पांच राज्यों के चुनाव के परिणाम आ गए हैं। लगता है कि गण पर तंत्र की विजय स्वाभाविक हो गई है। भारत इसके लिए भौतिक रूप से तैयार हो चुका है। बिहार चुनाव के पहले एसआईआर की कवायद लोकतंत्र में सर्वथा नवीन परिघटना की शुरुआत थी। बंगाल में वह एक नई ऊंचाई पर जा पहुंची। तीन राज्यों के चुनाव में उलट फेर हुए हैं। असम इसका अपवाद रहा। जहां डीलिमिटेशन पहले हो चुका था और हमलावर सांप्रदायिकता का ग्राफ बहुत ऊंचा था। मुख्यमंत्री उस भाषा का इस्तेमाल कर रहे थे जिसे आरएसएस ने 100 वर्षों में बड़े परिश्रम और रणनीतिक कुशलता से सामाजिक स्वीकृति दिलाने में सफल रहा है।
बंगाल में गुजरात यूपी असम जैसा पैटर्न ऐसी ऊंचाई पर चला गया। जहां से देश में संविधान लोकतंत्र कानून का शासन और नागरिक की आवाज के मायने लगभग खत्म हो गए हैं। सच तो यही है कि बंगाल चुनाव तक आते-आते बंच ऑफ थॉट के रचनाकार और संघ की गुरु परंपरा के सिरमौर “गुरु गोलवलकर पूरी क्षमता के साथ जी उठे हैं”। इस चुनाव ने इस बात की घोषणा कर दी है कि भारत अब उसी रास्ते पर आगे बढ़ेगा। जिसे छुपाने की कोशिश पिछले 50 वर्षों से भाजपा और संघ के संचालक गण कर रहे थे। यानी “हिंदू भारत का रथ” अब गुरु गोलवलकर द्वारा निर्धारित राज मार्ग पर तेज गति से दौड़ेगा।
हो सकता है कि पांच राज्यों के चुनाव परिणाम के बाद वैश्विक संस्थाएं भारत के लोकतंत्र के चरित्र चित्रण में कुछ नए विश्लेषण जोड़ दें। भारत के लोकतंत्र की रैंकिंग थोड़ा और लुढ़क जाए। फिर भी बात 147 करोड़ आबादी वाले विश्व के विशाल बाजार पर आकर टिक जाएगी। इस सभ्यता में तो “शुभ लाभ” के स्पेस की उपलब्धता ही महान लोकतंत्र की पहचान है।
विविधताओं की भूमि असोम जिस दिशा में आगे बढ़ रहा है। वह पूर्वोत्तर भारत के लिए कितना शुभ अशुभ होगा।यह आने वाला समय तय करेगा। हालांकि उसकी दिशा दिखाई दे रही है। मुख्यमंत्री मियां लोगों को औकात दिखाने के बहाने अंत में धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक नागरिकों के लिए कंसंट्रेशन कैंप ही बना सकते हैं। डीलिमिटेशन और नागरिकता प्रमाण पत्र की तय करने की प्रक्रिया द्वारा असम को पहले से ही सुरक्षित कर लिया गया था। बिहार में 65 लाख नागरिकों के वोट का अधिकार छीन कर और आखिरी स्वयं में 31 लाख नए वोटरों को जोड़कर सफल प्रयोग हो चुका था। बिहार चुनाव के तुरंत बाद नौ राज्यों में एसआईआर शुरू हुआ। जिसमें बंगाल केरल तमिलनाडु उप्र जैसे राज्य शामिल थे। असम में लोकतांत्रिक राजनीति का स्पेस पहले ही सिकुड़ गया है। जहां वोटर रिवीजन के नाम पर 19 लाख लोगों की नागरिकता संदिग्ध हो गई थी।
पांच राज्यों के चुनाव परिणाम के बाद यह भी हो सकता है कि भारत में जनजातियों का गुलदस्ता कहा जाने वाला पूर्वोत्तर भारत पर फासिस्ट हमला लगातार सघन हो। यह भी संभावना है कि सैकड़ों जनजाति समूह वाला पूर्वोत्तर भारत अपनी संपूर्ण जिजीविषा के साथ पुनः उठें और मजबूत लोकतांत्रिक दावेदारी फिर पेश करें। निश्चय ही वह घड़ी हमारे लोकतंत्र के लिए शुभ घड़ी होगी। हम देख रहे हैं कि मणिपुर कुछ वर्षों से फासिस्ट हिंदू राज्य की लेबोरेटरी बना हुआ है। इस प्रयोगशाला के निष्कर्ष ही पूर्वोत्तर के राज्यों के भविष्य की दिशा तय करेंगे।
