गांधी, दशहरा व आरएसएस- एक नक्षत्रीय संस्थिति?

इस बार जब पंचांग 2025 का प्रकाशन हुआ, तो उसमें दर्ज इस साल की विशेष घटना पर तुरंत ध्यान नहीं गया। पंचांग का वार्षिक प्रकाशन एक रूटीन, सामान्य ही घटना है जिसका आम हिन्दू जनता के लिए उतना ही महत्व है जब उसे व्यक्तिगत, पारिवारिक या सामाजिक कार्य के लिए कोई शुभ दिन-बार तय करना या किसी अशुभ परिणाम से बचना होता है।

वो तो जब कुछ ही महीने रह गए थे तो ध्यान 2 अक्टूबर पर गया। हमारे लिए यह तारीख गांधी जयंती होती है, जिसे विश्व-स्तर पर ‘‘अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस’’ के तौर पर भी मनाया जाता है। पर एकाएक हमारा ध्यान गया कि इस साल उसी दिन दशहरा का त्यौहार भी है। और चूंकि वह दशहरा का दिन है तो वह वर्तमान सरकार की पितृ-संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अहम दिन भी है जिसे वह अपना स्थापना दिवस के तौर पर मनाता है। और इस बार का दशहरा उसका आम स्थापना दिवस नहीं था – बल्कि इस बार दशहरा पर, संघ अपनी स्थापना का सौंवां दशहरा पूरा कर रहा था। देश में मौजूदा राजनीतिक-सामाजिक माहौल का देखते हुए, इस दिन का महत्व व उसकी परिभाषा एकाएक एक नयी दृष्टि में दिखी।

वैसे इस साल का यह संयोग देखा जाए तो विचित्र ही है। गांधी की जन्म-तिथि, ग्रिगोरियन या जिसे हम प्रचलित अंग्रेजी कैलेण्डर कहते, मानते हैं, उसके अनुसार है; जब कि दशहरा व तदानुसार संघ का स्थापना दिवस, पंचांग अनुसार हिन्दू वार्षिकी द्वारा तय हुआ है। जहां तक दशहरा का मसला है उसे विभिन्न नजरिए से देखा जा सकता है, मसलन गांधी के लिए ‘‘सत्य की असत्य पर जीत’’ के तौर पर जब कि आरएसएस के लिए रामचन्द्र का युद्ध में विजयी होने के रूप में जो पिछले कई दशकों से उसके हिन्दुत्व का मुख्य आख्यान रहा है।पर इसमें विडंबना यह है कि गांधी व आरएसएस हिन्दू धर्म, फलसफा व प्रचलन के दो विपरीत छोर पर स्थित हैं।

इतना ही नहीं, विडम्बना का चरमोत्कर्ष तो यह है कि हिन्दुत्व की प्रचलित सोच ही गांधी की हत्या का प्रमुख उत्प्रेरक व कारण बनी, जिस वजह से संघ के लिए आज भी गांधी सर्वाधिक घृणित व्यक्ति हैं जिनका हर वक्त, हर कीमत पर उपहास उड़ाना या अपमान करना उसका मुख्य ध्येय या कार्य रहा है।

2025 के इस तारीख की व्यक्त विचित्रता पर थोड़ा और गौर करें। गांधी का जन्म 2 अक्टूबर, 1869 को हुआ। पर 156 साल हुए उस दिन दशहरा का त्यौहार दिवस नहीं था। आरएसएस की स्थापना 1925 को दशहरा के दिन हुई। पर सौ साल गुजरे 1925 में दशहरा 25 सितंबर को था, 2 अक्टूबर को नहीं। लिहाजा, ग्रिगोरियन कैलेण्डर के अनुसार, जिसका अनुसरण संघ नहीं करता है, ऐसा कहा नहीं जा सकता है, उसे अपनी शताब्दी 25 सितंबर को मनानी चाहिए थी। पर चूंकि वह दशहरा को ही अपने स्थापना दिवस के तौर पर मानता आया है, अतः उसने अपनी शताब्दी 2 अक्टूबर को मनायी जो वास्तव में उसका शताब्दी दिवस था नहीं!

