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Categories: बीच बहस

याज्ञवल्क्य लंबे समय तक जिंदा नहीं रहते

नहीं लिखना चाहता था, परीक्षा के बीच अपना ध्यान नहीं भटकाना चाहता था, पर कठुआ से लेकर जेएनयू, जामिया और अब गार्गी कॉलेज में जो हुआ उससे विचलित हूं।

जिस कानून की पढ़ाई कर भारतीय न्याय व्यवस्था को सीखने समझने की कोशिश कर रहा हूं वही यदि बेबस, लाचार और वृहन्नला हो जाये तो लानत है ऐसी पढ़ाई और तर्कशीलता पर, अफसोस यह है कि सब चुप हैं – दो लोगों की लगाई आग में 138 करोड़ लोग, मातृशक्ति भस्म हो रही है – कमाल है और हम सब चुप है।

राजेन्द्र यादव ने “हंस” के औरत उत्तर कथा विशेषांक के सम्पादकीय में लिखा था कि हर परिवर्तन के झंडे का डंडा स्त्री की योनि में ही गाड़ा जाता है, उस समय वे सिख दंगों, बाबरी मस्जिद, भिवंडी और अन्य दंगों के बरक्स महिलाओं को दंगों में घसीटकर बलात्कार करने और प्रताड़ित करने की बात कर रहे थे।

आज कठुआ से लेकर जेएनयू, जामिया, शाहीन बाग और गार्गी कॉलेज में हुए सारे अनाचार राज्य प्रायोजित हैं और ये सब सोची समझी नीति के तहत है।

एक चुनाव जीतने के लिए संवैधानिक पदों पर बैठे लोग इस तरह की गुंडागर्दी पर उतर आएंगे कि न्याय, प्रशासन और पुलिस व्यवस्था को नपुंसक बनाकर हद से बाहर हो जायेंगे, असल में ये लिंग दिखाकर हस्त मैथुन करने वाले उसी संस्कृति से आते हैं जो प्यार के नाम पर वर्जनाएं थोपते हैं- वेलेंटाइन दिवस पर डंडे लेकर स्वयं न्यायाधीश बनते हैं और इस तरह से अपनी कुंठायें दबाकर नपुंसक मानसिकता का भौंड़ा प्रदर्शन करते हैं।

यह इस देश का दुर्भाग्य भी है कि 65 वर्षों की आजादी के बाद प्रचंड बहुमत से आई संस्कृति रक्षक सरकार ने जो हर मोर्चे पर परिणाम दिए हैं वे भयावह हैं पर सबसे खतरनाक असर महिलाओं पर पड़ा है।

इस सबमें जस्टिस लोया की मौत, गोधरा के आरोपियों को समाज सेवा के लिए छोड़ना, हरेन पंड्या की मौत को दबा जाना, गुजरात फाइल्स का गायब होना, माया कोडवानी, प्रज्ञा ठाकुर का छूटना, भोपाल से सांसद बनना और फिर अमर्यादित भाषणों की श्रृंखला और तमाम बाबाओं से लेकर चिन्मयानंद तक का सफर और करतूतें, 370 का विलोप और कश्मीर में तानाशाही, तीन तलाक, राम मंदिर का फ़ैसला, उप्र में लगातार महिलाओं के खिलाफ हिंसा बलात्कार, देश भर में बच्चों का कुपोषण से मरना, आर्थिक कंगाली और बेरोजगार युवाओं की जमात जो अपना भविष्य भूलकर संगठित हो रहे हैं धरना, रैली और गुंडागर्दी के लिए- एक सीरीज के दृश्य या एपिसोड्स है मानो।

ठीक इसके विपरीत स्मृति ईरानी से लेकर बाकी महिला सांसदों की चुप्पी और मार्ग दर्शक मंडल में बैठे असली जनसंघी जो ख़ौफ़ में कांपते हैं – का मौन भी दुखद है।

यह समय यह भी दिखाता है कि व्यवस्था ने समाज को हिन्दू-मुस्लिम किया पर लोग संगठित हुए, मोदी शाह के कारण ही आज देश की आबादी बगैर हिन्दू-मुस्लिम किये सड़कों पर है, खास करके मुस्लिमों के लिए यह एक पुनर्जागरण काल है जिसमें वे ना सिर्फ देश के नाम पर अपनी अस्मिता टटोल रहे हैं बल्कि महिलाएं मुल्लाओं और अपढ़ मौलवियों के जाल से निकलकर, अपनी बंदिशों एवं धर्म भीरू हिंसक पतियों और हिजाब से निकलकर सामने आई है- इसके लिए मैं राजा राम मोहन राय के आंदोलन को याद करता हूं- मुझे यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि इतिहास और समाज को मोदी शाह का उपकार मानना चाहिए कि इनकी इस सोच और कूटनीति के कारण आज देश की महिलाओं ने अपने हक़ों और अस्मिता को पहचाना है।

यकीन करिये ये लिंग हिलाते-हिलवाते युवा-अधेड़ों नपुंसकों और नामर्दों को इस देश की गार्गियां ही बाहर निकालकर फेंकेंगी, याज्ञवल्क्य बहुत साल जिंदा नहीं रहते, एक दिन चुनाव में लोग ईवीएम मशीनें फेंकेंगे, एक दिन लोग खड़े होकर राष्ट्रपति भवन में सवाल पूछेंगे, एक दिन सुप्रीम कोर्ट को जवाब देना होगा कि जब लोकतंत्र की हत्या हो रही थी तो न्यायाधीश गण क्या कर रहे थे, वे रिटायर्ड न्यायाधीश पेंशन और भत्ते पाकर ही जिंदा थे जो सुप्रीम कोर्ट से बाहर आकर बगावत कर बैठे थे, वकीलों को उनकी औलादें पूछेंगी कि जब न्याय नहीं हो रहा था तो आपकी डिग्री किसके घर दूध दे रही थी, एक दिन सुधीर, रोहित, रजत, अर्नब को जनता सड़क पर दौड़ा दौड़ाकर मार डालेगी और सारे पत्रकारिता संस्थानों पर कब्जा कर वहां आग लगा दी जाएगी।

इस समय में चुप रहना घातक ही नहीं बल्कि अपने घर आतताइयों को आमन्त्रित करना है और हमारे हिंदी के साहित्यकार- हवाई यात्राओं के टिकिट्स की बाट जोह रहे हैं- आपको लगता है कि जनता इन्हें बख़्श देगी।

(लेखक संदीप नाईक सामाजिक कार्यकर्ता है और आजकल भोपाल में रहते हैं।)

This post was last modified on February 11, 2020 1:20 pm

Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi

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