने के पहले उन्हें बतायी है। 

कामरेडों, मैं आप को पहले ही आश्वस्त कर चुका हूं कि मैं विदेश में, जो कुछ भी कर रहा हूं वह, अपने देशवासियों के एक बहुत बड़े हिस्से की इच्छा के अनुरूप ही है। मैं ऐसा कुछ भी नहीं करने जा रहा हूँ, जिसका सम्पूर्ण भारत, पूरे दिल से समर्थन नहीं करेगा । पिछले कुछ महीनों के दौरान, भारत सरकार के इंटेलिजेंस ब्यूरो और ब्रिटिश सीक्रेट सर्विस के तमाम प्रयासों के बावजूद, मैंने, एक से अधिक चैनलों के माध्यम से, जब से मैंने घर छोड़ा है, अपने घर और अपने देशवासियों के साथ घनिष्ठ संपर्क में हूँ। यदि आप मेरे निकट होने का सबूत चाहते हैं तो, भारत में मेरे देशवासियों के साथ संपर्क करें और आप में से बहुत से लोग अब तक यह जान गए हैं कि कैसे आप, जब चाहें मुझसे संवाद कर सकते हैं।  ऐसा करने के लिए, मैंने, आज़ाद हिंद रेडियो और खुद के बारे में भारत सरकार की कुछ खुफिया रिपोर्ट देखी है, और उन्हें देख कर मुझे हंसी ही आयी है। यदि, ब्रिटिश अधिकारियों को लगता है कि वे मेरे बारे में सब कुछ जानते हैं, तो मैं स्तब्ध हूं, लेकिन मैं एक न एक दिन उन्हें अपने जीवन की अंतिम लड़ाई लड़ने के लिये मजबूर कर दूंगा।  इस संबंध में यदि मैं ब्रिटिश सरकार को यह बता दूं कि उन्होंने, शत्रु देशों में जो हथकंडे अपनाये हैं, उनका हमारे लोगों ने सावधानीपूर्वक अध्ययन किया है, और वे हमारे पुराने दुश्मन, ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ हमारी लड़ाई में बेहद उपयोगी साबित होंगे। 

कामरेडों, वर्तमान समय में जितने भी देश, ब्रिटेन के दबदबे या कब्जे में हैं, वे या तो विद्रोह कर रहे हैं या विद्रोह की तैयारी कर रहे हैं। 

हम अपना संघर्ष जारी रखेंगे। हम न केवल अपनी आज़ादी पाने के लिये तेजी से प्रयास करेंगे, बल्कि ब्रिटेन द्वारा शोषित और प्रभुत्व वाले सभी देशों की आज़ादी के संघर्ष में भी साथ देंगे। दूसरी ओर, यदि भारतीय लोग इस आज़ादी की लड़ाई में, निष्क्रिय रहे, तो ‘ब्रिटेन के दुश्मन देश, अंग्रेजों को ही भारत से खदेड़ने की पहल करेंगे।  ब्रिटिश साम्राज्य अब हर मामले में बर्बाद हो गया है, और अब एकमात्र सवाल यह है कि जब इसका अंतिम विघटन होगा तो हमारा क्या होगा ? क्या हम अपनी स्वतंत्रता, अन्य शक्तियों के माध्यम से प्राप्त करेंगे या हम इसे अपने प्रयास से अर्जित करेंगे ?  मैं श्री जिन्ना, श्री सावरकर और उन सभी नेताओं से अनुरोध करूंगा जो अभी भी अंग्रेजों के साथ समझौता करने के बारे में सोचते हैं कि, वे एक बार यह महसूस करें कि, कल, दुनिया में कोई ब्रिटिश साम्राज्य नहीं होगा। वे सभी व्यक्ति, समूह या दल जो, अब भी, उन नेताओं के लिए लड़ाई में भाग लेते हैं जो, अभी भी अंग्रेजों के साथ समझौता करने के बारे में सोचते हैं, क्या, भारत में उनका सम्मानजनक स्थान होगा ?  इस संबंध में मैं, सभी दलों और समूहों से इस पर विचार करने और राष्ट्रवाद और साम्राज्यवाद – विरोध के संदर्भ में सोचने और आगे आने वाले और अभी चल रहे इस महान संघर्ष में शामिल होने की अपील करूंगा। मैं मुस्लिम लीग के प्रगतिशील तत्वों से भी यही, अपील करता हूं, जिनमें से कुछ के साथ मुझे 1940 में कलकत्ता नगर निगम के कार्यकाल के दौरान साथ साथ काम करने का सौभाग्य मिला है।

