सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आज सुप्रीम कोर्ट में बताया कि ग्रेटर नोएडा के उस एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को सस्पेंड कर दिया गया है, जिन्होंने ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के विरोध प्रदर्शन के लिए कथित तौर पर कैंपेन चलाने को लेकर एक छात्र को कारण बताओ नोटिस जारी किया था और 5 लाख रुपये का पर्सनल बॉन्ड भरने को कहा था।
कानूनी अधिकारी ने यह बयान गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी के छात्र अक्षत त्रिपाठी द्वारा दायर एक रिट याचिका के जवाब में दिया। छात्र ने बीएनएनएस की धारा 130 के तहत एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट द्वारा जारी नोटिस को चुनौती दी थी।
वरिष्ठ वकील पीवी दिनेश ने जुलाई में हुए छात्र विरोध प्रदर्शनों से जुड़े दूसरे मामलों की सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली बेंच के सामने यह याचिका पेश की। उन्होंने बेंच से याचिका पर विचार करने का आग्रह करते हुए कहा, “अधिकारियों तक एक कड़ा संदेश जाना चाहिए।” दिनेश ने इस बात पर ज़ोर दिया कि नोटिस में कहा गया था कि वह छात्रों के बीच “सरकार-विरोधी गुमराह करने वाली बातें” कर रहे थे और उनसे एक बॉन्ड भरने को कहा गया था।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि जब कल उनके सामने यह मामला लाया गया था, तो उन्होंने इसे गंभीरता से लिया था और राज्य से जवाब मांगा था।
इसके बाद एसजी तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि अधिकारी को सस्पेंड कर दिया गया है। त्रिपाठी की याचिका ‘एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड’ सुभाष चंद्रन केआर के ज़रिए दायर की गई थी।
याचिका के अनुसार, नोटिस में बीएनएसएस की धारा 126 का हवाला दिया गया था। यह धारा एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को शांति बनाए रखने के लिए सिक्योरिटी (ज़मानत) मांगने की इजाज़त देती है, जब ऐसी जानकारी हो कि कोई व्यक्ति शांति भंग कर सकता है या सार्वजनिक व्यवस्था में खलल डाल सकता है। इसमें धारा 135 का भी ज़िक्र था, जो ऐसी जानकारी की सच्चाई की जांच का प्रावधान करती है। नोटिस में छह महीने के लिए ₹5 लाख का पर्सनल बॉन्ड और उतनी ही राशि की दो ज़मानतें मांगी गई थीं।
यह नोटिस ‘इको फर्स्ट’ पुलिस स्टेशन के एक सब-इंस्पेक्टर की रिपोर्ट पर आधारित था। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया था कि त्रिपाठी छात्रों के बीच सरकार-विरोधी और गुमराह करने वाली बातें फैला रहे थे और उन्हें प्रस्तावित सीजेपी धरने में शामिल होने के लिए उकसा रहे थे। रिपोर्ट में दावा किया गया था कि इससे काफी तनाव पैदा हो गया था और छात्र आपस में लड़-झगड़ सकते थे, जिससे शांति और कानून-व्यवस्था भंग हो सकती थी।
त्रिपाठी की याचिका में कहा गया है कि नोटिस में कोई खास तारीख, समय, बयान, कोई प्रत्यक्ष हरकत या हिंसा की कोई ऐसी घटना नहीं बताई गई जिसके लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया जा सके। इसमें यह भी कहा गया है कि आरोपों का समर्थन करने वाला कोई भी सबूत उन्हें नहीं दिया गया।
याचिका में एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया को भी चुनौती दी गई है। 4 सितंबर के नोटिस में त्रिपाठी के पेश होने के लिए 5 सितंबर की तारीख तय की गई थी। याचिका में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि उन्हें वकील रखने, आरोपों को समझने और ₹5 लाख की ज़मानत (सिक्योरिटीज) की ज़रूरी व्यवस्था करने के लिए मुश्किल से एक दिन का समय दिया गया था।
याचिका में तर्क दिया गया है कि यह कार्यवाही सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट के 1 सितंबर के आदेश के खिलाफ है, जिसमें छात्र विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी एफआईआर को रद्द कर दिया गया था और छात्रों के खिलाफ ज़बरदस्ती की कार्रवाई पर रोक लगा दी गई थी। आगे यह भी कहा गया है कि त्रिपाठी पर लगाया गया आरोप – यानी साथी छात्रों को प्रस्तावित धरने में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करना – अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत बोलने और अभिव्यक्ति की आज़ादी और अनुच्छेद 19(1)(b) के तहत शांतिपूर्ण ढंग से इकट्ठा होने के अधिकार के दायरे में आता है।
त्रिपाठी ने यह भी तर्क दिया है कि उनसे ₹5 लाख का पर्सनल बॉन्ड और उतनी ही रकम की दो ज़मानतें देने के लिए कहना अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का गंभीर उल्लंघन है। याचिका में कहा गया है कि नोटिस का जवाब देने और ज़मानत की व्यवस्था करने के लिए उन्हें दिया गया एक दिन का समय प्राकृतिक न्याय के खिलाफ था और इसने प्रक्रिया को अनुचित और तर्कहीन बना दिया।
(जनचौक ब्यूरो)