गुरुदत्त (9 जुलाई 1925-10 अक्तूबर 1964) यदि जीवित होते तो इस 9 जुलाई को सौ वर्ष के हो चुके होते। 39 वर्ष की उनकी संक्षिप्त किंतु अवसादग्रस्त ज़िंदगी की शख्सियत सिनेमाई दृष्टिकोण से इतनी चमकीली है कि समय की धूल उसे फीका नहीं कर पाई। उनके जन्मशती वर्ष के प्रारंभ के साथ उन्हें शिद्दत से याद किया जा रहा है। बतौर अभिनेता और उससे कहीं अधिक बतौर निर्देशक, कुछ गिनी-चुनी फिल्मों वाले इस फिल्मकार का दुनिया ने लोहा माना। वे एक ‘कल्ट’ हैं, सिनेमा के छात्रों के लिए एक स्कूल। उनकी ज़िंदगी की तरह उनकी फिल्मों की धूप-छाँव, उदासी में डूबी सिनेमाटोग्राफी, दृश्य-सज्जा, और किरदारों की गढ़न पर बीते हफ्ते में फिर से कितना कुछ लिखा गया है।
उनकी राजनीतिक-सामाजिक दृष्टि और उनकी फिल्मों के स्त्री किरदारों पर भी चर्चा हुई है-उनके यहाँ स्त्री चरित्रों के कितने और कैसे-कैसे भिन्न-भिन्न रंग हैं, और नेहरूवादी आदर्शों से मोह व मोहभंग के दौर में समाज और सियासत पर उनके तंज कितने तीखे-गहरे हैं। अफसोस कि बागी और लगातार नाराज़ छवि वाला यह शख्स ‘हिंदू कोड बिल’ से भी खफा था और इसके विरुद्ध खुलकर प्रतिगामी राजनीति का ध्वज लहराता था।
गुरुदत्त का फिल्मी जीवन आज़ादी के तुरंत बाद के उन वर्षों में फैला हुआ है, जिनमें जवाहरलाल नेहरू की छवि की छाया में नए देश-समाज को खड़ा करने की जद्दोजहद थी। देश का संविधान आकार ले रहा था और पुराने सड़े-गले रीति-रिवाजों पर अडिग ब्राह्मणवादी ताकतों व आधुनिक मूल्यों को स्थापित करने के इच्छुक प्रगतिशील-लोकतांत्रिक नेताओं के बीच युद्ध का नया मैदान खुला हुआ था। इसी दौरान डॉ. भीमराव आंबेडकर के पास कई अन्य महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारियों के साथ-साथ हिंदू कोड बिल को पास कराने का कार्य भी था।
मनुस्मृति के विधान से बंधी ब्राह्मण संचालित हिंदू व्यवस्था में स्त्रियों पर लादी गई सती-प्रथा जैसी बर्बर ‘मर्यादाओं’ को औपनिवेशिक शासन के दौरान कानून बनाकर चुनौती दी गई थी। किंतु, स्त्रियों को स्वतंत्र नागरिक अधिकार देने के लिए औपनिवेशिक शासन के दौरान शुरू की गई महत्वपूर्ण कोशिशों को उत्तर-औपनिवेशिक सरकार में जारी रखना आसान नहीं था। जैसा कि आंबेडकर ने ब्राह्मणीय व्यवस्था में दलितों के अधिकारों को लेकर आशंका जताई थी, वही सच्चाई स्त्रियों के लिए भी थी।
आज़ादी से पहले भी स्त्री अधिकारों के लिए महत्वपूर्ण संघर्ष शूद्र बुद्धिजीवी एक्टिविस्ट फुले दंपति के हिस्से में आए थे। अब फिर एक दलित बुद्धिजीवी, कानून मंत्री के रूप में, अपनी भूमिका निभाने जा रहा था। दलितों को ब्राह्मणीय सत्ता के जुए से पूरी तरह मुक्ति दिलाने की आंबेडकर की एक कोशिश को सवर्ण हिंदू नेताओं ने गांधी के ज़रिए पूना पैक्ट में सीमित कर दिया था। अब उसी सत्ता से स्त्रियों की मुक्ति के उनके प्रयास फिर सवर्ण हिंदू एकता के ज़रिए विफल किए जाने थे।