यही नहीं यह प्रयोग भारत की एकता अखंडता और लोकतांत्रिक संवैधानिक ढांचे के भविष्य के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ है। अल्पसंख्यक बहुल जनजाति वाले इलाकों से शुरू हुआ प्रयोग अब अखिल भारतीय आकार ले चुका है। पांच राज्यों के चुनाव परिणाम आने के बाद भारत के जन मानस में एक अदृश्य आशंका प्रबल होती गई है कि क्या हमारे महान स्वतंत्रता संघर्ष की समस्त उपलब्धियां जैसे लोकतंत्र संविधान सार्वभौम मताधिकार और धर्मनिरपेक्ष समावेशी सांस्कृतिक मूल्य अप्रासंगिक हो गये हैं।
क्या हिंदुत्व कारपोरेट गठजोड़ सब कुछ निगल चुका है। क्या साम्राज्यवाद विरोधी राष्ट्रवाद का युग खत्म हो चुका है। ठीक पांच राज्यों के चुनाव के दौरान ही जिस तरह से अमेरिकी इजरायली हमलावर गुट के समक्ष मोदी और संघ ने आत्मसमर्पण किया है। भला उससे और किस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है। (संघ प्रचारक राम माधव के द्वारा अमेरिका में की गई स्वीकारोक्ति)।
दक्षिण भारत में केरल अपने पुराने ट्रेडिशन को बरकरार रखते हुए सत्ता परिवर्तन का गवाह बना। तो तमिलनाडु में आश्चर्यजनक बदलाव देखने को मिला। जहां डीएमके को 2 साल पहले बनी एक पार्टी के सामने बुरी तरह से पराजित होना पड़ा है। मुख्यमंत्री एमके स्टालिन चुनाव हार गए हैं। जोसेफ विजय थलापति की सरकार का ऊंट किस करवट बैठेगा। यह तो समय बताएगा ।लेकिन एक बात बहुत स्पष्ट है कि डीएमके की हार से संघात्मक भारत को बचाने के लिए चल रहे संघर्ष को धक्का लगा है। बंगाल में इतिहास दुहरा रहा है। हिंदू महासभा के नेता और संघ के राजनीतिक मुखौटे जनसंघ के संस्थापक डा, श्याम प्रसाद मुखर्जी और मुस्लिम लीग के फजलुर्रहमान ने मिलकर 1940 से 43 तक बंगाल में सरकार चलायी थी।
जो ब्रिटिश भारत की सबसे बड़ी राज्य सरकार थी। उस समय बतौर संयुक्त सरकार के वित्तमंत्री डा श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का दमन करने के लिए ब्रिटिश हुकूमत को पत्र लिखा था। उस सरकार के प्रमुख फजलुर्रहमान ने ही 1940 में मुस्लिम लीग के अधिवेशन में अलग पाकिस्तान का प्रस्ताव पेश किया था। इतिहास का अजीब द्वंद्व है कि जहां श्यामा प्रसाद मुखर्जी स्वतंत्रता सेनानियों के दमन में अंग्रेजों के साथ थे। तो उसी तूफानी काल में गोलवलकर हिंदू राष्ट्रवादियों को हिटलर से सीखने और जर्मन राष्ट्रवाद की तर्ज पर भारत के शुद्धीकरण का आह्वान कर रहे थे और फजरुल रहमान भारत के विभाजन की मांग कर रहे थे।
लगता है कि बंगाल विजय करके मोदी अमित शाह की जोड़ी अपने दोनों पूर्वजों के चिरलंबित लक्ष्य की दिशा में एक कदम आगे बढ़ी है।अब संघनीति मोदी सरकार 100 वर्षों से लंबित पड़े कार्यभार को पूरा करने की दिशा में तेजगति से आगे बढ़ेंगी। बंगाल चुनाव के परिणाम आने के साथ ही फिल्म का ट्रेलर दिखाई देने लगा है। विजय का जश्न खून आगजनी हिंसा के साथ जारी है। विजय ज़श्न के अवसर पर मोदी महाशय औपनिवेशिक दौर के बंगाली भद्र जनों के अवतार में प्रकट हुए।
