पश्चिम बंगाल की नई भाजपा सरकार ने सोमवार को राज्य विधानसभा में पिछड़े वर्गों (ओबीसी) के आरक्षण के बारे में दो विधेयक पारित करा लिये। सदन में प्रचंड बहुमत होने के कारण उसे इन दोनों विधेयकों को पारित कराने में कोई समस्या नहीं आई। चुनाव नतीजे के कुछ ही दिन बाद विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी-तृणमूल कांग्रेस विभाजित हो गई और ऋतोब्रत बनर्जी की अगुवाई में पार्टी के ज्यादातर विधायकों ने अलग गुट बना लिया।
नतीजतन उसी गुट को विधानसभा में सबसे बडे दल की मान्यता भी मिल गई। इस तरह भाजपा की शुभेन्दु अधिकारी सरकार के सामने अब सदन में मुख्य विपक्षी खेमा भी उसका समर्थक मिल गया है। ममता की आधिकारिक पार्टी में कम विधायक रह गये हैं। सोमवार को सरकार द्वारा पेश विधयेकों के विरोध में 294 सदस्यीय विधानसभा में कुल 17 ही वोट पड़े, पक्ष में 186 वोट पड़े और दोनों विधेयक आसानी से पारित हो गये।
मजे की बात है कि इस बार के चुनाव में बंगाल के ओबीसी समुदाय में भाजपा को तृणमूल के बजाय ज्यादा समर्थन मिला। लेकिन सरकार में आते ही शुभेंदु अधिकारी सरकार ने पहली गाज गिराई ओबीसी हितों पर!
कल से ही बंगाल में भाजपा और सरकार के समर्थक दोनों विधेयकों को सही ठहराने के लिए दो तरह की दलील दे रहे हैं। जो भाजपा समर्थक राजनीतिक लोग हैं, उनका कहना है कि आरक्षण में जो कटौती की गई है, उससे ‘हिन्दू ओबीसी’ नहीं, सिर्फ मुस्लिम प्रभावित होगा, जिसे पूर्व की ममता बनर्जी सरकार ने असंवैधानिक ढंग से आरक्षण दे रखा था। लेकिन प्रशासकीय स्तर पर दलील दी जा रही है कि सरकार ने जो कुछ किया है, उसके पीछे माननीय कलकत्ता हाईकोर्ट का मई, 2024 का फैसला ही मुख्य कारण है।
आइए देखतें हैं, किस तरह ये दोनों ही दलीलें गलत और गैरवाजिब हैं।
पहली दलील हिंदू-मुस्लिम वाली है, जिसमें तनिक भी सच नहीं है। भारत में पिछड़ों का आरक्षण मंडल आयोग की सिफारिश की रोशनी में माननीय सुप्रीम कोर्ट के फैसले के तहत मिलता है। मंडल सिफारिशों को कोर्ट में चुनौती दी गई थी। दो साल की कानूनी प्रक्रिया के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मंडल आयोग की सिफारिश के तहत (क्रीमी-लेयर को छोड़कर) सभी पिछड़ों को आरक्षण देने का फैसला सुनाया।
विभिन्न प्रदेशों में पिछड़ों की सूची में हिन्दू-मुस्लिम हर समुदाय के लोग शामिल किये गये। इसलिए फैसला सब पर लागू हुआ। लेकिन बंगाल सहित कई प्रदेशों में ऐसा नहीं हो सका। बंगाल की तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार ने शुरुआती दौर में अजीबोगरीब दावा किया कि दावा किया कि उनके यहां जाति-आधारित समाज नहीं है, इसलिए यहां पिछड़ों को आरक्षण देने की जरूरत नहीं है। लेकिन बाद के दिनों में मोर्चा सरकार को सद्बुद्धि आई और पिछड़ों को 27 फीसदी की जगह 7 फीसदी आरक्षण देने का प्रावधान किया गया।
कुछ समय बाद यह 10 फीसदी हुआ।बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकार के दौर में इसे 17फीसदी कर दिया गया। इसमें हिन्दू और मुस्लिम ओबीसी दोनों शामिल थे। इस तरह बंगाल में एससी को 22 फीसदी, एसटी को 6 फीसदी, ओबीसी को 17 फीसदी (10 फीसदी-ओबीसी-ए श्रेणी, 7 फीसदी ओबीसी-बी श्रेणी) आरक्षण दिया जाने लगा। बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकार के बाद जब सत्ता में ममता बनर्जी आईं तो विकलांगता से प्रभावित लोगों के लिए 3 फीसदी के साथ आरक्षण का यही फार्मूला जारी रहा। सन् 2014 की एक सरकारी अधिसूचना के अनुसार राज्य में कुल 48 फीसदी आरक्षण था।
