“शिक्षा सबसे शक्तिशाली शस्त्र है, जिसके माध्यम से दुनिया को बदला जा सकता है।” – नेल्सन मंडेला
“शिक्षा मुक्ति की कार्रवाई है।” – पाउलो फ्रेयरे
देश में करीब 92,439 सरकारी स्कूल बंद कर दिए गए हैं, जिनमें सबसे अधिक संख्या मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की है
-सरकारी रिपोर्ट
(आज देश के लोकतंत्र को मरणासन्न अवस्था में पहुंचाया जा रहा है, क्योंकि इसकी जीवन रेखा ‘वोट तंत्र’ को विभिन्न हथकंडों से अवरुद्ध किया जा रहा है। इसका सबसे घिनौना सबूत है ‘वोट चोरी’। वोट चोरी या चुनाव चोरी तब ही संभव है, जब नागरिकों को विवेचनात्मक शिक्षा से वंचित रखा जाता है। आम जनता के लिए अच्छी पाठ्यपुस्तकें और पुस्तकालय दुर्लभ वस्तु बनते जा रहे हैं। आज हमारा समाज ऐसे ही दौर से गुजर रहा है।
साक्षात् सत्य को भी असत्य में तब्दील करने की कुचेष्टाएं की जा रही हैं। ऐसी कुचेष्टाओं से बचने के लिए जरूरी है कि बस्ती-बस्ती, मोहल्ला-मोहल्ला पुस्तकालय संस्कृति विकसित की जाए और अच्छी पाठ्यपुस्तकों की मांग की जाए। चरम उपभोक्तावादी पूंजीवादी समाजों में यह संस्कृति जीवंतता के साथ फल-फूल रही है, विशेष रूप से बच्चों की पुस्तकों पर केंद्रित। पुस्तकालयों में बच्चों के लिए खास व्यवस्थाएं की जाती हैं, क्योंकि उन्हें विवेकशील और चिंतनशील नागरिक बनाना है। प्रस्तुत है एक ताजा अनुभव:)
पुस्तकालय के बहाने चर्चा को मैं निजी सुखद अनुभव से शुरू करता हूं। विश्व विख्यात हार्वर्ड विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में मेरी दो पुस्तकें-The Bonsai of My Time और The Islands of Deprivation-मौजूद हैं। यह जानकारी मुझे सुखद लगी। खुशी का कारण यह है कि मेरे कुछ प्रकाशक मित्रों का ताजा तर्क है कि मोदी-युग में पुस्तकालयों और प्रदेश सरकारों की थोक खरीद में प्रगतिशील व वामपंथी लेखकों-पत्रकारों की पुस्तकों पर अघोषित-अनौपचारिक पाबंदी है। यह सच्चाई हो सकती है या रॉयल्टी से बचने का बहाना भी। वास्तविकता क्या है, यह उनकी व्यावसायिक अंतरात्मा ही जानती है।
इस पृष्ठभूमि में, यह खबर आनंद और उपलब्धि का अहसास कराती है। किसी भी ‘जैविक काया’ की यह स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। ‘गैर-जैविक काया’ सुख-दुख की अनुभूति से मुक्त रहती है और स्थितप्रज्ञ अवस्था में होती है। भारत के प्रधानमंत्री स्वयं को गैर-जैविक मानते हैं और ईश्वरीय मिशन पर होने का दावा करते हैं। हाल के लोकसभा चुनावों में उन्होंने स्वयं को इसी मिथकीय अवतार के रूप में जनता के सामने प्रस्तुत किया। इस तरह 21वीं सदी का अवतार संस्करण उदित हुआ।