बंगाल जीतना संघ का पुराना सपना रहा है। जो बांग्लादेश की सीमा से सटा सघन मुस्लिम आबादी वाला प्रदेश है। जिसकी औपनिवेशिक संघर्ष की महान विरासत है ।भारत में आधुनिकता के मूल्य बंगाल से ही ठोस शक्ल लेना शुरू हुए थे। (हालांकि ढेर सारे जटिल अंतरविरोधों के साथ)। एक दौर ऐसा था की बंगाल प्रेसीडेंसी में बिहार झारखंड उड़ीसा असम के इलाके शामिल थे। इसलिए बांग्ला भाषा संस्कृति के वर्चस्व के खिलाफ कई क्षेत्रीय अस्मिताएं संघर्ष करती रही हैं। एक छोटे से कालखंड(1946-47) को छोड़ दिया जाए तो बंगाल का हिंदू मुस्लिम एकता और संयुक्त संघर्षों का शानदार इतिहास है।
लार्ड कर्जन के बंगाल विभाजन की योजना के खिलाफ उठे विराट आंदोलन के पेट से ही भारत में उपनिवेशवाद विरोधी राष्ट्रवाद ने ठोस शक्ल ली थी।जिसकी अग्र गति के साथ भारत का स्वतंत्रता संघर्ष सफलता तक पहुंचा और भारत संवैधानिक गणतंत्र बना ।नागरिकों को लोकतंत्र आजादी और न्याय की गारंटी मिली। देश विकास के नए रास्ते की तरफ तेज गति से आगे बढ़ा और धर्म निरपेक्ष संघात्मक गणतंत्र के बतौर विश्व मंच पर सम्मानित हुआ। सामाजिक चेतना में बदलाव के साथ जड़ सामाजिक परंपराएं कमजोर हुईं। जिससे आधुनिकता के मूल्य ‘स्वतंत्रता समानता बंधुत्व और न्याय ‘के लिए चलने वाले संघर्ष ऊंचाई पर पहुंचे।
भारत में लोकतांत्रिक ढांचा व संवैधानिक संस्थाएं वजूद में आईं और उनकी स्वायत्तता स्वतंत्रता की गारंटी की गई। नागरिकों में राज्य और उसके संस्थानों पर विश्वास बढ़ने से उनकी भागीदारी बढ़ी। आम नागरिक के जीवन स्थितियों में भारी बदलाव आया। यह सभी उपलब्धियां लोकतांत्रिक भारत के खाते में दर्ज हैं। भाषाई जातीय क्षेत्रीय धार्मिक विविधताओं को भारतीय राज्य ने संबोधित करना शुरू किया ।जिससे समावेशी विकास संभव हो सका। औपनिवेशिक काल द्वारा छोड़ी गई बीमारियोंके जख्म को भरने में भारतीय लोकतंत्र को एक हद तक सफलता मिली। लेकिन एक ऐसा समय आया जब हमारे लोकतंत्र की अग्र गति ठहर गई।उदारीकरण के बाद और संकटग्रस्त होते लोकतंत्र के बीच से 2014 में संघनीति मोदी सरकार केन्द्रीय सत्ता पर आई।
जैसी की आशंका थी कि मोदी सरकार बनने के बाद भारत के लोकतांत्रिक ढांचे पर दबाव बढ़ेगा। अब यह आशंका यथार्थ में बदल गई है। पिछले 12 वर्षों में मोदी ने कानून को लोकतंत्र संविधान और नागरिकों की आपसी एकता के खिलाफ हथियार के बतौर प्रयोग किया। इस क्रम में संस्थाओं का जिस तरह से क्षरण और दुरुपयोग हुआ । उससे लोकतंत्र में लेवल प्लेइंग के सिद्धांत की धज्जियां उड़ गई है। स्पष्ट है कि अब जनादेश हासिल करना आपराधिक कला में बदल गया है। समाज और राजनीति का अपराधीकरण तथा कम्युनलाइजेशन तेजी से बड़ा है।संवैधानिक संस्थाएं मैनेज हो चुकी है और हिंदुत्व के विध्वंसक लक्ष्य की प्राप्ति के साधन में बदल दी गई हैं। बंगाल में जिस तरह से मोदी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया है।उससे भारत की लोकतांत्रिक साख को भारी धक्का लगा है।
पांच राज्यों के जनादेश के चरित्र को समझने के लिए हमें 2024 के लोकसभा चुनाव के परिणाम को ध्यान में रखना होगा। 2024 के चुनाव में भाजपा का बहुमत खोना वह निर्णायक मोड़ है। जहां से भारत में चुनाव प्रक्रिया व लोकतंत्र की यात्रा दूसरी दिशा में मुड़ गई। हालांकि मोदी सरकार बनने के बाद से ही यह प्रक्रिया चल रही थी। लेकिन 2024में भाजपा के अल्पमत में आने के बाद फासीवादी अभियान की आक्रामकता बहुत तेज गई है।