मैं भारत की राष्ट्रवादी मुस्लिम पार्टी, बहादुर, मजलिस-ए-अहरार से अपील करता हूं, जिसने किसी अन्य पार्टी द्वारा, ऐसा करने से पहले ब्रिटेन के युद्ध प्रयासों के खिलाफ सविनय अवज्ञा अभियान शुरू किया था। मैं जमीयत-उ-उलेमा, उलेमाओं के पुराने प्रतिनिधि संगठन या उस प्रतिष्ठित देशभक्त और नेता मुफ्ती खिफायत उल्लाह के नेतृत्व में भारत के मुस्लिम नेताओं से अपील करता हूं। मैं आजाद (स्वतंत्र) मुस्लिम लीग से अपील करता हूं, जो भारत के राष्ट्रवादी मुसलमानों का एक और महत्वपूर्ण संगठन है। मैं भारत की प्रमुख राष्ट्रवादी सिख पार्टी, अकाली दल से अपील करता हूं। और अंत में, मैं बंगाल की प्रजा पार्टी से अपील करता हूं, जिसको उस प्रांत का विश्वास प्राप्त है और जिसका नेतृत्व जाने-माने देशभक्त करते हैं। मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि अगर ये सभी संगठन इस संघर्ष में, एकजुट होकर, शामिल हो गए तो, भारत की आज़ादी का दिन निकट आ जाएगा।

भारत में इस समय स्वाधीनता संग्राम का जो, अभियान चल रहा है उसे एक अहिंसक छापामार युद्ध के रूप में वर्णित किया जा सकता है। इस गुरिल्ला युद्ध में, फैलाव की रणनीति को अपनाना होगा दूसरे शब्दों में, हमें अपनी गतिविधियों को पूरे देश में फैलाना चाहिए ताकि  ब्रिटिश पुलिस और सेना एक बिंदु पर अपने हमले को केंद्रित करने में सक्षम न हो सकें। गुरिल्ला युद्ध के सिद्धांतों के अनुसार, हमें भी जितना संभव हो उतना ही चलायमान रहना चाहिए और लगातार एक स्थान से दूसरे स्थान पर बदलते रहना चाहिए। ब्रिटिश अधिकारियों को कभी भी यह आभास नहीं होने देना चाहिए कि हमारा अगला कदम क्या होगा। दोस्तों, जैसा कि आप पहले से ही जानते हैं, मैं 1921 और 1940 के बीच हुए स्वाधीनता संग्राम के सभी अभियानों में भाग ले चुका हूं, और मैं उनकी विफलता के कारणों को जानता हूं। मुझे अब इस रणनीति के संबंध में विशेषज्ञों से समझने का अवसर मिला है, और अब मैं, गुरिल्ला युद्ध के तरीक़ों के बारे में, आपको कुछ सुझाव देने की स्थिति में हूं कि, कैसे इस वर्तमान अभियान को विजय में परिवर्तित किया जाय। यह दो चरणों मे होना चाहिए। पहला, भारत में युद्ध उत्पादन को नष्ट करना, और दूसरा, इस अहिंसक छापामार अभियान के माध्यम से, ब्रिटिश प्रशासन को पंगु बना देना। इन उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए समाज के प्रत्येक वर्ग को संघर्ष में भाग लेना चाहिए।  

● सबसे पहले, उन सभी टैक्सों का भुगतान करना बंद करें जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सरकार को राजस्व देते हैं। 

● दूसरे, सभी उद्योगों के श्रमिकों को या तो ‘स्टे-इन’ हड़ताल शुरू करनी चाहिए या कारखानों के अंदर ‘धीमी गति से’ अभियान चलाकर उत्पादन में बाधा डालने का प्रयास करना चाहिए। उन्हें उत्पादन में बाधा डालने के लिए नट और बोल्ट को हटाने जैसे तरीकों से तोड़फोड़ भी करनी चाहिए।  

● तीसरा, छात्रों को देश के विभिन्न हिस्सों में तोड़फोड़ करने के लिए गुप्त गुरिल्ला बैंड का आयोजन करना चाहिए। उन्हें ब्रिटिश अधिकारियों को परेशान करने के नए तरीके भी इजाद करने चाहिए, उदाहरण के लिए, डाकघरों में डाक टिकट जलाना आदि, ब्रिटिश स्मारकों को नष्ट करना आदि। 