किस्सा यूं है कि एक दिन मेरी बड़ी पुत्री डॉ. मनस्विता जोशी ने विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में मेरी दोनों पुस्तकों की मौजूदगी की सूचना दी। यह जानकारी उन्हें उनकी सहयोगी से मिली। दोनों विश्वविद्यालय के डेटा सेंटर में कार्यरत हैं। उनकी यहूदी सहयोगी ने आत्मकथा को केंद्रीय पुस्तकालय से इश्यू करवाया, जबकि दूसरी पुस्तक, जो जनजाति समाज से संबंधित थी, विशेषीकृत मानवशास्त्र पुस्तकालय से प्राप्त की।
भारतीय मूल के एक मलयाली पुस्तकालयकर्मी ने यह पुस्तक उपलब्ध कराई। वर्षों पहले विश्वविद्यालय ने इन पुस्तकों की खरीद की थी। खरीद की कसौटी भी सख्त है। इन पुस्तकों की मौजूदगी से यह स्पष्ट है कि उन्नत पूंजीवादी देशों के पुस्तकालयों की पैनी नजर पिछड़े देशों की कृतियों पर भी रहती है। भारत सहित विभिन्न देशों की भाषाओं की पुस्तकों को खरीदा जाता है, ताकि उनके समाजों की आंतरिक और बाह्य हलचलों का पता चलता रहे। इसके साथ ही, खुले समाज अन्य समाजों से ज्ञान प्राप्ति के लिए अपने दरवाजे खुले रखते हैं।
याद आया, विश्व प्रसिद्ध पुस्तक Asian Drama के लेखक डॉ. गुन्नार मिर्डल ने कहा था कि मध्य युग में पश्चिमी साम्राज्यवादी चार हथियारों से लैस थे: जहाज, बाइबिल, तलवार और मानवशास्त्र। मूलतः किसी भी विश्वविद्यालय की भूमिका केवल डिग्रियां बांटना नहीं, बल्कि ज्ञान का सृजन करना है। इस दृष्टि से हार्वर्ड विश्वविद्यालय पीछे क्यों रहे! वैसे, इन दिनों यह विश्वविद्यालय ट्रम्प सत्ता-प्रतिष्ठान के प्रतिरोध का केंद्र बना हुआ है। निश्चित ही, इसके पुस्तकालय में अन्य भारतीय लेखकों-चिंतकों की सैकड़ों पुस्तकें होंगी। पुस्तकालय की विशाल अलमारियों में मेरी दोनों पुस्तकों का प्रवेश सामान्य घटना है, पर मेरे लिए अकल्पनीय है। इससे यह स्पष्ट है कि ज्ञान के दरवाजे बंद नहीं किए जाने चाहिए।
पांचवें दशक में अमेरिका में मैकार्थीवाद के तहत मार्क्सवादी, समाजवादी और प्रतिरोधवादी पुस्तकों के अध्ययन पर पाबंदी थी। कई प्रतिष्ठित वामपंथी लेखकों, अभिनेताओं, कलाकारों आदि को गिरफ्तार किया गया था। इस ज्ञान-विरोधी हरकत से नुकसान होने लगा। समीक्षा हुई और अंततः इसका अंत हुआ। सीनेटर मैकार्थी का भी पतन हो गया।
एक स्वस्थ पूंजीवादी लोकतंत्र की विशेषता यह है कि वह अपनी कमियों से सीखता है और अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए नए औजारों का निर्माण करता रहता है। इस लिहाज से पूंजीवादी लोकतांत्रिक सत्ताएं साम्यवादी सत्ताओं के मुकाबले सफल रही हैं। याद होगा, पश्चिमी पूंजीवादी देशों में माओ की रेड बुक खूब बिकी, जबकि भारत में इस पर रोक थी। अमेरिका और यूरोप में सलमान रुश्दी का विवादास्पद उपन्यास The Satanic Verses धड़ल्ले से बिक रहा है, जबकि भारत में इसके दर्शन दुर्लभ हैं।
