पटना। कॉमरेड नीति रंजन नहीं रहे। उनका दाह संस्कार गुरुवार की शाम पटना को बांस घाट पर किया गया। इस अवसर पर उनकी बेटियों ने उन्हें कंधा दिया। घर से घाट तक पहुंची। नीति रंजन ने पहले से कह रखा था कि ‘मेरा शरीर इलेक्ट्रिक क्रिमेटोरियम में ले जाकर बिना किसी रीति-रिवाज के, बिना मुखाग्नि के अग्नि को सौंप दिया जाए।’
शवदाह गृह में पिता को शब्द-शब्द प्यार करती बेटियां
उनका अंतिम संस्कार करने के लिए विद्युत शवदाह गृह की पटरी पर रखा गया। अब उन्हें आग के हवाले कर दिया जाना था और पंचतत्व में मिल जाना था। ठीक उसी समय बांस घाट का विद्युत शवदाह गृह गीतकार शैलेन्द्र और साहिर लुधयानवी के गीतों से गूंज उठा। उनकी बेटियों की आंखों से झर-झर आंसू गिर रहे थे। कभी हिम्मत नहीं हारने की सीख देने वाले पिता को अंतिम सलाम करने का समय था। बेटियों ने बिलखने के बजाय गीत गाए।
शैलेन्द्र और साहिर के ये गीत उनके पिता नीति रंजन को बहुत पसंद थे। सभी बहनों ने सुर में सुर मिलाए- ‘तू जिंदा है तो जिंदगी की जीत में यकीन कर, अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला जमीन पर….सुबह और शाम के रंगे हुए गगन को चूमकर, तू सुन जमीन गा रही है कब से झूम- झूमकर……ये गम के और चार दिन, सितम के और चार दिन, ये दिन भी जाएंगे गुज़र, गुज़र गए हज़ार दिन, कभी तो होगी इस चमन पर भी बहार की नज़र!अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!…. तू ज़िन्दा है….।’
साहिर के गीत
कुछ ही देर में साहिर लुधयानवी को बेटियों ने गाया- ‘वो सुबह कभी तो आएगी, इन काली सदियों के सर से जब रात का आंचल ढलकेगा, जब दुख के बादल पिघलेंगे जब सुख का सागर झलकेगा, जब अंबर झू के नाचेगा जब धरती नगमे गाएगी।’
लय टूटा नहीं, साथ रहा
पिता नीति रंजन निस्तेज पड़े थे। लेकिन बेटियों की बुलंद आवाज सुन पा रहे होंगे तो साथ में गा रहे होंगे। बेटियों के सुर उनके सुर से मिल रहे होंगे। इसी उम्मीद के साथ उन्हें अंतिम विदाई दी गई कि उन्होंने जीवन का जो लय समझाया है वह हमेशा साथ रहेगा, साथ रहेंगे शब्द और विचार की ताकत। विलाप के गीत की जगह उम्मीद और उल्लास के गीत बेटियां गाती रहीं।
पिता ने बेटियों को हिम्मतबाज बनाया
जिस विद्युत शवदाह गृह तक बेटियां आम तौर पर नहीं जाती हैं नीति रंजन की बेटियां लोहे के उस दरवाजे के पास खड़ी थीं जिसके अंदर की आग की तपिश बाहर महसूस की जा रही थी। दरवाजा खुला और पटरी पर पड़े पिता की ट्रॉली आगे बढ़ गई। गीत जारी रहे, देर तक ! बेटियां निवेदिता झा, मोना झा, सोनल झा और रूपा झा ने पिता को ऐसे विदा किया। बेटियों की ओर से पिता को दी गई ऐसी विदाई ने बताया कि पिता ने हमें हिम्मतबाज बनाया है। बेटियों के साथ ही कई गणमान्य लोगों की उपस्थिति बांस घाट पर रही।
कई संस्थाओं के निर्माण में बड़ी भूमिका निभाई, जेल गए
92 वर्ष की उम्र में नीति रंजन का निधन हुआ। उन्होंने कॉपरेटिव में रजिस्ट्रार के पद पर नौकरी की। नाट्य संस्था इप्टा के वाइस प्रेसीडेंट रहे। सिटिजन फोरम, एकता मंच जैसी संस्थाओं के निर्माण में बड़ी भूमिका निभाई। कॉपरेटिव मूवमेंट से जुड़े होने की वजह से जेल भी जाना पड़ा था। सीपीआई से उनका गहरा जुड़ाव था। बेटियों में निवेदिता पत्रकार और एक्टिविस्ट हैं, मोना रंगमच आर्टिस्ट हैं, सोनल फिल्म अभिनेत्री हैं और रुपा झा बीबीसी में बड़े पद पर हैं। पुत्र प्रिरंजन यूएन की एजेंसी से जुड़ी हैं। दूसरे पुत्र आशीष रंजन आईआईटियन हैं, अमेरिका में रहे, अभी अररिया में सोशल वर्क से जुड़े हैं।
शैलेन्द्र का गीत पढ़ सकते हैं-
तू ज़िन्दा है तो ज़िन्दगी की जीत में यकीन कर,
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!
सुबह औ’ शाम के रंगे हुए गगन को चूमकर,
तू सुन ज़मीन गा रही है कब से झूम-झूमकर,
तू आ मेरा सिंगार कर, तू आ मुझे हसीन कर!
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!…. तू ज़िन्दा है
ये ग़म के और चार दिन, सितम के और चार दिन,
ये दिन भी जाएंगे गुज़र, गुज़र गए हज़ार दिन,
कभी तो होगी इस चमन पर भी बहार की नज़र!
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!…. तू ज़िन्दा है
हमारे कारवां का मंज़िलों को इन्तज़ार है,
यह आंधियों, ये बिजलियों की, पीठ पर सवार है,
जिधर पड़ेंगे ये क़दम बनेगी एक नई डगर
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!…. तू ज़िन्दा है
हज़ार भेष धर के आई मौत तेरे द्वार पर
मगर तुझे न छल सकी चली गई वो हार कर
नई सुबह के संग सदा तुझे मिली नई उमर
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!…. तू ज़िन्दा है
ज़मीं के पेट में पली अगन, पले हैं ज़लज़ले,
टिके न टिक सकेंगे भूख रोग के स्वराज ये,
मुसीबतों के सर कुचल, बढ़ेंगे एक साथ हम,
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!…. तू ज़िन्दा है
बुरी है आग पेट की, बुरे हैं दिल के दाग़ ये,
न दब सकेंगे, एक दिन बनेंगे इन्क़लाब ये,
गिरेंगे जुल्म के महल, बनेंगे फिर नवीन घर!
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!…. तू ज़िन्दा है
(फेसबुक से साभार।)