कार्यक्रम कहानी पाठ का था। सुनने वाले जो वहां मौजूद थे, कहना मुश्किल है कि उन्हें वहां तक खींच लाने में किसका आकर्षण निर्णायक साबित हुआ। कहानियां अगर मंटो और उदय प्रकाश की थीं तो पाठ कर रहे थे – इरफान। जी हां, जाने-माने ब्रॉडकास्ट जर्नलिस्ट, इंटरव्यूअर और वॉयस प्रफेशनल – सैयद मोहम्मद इरफान। ऐसे में यह कैसे तय किया जाए कि कौन इन कथाकारों और कहानियों के मोह में वहां आया और किसे इरफान के कहन के अंदाज की दीवानगी खींच लाई।
बहरहाल, मुद्दे की बात यह है कि पाठ शुरू हुआ तो श्रोता सब कुछ भूल कहानी में डूब गए। पहली कहानी थी उदय प्रकाश की ‘तिरिछ’, उसके बाद पढ़ी गई सआदत हसन मंटो की ‘मम्मद भाई’। ज्यादा समय नहीं हुआ है इस अनोखी पहल को। प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया की ओर से कहानी पाठ की यह कार्यक्रम श्रंखला पिछले पखवाड़े शुरू की गई। हर दूसरे शनिवार को नई दिल्ली स्थित प्रेस क्लब की पहली मंजिल पर हॉल में यह कार्यक्रम होता है।
इस शनिवार (18 जुलाई) की बात करें तो कहानी पाठ समाप्त होने के बाद श्रोताओं की ओर से कई प्रश्न पूछे गए, लेकिन जिसे प्रतिनिधि प्रश्न माना जा सके, वह एक युवा श्रोता ने पूछा था। दिलचस्प है कि कार्यक्रम कहानी पाठ का था, लेकिन उस युवक ने उदय प्रकाश की ही एक कविता की पंक्तियां उद्धृत कीं,
‘मरने के बाद आदमी कुछ नहीं बोलता
मरने के बाद आदमी कुछ नहीं सोचता
कुछ नहीं बोलने और कुछ नहीं सोचने पर
आदमी मर जाता है।’
इसके बाद उस युवक ने इरफान से सवाल किया कि आज हालात ऐसे हैं कि आप कुछ नहीं बोलें और कुछ नहीं सोचें तो मर जाएंगे, लेकिन अगर आप कुछ सोचते और बोलते हैं तो आपको मार दिया जाएगा। ऐसे में, आप हमें बताएं कि मरा हुआ कौन है, वह जो कुछ नहीं बोलता और सोचता या वह जिसे बोलने और सोचने की वजह से मार दिया जाता है?
इरफान ने इसका उत्तर तो दिया, लेकिन वह उनका उत्तर था। कार्यक्रम में शामिल हर शख्स इस सवाल से जूझता प्रतीत हो रहा था, बल्कि कार्यक्रम से बाहर भी हर जिम्मेदार और संवेदनशील व्यक्ति इस सवाल से जूझता नजर आ रहा है। प्रेस क्लब से दो-ढाई किलोमीटर दूर जंतर मंतर पर इकट्ठा हुए लोग भी इसी सवाल से टकरा रहे हैं।
सोनम वांगचुक को भले दिल्ली पुलिस ने उठाकर हॉस्पिटल में भर्ती कर दिया हो, लोग वहां अब भी जमे हैं, अनशन भी चल ही रहा है। यह अनशन भी सोचने, बोलने और अपना सोचना तथा बोलना दर्ज करने की ही एक प्रक्रिया है। सरकार ने इस प्रखरण में अभी चाहे किसी को न मारा हो, पेपर लीक के चलते मरने वाले छात्रों की मौत पर बर्फ जैसी ठंडी उसकी चुप्पी भी कम शोर नहीं कर रही।
यह चुप्पी कह रही है कि आपने अगर सोचने और बोलने का फैसला किया तो अपनी जिम्मेदारी पर ही करें। आपकी मौत के लिए कोई और जिम्मेदार नहीं होगा, यह सरकार तो कतई नहीं। ऐसे में एक ठोस जवाब लेकर आती हैं एक और कवि भवानी प्रसाद मिश्र की ये पंक्तियां –
‘साधारणतया मौन अच्छा है
किन्तु मनन के लिए
जब शोर हो चारों ओर सत्य के हनन के लिए
तब तुम्हें अपनी बात ज्वलंत शब्दों में कहनी चाहिए
सिर कटाना पड़े या न पड़े
तैयारी तो उसकी रहनी चाहिए।’
(रेखाचित्र प्रतीकात्मक। एआई की मदद से)
(प्रणव प्रियदर्शी ‘जनसत्ता’, ‘लोकमत समाचार’ और ‘नवभारत टाइम्स’ में लंबी पत्रकारीय पारी के बाद फ़िलहाल स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।)