अब भारत में पाठ्यपुस्तकों से प्रतिरोध साहित्य को योजनाबद्ध ढंग से हटाया जा रहा है। इतिहास के पुनर्लेखन के बहाने इतिहास का ध्रुवीकरण हो रहा है। अंग्रेजों से टक्कर लेने वाले टीपू सुल्तान को भी पाठ्यपुस्तकों से हटाए जाने की खबरें हैं। मध्यकालीन मुस्लिम शासकों को हाशिए पर डाल दिया गया है। तर्क दिया जा रहा है कि कांग्रेस काल में वामपंथी इतिहासकारों ने बहुसंख्यक शासकों के साथ न्याय नहीं किया, इसलिए इतिहास का पुनर्लेखन अपरिहार्य है। शायद यही कारण है कि रोमिला थापर, इरफान हबीब, डी.डी. कोसंबी, रामशरण शर्मा, डी.एन. झा जैसे विश्व प्रसिद्ध इतिहासकारों का हाशियाकरण हो रहा है।
पिछले दिनों उत्तर प्रदेश में एक दुखद घटना घटी। एक अध्यापक, डॉ. रजनीश गंगवार ने अपने विद्यार्थियों को एक कविता सुनाई थी:
“तुम कांवड़ लेकर मत जाना, तुम ज्ञान के दीप जलाना, मानवता की सेवा करके, तुम सच्चे मानव बन जाना।”
इस मासूम-सी कविता को लेकर शिक्षक के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो गई। कविता में भगत सिंह बनने, पाखंड से दूर रहने और पूंजीवादी व धार्मिक प्रपंचों से सावधान रहने का संदेश था। लेकिन वर्तमान सत्ताधीशों को यह सामान्य कविता भी खतरनाक लगती है। कुछ कांवड़ियों के हुड़दंग और तोड़फोड़ के वीडियो भी प्रसारित हुए हैं, जिनके खिलाफ केस दर्ज हुए हैं। फिर शिक्षक से नाराजगी क्यों?
कारण एक ही है: कविता विद्यार्थियों को कांवड़ियों से दूर रहने और सच्चा मानव बनने का संदेश देती है। वर्तमान दौर में कांवड़िए सामाजिक-सांस्कृतिक ध्रुवीकरण के ध्वजवाहक बन गए हैं। राजसत्ता का आधार स्तंभ अंध धार्मिकता है। इस दृष्टि से शिक्षक ने ‘अपराध’ किया है। वास्तव में, संघ+भाजपा का सत्ता-प्रतिष्ठान भारतीयों में ‘विवेचनात्मक चेतना’ के अंकुरण के खिलाफ है। वह जनता के इर्द-गिर्द मिथकों का बैरिकेड खड़ा करना चाहता है। इसलिए इतिहास और पाठ्यक्रम का पुनर्लेखन-संशोधन अनिवार्य हो गया है।
इसी बैरिकेड का शिकार सरकारी स्कूल हो रहे हैं। हजारों स्कूल बंद किए गए हैं। बंद करने का कारण या बहाना है कि पर्याप्त संख्या में विद्यार्थी नहीं हैं। लेकिन, क्या सरकार ने इस अभाव के तात्कालिक कारणों की पड़ताल की? कुछ वीडियो वायरल हुए हैं, जिनमें दलित अभिभावकों की शिकायत है कि स्कूलों में उनके बच्चों के साथ भेदभाव होता है। उन्हें जातिसूचक शब्दों का शिकार होना पड़ता है। बच्चे निरुत्साहित होकर स्कूल आना बंद कर देते हैं।
विडंबना यह है कि शहरों-कस्बों में तथाकथित पब्लिक स्कूलों या निजी स्कूलों की संख्या बढ़ रही है। तर्क दिया जाता है कि सरकारी स्कूलों का स्तर गिर गया है, शिक्षकों का अभाव है, और शिक्षक समय पर स्कूल नहीं आते। इन कारणों की जिम्मेदारी किसकी है-सरकार की या अभिभावकों की?