हमें पता है कि 2023 में ही मोदी के नेतृत्व में लोकतंत्र के अपहरण की परियोजना तैयार हो चुकी थी ।जब सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद संवैधानिक संशोधन करके लायल चुनाव आयुक्त की नियुक्ति का रास्ता साफ किया गया।यही नहीं एक संवैधानिक संशोधन करके चुनाव आयोग को कानूनी जवाबदेही से मुक्त कर दिया गया। फिर शुरू हुआ लोकतंत्र के अपहरण का खेल।अकूत पैसा चुनाव आयोग की पक्षधरता और संवैधानिक संस्थाओं के समर्पण के क्रम में 2024 का लोकसभा चुनाव हुआ। चुनावी सुचिता मर्यादा और नैतिकता की धज्जियां उड़ाते हुए “अबकी बार 4सौ पार “के नारा उछाला गया।
इस नारे ने समाज के दबे कुचले कमजोर वर्गों को डरा दिया। उन्हें लगा कि यह लक्ष्य संविधान व लोकतंत्र को खत्म करने की योजना का अंग है। जिस कारण मोदी सरकार बहुमत से चूक गई। 2024 के चुनाव परिणाम आने के बाद हिंदुत्व कॉरपोरेट गठजोड़ चौकन्ना हो गया और पहले से तैयार स्क्रिप्ट के आधार पर कार्रवाई शुरू हो गई। जिसे सबसे पहले मध्य प्रदेश हरियाणा महाराष्ट्र में लागू किया गया।वोटर जांच के नाम पर वोटर चुनने का नया प्रयोग शुरू हुआ चुनाव अपहरण के नए तरीके खोजे और गढे गये। सम्पूर्ण चुनाव को कम्युनलाइज और क्रिमिनलाइज करने की योजना पर अमल शुरू हुआ।
चुनाव आयोग, सरकारी योजनाएं, सरकारी धन और चुनाव मशीनरी का दुरुपयोग शुरू हुआ। विपक्ष द्वारा ठोस सबूत के आधार पर उठाए गए सवालों को मजाकिया लहजे में टाला गया। चंडीगढ़ का मेयर चुनाव निर्णायक मोड़ साबित हुआ। जब एलान कर दिया गया कि भाजपा को लाभ पहुंचाने वाले का सात खून माफ माना जायेगा।
अब शुरू हुआ एसआईआर का नायाब प्रयोग। बिहार चुनाव के पहले शुरू हुआ एस आई आर फ्री एंड फेयर चुनावी प्रकिया पर मरणांतक हमला था। जिसके द्वारा 65 लाख से ज़्यादा वोटरों को वोट के अधिकार से वंचित किया गया। वोटर चुनने के तरीके को एक हथियार के रूप में प्रयोग किया गया। जिससे गरीब मजदूर दलित मुस्लिम समाज की बड़ी संख्या वोटिंग अधिकार से वंचित हो गया। न्यायपालिका भी मतदाताओं के अधिकार की रक्षा नहीं कर सकी। इसके साथ महिलाओं के सशक्तीकरण के नाम पर महिला मतदाताओं के खाते में 10 हजार रुपए मध्य चुनाव के समय ट्रांसफर करना एक नए तरह का प्रयोग था।
अर्ध सामंती लघु कृषक अर्थव्यवस्था वाले समाज में इस तरह के प्रयोग बहुत कारगर होते हैं। जिस तरह से लाभार्थी नामक श्रेणी को चिन्हित कर मोदी ने मीडिया और आक्रामक सरकारी योजनाओं के प्रचार अभियानों द्वारा चुनावी ल में बदला है।वह वस्तुतः भारत में अर्थ फासीवादी समाज के निर्माण की संगठित परियोजना है।वस्तुतः बिहार विधानसभा चुनाव इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी की प्रयोग भूमि था। जिसे शेष भारत में विस्तारित होना था। बिहार के बाद एस आई आर को अखिल भारतीय स्तर पर विस्तारित किया गया ।
