किताबें केवल शब्दों का संग्रह नहीं होतीं। वे हमारी सोच की खिड़कियाँ होती हैं, इतिहास की दर्पण होती हैं, सवालों की गूंज होती हैं और हमारी पहचान की अनकही कहानियाँ। दुनिया के अधिकांश हिस्सों में किताबों को ज्ञान, जिज्ञासा और अभिव्यक्ति की आज़ादी का प्रतीक माना जाता है। लेकिन जब सत्ता किसी क्षेत्र में अपने खिलाफ आवाज़ों को दबाने की नीति अपनाती है, तो सबसे पहले किताबों और साहित्य को निशाना बनाया जाता है। कश्मीर, जो दशकों से भू-राजनीतिक टकराव और स्थानीय जनता के अधिकारों के संघर्ष का केंद्र रहा है, अब किताबों पर प्रतिबंध की जद में है।
बीते मंगलवार को जिन 25 किताबों को “खतरनाक” करार देते हुए जम्मू-कश्मीर के गृह विभाग ने प्रतिबंधित कर दिया है, उनमें बुकर पुरस्कार विजेता अरुंधति रॉय, संविधान विशेषज्ञ ए. जी. नूरानी, और दक्षिण एशियाई राजनीति की जानकार सुमंत्रा बोस जैसे हस्तियों नाम शामिल हैं। ये किताबें कश्मीर के लंबे, जटिल इतिहास को, उसकी राजनीतिक लड़ाइयों को, मानवाधिकारों के उल्लंघनों को और वहां के लोगों की आवाज़ को मजबूती से प्रस्तुत करती हैं।
गृह विभाग की ओर से जारी आदेश में यह भी कहा गया है, कि सरकार के संज्ञान में आया है कि कुछ साहित्य जम्मू-कश्मीर में झूठे विमर्शों और अलगाववाद का प्रचार करते हैं। इन किताबों में “गलत और आपत्तिजनक” जानकारियां हैं, जो अलगाववादी विचारधारा को बढ़ावा देती हैं, भारत की संप्रभुता पर सवाल उठाती हैं और क्षेत्र में शांति भंग कर सकती हैं। इसलिए 2023 में लागू सुरक्षा कानून की धारा 98 के तहत इन पर प्रतिबंध लगा दिया गया, जिससे इन किताबों की बिक्री, वितरण और घर में रखने पर भी सजा का प्रावधान है।
इतिहास में देखें तो कश्मीर की कहानी लंबे समय से विवादों और संघर्षों से भरी रही है। 1947 में ब्रिटिश भारत के विभाजन के बाद कश्मीर का रुख़ बेहद पेचीदा था। महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ संधि की, जिससे विवाद उत्पन्न हुआ और भारत-पाक युद्धों की शुरुआत हुई। इसी समय से कश्मीर की पहचान, उसकी संप्रभुता और स्थानीय लोगों के अधिकारों को लेकर सवाल उठते रहे। इन संघर्षों और राजनीतिक घटनाक्रमों की गहरी पड़ताल कई प्रतिबंधित किताबों में मिलती है।
जैसे ए. जी. नूरानी की किताब ‘The Kashmir Dispute 1947-2012’ में 1947 के बाद कश्मीर की राजनीतिक जद्दोजहद का विस्तार से वर्णन है। इसमें महाराजा हरि सिंह द्वारा भारत के साथ संधि करने की घटना को प्रमुखता से बताया गया है, जो कश्मीर विवाद की जड़ है। किताब में भारत-पाक युद्धों, स्थानीय अलगाववादी आंदोलनों और केंद्र सरकार तथा कश्मीर के बीच विश्वास की कमी को भी बारीकी से उजागर किया गया है। यह किताब कश्मीर के जटिल राजनीतिक इतिहास और वहां की जनता की आकांक्षाओं को समझने में मदद करती है।

अरुंधति रॉय की किताब ‘Azadi’ में 2016 के उरी हमले के बाद कश्मीर में लगे कर्फ्यू, इंटरनेट बंदी और स्थानीय लोगों की दबती हुई आवाज़ को बहुत ही मार्मिक तरीके से पेश किया गया है। वहीं, विक्टोरिया शॉफील्ड की ‘Kashmir in Conflict’ में उस युद्धकालीन दौर का दर्दनाक सच बताया गया है, जब विस्थापन हुआ, परिवार टूटे और गांव तबाह हो गए, जिसने कश्मीर की जमीन को गहरे जख्म दिए।