कानून मंत्री के रूप में आंबेडकर द्वारा पेश किए गए बिल के मसौदे में हिंदू स्त्रियों को पैतृक संपत्ति का अधिकार, जाति से बाहर विवाह की स्वतंत्रता, और तलाक लेने का हक जैसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव शामिल थे, जो स्त्रियों को पशुवत दास मानने वाले समाज के लिए असहनीय थे।
राजेंद्र प्रसाद, सरदार पटेल, पट्टाभि सीतारमैया, गोविंद वल्लभ पंत आदि कांग्रेस पार्टी, सरकार, और संविधान सभा के दिग्गज पुरुषों का झुंड इस बिल के खिलाफ था। कांग्रेस में शामिल हिंदू महासभाई मदन मोहन मालवीय और भारतीय जनसंघ के श्यामा प्रसाद मुखर्जी, हिंदू महासभा के एन.सी. चटर्जी आदि को तो बिल के विरोध में होना ही था। एक ‘अछूत’ के कारण हिंदू धर्म के खतरे में पड़ने जैसी बेतुकी बातें तक उछाली जा रही थीं।
आखिरकार, प्रधानमंत्री नेहरू के समर्थन के बावजूद बिल गिर गया। नेहरू ने ऐसी स्थिति में अपनी सरकार का इस्तीफा देने की बात कही थी, लेकिन इस्तीफा केवल कानून मंत्री आंबेडकर ने दिया। फिर भी, इस मसले पर नेहरू के सरोकार गहरे थे। उन्होंने हिंदू कोड बिल को लेकर अपनी कोशिशें नहीं छोड़ीं और इसके महत्वपूर्ण प्रस्तावों को धीरे-धीरे टुकड़ों में कानून के रूप में पास कराने में कामयाब हुए। जाहिर है, नेहरू की इन कोशिशों में आंबेडकर की ज़िद शामिल थी।
‘आज़ाद भारत’ में दलितों और स्त्रियों को नागरिक अधिकार देना ‘हिंदू धर्म के खतरे में पड़ने’ जैसा माना गया। इस दृष्टिकोण से यह स्थिति औपनिवेशिक शासनकाल से भी अधिक शर्मनाक थी। सत्ता के शीर्ष पर बैठे कांग्रेसी झुंड और उनकी विरोधी आरएसएस व हिंदू महासभा जैसी ताकतों के लिए आज़ादी का मतलब यही था कि गुलाम तबके पहले की तरह आज्ञाकारी सेवक बने रहें। हिंदू कोड बिल को लेकर संसद में जिस तरह घिनौना विरोध हुआ, उसी तरह हिंदूवादी समूह, विशेषकर हिंदू महासभा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ-जनसंघ, राम राज्य परिषद आदि, जनता के बीच अभियान चला रहे थे।
हिंदू कोड बिल को धर्मशास्त्रों के विरुद्ध बताते हुए कथित ‘धर्मयुद्ध’ चलाने वाले इन समूहों ने दिल्ली सहित देश के विभिन्न स्थानों पर सभाएँ और विरोध-प्रदर्शन आयोजित किए। संसद के बाहर भी प्रदर्शन हुए, नेहरू का पुतला फूंका गया, और गांधी-टोपियाँ जलाई गईं। बिल के प्रावधानों को लेकर तरह-तरह का दुष्प्रचार किया गया। बंगाली परिवेश वाले कोंकणी ब्राह्मण गुरुदत्त की फिल्म मि. एंड मिसेज 55 भी इसी तरह के भद्दे प्रचार से अधिक कुछ नहीं थी।