राज्य में भाजपा की पहली सरकार ने अब आरक्षण के प्रावधान में बड़ा बदलाव किया है और पिछडों (ओबीसी) के लिए अब यह 17 फीसदी की जगह सिर्फ 7 फीसदी रहेगा। इसका मतलब कि सबाल्टर्न समूहों के लिए अब तक जो आरक्षण 8 फीसदी निर्धारित था, नये बदलाव के बाद वह महज 38 फीसदी तक सिमट जायेगा। इस तरह बंगाल की हिन्दुत्व-ब्रांड सरकार ने बंगाल को उन प्रदेशों में शामिल करा लिया, जहां दलित-ओबीसी-एसटी को मिलाकर सबसे कम आरक्षण दिया जा रहा है।
एससी-एसटी का कोटा बरकरार रखा गया है लेकिन ओबीसी का कोटा 17 फीसदी से 7 फीसदी हो गया है। सरकारी तौर पर कहा जा रहा है कि कलकत्ता हाईकोर्ट के 2024 के फैसले के कारण सरकार को ऐसा करना पड़ा है। लेकिन यह दलील बेमतलब है। अगर कोर्ट का फैसला इस कदर बाध्यकारी था तो ममता बनर्जी की सरकार में पिछडों का आरक्षण 17 फीसदी कैसे बना रहा? दूसरी बात कि भाजपा सरकार ने तो दलितों-पिछड़ों के नाम पर भी वोट मांगा था फिर सरकार बनने के बाद उसने उसने ममता सरकार के दौर के 17 फीसदी ओबीसी आरक्षण को 27 फीसदी करने की बजाय 7 फीसदी क्यों कर दिया?
सरकर चाहती तो सदन में नया कानून बनाकर आरक्षण का दायरा घटाने की जगह और बढ़ा सकती थी। लेकिन उसने ओबीसी की दो श्रेणियों को खत्म करके एक श्रेणी बना दी है और इसमें आरक्षण पाने के लिए कुल 66 जातियों को शुमार किया। मुस्लिम पसमांदा श्रेणी की बहुत कम जातियों को इस प्रावधान का फायदा मिलेगा। लिस्ट से 77 मुस्लिम जातियों को बाहर किया गया है। हिंदू ओबीसी जातियों के लिए भी मुश्किलें बढ़ जायेंगी क्योंकि सीमित आरक्षण (कहां 17 फीसदी और अब कहां 7 फीसदी) के कारण अपेक्षाकृत कम लोगों को ही इसका फायदा मिलेगा।
सरकार चाहती तो देश भर में हो रही जातिवार जनगणना का हवाला देकर वह मौजूदा आरक्षण फार्मूले को जारी रख सकती थी और कोर्ट में अपना मंतव्य रखते हुए जनगणना के बाद ठोस नीतिगत फैसला करने का संकल्प रख सकती थी। लेकिन उसने ऐसा कुछ भी नहीं किया। जैसे ही मौका मिला, उसने बहुमत के बल पर डेढ़ दशक से जारी ओबीसी के आरक्षण फार्मूले पर कैंची चला दी। दिलचस्प बात है कि बंगाल की कोई भी प्रमुख राजनीतिक पार्टी जाति-जनगणना के पक्ष में नहीं रही है।
इंडिया गठबंधन में होने के बावजूद स्वयं ममता बनर्जी ने भी जाति-जनगणना का कभी समर्थन नहीं किया। भाजपा ने बाद में दबाव के चलते जाति-जनगणना का पक्ष लिया और उसकी सरकार ने फैसला भी किया। पर बंगाल की भाजपा आज भी जाति-जनगणना की पक्षधर नहीं है। बंगाल के वामपंथी भी जाति-जनगणना के पक्षधर (जबकि तमिलनाडु और केरल वाले हैं) नहीं रहे हैं।
एक गैर-सरकारी आकलन के मुताबिक बंगाल में 50 फीसदी से ज्यादा ओबीसी हैं। इसमें हिंदू ओबीसी और मुस्लिम ओबीसी दोनों को शुमार किया गया है। लेकिन इतनी बड़ी आबादी के लिए भाजपा की ‘हिदुत्ववादी सरकार’ ने महज 7 फीसदी आरक्षण का प्रावधान किया है। यह ईडब्ल्यूएस से भी 3 फीसदी कम है। कैसी विडम्बना है। पर बंगाल संभवतः अभी ‘हिंदुत्व की जीत के जश्न’ में है। नफरत, कट्टरता और सांप्रदायिकता के बवंडर में न्याय की चेतना मानो भस्म हो गई है! लोग जब जागेंगे तो अपने पूर्वजों की मूर्खता और अज्ञानता पर जरूर अफसोस करेंगे!
(उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार हैं। इनका यूट्यूब चैनल UrmileshOfficial भी है।)