बिहार चुनाव त्यौहार के बाद जोर पकड़ने लगा है। महागठबंधन ने अपना घोषणापत्र जारी कर दिया है। इस पर गठबंधन की सभी पार्टियों की छाप देखी जा सकती है।
जहां इसमें सबसे ज्यादा लोकप्रिय दो वायदे रोजगार से जुड़े हुए हैं। तेजस्वी के प्रण के नाम से जारी घोषणापत्र में हर परिवार को एक नौकरी देने का वायदा किया गया है। वैसे तमाम लोग इस वायदे की व्यावहारिकता पर सवाल खड़ा कर रहे हैं और विरोधी इसे चुनावी जुमला बता रहे हैं वहीं इसका ब्यौरा तेजस्वी अगले कुछ दिनों में पेश करने की बात कर रहे हैं। इसमें संभवतः वे खाली पदों तथा संविदा कर्मियों को सरकारी कर्मचारी मानने के साथ साथ शिक्षा स्वास्थ्य आदि में जो नए रोजगार पैदा करने की जरूरत और संभावनाएं हैं उन सब को ध्यान में रखते हुए ये वायदे कर रहे हैं।
उधर जीविका दीदियों का सवाल महिला के अतिरिक्त रोजगार से भी जुड़ा हुआ है। जिन 75 लाख जीविका दीदियों को नीतीश ने दस हजार रूपये का कर्ज दिया है उन्हें महागठबंधन द्वारा स्थाई सरकारी कर्मचारी बनाने और उन्हें तीस हजार का वेतन देने का वायदा किया गया है। संविदा कर्मियों को नियमित करने का वायदा किया गया है। इसके अलावा पुरानी पेंशन योजना बहाल कर कर्मचारियों को राहत देने की बात की गई है।
अन्य वायदों में माई बहिन मां योजना के तहत 2500 रु हर महीने अर्थात 30 हजार रु सालाना देने की बात कही गई है। ताड़ी को शराब बंदी कानून से छूट देने का वायदा किया गया है। बेरोजगार युवाओं को 2 से 3हजार रु भत्ता देने की बात की गई है। प्राइवेट स्कूलों में भी आरक्षण देने का वायदा किया गया है। युवाओं के लिए कुछ न करने पर नीतीश सरकार पर निशाना साधते हुए तेजस्वी ने वायदा किया कि हम नया बिहार बनाएंगे जहां हर घर को एक सरकारी नौकरी देने का पूरा रोडमैप जल्दी ही पेश किया जाएगा।
उन्होंने कहा कि हर तबके को आरक्षण आबादी के हिसाब से सुनिश्चित किया जायेगा। इसके लिए आरक्षण पर लगी 50% की सीमा को हटाया जाएगा और इसे संविधान के 9वें शेड्यूल में शामिल करवाया जाएगा। पंचायत आदि में अति पिछड़ों का कोटा 20%से बढ़ाकर 30%किया जाएगा ताकि इन निकायों में उनकी भागीदारी अपनी जनसंख्या के अनुरूप हो सके।
इसी तरह अनुसूचित जातियों का हिस्सा 16%से बढ़ाकर 20% किया जाएगा। प्राइवेट कॉलेजों में आधा आरक्षित सीटें होंगी।दलित व पिछड़े छात्रों को यूनिफॉर्म, छात्रवृत्ति तथा छात्रावास की सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी। अनुसूचित जाति, जनजाति अत्याचार निरोधक कानून को कड़ाई से लागू किया जाएगा। हर घर को 200 यूनिट बिजली मुफ्त दी जाएगी।
ग्रामीण महिलाओं को माइक्रो फाइनेंस कंपनियों के भारी ब्याज और उसकी वसूली के नाम पर उत्पीड़न से बचाया जाएगा। उन्हें नियंत्रित करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे। प्रदेश के हर नागरिक को 25 लाख का बीमा कवर मुफ्त दिया जाएगा। प्रतियोगी परीक्षाओं को पूरी तरह शुल्क मुक्त किया जाएगा और परीक्षा केंद्र तक जाने आने के लिए प्रतियोगी छात्रों को मुफ्त यात्रा की सुविधा दी जाएगी।
नीतीश भाजपा के शासन काल में जिस तरह पेपर लीक होते रहे और युवाओं की सालों साल की मेहनत पर पानी फिरता रहा उसे ध्यान में रखते हुए पेपर लीक पर कड़े कानून बनाए जाएंगे और पेपर माफिया के राज का अंत किया जाएगा। कक्षा 8 से लेकर 12तक के छात्रों को मुफ्त टैबलेट दिया जाएगा ताकि आधुनिक शिक्षा के सारे अवसर उनके लिए भी उपलब्ध हो सकें। प्रत्येक 70किमी पर एक कॉलेज या विश्वविद्यालय की स्थापना की जाएगी।