जो बंगाल में क्रूरतम रुप में सामने आया। जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “अगर इस बार वोट नहीं दे पा रहे हों तो क्या हो गया। अगले चुनाव में वोट देना।” यह भारतीय लोकतंत्र के बुनियाद पर प्रहार था। जब हमारा लोकतंत्र एक मंजिल से दूसरी में प्रवेश कर रहा था। बाकी सब सहायक कार्यवाहियां हैं। जैसे सेना पुलिस का जमावड़ा, मनचाहे नौकरशाहों की नियुक्ति और जनता को डराने- धमकाने की कोशिश। इन हथियारों के द्वारा बंगाल में लोकतंत्र युद्ध लड़ा गया। बाकी सब कुछ देश के सामने है। उसके विवरण की जरूरत नहीं।
जहां तक टीएमसी का सवाल है तो वाममोर्चा ने जब ममता बनर्जी को सत्ता सौंपी थी। तो भाजपा के पास तीन विधायक और तीन प्रतिशत वोट था। लेकिन 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के पास 80 से ज्यादा विधायक और 39 प्रतिशत वोट शेयर के साथ भाजपा लगभग टीएमसी के बराबर पहुंच चुकी थी। बस सिर्फ प्रशासनिक तैयारी की जरूरत थी। जिसे भाजपा ने एस आई आर सैनिक बलों के जमावड़े, सांप्रदायिक उन्माद लुंपेन गैंगों पैसे और सत्ता तंत्र के संयुक्त योगफल द्वारा हासिल कर लिया। यह बहुत पहले तय हो गया था कि ममता जी जब अप्रासंगिक हो चुकी होगी। तो सत्ता भाजपा को उसी तरह सौंप देगी। जैसे बीजू पटनायक नीतीश कुमार देवगौड़ा चौटाला परिवार मायावती और अन्य क्षेत्रीय दलों ने सौंपा है।
बंगाल की राजनीति का पहिया 360डिग्री घूम चुका है। महान बंगाली नवजागरण के रास्ते से उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद विरोधी राष्ट्रवाद का परचम उठाए बांग्ला समाज मध्यमार्गीकांग्रेस , और वाममोर्चे से आगे बढ़ते हुए वैश्वीकरण के दौर में लुंपन पूंजीके प्रतिनिधि टीएमसी के बाद समर्पणवादी राष्ट्रवाद के साम्प्रदायिक कार्पोरेट गठजोड़ के हाथ में सत्ता आ चुकी है। भारत विजय के लिए कॉर्पोरेट चार्टर्ड प्लेन पर सवार होकर 2014 में हिंदू राष्ट्रवाद का झंडा उठाएं हिंदुत्व कॉरपोरेट गठजोड़ दिल्ली की सत्ता तक पहुंचाथा। बंगाल और पूर्वोत्तर पर कब्जा के बाद 100 वर्ष से चल रहा आर एस एस साम्प्रदायिक अभियान एक मंजिल पूरा कर चुका है। जो पश्चिम मध्य भारत से आगे बढ़ते हुए धीरे-धीरे सुदूर पूर्व तकजा पहुंचा है।
जटिल बहु संस्कृतियों वाले संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्र की राजनीतिक सत्ता पर कब्जे के बाद संघ गिरोह क्या गुल खिलाएगा। आने वाले समय में इसके परिणाम दिखाई देंगे। बांग्लादेश को घेरे हुए भारतीय भूभागों में फैले धार्मिक एथनिक समूहों वाले क्षेत्रों की जनता इस कारपोरेट ओवरटेक का किस तरह से जवाब देती हैं। भारत के लोकतंत्र का भविष्य इसी पर निर्भर करेगा। लेकिन मणिपुर के घटनाक्रमों को देखते हुए हम भारत के लोकतंत्र के भविष्य को लेकर आश्वस्त नहीं हो सकते। असम से लेकर बंगाल तक जिस तरह के लोगों के हाथ में सत्ता की बागडोर है।चुनाव जीतने का जश्न आगजनी बुलडोजर और हत्या द्वारा मनाया जा रहा हैं। वह निश्चय ही चिंतित करने वाला है।चुने हुए जनप्रतिनिधियों के द्वारा की जा रही घोषणाएं और व्यक्त की जा रही प्रतिबद्धताएं डरावनी हैं। उन्हें संविधान कानून और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की कोई परवाह नहीं है। इसलिए बंगाल चुनाव परिणाम को सामान्य नजरिए से नहीं देखा जा सकता है।