● चौथा, महिलाओं और विशेष रूप से छात्राओं को सभी प्रकार के भूमिगत काम करना चाहिए, विशेष रूप से गोपनीय रूप से लड़ने वाले पुरुषों के लिए आश्रय प्रदान करने का काम।  

● पांचवां, अभियान में मदद करने के लिए तैयार सरकारी अधिकारियों को अपने पदों से इस्तीफा नहीं देना चाहिए, लेकिन उन्हें सरकारी कार्यालयों और युद्ध उद्योगों के संबंध में, उपलब्ध सभी जानकारी बाहर के स्वाधीनता संग्राम सेनानियों को देनी चाहिए, और अक्षमता से काम करके उत्पादन में बाधा डालने का प्रयास करना चाहिए।  

● छठा, जो नौकर अंग्रेजों के घरों में काम कर रहे हैं, उन्हें अपने मालिकों को परेशान करने के उद्देश्य से संगठित किया जाना चाहिए, उदाहरण के लिए उच्च वेतन की मांग, खाना बनाना और खराब भोजन और पेय परोसना आदि। 

● सातवां, भारतीयों को सब कुछ त्याग देना चाहिए  बैंकों, फर्मों, बीमा कंपनियों आदि के साथ व्यापार। 

● आठवां, बीबीसी की यूरोपीय सेवा में कर्नल ब्रिटन के प्रसारण को सुनें  और कर्नल की रणनीति को भारतीय स्थिति पर लागू करें।

आम जनता, को उसकी इस संघर्ष मे योगदान हेतु, मैं निम्नलिखित  सुझाव भी देता हूं: –

(1) ब्रिटिश सामानों का बहिष्कार, जिसमें ब्रिटिश स्टॉल और सरकारी स्टोर जलाना शामिल है।

(2) भारत में सभी अंग्रेजों का पूर्ण बहिष्कार, और उन भारतीयों का भी जो, ब्रिटिश समर्थक हैं।  

(3) सरकारी निषेध के बावजूद सार्वजनिक सभाओं और प्रदर्शनों का आयोजन।  

(4) गुप्त बुलेटिनों का प्रकाशन, और गुप्त रेडियो स्टेशन की स्थापना।

(5) ब्रिटिश सरकार के अधिकारियों के घरों तक मार्च करना और भारत से उनके निकल जाने की मांग करना।

(6) प्रशासन को बाधित करने की दृष्टि से सरकारी कार्यालयों, सचिवालय भवनों, विधि न्यायालयों आदि में प्रवेश करने और कब्जा करने के लिए जुलूसों का आयोजन।

(7) लोगों पर अत्याचार और उत्पीड़न करने वाले पुलिस अधिकारियों और जेल अधिकारियों को दंडित करने की व्यवस्था करना।

(8) उन गलियों में बैरिकेड्स लगाना शुरू करें जहां से हमले की संभावना हो

(9) उन गलियों में बैरिकेड्स लगाना शुरू करें जहां पुलिस और सेना के हमले की संभावना हो।

(10) युद्ध के उद्देश्य से काम कर रहे सरकारी कार्यालयों और कारखानों में आग लगाना।

(11) डाक, टेलीग्राफ और टेलीफोन संचार को जितनी बार संभव हो और विभिन्न स्थानों पर बाधित करना।

(12) जब भी सैनिकों या युद्ध सामग्री के परिवहन में बाधा उत्पन्न होने की संभावना हो, रेलवे, बस और ट्राम सेवाओं को बाधित करना।

(13) अलग-अलग जगहों पर पुलिस थानों, रेलवे स्टेशनों और जेलों को नष्ट करना।

कामरेडों, मैं आपको आश्वस्त कर सकता हूं कि जैसे ही इस कार्यक्रम को लागू किया जाएगा, प्रशासनिक तंत्र पंगु हो सकता है। इस संबंध में, मुझे आपको याद दिलाना चाहिए कि एक अहिंसक छापामार अभियान में किसान की भूमिका हमेशा निर्णायक होती है। मुझे यह देखकर खुशी हो रही है कि कई प्रांतों, विशेषकर, बिहार और मध्य प्रांतों में, किसान पहले से ही इस आंदोलन में, सबसे आगे हैं। मुझे पूरी उम्मीद है कि स्वामी सहजानंद सरस्वती और अन्य किसान नेता, जो ‘फॉरवर्ड ब्लॉक’ के साथ मिलकर महात्मा गांधी से पहले ही यह लड़ाई शुरू कर चुके हैं, अब इस अभियान को विजय के अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचाएंगे। मैं स्वामी सहजानंद और किसान आंदोलन के नेताओं से अपील करूंगा कि वे आगे आएं और लड़ाई के अंतिम चरण में अपनी अग्रणी भूमिका को पूरा करें। हम जनता के लिए स्वराज चाहते हैं, मजदूरों और किसानों के लिए स्वराज चाहते हैं, इसलिए यह मजदूरों और किसानों का कर्तव्य है कि, जब भारत का भविष्य बनाया जा रहा है, तब वे ऐसे समय में राष्ट्रीय सेना के हिरावल दस्ते के रूप में उभरें। यह प्रकृति का नियम है कि, जो स्वतंत्रता के लिए लड़ते हैं, और इसे जीतते हैं, वे सत्ता और जिम्मेदारी बनाए रखेंगे।  

