बिना ज़्यादा बल प्रयोग या मानवाधिकारों के उल्लंघन के भी प्रभावी पुलिसिंग की जा सकती है : जस्टिस उज्ज्वल भुइयां

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने शुक्रवार को कहा कि पुलिस अधिकारियों से जिस निष्पक्षता या संयम की उम्मीद की जाती है, वह खत्म होती दिख रही है। जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने पुलिस में ‘निष्पक्षता’ या ‘भावनात्मक दूरी’ के खत्म होने पर चिंता जताई और कहा कि बिना ज़्यादा बल प्रयोग या मानवाधिकारों के उल्लंघन के भी प्रभावी पुलिसिंग की जा सकती है। उनका इशारा जंतर-मंतर पर हाल ही में नीट छात्रों के विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों द्वारा प्रदर्शनकारियों के साथ कथित बर्बरता की और था।

पूर्व सचिव (सुरक्षा) यशोवर्धन आज़ाद की किताब “पुलिसिंग द रिपब्लिक” के लॉन्च पर बोलते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा, “हम सभी को दुख होता है जब हम भारतीय पुलिस सेवा के युवा अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से जाकर प्रदर्शनकारियों और आंदोलनकारियों के साथ मारपीट करते हुए देखते हैं। यह देखना वाकई बहुत दुखद है।”

उन्होंने आगे कहा, “पुलिस अधिकारियों से जिस निष्पक्षता या संयम की उम्मीद की जाती है, वह किसी तरह खत्म होती दिख रही है और यह वास्तव में गंभीर चिंता का विषय है।”किताब का लॉन्च राष्ट्रीय राजधानी के वायसराय हॉल में हुआ। इस कार्यक्रम में कांग्रेस सांसद पी. चिदंबरम, महाराष्ट्र के पूर्व पुलिस महानिदेशक डी. शिवानंदन और अन्य लोग मौजूद थे।

जस्टिस भुइयां ने कहा कि बिना ज़्यादा बल प्रयोग या मानवाधिकारों के उल्लंघन के भी प्रभावी पुलिसिंग की जा सकती है।

उन्होंने कहा, “ज़्यादातर आम लोगों के लिए, सड़क पर सीटी और लाठी लिए खड़ा पुलिसकर्मी राज्य की शक्ति और अधिकार का प्रतीक होता है। जब उन्हें लगता है कि उनके साथ गलत हुआ है, तो वे पुलिस की मदद लेते हैं। इसलिए, यह बहुत ज़रूरी है कि पुलिस बल अपनी विश्वसनीयता बनाए रखे।”

उन्होंने आगे कहा, “ऐसा तभी किया जा सकता है जब वे संविधान का सख्ती से पालन करें, एक सच्चे पेशेवर बल के तौर पर काम करें, निष्पक्ष रहें, साहस और दृढ़ विश्वास के साथ काम करें, ईमानदारी बनाए रखें और धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों का पालन करें, और इस तरह कानून के शासन को बनाए रखें।”

उन्होंने देश में हिरासत में यातना और मौतों के बढ़ते मामलों का भी ज़िक्र किया और कहा कि यह एक सभ्य समाज में सबसे बुरे अपराधों में से एक है।

उन्होंने कहा, “कानून के शासन से चलने वाले सभ्य समाज में हिरासत में मौत शायद सबसे बुरे अपराधों में से एक है। किसी भी तरह का टॉर्चर, क्रूर, अमानवीय या अपमानजनक व्यवहार आर्टिकल 29 के तहत मनाही के दायरे में आएगा, चाहे वह जांच, पूछताछ या किसी और स्थिति में हुआ हो।”

जस्टिस भुइयां ने कहा कि जब सरकारी अधिकारी कानून तोड़ने वाले बन जाते हैं, तो इससे अराजकता को बढ़ावा मिल सकता है।

उन्होंने कहा, “अगर सरकार के अधिकारी कानून तोड़ने वाले बन जाते हैं, तो इससे कानून के प्रति अनादर पैदा होगा और अराजकता को बढ़ावा मिलेगा। कोई भी सभ्य देश ऐसा होने नहीं दे सकता। क्या कोई नागरिक उसी पल अपने मौलिक अधिकारों को खो देता है जब कोई पुलिसकर्मी उसे गिरफ्तार करता है?” 