जनता के दिल-दिमाग पर सबसे अधिक असर डालने वाला सिनेमा उद्योग पहले ही स्त्रियों की कंडीशनिंग की मुहिम छेड़े हुए था। आज़ादी के आंदोलन के दौरान स्त्रियाँ ‘लक्ष्मण-रेखा’ लांघने लगी थीं। उन्हें वापस हद में लाने के राष्ट्रीय अभियान में सिनेमा भी अपनी भूमिका निभा रहा था। फिल्मों की नायिका की छवि मनु की आदर्श स्त्री की छवि थी-संस्कारी और पारिवारिक ‘दायित्वबोध’ वाली। ‘हिंदू कोड बिल’ की बहस ने फिल्मकारों को और ‘ज़िम्मेदार’ बना दिया था।
आधुनिक स्त्री की छवि भी ऐसी गढ़ी जा रही थी जो पढ़ी-लिखी हो, भले ही घर से बाहर निकलकर सामाजिक कार्य या नौकरी करती हो, लेकिन प्रेमिका और पत्नी के रूप में पुरुष को समर्पित हो, परिवार के प्रति प्रतिबद्ध और संस्कारी हो। नायक चाहे आवारा, अनाड़ी, चार सौबीस, जुआरी, गुंडा, मवाली, लीडर, बागी, या सदाचारी हो, उसकी एक अहम ज़िम्मेदारी नायिका के स्वाभिमान को तोड़कर पूर्ण समर्पण कराना भी थी। बकौल मीर-उस शोख को भी राह पर लाना ज़रूरी था।
मि. एंड मिसेज 55 में प्रीतम कुमार (गुरुदत्त) नायिका अनीता वर्मा (मधुबाला) का अपहरण कर सबक सिखाता है, तो 1951 में आई आन का नायक जय तिलक (दिलीप कुमार), जो एक विद्रोही किसान है, नायिका प्रिंसेज राजेश्वरी (नादिरा) को अगवा कर उसके ‘दर्प’ को तोड़ता है और उसे प्रेम के नाम पर परंपरागत स्त्री-परिधान पहनने के लिए विवश करता है। नायक का गुरूर यह है कि वह अपनी घोड़ी पर ढालकर अपहृत स्त्री को ताना मारता है-‘‘तू भी बहुत हठी थी मिस सितारा, लेकिन अब मोहब्बत करती है। है ना! अरे, मैंने इंसानों को मोहब्बत करना सिखा दिया है, तुम तो जानवर हो।’’
दिलचस्प यह कि इस फिल्म के निर्देशक मेहबूब खान हैं, जिन्हें पहले औरत और फिर मदर इंडिया के ज़रिए कथित ‘स्त्री-सिनेमा’ बनाने का श्रेय भी है। 1955 में ही आई राज कपूर की श्री 420 में भी थोड़ा समाजवादी, थोड़ा नेहरूवादी गरीबों से हमदर्दी वाला तड़का है। चार्ली चैप्लिन-सी मासूमियत वाला अनाथ-बेरोज़गार नायक राज अपने वर्ग के लोगों का भरोसा तोड़कर चारसौबीसी में फंस जाता है, लेकिन अंततः राह पर लौट आता है। यहाँ नायिका विद्या (नर्गिस) अध्यापिका है, लेकिन उसकी पूरी भूमिका नायक से रोमांस करने और उसके वियोग में उदास होने तक सीमित है।
स्त्री की गरिमा और उसके अधिकारों के लिए देश में राजनीतिक उथल-पुथल के उस दौर में इस फिल्म की स्त्री छवि भी राजनीतिक ही है। सचेत प्रतिगामी राजनीति की तरफदारी से बनी इस फिल्म में ‘आदर्श’ नायिका के बरक्स छल का प्रतीक माया (नादिरा) है, जो नायक को गलत रास्ते पर चलने के लिए लुभाती है। यह भद्दा और अश्लील फॉर्मूला हिंदी फिल्मों में उसी दौर से चला आ रहा है।