मित्रों, यह बहुत उत्साहजनक है कि भारतीय रियासतों के लोगों ने इस अखिल भारतीय संघर्ष में भाग लेना शुरू कर दिया है। बड़ौदा, मैसूर और हैदराबाद से इस आशय की रिपोर्टें आ चुकी हैं, और मुझे विश्वास है कि वह दिन दूर नहीं जब सभी रियासतों के लोग ब्रिटिश भारत के लोगों के साथ खड़े होंगे और ब्रिटिश साम्राज्यवाद के संयुक्त मित्रों के खिलाफ एक साझा मोर्चा बनाएंगे। सबसे अधिक संतोष की बात यह है कि, देश-विदेश में हमारे सैनिकों के कानों और दिलों तक आज़ादी की आवाज़, पहुँच चुकी है।  इसमें कोई संदेह नहीं है कि, विशिष्ट ब्रिटिश साम्राज्यवादी दमनतंत्र  के साथ उनका कोर्ट मार्शल किया गया है।  लेकिन आग एक जगह से दूसरी जगह लगातार, फैल रही है। मिस्र में एक्सिस देशों की सेनाओं में शामिल होने के लिए बड़ी संख्या में सैनिक स्वेच्छा से भाग गए हैं और उनका खुले हाथों से स्वागत किया जा रहा है। यह अविश्वसनीय लगता है, पर यह सच भी है कि, सभी भारतीय लड़ाकू इकाइयों को अल अलामीन के मोर्चे से हटा लिया गया है। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद के कुछ समर्थकों को, भारतीय सेना को वश में करने के लिए भारत से लाया गया है। लेकिन उनके प्रयास अब तक विफल रहे हैं। मैं बाहरी दुनिया को, भारत की ताजा स्थिति के सभी तथ्यों से अवगत कराने में सक्षम होऊंगा, ताकि ब्रिटेन के दुश्मनों से भारत को अब जितनी मदद की आवश्यकता हो, उसे सुनिश्चित कर सकूं।

अंत में मैं यह बताना चाहूंगा कि यह अभियान हफ्तों तक चलाया जाना चाहिए और यदि आवश्यक हो तो महीनों के लिए यह लड़ाई चले। यदि यह अहिंसक छापामार युद्ध पर्याप्त रूप से लंबे समय तक जारी रहता है तो, स्वतंत्रता आ जाएगी, क्योंकि ब्रिटिश साम्राज्यवाद अंततः सभी मोर्चे पर लड़ने और उनके परिणामों के प्रभाव के कारण टूट जाएगा।  विभिन्न मोर्चों पर लगातार हार का सामना करना पड़ रहा है। यह मत भूलो कि ब्रिटिश साम्राज्य अब अपने आखिरी चरण में है।

इसी समय, हर दुख के लिए तैयार रहें, क्योंकि स्वतंत्रता और लोकतंत्र से प्रेरित और अटलांटिक चार्टर के लेखक, आने वाले दिनों में अपना सबसे बुरा काम कर सकते हैं। भोर से पहले सबसे अंधेरी घड़ी आती है। यह वही घड़ी है। बहादुर बनो और संघर्ष जारी रखो। आजादी, आप के हाथ में है। अपने नारे ‘अभी या कभी नहीं’ ‘जीत या मौत’, याद रखें।

 इंकलाब जिंदाबाद।

( यह भाषण शुभम शर्मा, जो आज़ाद हिंद फौज के कर्नल जीएस ढिल्लो, जिन पर लाल किले में अंग्रेजों ने मुकदमा चलाया था, के सम्बन्धी हैं, द्वारा अंग्रेजी में उपलब्ध कराया गया है। हिंदी अनुवाद मेरा है।)

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

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