स्थापना दिवस का यह गणितज्ञ विश्लेषण कुछ हास्यास्पद तो है ही, पर उस पर विचार करते हुए अहसास भी हुआ, जीवन में पहली बार, कि हम पंचांग को किस तरह निर्विवाद स्वीकार करते आए हैं!

क्या इस साल के 2 अक्टूबर को लेकर, यह सवाल नहीं उठाया जा सकता कि गांधी जयंती और और संघ स्थापना दिवस के तौर पर दशहरा का एक ही दिन होना कुछ ज्यादा ही संयोग तो नहीं है? कुछ ज्यादा ही सुविधाजनक? राष्ट्रीय व वैश्विक स्वीकार्यता के लिए सदैव संघर्षरत आरएसएस अपनी सुविधानुसार सरदार पटेल, सुभाष चन्द्र बोस, भगत सिंह व देश की आजादी के संघर्ष के अन्य नायकों को हड़पने की कोशिश करता रहा है। उनमें, जवाहरलाल नेहरु व गांधी ही दो प्रमुख नाम थे जिन्हें वो बिल्कुल ही हड़प नहीं पाया। शायद यही कारण है कि नेहरु की निंदा करना उसका एक ध्येय रहा है। और जहां तक गांधी का सवाल है, तो संघ उन्हें, एक तरह से, न उगल ही पाता है, न निगल ही – और देश व खासकर दुनिया की नजरों में अपनी वैधता बनाने के चक्कर में उसे गांधी के नाम पर नतमस्तक होना ही पड़ता है।

तो क्या इस साल के 2 अक्टूबर की नक्षत्रीय संस्थिति, संघ की एक कोशिश रही है कि वह अपने को गांधी के समकक्ष या विकल्प के तौर पर प्रस्तुत करे, और समानांतर उन्हें हाशिए पर करने का मैदान भी तैयार करने का अवसर प्रदान करती है?

एक बड़ा सवाल यह भी है, और जिज्ञासा भी कि समाज अपनी यात्रा में हर वक्त अपने तरीके से सवाल करता रहा है। धर्म, उसके दर्शन, उसके मत, प्रक्रिया व पर भी आदि ग्रंथों पर भी उसने सवाल किए हैं। आज हम परंपराओं, कर्मकाण्डों व अंधविश्वासों को आंख मूंद कर स्वीकार नहीं करते हैं। मगर हमने पंचांग- उसके गणित व उसकी व्याख्या पर कभी कोई सवाल नहीं उठाए हैं, न ही अपने त्योहारों व मंगल तारीखों को लेकर कभी कुछ पूछा। हम आइंस्टीन के सिद्धांत को चुनौती दे सकते हैं पर ज्योतिष पर, न ही पंचांग के निर्माण व गणना की प्रक्रिया पद्धति को लेकर कोई गंभीर जिज्ञासा जाहिर करते हैं।

क्या पंचांग की इस तरह की व्यापक स्वीकार्यता किसी अंधविश्वास से कम है?

तो इस साल का 2 अक्टूबर, एक नक्षत्रीय संस्थिति थी या चमत्कारिक हाथ की सफाई? अगर हम आरएसएस के स्वरूप को थोड़ा बहुत भी समझते हैं, तो इसका जवाब दोनों में कुछ भी हो सकता है। जिस तरह, 1977 के आपातकाल की पृष्ठभूमि में आरएसएस ने जेपी को हड़प कर राष्ट्रीय राजनीति में एक लंबी छलांग लगायी, वह गांधी का भी उसी तरह इस्तेमाल कर अपने लिए वैश्विक स्वीकार्यता हासिल करने के साथ-साथ उन्हें कूड़े के ढेर में फेंकना चाहती हो।

ये अलग बात है कि गांधी, जेपी नहीं हैं, न ही इस बार समस्या का स्वरूप व उसका समाधान तात्कालिक।

(हिंद स्वराज मंच से जुड़े बिजू नेगी देहरादून में रहते हैं।)

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