बंगाल और तमिलनाडु के चुनाव परिणाम से संघात्मक भारत पर दबाव और बढ़ेगा। सत्ता का केंद्रीकरण तेज होगा। लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर होगी। साम्प्रदायिक सौहार्द और सामाजिक ताने- बाने को क्षति पहुंचने का खतरा है।। कुछ राजनीतिक विश्लेषक बंगाल को नए गुजरात के रूप में देख रहे हैं। गुजरात के साथ बंगाल की तुलना करना उचित नहीं होगा। गुजरात में मुस्लिम अल्पसंख्यकों की आबादी बहुत कम थी। बंगाल में वे एक दिखने वाली सामाजिक ताकत है। इसलिए गुजरात जैसा कोई प्रयोग बंगाल में सफल होगा। यह कहा नहीं जा सकता।यही नहीं बंगाल उत्तर प्रदेश भी नहीं है।
यह सीमावर्ती राज्य है और यहां सांप्रदायिक सौहार्द की जडें बहुत गहरी है।अगर भाजपा बंगाल को गुजरात या उत्तर प्रदेश की दिशा में ले जाना चाहेगी। तो यह उसके लिए नुकसानदेह होगा। हालांकि बंगाल में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण चरम पर है। जो स्पष्टतः दिखाई दे रहा है। असम में वह एक हद तक कामयाब हो चुकी हैं। डिलिमिटेशन ने असम की चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित किया और हिंदू मुस्लिम विभाजन को और पुख्ता किया है ।यह सब एक खतरनाक स्थिति है।
दूसरा बंगाल से लेकर के पूर्वोत्तर भारत तक कॉर्पोरेट दखल और बढ़ेगा। जिस कारण से एथेनिक समूहों और जनजातियों में बेचैनी बढ़ सकती है ।पहाड़ जंगल और दुर्लभ प्राकृतिक संपदा के प्रचुर मात्रा में मौजूद होने के कारण कार्पोरेट ग्रीड बढ़ेगी और संसाधनों के लूट की प्रक्रिया तेज होगी। जिससे सामाजिक संकट बढ़ सकता है। मणिपुर के कुकी बहुल पहाड़ी क्षेत्रों में अशांति का एक कारण कॉर्पोरेट ग्रीड भी था। देसी विदेशी कॉर्पोरेट घरानों की निगाह पूर्वोत्तर भारत की तरफ लगी हुई है।
परंपरा के विपरीत ट्रंप ने बंगाल चुनाव जीतने पर मोदी को बधाई दी।नई परंपराए नए खतरे की तरफ इशारा करती है। हेमंत विश्व शर्मा के शपथ ग्रहण समारोह में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर को आमंत्रित किया गया था। यह भारत की आंतरिक राजनीति में साम्राज्यवादी दखलंदाजी के बढ़ने का संकेत है। इसके पहले 22 फरवरी 2026 को सर्जियो गोर सेना के पश्चिमी कमांड मुख्यालय चंडीगढ़ गए थे। उनके साथ अमेरिकी इंडो पैसिफिक कमान के कमांडर एडमिरल सैमुअल जे, पापोरो थे ।
इस विजिटका उद्देश्य पश्चिमी मोर्चे पर रणनीतिक सुरक्षा की गतिशीलता और परिचालन संबंधित तैयारी के बारे में चर्चा करना था। उन्होंने लेफ्टिनेंट जनरल मनोज कुमार कटिहार के साथ स्टैटिक सिक्योरिटीर और रक्षा सहयोग पर बातचीत की।इसी समय सर्जियो गोर ने उद्योगपति मुकेश अंबानी और टाटा समूह क चेयरमैन से भी मुंबई में मुलाकात की। ऐसा लगता है कि भारत में सर्जियो गोर की नियुक्ति किसी खास योजना के तहत की गई है।स्पष्ट है कि पंजाब जैसे संवेदनशील इलाके से लेकर पूर्वोत्तर भारत तक अमेरिकी दिलचस्पी का बढ़ना नए दौर का संकेत है। अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा बंगाल चुनाव के बाद मोदी को बधाई देना । भारत में विपक्ष और लोकतांत्रिक नागरिकों द्वारा उठाए जा रहे सवालों और शंकाओं से इनकार करना है और मोदी सरकार द्वारा लोकतंत्र को कमजोर करने के षड्यंत्र पर पर्देदारी करना है।
