वाराणसी। बनारस शहर में स्थित बीएचयू अस्पताल में इलाज कराना आज भी मध्यम, निम्न मध्यम और हाशिए पर रहने वाले करोड़ों नागरिकों का सपना है। सिमित आजीविका, बेहिसाब मंहगाई और बीमारी से शायद ही कोई परिवार बचा होगा। जब बीमारी हद से बढ़ जाती है, तब किफायती बीएचयू अस्पताल आना ही गरीबों के लिए एकमात्र विकल्प बचता है।
चाहे इसके लिए किसी को बनिया-महाजन से कर्ज लेना पड़े, लेता है। रुपए कम पड़ने पर महिलाओं को गहने-जेवर गिरवी रखने पड़ें। गंभीर बीमारी है तो खेत-प्लॉट भी बेचने पड़ जाएं तो बेच देता है। किसान, मजदूर है तो भेड़, बकरी, भैंस-गाय बेचकर अपने बीमार सदस्य का इलाज कराने बीएचयू की देहरी पर आ पहुंचता है।

मसलन, जब ऐसे बेहद जरूरतमंद लोग अपने मरीज को लेकर यहां इलाज को आये और अस्पताल में हड़ताल की वजह से इलाज न मिले तो उनपर क्या बितेगी ?
पूर्वांचल का एम्स कहा जाने वाला बीएचयू अस्पताल एक बार फिर से हड़ताल की जद में है। अपनी मांगों को लेकर जूनियर डॉक्टरों की हड़ता तीसरे दिन भी जारी रही। इससे आसपास के दर्जनों जिलों और कई राज्यों से हजारों की संख्या में आने वाले मरीजों को स्वास्थ्य सुविधाओं व इलाज के लिए तरसना पड़ रहा है।
पिछले ढाई महीने के दौरान 15 दिन हड़ताल रही है। कोलकाता की घटना के विरोध में रेजीडेंट डॉक्टरों की 13 से 23 अगस्त तक हड़ताल चली थी। इसके बाद नर्सिंग ऑफिसर 17 से 19 सितंबर तक हड़ताल पर थे। अब तीन दिनों से रेजीडेंट हड़ताल पर हैं।
हड़ताल की वजह से मरीजों को होनेवाली परेशानियों को जानने जनचौक की टीम गुरुवार को बीएचयू अस्पताल परिसर में पहुंची। पेश है पवन कुमार मौर्य की ग्राउंड रिपोर्ट।
बिहार राज्य के औरंगाबाद जनपद स्थित दाउदनगर के पैंसठ वर्षीय सुखन प्रसाद बुधवार की भोर में ही ट्रेन से मुगलसराय पहुंच गए। वहां से एक घंटे में बीएचयू अस्पताल। सुखन के साथ उनका बीमार बेटा है और गांव की ही बहू आशा अपने बीमार पति को लेकर इलाज कराने आई हैं।
सुखन “जनचौक” से बताते हैं “मेरे बेटे को दिमाग में चोट लग गई थी, जिसका इलाज बहुत जगह कराया लेकिन आराम नहीं मिला। गत दो सालों से से बीएचयू से इलाज चल रहा है, अब आराम है।
बारिश के बाद से बेटे को दिक्कत है। इलाज के रुपए नहीं होने पर मैंने दो बकरी बेचकर कुछ व्यवस्था कर यहां आया, तो गार्ड ने बताया कि आज सभी जूनियर डॉक्टर हड़ताल पर हैं। एक सीनियर डॉक्टर हैं, वो कितने लोगों का इलाज करेंगे? आज घर चले जाओ, दो-तीन दिन बाद आना। यह सुनते ही मेरा शरीर एक पल के लिए सुन्न पड़ गया।