घोषणापत्र पर वामपंथ की स्पष्ट छाप देखी जा सकती है। ग्रामीण क्षेत्र में सामंती अवशेषों के खात्मे के लिए वामपंथ विशेषकर भाकपा माले के प्रभाव में अनेक वायदे किए गए हैं। इनके माध्यम से भूमि संकेद्रण को तोड़ने, बंटाईदार किसानों को सुरक्षा देने, भूमि की ऊपरी सीमा तय करने तथा उससे निकली जमीन को हाशिए के तबकों गरीबों और मजदूरों में वितरित किया जाएगा।
दरअसल 2006में नीतीश कुमार ने स्वयं इसी उद्देश्य से बंद्योपाध्याय कमेटी बनाई थी। लेकिन विडंबना देखिए कि कमेटी की रिपोर्ट को नीतीश कुमार ने स्वयं ठंडे बस्ते में डाल दिया और उसकी संस्तुतियों को मानने से इनकार कर दिया। इन्हीं बंद्योपाध्याय की कमेटी के संस्तुति के आधार पर प बंगाल में 70 के दशक में ऑपरेशन बर्गा नाम से भूमि सुधार हुआ था जो अब तक देश का सफलतम भूमि सुधार कार्यक्रम माना जाता है।
लेकिन अपनी ही बनाई कमेटी की संस्तुति को रद्दी की टोकरी में डालते हुए नीतीश कुमार ने कहा था कि आप किसी का पैसा चुरा लो वह चलेगा लेकिन अगर उसकी पत्नी या जमीन ले लो तो वह हिंसक हो उठेगा। बहरहाल एक बार फिर से महागठबंधन ने बंद्योपाध्याय कमेटी की रिपोर्ट को एजेंडा पर ला दिया है। कहा गया है कि भूमि की ऊपरी सीमा तय की जाएगी। अब 5 लोगों के परिवार को 15 एकड़ से अधिक भूमि रखने का अधिकार नहीं होगा। शेष भूमि का बंटवारा भूमिहीन गरीबों के बीच कर दिया जाएगा।
इसी तरह बंटाईदार किसानों को कानूनी संरक्षण दिया जाएगा। यदि उत्पादन लागत भूस्वामी लगाता है तो बंटाईदार को उपज का 60% और यदि लागत बंटाईदार लगाता है तो उसे उपज का 70 से 75% मिलेगा। जाहिर है महागठबंधन की सरकार बनी और यह संस्तुति अगर लागू हो सकी तो कृषि पर अर्ध सामंती वर्चस्व को तोड़ने में यह ऐतिहासिक और क्रांतिकारी कदम साबित होगा।
इसीलिए कांग्रेस के एक हिस्से और सवर्णों के द्वारा इसका विरोध भी अंदर अंदर हो रहा है लेकिन राहुल गांधी जो सामाजिक न्याय की लाइन लिए हैं उसके अनुरूप होने के कारण फिलहाल इसे स्वीकार कर लिया गया है।
कुल मिलाकर मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री का चेहरा पहले घोषित करके, जबकि एनडीए नीतीश कुमार के नाम की घोषणा नहीं कर रहा है, महागठबंधन ने एनडीए में एक दूसरे के प्रति विश्वास की नींव को हिला दिया है जिसके बिना एनडीए के विभिन्न दलों का परस्पर वोट ट्रांसफर मुश्किल हो गया है।
एक प्रगतिशील घोषणापत्र पहले पेशकर महागठबंधन ने एनडीए पर बढ़त ले ली है। भाजपा कोई नैरेटिव बना पाने में असफल है और ले देकर फिर उसी 20 साल पुराने जंगल राज के राग पर लौट आई है। 10% आबादी वाले सवर्णों को अपने 50% टिकट देकर उसने अपनी पक्षधरता साफ कर दी है।
महागठबंधन की पार्टियां अगर रोजगार नौकरियों के सवाल को तथा गरीबों से किए गए वायदे को जोरशोर से जनता के बीच पहुंचा सकी तो पिछले बार महज 12 हजार से पिछड़ने की न सिर्फ भरपाई कर लेंगी बल्कि 20 साल पुराने नीतीश भाजपा राज का अंत कर सत्ता में पहुंच सकती है। बेशक इसके लिए उसे प्रचार मतदान से लेकर काउंटिंग तक भाजपा नीतीश सरकार की तमाम साजिशों और तिकड़मों को शिकस्त देना होगा।
(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं।)