सुमंत्रा बोस की किताब ‘Contested Lands’ में 1990 के दशक में खासकर हंदवाड़ा इलाके में हुई हिंसक झड़पों और उनके प्रभावों का विस्तार से वर्णन है, जो स्थानीय लोगों की ज़िंदगी पर गहरा असर डालती हैं। वहीं, अनुराधा भासिन की ‘A Dismantled State’ में 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद लगे इंटरनेट बंदी और संचार प्रतिबंधों की कहानी है, जिसे उन्होंने एक पत्रकार के रूप में खुद अनुभव किया है।
1991 में कश्मीर के कुख्यात ‘कुनन-पोशपोरा’ सामूहिक बलात्कार की घटना का दस्तावेज ‘Do You Remember Kunan-Poshpora?’ दर्दनाक सच्चाइयों से भरा है। इसमें पीड़ितों की आवाज़ है, जो सेना पर लगे आरोपों के संदर्भ में लिखी गई है। फौज और सरकार इस इल्ज़ाम को बेबुनियाद बताते हैं, जबकि घटना पर पहुँचने वाले पहले सरकारी अफसर और उस वक्त के कुपवाड़ा के डिप्टी कमीश्नर S M यासिन अपनी रिपोर्ट में लिखते हैं कि फौज ने “दरिंदों की तरह सलूक किया था।”
राधिका गुप्ता की किताब ‘Freedom in Captivity’ में सीमावर्ती इलाकों की सच्ची तस्वीर उभरती है, जहाँ लोग बार-बार सैन्य छापों, तलाशी अभियानों और असुरक्षा के बीच भी अपनी मिट्टी और अपनी पहचान से जुड़ाव बनाए रखते हैं। उनकी ज़िंदगी में लगातार खतरे और संघर्ष होते हुए भी वे अपने गाँवों में जड़ें जमाए रहते हैं और अपनी आज़ादी की उम्मीद नहीं खोते।

वहीं, ‘Between Democracy & Nation’ में महिलाओं की कठिन और साहस भरी ज़िंदगी का दस्तावेज़ीकरण किया गया है, जो सैन्य कब्जे के बीच भी अपने परिवारों को सँभालती हैं, अपने अधिकारों के लिए लड़ती हैं और कश्मीर की राजनीतिक जटिलताओं में सक्रिय भूमिका निभाती हैं। यह किताब दिखाती है कि कैसे महिलाएं न केवल पीड़ित हैं, बल्कि बदलाव की शक्तिशाली आवाज़ भी हैं।
‘Kashmir: The Case for Freedom’ एक ऐसा संग्रह है जिसमें कई लेखकों ने मिलकर 2008 और 2010 के कश्मीर के बड़े विरोध प्रदर्शनों की जीवंत तस्वीर पेश की है। इन प्रदर्शनों में हजारों लोग सड़कों पर उतरे और भारत सरकार की नीतियों के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद की। यह किताब कश्मीर की व्यापक राजनीतिक और सामाजिक आवाज़ को एक मंच पर लाती है, जो उस समय के गहरे असंतोष और संघर्ष को दर्शाती है।
वहीं, हाफसा कंजवाल की ‘Colonizing Kashmir’ कश्मीर में सेना और प्रशासन के ज़मीन, संसाधनों और स्थानीय अधिकारों पर बढ़ते प्रभाव को विस्तार से उजागर करती है। इस किताब में बताया गया है कि कैसे यह बढ़ता दबदबा स्थानीय लोगों की आज़ादी और स्वायत्तता को कमजोर करता है, जिससे कश्मीर की सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने पर गहरा असर पड़ता है।
इतिहास में किताबों को दबाने की प्रवृत्ति कोई नई बात नहीं है। दुनिया भर में कई बार सत्ता ने अपने विरोधियों की आवाज़ को दबाने के लिए किताबों और साहित्य को प्रतिबंधित किया है। चाहे वह तानाशाह हों या उपनिवेशवादी शासक, उन्होंने हमेशा अपने विरोधी विचारों को दबाने के लिए लिखित शब्दों को निशाना बनाया।
भारत के इतिहास में भी ऐसा उदाहरण खूब मिलते हैं। ब्रिटिश शासन के दौरान कई ऐसी किताबें और लेखों पर सेंसरशिप लगी, जो आज़ादी की बात करते थे या उपनिवेशवादी शासकों की आलोचना करते थे। आज़ादी की लड़ाई के दौरान अनेक लेखकों, कवियों और विचारकों को जेलों में डाल दिया गया ताकि उनकी आवाज़ को दबाया जा सके।