जैसे लगा कि आंखों के सामने अंधियारा छा गया। जितना मैं 15-20 घंटे के सफर में नहीं थका था, उससे ज्यादा गार्ड की दो बातों ने थका दिया। मैं वहीं गलियारे में झोले-पर्ची और बेटे को लेकर बैठ गया। मैं कोसने लगा हाय रे नियति! हमलोग तो पहले से ही कम परेशान थे क्या, जो तूने यह स्वांग (हड़ताल) रचाये हैं?
तकरीबन आधे सुस्ताने के बाद कुछ शरीर में जान में जान आई। फिर मैंने तय किया कि, इंतजार करेंगे और बेटे को डॉक्टर साहब को दिखाकर ही जाएंगे।”
सुखन आगे कहते हैं “किसी तरह से नेत्र विभाग के समीप बिल्डिंग के नीचे एक छोटे से पेड़ की छांव में दो जानना (महिला) और तीन मरद प्लास्टिक की पन्नी बिछाकर सुबह किये।
हड़ताल की वजह से अब तक पांचों लोगों का मिलाकर (जिसमें दो मरीज और दो महिलाएं हैं) हजार- बारह सौ रुपए खाने, नहाने और टॉयलेट आदि में खर्च हो गए। जो रुपए इलाज में लगने चाहिए थे, वे फालतू में खर्च हो रहे हैं। किससे बताये कि, मैं कैसे-कैसे कुछ रुपए की व्यवस्था कर यहां इलाज करने आया हूं (यह कहते बूढ़ा आदमी सिसक पड़ा)।”

आज सुबह (गुरुवार) फिर ओपीडी में पर्ची लगाने पहुंचा तो गार्ड ने वही बात दोहराई की आज भी हड़ताल है। दोपहर बाद ओपीडी में पर्ची जमा होगी आना। आज डॉक्टर साहब देख लेंगे। यह सुनकर जान में जान आई। डॉक्टर साहब ने बारह बजे के बाद देखा और दवा लिखा।”
सुखन को दवा तो मिल गई लेकिन वह अपने साथ मरीज रामदयाल को भी दिखवाकर साथ गांव लौटने की बात कह रहे थे। इस इंतजार में उन्होंने ने बताया कि ‘उन्हें किसी भोजन वाली गाड़ी का इंतजार है, जो बुधवार की दोपहर और रात में ग्यारह बजे भोजन के पैकेट मुफ्त में बांटा था।’
बीएचयू में बीते दिनों कोलकाता में महिला जूनियर डॉक्टर के साथ रेप व हत्या के विरोध में रेजिडेंट डॉक्टरों ने विरोध-प्रदर्शन किया था। इस दौरान बीएचयू प्रशासन से डॉक्टरों की सुरक्षा को लेकर की अपनी मांगें भी रखी थीं, जिस पर अस्पताल प्रशासन द्वारा आश्वासन दिए जाने के बाद उन्होंने विरोध समाप्त कर दिया था।
इसके बाद एक बार फिर से रेजिडेंट डॉक्टर बैनर-पोस्टर लेकर गुरुवार को तीसरे दिन भी हड़ताल पर हैं।
इधर, हड़ताल की वजह से मंगलवार को बीएचयू अस्पताल की ओपीडी में लगभग 4900 मरीज ही देखे गए, जबकि 49 मरीजों के ही ऑपरेशन हो सके हैं। ओपीडी में केवल कंसल्टेंट डॉक्टर ही बैठ रहे हैं। आम दिनों में बीएचयू अस्पताल में इलाज कराने 6000 से अधिक मरीज आते हैं।
जबकि सभी विभागों को मिलाकर करीब 100 की संख्या में मरीजों की सर्जरी भी होती है। डॉक्टरों की लगातार हड़ताल की वजह से अस्पताल में इलाज के लिए पहुंचने वाले मरीजों की तादात में कमी आई है।
पेट की गंभीर बीमारी से ग्रस्त पति रामदयाल को लेकर आशा (बुजुर्ग सुखन के साथ आईं) बीएचयू आई हैं। आशा ने जांच रिपोर्ट की रसीद दिखते हुए बताया कि “पहले दिन यानी बुधवार को हड़ताल की वहज से इलाज नहीं मिल सका।