जस्टिस भुइयां ने डीके बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के 1997 के फैसले का भी ज़िक्र किया। उन्होंने कहा कि कोर्ट ने साफ कर दिया था कि किसी भी तरह का टॉर्चर या क्रूर, अमानवीय या अपमानजनक व्यवहार मौलिक अधिकारों के संवैधानिक संरक्षण के दायरे में आएगा, चाहे वह जांच, पूछताछ या किसी और स्थिति में हुआ हो।

जस्टिस भुइयां ने कहा कि कोर्ट ने एक बुनियादी सवाल उठाया था — क्या कोई नागरिक पुलिसकर्मी द्वारा गिरफ्तार किए जाते ही अपने मौलिक अधिकारों को खो देता है और क्या गिरफ्तारी पर जीवन के अधिकार को कुछ समय के लिए रोका जा सकता है? “इसका जवाब निश्चित रूप से ज़ोरदार ‘नहीं’ होना चाहिए,” उन्होंने कहा।

उन्होंने बताया कि डीके बसु फैसले में गिरफ्तारी और पूछताछ से जुड़े कई निर्देश दिए गए थे, और उन पीड़ितों को मुआवज़ा देने की ज़रूरत को भी माना गया था जिनके मानवाधिकारों का उल्लंघन हुआ था।

एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल हत्याओं या “फर्जी एनकाउंटर” के मुद्दे पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी घटनाओं को गंभीरता से लिया है।

2011 के एक फैसले का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि कोर्ट ने माना था कि फर्जी एनकाउंटर “कानून के शासन की मूल भावना को खत्म कर देते हैं” और कहा कि जब किसी मौजूदा पुलिसकर्मी के खिलाफ ट्रायल में फर्जी एनकाउंटर साबित हो जाता है, तो इसे बहुत गंभीरता से लिया जाना चाहिए। जस्टिस भुइयां ने कहा, “एनकाउंटर की सोच आपराधिक सोच है। यह पुलिसिंग का हिस्सा नहीं हो सकती।”

उन्होंने पुलिस सुधारों की ज़रूरत और पुलिस के कामकाज में राजनीतिक दखलअंदाज़ी से होने वाले खतरों के बारे में भी बात की।

जस्टिस भुइयां ने नेशनल पुलिस कमीशन का ज़िक्र किया, जिसे सरकार ने 1977 में पुलिस की भूमिका और कामकाज की जांच के लिए बनाया था। यह कमीशन कानून लागू करने वाली एजेंसी और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने वाली संस्था, दोनों ही रूपों में पुलिस के काम की समीक्षा करने के लिए गठित किया गया था।

कमीशन ने सरकार को कई रिपोर्ट सौंपीं, जिनमें मई 1981 में दी गई अंतिम रिपोर्ट भी शामिल थी। उन्होंने बताया कि कमीशन की सिफारिशों में पुलिस के गलत व्यवहार की शिकायतों से निपटने के तरीकों से लेकर पुलिस की पेशेवर आज़ादी सुनिश्चित करने तक के मुद्दे शामिल थे।

जस्टिस भुइयां ने प्रकाश सिंह और अन्य बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2006 के फैसले का ज़िक्र किया। यह फैसला पुलिस सुधारों से संबंधित था और नेशनल पुलिस कमीशन की सिफारिशों को लागू न किए जाने के बाद आया था।

उन्होंने कहा कि फैसले में पुलिस पर अत्यधिक राजनीतिक और प्रशासनिक नियंत्रण के खिलाफ चेतावनी दी गई थी। इसमें कहा गया था कि ऐसा नियंत्रण पुलिस बल को कानून के शासन को कमजोर करने और लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाने का साधन बना सकता है।

इसके अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने कई निर्देश जारी किए थे, जिनमें राज्य सुरक्षा आयोगों का गठन, पुलिस महानिदेशक का चयन और न्यूनतम कार्यकाल, जांच को पुलिस के अन्य कार्यों से अलग करना, पुलिस स्थापना बोर्ड और पुलिस शिकायत प्राधिकरणों की स्थापना शामिल थी।

जज ने “पुलिसिंग द रिपब्लिक” किताब में मणिपुर पर लिखे अध्याय का भी ज़िक्र किया। उन्होंने राज्य को प्रतिभा और संस्कृति के मामले में बेहद समृद्ध बताया, लेकिन वहां जारी हिंसा पर चिंता भी जताई।

उन्होंने कहा कि राज्य पुलिस, मणिपुर राइफल्स, असम राइफल्स, अर्धसैनिक बलों और सेना जैसे सुरक्षा बलों की भारी मौजूदगी के बावजूद, राज्य में “शांति अभी भी दूर की कौड़ी बनी हुई है।”

मणिपुर में हो रही हिंसा का ज़िक्र करते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा, “हम सभी के लिए इसमें एक सबक है। भारत के लिए इसमें एक सबक है।”

(जनचौक ब्यूरो)

Leave a Reply