एक समय था जब डॉ. अनिल सदगोपाल जैसे प्रतिबद्ध शिक्षाशास्त्रियों ने ‘कॉमन स्कूल पद्धति’ के लिए आंदोलन चलाया था। एजेंडा था कि हायर सेकेंडरी स्तर तक सभी वर्गों के विद्यार्थियों के लिए समान पाठ्यक्रम और निःशुल्क शिक्षा हो। निजी स्कूलों को अनावश्यक तरजीह न दी जाए। अमेरिका, कनाडा जैसे चरम पूंजीवादी देशों में समान स्कूल प्रणाली के माध्यम से शिक्षा दी जाती है। सभी वर्गों के विद्यार्थियों के लिए भेदभाव-मुक्त समान पाठ्यक्रम है। मैं निजी अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि मेरी तीन नातिनें अमेरिका और कनाडा में इसी पद्धति से शिक्षा ग्रहण कर रही हैं।
कनाडा में शिशुओं के लिए ‘डे केयर’ के खर्च में भी सरकार वित्तीय सहायता देती है। मेरी नातिनों के अभिभावक अच्छे पदों पर हैं, लेकिन मैंने देखा है कि उनके घरों में सफाई और अन्य कार्यों के लिए आने वाले अस्थायी कर्मियों के बच्चे भी उसी स्कूल में पढ़ते हैं और उसी स्कूल बस में जाते हैं। इन स्कूलों में पुस्तकालयों की व्यवस्था देखने लायक है।
सार्वजनिक पुस्तकालयों में छह माह के शिशु को भी सदस्यता दी जाती है। बच्चों के लिए पुस्तकालय अद्भुत हैं। कनाडा के अल्बर्टा प्रांत की राजधानी एडमॉन्टन के केंद्रीय पुस्तकालय में बच्चों के लिए विशेष आकर्षक व्यवस्था देखने को मिली। अमेरिका में भी यही स्थिति है। आश्चर्यजनक रूप से, चौथी और पांचवीं कक्षा के बच्चे भारी-भरकम पुस्तकों के अभ्यस्त हैं। ग्रीष्म अवकाश में पुस्तक पठन और मनचाहा लेखन कार्य दिए जाते हैं।
लेकिन भारत में सरकारी स्कूलों के शिक्षकों से सुनने को मिलता है कि उनके पुस्तकालयों में नीरस और अप्रासंगिक पुस्तकें लाद दी जाती हैं। विद्यार्थी इनसे जल्दी ऊब जाते हैं और पुस्तकें सड़ती रहती हैं। पूंजीवादी देशों में बुकशॉप से पुस्तक खरीद कम नहीं हुई। कोविड काल में भी यही स्थिति थी। बोस्टन में देखा कि खरीदने वालों की भीड़ रहती है। बिल अदा करने वाले कतारबद्ध रहते हैं। न्यूयॉर्क, वाशिंगटन और अन्य शहरों में भी यही दृश्य देखने को मिले।
पूंजीवादी देशों में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया क्रांति को दशक बीत चुके हैं, फिर भी ‘बुक क्रेज’ बरकरार है। सार्वजनिक स्थानों पर हर आयु के पाठक पुस्तकें पढ़ते दिखते हैं-लिफ्ट, एस्केलेटर पर भी। क्या भारत, खासकर हिंदी पट्टी में, ऐसे नजारे दिखते हैं? मध्यवर्ग मंदिर-मस्जिद में सिजदा करता दिखता है। जुमे की नमाज में खुदा के बंदों का हुजूम होता है। कांवड़ यात्रा और कुम्भ में ईश्वरभक्त कतारबद्ध डुबकी लगाते मिलते हैं।
