सही होकर भी गलत क्यों हो जाते हैं राहुल गांधी ?

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राहुल गांधी मतलब भारतीय राजनीति में विपक्ष का एक चेहरा। इसे कमज़ोर विपक्ष का चेहरा भी कह सकते हैं। मगर, यह चेहरा ऐसा है जो किसी भी दिन सुर्खियों से दूर नहीं रहता। राहुल नहीं चाहते हैं तब भी बीजेपी उन्हें चर्चा के केंद्र में लेकर आ जाती है। राहुल गांधी विपक्ष के लिए सर्वमान्य भले नहीं हो पाए हों, लेकिन बीजेपी के लिए विपक्ष के तौर पर हमेशा से सर्वमान्य रहे हैं। यह एक बहुत अच्छी स्थिति है जब वे सत्ता को चुनौती दे सकते हैं। मगर, राहुल की कोशिश सफल क्यों नहीं हो पा रही है? क्यों सही होने के बावजूद अक्सर वही गलत करार दिए जाते हैं?

बात ताजा उदाहरण से शुरू करते हैं जब पुलवामा हमले के एक साल पूरे होने पर राहुल गांधी ने ट्वीट किया। ट्वीट में तीन सवाल उठाए गये-  1. हमले से सबसे ज्यादा फायदा किसको हुआ, 2. हमले की जांच का नतीजा क्या रहा, 3. बीजेपी सरकार में वह कौन है जो सुरक्षा में चूक के लिए जिम्मेदार है?

राजनीतिक विवाद में स्वाभाविक रूप से पहला प्रश्न आया क्योंकि इस प्रश्न का मकसद भी राजनीतिक रूप से बीजेपी को घेरना था। मगर, प्रश्न करने का तरीका उतना दमदार नहीं था कि बीजेपी जवाब दे तो मुश्किल, ना दे तो मुश्किल। बगैर जवाब दिए बीजेपी ने राहुल गांधी और कांग्रेस पर सवालों के बौछार कर दिए। ‘शहीदों का अपमान’ से लेकर ‘शहादत में भी फायदा देखना’, ‘फायदे से परे सोच नहीं पाती कांग्रेस’ वगैरह-वगैरह। जाहिर है राजनीतिक हमले में राहुल बीजेपी को घायल नहीं कर सके, उल्टे जवाबी हमले में वे और उनकी पार्टी घायल हैं।

अगर राहुल गांधी ने पुलवामा हमले से निपटने में सरकार की विफलता पर फोकस किया होता, पुलवामा के शहीदों के परिजनों को मुआवजा नहीं मिलने या उनके साथ वादाखिलाफी का सवाल उठाया होता तो आगे वे बड़ी स्पष्टता से यहां तक कह सकते थे कि बालाकोट एअरस्ट्राइक का भी सकारात्मक नतीजा देश को नहीं मिला। वे कह सकते थे कि बालाकोट के बावजूद पाकिस्तान के दुस्साहस में कमी नहीं आयी, सीज़ फायर की घटनाएं बढ़ीं, सैनिकों की शहादत की घटनाएं बढ़ती चली गयीं। 

राहुल गांधी ने जिन तीन सवालों को उठाया है उसे विस्तार से देश को बताने की भी जरूरत थी। ऐसा नहीं करने की वजह से ही बीजेपी को यह मौका मिला कि वह उन तीन सवालों के मनमाफिक मतलब निकाल कर देश के सामने परोस दें। मीडिया का बेहतर इस्तेमाल करने में बीजेपी तुलनात्मक रूप से अधिक सक्षम है इससे कौन इनकार कर सकता है। इसके विपरीत कांग्रेस में कोई ऐसा नेता नहीं है जो राहुल गांधी के बयानों को सही संदर्भ में समझा सके।

प्रश्न यह है कि राहुल गांधी के बयान ऐसे क्यों हों जिन्हें समझाने की जरूरत पड़े? राहुल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए जो डंडे मारने वाला बयान दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान दिया था, उस पर भी गौर करें। इसमें संदेह नहीं कि बयान का कंटेंट बहुत मजबूत था। देश में बढ़ती बेरोजगारी पर चिंता थी, असंतोष को बयां किया गया था। मगर, इस बयान के तरीके और इसकी भाषा ने पूरे बयान को अस्वीकार्य बना दिया। राहुल के बयान में तमीज और तहजीब का गायब होना घोर आश्चर्यजनक है और जनता इस पर आपत्ति करेगी। बीजेपी ने जनता की भावना के अनुरूप अपनी प्रतिक्रियाओं से राहुल पर आक्रामक जवाबी हमले किए। राहुल के शब्दों की याद दिलाना यहां जरूरी लगता है- 

“ये जो नरेंद्र मोदी भाषण दे रहा है, छह महीने बाद ये घर से बाहर नहीं निकल पाएगा। हिंदुस्तान के युवा इसको ऐसा डंडा मारेंगे। इसको समझा देंगे कि हिंदुस्तान के युवा को रोजगार दिए बिना देश आगे नहीं बढ़ सकता।” 5 फरवरी, 2020, दिल्ली की चुनावी रैली

राहुल गांधी के इस बयान के जवाब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद के भीतर सूर्य नमस्कार करने, अपनी पीठ मजबूत रखने और अपने पास 6 महीने का वक्त होने की बात कहते हुए व्यंग्यात्मक शैली में जवाब दिया। यहां भी राहुल गांधी के पास अवसर था जब वे अपने बयान का निहितार्थ समझा सकते थे। पास जाकर झप्पी लेने वाले राहुल के लिए यह सद्भावना दिखाना जरूरी था कि वे शारीरिक रूप से उन्हें सुरक्षित देखना चाहते हैं और उनके कहने का मतलब प्रतीकात्मक था।

अपनी भाषा के लिए भी वे कुछ न कुछ सफाई रख सकते थे। इसके बजाए राहुल ने क्या कहा?- “कभी-कभी ऐसा हो जाता है।” यह कौन सा जवाब है? इस जवाब से ऐसा लगता है मानो राहुल खुद कह रहे हों कि उनके बयान को गम्भीरता से लेने की जरूरत नहीं है। अब बात समझ में आ रही होगी कि क्यों राहुल सही होकर भी गलत हो जाते हैं।

(प्रेम कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल उन्हें विभिन्न चैनलों के पैनलों में देखा जा सकता है।)

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