आज सुबह में ही डॉक्टर ने देखा और कई जांच लिख दिए। डॉक्टर ने ही कहा कि अस्पताल में हड़ताल चल रहा है। यहां जांच कराओगे तो देर से रिपोर्ट मिलेगी। बाहर प्राइवेट में कराकर रिपोर्ट लाओ। शाम को पांच बजे तक बैठूंगा, नहीं तो फिर शनिवार को दिखाना पड़ेगा। इसलिए मैंने प्राइवेट में जांच के लिए दे दिया है, जिसके 2500 रुपए लगे और रिपोर्ट चार बजे शाम को मिलेगी।”
दोपहर के तीन बज गए हैं आशा बार-बार मोबाइल में समय देख रही हैं। बगल में ही पन्नी पर लेटे उनके पति के मुरझाये चेहरे से ऐसा प्रतीत हो हो रहा था कि उन्हें दवा-इलाज की सख्त जरूरत है। आशा कहती हैं “मैं बनिया-महाजन से दस हजार रुपए ब्याज पर कर्ज लेकर पति का इलाज कराने आई हूं।
घर में पति ही कमाने वाले हैं, जो कई महीनों से बीमार चल रहे हैं। जाने कहां-कहां दुआ-दवा करके थककर हार गई हूं। इलाज आदि पर लाखों रुपए खर्च हो गए। लगभग एक लाख रुपए बनिया का उधार भी हो गया है। बात रुपए की नहीं है, पति पहले की तरह हो जायेंगे तो कर्ज हमलोग मर-जी के चुका देंगे।”
हड़ताली एक जूनियर डॉक्टर ने बताया कि “हम लोगों ने बीएचयू प्रशासन के समक्ष अपनी कई मांगें रखी थीं, लेकिन अभी तक उसे पूरा करने की कोई ठोस पहल नहीं की गई। न ही प्रॉक्टेरियल बोर्ड द्वारा हमें उचित तरीके से सुरक्षा व्यवस्था प्रदान की गई है।
हमारे साथ यदि कोई घटना होती है तो बीएचयू प्रशासन द्वारा 6 घंटे के अंदर एफआईआर नहीं कराई जाती है, जब तक अस्पताल प्रशासन से जो हमने मांग की थी, उसे पूरा करने पर विचार नहींं किया जाता, हम सभी को सुरक्षा नहीं दी जाती, तब तक यह हड़ताल जारी रहेगी।”
ह्रदय रोग विभाग के सामने अर्धनिर्मित पार्क के छांव में अपने मरीज के साथ सुस्ताते सासाराम (बिहार) के सुभाष चंद्र बीएचयू अस्पताल में हड़ताल की वजह से दुःखी और निराश हैं। उनकी बीमार बेटी समीप में ही निढाल पड़ी है।

उसे देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा है कि उसे इलाज की जरूरत है, जो नहीं मिल रहा, लेकिन वह बिना इलाज के ही एक पतली सी चुन्नी ओढ़कर उसमें सिमटी हुई है। वह बीच-बीच में जगती है और अपने पास परिवारीजनों को देखकर पुन: सो जाती है।
सुभाष अपनी पीड़ा “जनचौक” बताते हैं “सासाराम में तीन-चार दिनों में प्राइवेट अस्पताल वालों ने 30-35 हजार रुपए ले लिए। बेटी की बीमारी से हाथ-पांव अकड़ रहे थे। सिर दर्द के मारे फटा जा रहा था। फिर भी बेटी की बीमारी ठीक नहीं हुई तो बीएचयू अस्पताल रेफर कर दिया। यहां आये तो पता चला की हड़ताल है।

यह सुन मेरी स्थिति ऐसी हुई की काटो तो खून नहीं। जैसे-तैसे निहोरा-निवेदन कर बीएचयू के इमरजेंसी में भर्ती हो गई बच्ची और रातभर इलाज चला। इसमें बेटी को आराम मिला, सुबह होते ही मेरे मरीज को इमरजेंसी से बाहर निकाल दिया गया।
डॉक्टर ने कुछ दवा-पानी चढ़ाने के लिए मंगाया था। वह भी नहीं चढ़ाया गया और हमें बाहर फेंक दिया गया। कहा गया कि किसी नजदीकी अस्पताल में चले जाओ। तब से यहीं बैठा हूं शाम को चार बज गए हैं। कुछ समझ नहीं आ रहा।

हड़ताल नहीं होती हो संबंधित विभाग के सामान्य वार्ड में भर्ती हो जाती, लेकिन हड़ताल की वजह से सब अस्त-व्यस्त है। कहीं कोई सुनने वाला ही नहीं है। ऐसे में हमलोग कहां जायेंगे ?”
आईएमएस बीएचयू के निदेशक प्रो एसएन शंखवार ने मीडिया को बताया कि “मरीजों के हितों को देखते हुए रेजीडेंट काम पर लौट आएं। उनकी जो भी जायज मांगे हैं, उन्हें पूरा कर दिया गया है।”
(पवन कुमार मौर्य चंदौली\वाराणसी के पत्रकार हैं)
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