अब स्कूलों और कॉलेजों के शिक्षकों का वेतन पहले जैसा लज्जाजनक नहीं रहा। लेकिन शिक्षक अपने वेतन का कितना हिस्सा पुस्तकों पर खर्च करते हैं? ड्राइंगरूम में कीमती सोफासेट सजे मिलते हैं, लेकिन क्या उसी अनुपात में पुस्तकें होती हैं? औसत हिंदी मीडियाकर्मी की स्थिति भी कहां बेहतर है? पहले गांव-कस्बों में चंदामामा, चंपक, पराग, बालक, कल्याण, सरिता जैसी पत्रिकाएं मिल जाया करती थीं। मेरी प्राथमिक शिक्षा ग्रामीण परिवेश में हुई, इसलिए यह अनुभव साझा कर रहा हूं। लेकिन आज ग्रामीण-कस्बाई भारत में हथेलियों से चिपके मोबाइल दिखते हैं। पुस्तक संस्कृति विलुप्त हो चुकी है।
शहरों-महानगरों में अपार्टमेंट संस्कृति छाई है। क्या वहां सहकारिता के आधार पर पुस्तकालय नहीं चलाए जा सकते? अपार्टमेंट सोसाइटी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। किसी ने बताया कि महाराष्ट्र और गैर-हिंदी प्रदेशों में यह सिलसिला मौजूद है। लेकिन मेरा संबंध हिंदी भाषी राज्यों से है।
एडमॉन्टन में मुझे स्वयंसेवी साइडवॉक पुस्तकालय देखने को मिले। कॉलोनी के लोग फुटपाथ पर एक स्टैंड खड़ा कर उसमें बॉक्स लटकाते हैं और 50-100 पुस्तकें रख देते हैं। आसपास के पाठक आते हैं, 10-15 दिनों के लिए पुस्तक ले जाते हैं और अपनी पुस्तकें भी वहां रख देते हैं। कॉफी हाउसों में भी पुस्तकें होती हैं, जहां कॉफी के साथ पुस्तक का आनंद लिया जा सकता है।
भारत में भी अब यह सिलसिला शुरू हो रहा है। दिल्ली के कनॉट प्लेस, मयूर विहार, नोएडा में कुछ रेस्तरां में पुस्तकें अलमारियों में सजी मिलती हैं। शाहीन बाग में एक रेस्तरां देखा, जहां गंभीर चिंतन साहित्य था। युवा पाठक आने लगे थे, बैठकी बढ़ने लगी थी। लेकिन सत्ता से चिपके कुछ तत्वों को यह नजारा रास नहीं आया। पुलिस आई और रेस्तरां बंद हो गया। संचालक कभी नेहरू विश्वविद्यालय का छात्र था और अल्पसंख्यक वर्ग से था। बुकशेल्फ में मार्क्स, माओ, गांधी, नेहरू, रोमिला थापर, कौसांबी, प्रेमचंद, फैज, साहिर, इस्मत चुगताई आदि की पुस्तकें थीं। सत्ता को विवेचनात्मक चेतना से दुश्मनी है, इसलिए ऐसा रेस्तरां बंद होना ही था।
आज ट्रम्प शासन के निशाने पर हार्वर्ड सहित कई विश्वविद्यालय हैं। शोध के लिए वित्तीय सहायता में कटौती की गई या बंद कर दी गई है। फिर भी, हार्वर्ड और अन्य विश्वविद्यालय ट्रम्प शासन से कानूनी मुठभेड़ कर रहे हैं। हाल ही में राष्ट्रपति ट्रम्प ने अमेरिकी संसद की वरिष्ठ पुस्तकालय कर्मी डॉ. हेडन को इसलिए हटा दिया, क्योंकि वे कांग्रेस पुस्तकालय में एशिया, अफ्रीका, लैटिन देशों और जनजाति समाज के लेखकों की पुस्तकें रखना चाहती थीं। वे अश्वेत समाज से थीं और अगले वर्ष सेवामुक्त होने वाली थीं।
यह घटना क्या दर्शाती है? क्या डोनाल्ड ट्रम्प अब्राहम लिंकन के अमेरिका को मोदी+शाह के भारत के मार्ग पर ले जाना चाहते हैं? ठीक वैसे ही जैसे मोदी जी भारत को पाकिस्तान के नक्शेकदम पर धकेलने पर आमादा हैं! ऐसे में, हार्वर्ड विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में दो पुस्तकों के प्रवेश से किस लेखक को खुशी नहीं होगी?
(रामशरण जोशी वरिष्ठ पत्रकार हैं)