1951 की बाज़ी, जिसके निर्देशक गुरुदत्त हैं और नायक देव आनंद, नायिका के प्रति नायक का समस्याग्रस्त व्यवहार ही पेश करती है। कई बार दर्शकों की मानसिकता के नाम पर और कई बार फिल्म के पात्र की जटिल मानसिकता के नाम पर बदतमीज़ी को जायज़ ठहराया जाता रहा। सच यह है कि उस दौर के तीनों बड़े सितारे-दिलीप, देव, और राज-जिन्हें सामाजिक रूप से सचेत और संवेदनशील कहा जाता है, स्वयं भी ऐसी ही छवि पसंद करते थे। नायकों की इस चाह को सिनेमा हमेशा तरजीह देता रहा।
गुरुदत्त की मि. एंड मिसेज 55 इस मायने में प्रतिगामिता की अग्रगामी फिल्म है कि वह स्त्री की पितृसत्ता के प्रति कंडीशनिंग का काम गुप्त रूप से नहीं, बल्कि ‘हिंदू कोड बिल’ के ऐलानिया विरोध के साथ शुरू होती है। चालाकी केवल इतनी है कि यह काम ‘तलाक बिल’ का नाम लेकर किया गया। पहले ही दृश्य में अखबार का हॉकर चिल्ला-चिल्लाकर ‘तलाक बिल पर असेंबली-लोकसभा में ज़ोरदार बहस’ की खबर दे रहा होता है। फिल्म में फेमिनिज़्म को सनकी, अहंकारी, पुरुषों से नफरत करने वाली, समाज-विरोधी, और षड्यंत्रकारी प्रवृत्ति के रूप में चित्रित किया गया है।
फेमिनिस्ट सीता देवी (ललिता पवार) और उनकी सचिव जूली (विनीता भट्ट) की ऐसी छवि गढ़कर फिल्मकार ने वैम्प बनाम संस्कारी स्त्री वाली चाल का सहारा लिया है। फिल्म तलाक के मुद्दे पर ज़रा भी गंभीर बहस नहीं दिखाती। नायक प्रीतम (गुरुदत्त) नायिका अनीता (मधुबाला) को अगवा कर अपने गाँव ले जाता है, जहाँ उसकी भाभी (कुमकुम) उसमें आदर्श पत्नी के संस्कारों के बीज रोपती है। निर्लज्जता यह कि पति के हाथों पत्नी की पिटाई को भी जायज़ ठहराया जाता है। इस सवाल पर कि क्या आपके पति आपको कभी-कभी पीटते भी हैं, नायक की भाभी से प्रवचन कराया जाता है-‘‘तन-मन से प्यार भी तो वही करते हैं। भात खाते समय कभी-कभी दाँत तले कंकर भी तो आ जाते हैं, उससे लोग भात खाना तो नहीं छोड़ देते।’’
चार वर्ष में तीन बच्चों को लेकर स्त्री के स्वास्थ्य और आज़ादी से जुड़े सवालों का जवाब गीता प्रेस की कल्याण की तर्ज पर मिलता है-‘‘जो औरत अपने बच्चों को बोझ समझे, उनसे आज़ादी चाहे, वह भला माँ कहलाने योग्य है? अपने घर के काम-काज में सुख पाना, अपने परिवार को खुश रखने का नाम गुलामी है, तो हज़ार बार मैं उस गुलामी के गुण गाऊँगी। जिस गुलामी में पति-पत्नी के बीच प्रेम है, एक-दूसरे की कद्र है, एक-दूसरे की खुशी का खयाल है, वह आपकी इस आज़ादी से बेहतर है, जो पुरुषों से नफरत के सिवा कुछ भी नहीं।’’