सर्जियो गोर ट्रम्प की किचन कैबिनेट के मेंबर हैं। हम जानते हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति कसे सम्बद्ध हर गतिविधि के पीछे सीआईए और एफबीआई का नेटवर्क काम करता है। अगर हमारे सीमावर्ती क्षेत्रों में सीआईए और मोसाद की गतिविधियां बढ़ती हैं । तो भारत के लिए किसी भी तरह से हितकर नहीं होगा।संघ की ताकत बढने के साथ भारत में इजरायली दखल भी बढ़ता गया है।इजरायली जासूसी उपकरण पेगासस की भूमिका से हमसभी परिचित हैं । भारत के आंतरिक मामलों में अमेरिकी इजरायली दखल भारत की एकता अखंडता और सार्वभौमिकता के लिए खतरा है।
मोदी के इजरायली अमेरिकी खेमे के समक्ष आत्मसमर्पण से विकास शील देशोंके साथ भारत का अलगाव बढ़ा है। पिछले कुछ वर्षों में पूर्वोत्तर भारत की सीमा पर इजरायली अमेरिकी गतिविधि बढ़ी है । कुछ दिन पहले सीआईए के लिए काम करने वाला एक शख्स दिल्ली से चलकर मणिपुर होते हुए म्यांमार तक आता जाता रहा।बाद में वह अपने कई साथियों सहित गिरफ्तार हुआ। इस तरह की गतिविधियों के संकेत पूर्वोत्तर भारत के विकास स्थिरता और समावेशी समाज के लिए खतरनाक हो सकता है। अतीत में एक ऐसा समय था जब पूर्वोत्तर विद्रोहों की धरती हुआ करता था। लंबे प्रयास के बाद इस पर विजय पाया जा सका है। भाजपा की सांप्रदायिक विभाजनकारी राजनीति से इस तरह के खतरे बढ़ सकते हैं।
इसलिए भारत के लोकतांत्रिक देशभक्त नागरिकों को समय रहते सचेत हो जाना चाहिए । उन्हें संघनीति मोदी सरकार की इजराइली अमेरिकी एक्सिस के समक्ष समर्पण और भारत की संप्रभुता के साथ किसी भी तरह का समझौते का डटकर विरोध करना होगा । अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर का पूर्वोत्तर में दिलचस्पी भारत के लिए शुभ नहीं है। पश्चिम एशिया में अमेरिकी इजरायली धुरी ने कहर मचा रखा है और क्षेत्रीय शांति के लिए खतरा बना हुआ है।समय रहते हमें पूर्वोत्तर भारत में अमेरिकी इजरायली विश्व रणनीति को बेनकाब करना होगा और भारत के लिए इसके खतरे से नागरिकों को सचेत करना होगा ।
भारत को चीन को घेरने के अमेरिकी प्रोजेक्ट में किसी भी स्थिति में शामिल होने से इनकार कर देना चाहिए। हमारे सीमावर्ती देश बांग्लादेश म्यांमार पहले से ही राजनीतिक अस्थिरता से गुजर रहे हैं। भारत अपने सीमावर्ती इलाके में किसी भी तरह के ऐसी गतिविधि को इजाजत नहीं दे सकता।जो हमारे लोकतंत्र और राष्ट्रीय एकता को प्रभावित करें। भारत के राजनीतिक दलों लोकतांत्रिक नागरिकों तथा राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए समर्पित राजनीतिक सामाजिक कार्यकर्ताओं को पूर्वोत्तर भारत शांति और भाईचारा बचाए रखने के लिए कठोर परिश्रम करना होगा। नहीं तो भारत भी पश्चिमी एशिया की तरह ऐसे खित्ते में बदल जाएगा। जहां शांति बहाल करना संभव नहीं होगा। बंगाल असम के चुनाव के बाद बदली हुई राजनीतिक स्थिति में यही राष्ट्रीय कार्यभार है। जिसे देशभक्त लोकतांत्रिक नागरिकों को अपने कंधे पर लेना होगा।
(जयप्रकाश नारायण सीपीआई एमएल के नेता हैं।)