कश्मीर में भी यह सिलसिला कोई नई बात नहीं है। इंटरनेट बंदी, प्रेस पर सेंसरशिप और राजनीतिक नेताओं की आवाज़ को रोकना ऐसे कई उदाहरण हैं जिनसे इस क्षेत्र की आज़ादी पर गहरा प्रहार हुआ है। परंतु किताबों पर यह ताजा प्रतिबंध एक नई और गहन लड़ाई का संकेत है। यह लड़ाई विचारों की है, स्वतंत्र सोच की है, और उस असहज सच्चाई की है जिसे सत्ता छुपाना चाहती है। किताबों को रोक कर, केवल शब्दों को नहीं बल्कि उम्मीदों, सवालों और बदलाव की चाहत का भी दमन किया जा रहा है।

प्रतिबंध के बाद श्रीनगर, बारामूला, अनंतनाग और अन्य जिलों में बुकस्टॉल, पुस्तकालयों, और प्रकाशकों पर लगातार छापेमारी की जा रही है। पुलिस और प्रशासन का कहना है कि यह कार्रवाई क्षेत्र में सुरक्षा और शांति बनाए रखने के लिए आवश्यक है, ताकि अलगाववादी विचारधारा को फैलने से रोका जा सके। लेकिन स्थानीय जनता, लेखक समुदाय और प्रकाशकों के बीच इस कदम को लेकर गहरा डर और असमंजस फैल गया है।
यह स्थिति कश्मीर के सांस्कृतिक और बौद्धिक जीवन के लिए बड़े खतरे का संकेत है, क्योंकि किताबें और साहित्य किसी भी समाज की सोच, पहचान और विकास के स्तंभ होते हैं। कश्मीर में जहां लोकतंत्र की जड़ें पहले से ही कमजोर और अस्थिर हैं, तब इन्हें निशाना बनाया जाता है, तो विचारों की आज़ादी और लोकतंत्र की नींव को भी चोट पहुंचती है। इस माहौल में खुली बहस और संवाद की संभावनाएं धीरे-धीरे समाप्त हो रही हैं, जो कि एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए सबसे खतरनाक संकेत हैं।
चिनार बुक फेस्टिवल जैसे साहित्यिक कार्यक्रमों पर भी इस प्रतिबंध का प्रभाव पड़ा है। आयोजकों ने बताया कि अब किताबों के चयन में कड़ी पाबंदियां लगाई जा रही हैं, जिससे साहित्यिक स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। ऐसे प्रतिबंध न केवल लेखकों और पाठकों की आवाज़ दबाते हैं, बल्कि साहित्य की विविधता और खुले संवाद की संभावनाओं को भी सीमित करते हैं। यह स्थिति एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है, जहां अभिव्यक्ति की आज़ादी सबसे अहम स्तंभ होती है।
लेखकों, बुद्धिजीवियों और राजनीतिक नेताओं ने इस प्रतिबंध की कड़ी निंदा की है। प्रसिद्ध लेखिका अरुंधति रॉय ने इसे अभिव्यक्ति की आज़ादी पर सीधा हमला बताया है। जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने स्पष्ट कहा है कि वे कभी भी किताबों पर प्रतिबंध नहीं लगाना चाहेंगे। नेशनल कॉन्फ्रेंस समेत अन्य स्थानीय राजनीतिक दलों ने इस कदम को “अयोग्य” और “दुर्भाग्यपूर्ण” करार दिया है, जो लोकतंत्र और विचारों की स्वतंत्रता के लिए हानिकारक साबित होगा।
यह प्रतिबंध केवल किताबों को ही नहीं, बल्कि कश्मीर में संवाद, बहस और लोकतंत्र की आत्मा को दबाने की एक घातक कोशिश है। एक ऐसा संवेदनशील और दशकों से संघर्षरत क्षेत्र, जहाँ खुली बातचीत और अभिव्यक्ति शांति की पहली सीढ़ी होती है, वहाँ इस तरह की पाबंदियां भविष्य के लिए गंभीर खतरा हैं। सवाल उठता है—क्या सच को दबाकर कोई समाज आगे बढ़ सकता है? क्या बहस को रोककर कोई स्थायी समाधान निकाला जा सकता है? इतिहास से सीखना ही विकास की कुंजी है, और उसे दबाना न केवल अनुचित है, बल्कि समाज के लिए भी खतरनाक साबित हो सकता है।
(रितिक कुंडू जनचौक में प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं।)