फिल्म में स्त्री की गरिमा, स्वतंत्रता, और तलाक के अधिकार जैसे सवालों को पुरुषों से नफरत और अमेरिका व यूरोप की उन औरतों की नकल बताया गया है, ‘जो हर सीजन में पति बदलती हैं।’ तुर्रा यह कि गुरुदत्त की इस फिल्म को सामाजिक-क्लासिक कहने वाले भी कम नहीं हैं। हद तो यह कि फिल्म के एक बेमतलब के संवाद का सहारा लेकर कुछ प्रगतिशील द्विज भी इस फिल्म की तारीफ का सार्वजनिक सुख लेने लगते हैं।
नायक प्रीतम गरीबों के लिए कोई जुमला बोलता है, तो सीता देवी सवाल करती हैं कि क्या तुम कम्युनिस्ट हो, नायक जवाब देता है, ‘जी नहीं, मैं कम्युनिस्ट नहीं, मैं कार्टूनिस्ट हूँ।’ ऐसे वाहियात कार्टूनिस्ट के लिए फिल्म में अपने कार्टून देने वाले आर.के. लक्ष्मण क्यों शर्मिंदा होते, जब ऐसी घटिया पटकथा और भद्दे संवाद लिखने में अबरार अल्वी को शर्म नहीं आई।
जिस तरह अंतर्विरोधों से भरी कांग्रेस और उसकी विपक्षी हिंदुत्ववादी व समाजवादी शक्तियों के अधिकांश नेताओं के सांस्कृतिक और दार्शनिक मूल्य ब्राह्मणवादी थे, हिंदी फिल्मों के बौद्धिक रहनुमाओं की मूल प्रेरणा भी तमाम नेहरूवादी-सोशलिस्ट और रोमांटिक प्रभावों के बावजूद ब्राह्मणवादी मूल्यों से आती थी। आंबेडकर जिस पितृसत्ता को ब्राह्मणीय पितृसत्ता कहते थे, उस पर चोट को ब्राह्मणवाद पर चोट की तरह महसूस कर सवर्ण पुरुष नेताओं और सवर्ण वर्चस्व वाले सिनेमा जगत के दिग्गजों का एक तरह से प्रतिक्रिया करना स्वाभाविक था।
गुरुदत्त और उनकी फिल्म मि. एंड मिसेज 55 पर लौटते हैं। स्त्रियों और एससी-एसटी के अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए बनाए गए कानूनों को सवर्ण दबदबे के इस सबसे भयानक सामाजिक-राजनीतिक दौर में जिस तरह खत्म करने का माहौल बनाया जा रहा है, उसमें इस फिल्म के ‘नींव की ईंट’ जैसे योगदान को समझा जा सकता है।
उत्तराखंड की भारतीय जनता पार्टी सरकार यूनिफॉर्म सिविल कोड के ज़रिए स्त्रियों की पार्टनर चुनने की स्वतंत्रता को नियंत्रित करने और लिव-इन जोड़ों के रजिस्ट्रेशन के नाम पर उनकी निजता को निगरानी में लाने का काम कर चुकी है। इस फिल्म के विचारों की तर्ज पर ही विवाहित स्त्रियों को आदतन हत्यारी बताने वाले मैसेज वायरल हो रहे हैं और आरोप लगाए जा रहे हैं कि युवतियाँ गुजारा भत्ता (एलिमनी) पाने के लिए योजनाबद्ध तरीके से अमीर लड़कों से विवाह कर झूठे आरोप लगाकर तलाक ले रही हैं।
बहरहाल, फासीवाद से गलबहियाँ करने वाले हिंदी के सवर्ण कवियों के समर्थन में आने वाले उनके सजातीय प्रगतिशीलों के तर्क ‘लेकिन वे बड़े कवि हैं’ को याद करते हुए, गुरुदत्त के सिनेमा की कलात्मक ऊँचाइयों को एक बार फिर याद कर लेते हैं।
(धीरेश सैनी स्वतंत्र पत्रकार हैं।)