गरीबी-बदहाली, कुपोषण, अशिक्षा, बीमारी, असमय मौत, बेरोजगारी, पलायन और अपमान की चक्की में पिसता बिहार

मानव विकास के कुछ महत्वपूर्ण सूचकांकों के लिहाज से बिहार की आज की स्थिति को देखें तो पाएंगे कि बिहार गरीबी-बदहाली, कुपोषण, अशिक्षा, बीमारी, असमय मौत, बेरोजगारी, पलायन और अपमान की चक्की में पिस रहा है।

ये आंकड़े नीति आयोग, सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण, भारतीय रिजर्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के हैं:

महिलाओं का हाल :

2019-2021 तक के आंकड़े बताते हैं कि बिहार में कभी न कभी स्कूल गयी महिलाओं का प्रतिशत केवल 61% है। इस पैमाने पर बिहार 29 राज्यों में 28वें स्थान पर है। 95.5% महिलाओं के साथ केरल पहले, 83.8% महिलाओं के साथ दिल्ली और राजधानी क्षेत्र दूसरे और 81% महिलाओं के साथ हिमांचल प्रदेश तीसरे स्थान पर हैं।

बिहार में 20 से 24 वर्ष की आयु की ऐसी महिलाएं 41% हैं, जिनकी शादी 18 वर्ष से कम उम्र में हो गयी थी। यह स्थिति महिलाओं की हालत को कमजोर करती है। इस मानदंड पर भी बिहार 29 राज्यों में 28वें स्थान पर है। पहले स्थान पर हिमांचल प्रदेश (मात्र 5.4%), दूसरे पर केरल (6.3%) और तीसरे पर पंजाब (8.7%) हैं।

बच्चों का हाल :

जहाँ भारत की शिशु मृत्यु दर (प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर) 35.2 है, वहीं बिहार 46.8 की दर के साथ 29 राज्यों में 27वें स्थान पर है। इस मामले में केरल मात्र 4.4 बच्चों के साथ पहले, तमिलनाडु (18.6) दूसरे और पश्चिम बंगाल (22) तीसरे स्थान पर हैं।

उम्र के लिहाज से छोटे क़द वाले सबसे ज्यादा 42.9% बच्चों के साथ बिहार 29 राज्यों में अंतिम 29वें स्थान पर है, जबकि केरल पहले (23.4%), पंजाब दूसरे (24.5%) और तमिलनाडु तीसरे (25%) स्थान पर हैं।

क़द के हिसाब से कम वजन वाले बच्चों के मामले में बिहार 22.9% के साथ 29 राज्यों में 27वें स्थान पर है, जबकि पंजाब पहले (10.6%), दिल्ली और राजधानी क्षेत्र दूसरे (11.2%) और हरियाणा तीसरे (11.5%) स्थान पर हैं। इस मामले में बिहार की स्थिति खुद उसके ही 2015 के आंकड़ों की तुलना में और खराब हो गयी है।

बिहार के 41% बच्चे उम्र के हिसाब से कम वजन के हैं। इस मामले में भी वह 29 राज्यों में अंतिम, 29वें स्थान पर है, जबकि पंजाब पहले (16.9%), केरल दूसरे (19.7%) और उत्तराखंड तीसरे (21%) स्थान पर हैं।

साफ-सफाई का हाल :

राज्य में बेहतर स्वच्छता सुविधाओं का उपयोग करने वाली आबादी का हिस्सा भी सबसे कम (49.9%) है। इस मामले में केरल पहले (98.8%), पंजाब दूसरे (86.6%) और हरियाणा तीसरे (85%) पर हैं।

स्वास्थ्य का हाल :

बिहार में ऐसे परिवारों का प्रतिशत, जिनके कम से कम एक सदस्य किसी स्वास्थ्य बीमा या वित्तीय सहयोग योजना की सुविधा पाते हों, मात्र 14.6% हैं और उसका अंतिम 29वां स्थान है, जबकि राजस्थान के 87.7% (पहला), छत्तीसगढ़ के 71.4% (दूसरा) तथा आंध्र प्रदेश के 70.2% (तीसरा) परिवार इन स्वास्थ्य योजनाओं से सुरक्षित हैं।

मानव विकास सूचकांक में बिहार :

मानव विकास सूचकांक (एचडीआई), यूएनडीपी द्वारा तैयार किया गया एक अंक है जो किसी राष्ट्र या उसके राज्य का जीवन काल, ज्ञान तक पहुँच और जीवन स्तर के आधार पर मूल्यांकन करता है। 2022 तक भारत का औसत एचडीआई स्कोर 0.644 था, जबकि बिहार का 0.609 था। इन आँकड़ों में 27 राज्यों में बिहार सबसे निचली पायदान पर है। गोवा 0.791 अंक के साथ पहले स्थान पर रहा, जबकि केरल 0.789 अंक के साथ दूसरे पायदान पर है।

अर्थव्यवस्था और रोजगार का हाल :

राज्य के प्रति व्यक्ति शुद्ध घरेलू उत्पाद (वर्तमान मूल्यों पर प्रति व्यक्ति औसत आर्थिक उत्पादन) के मामले में भी बिहार 2023-24 में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाला राज्य (रु.60,337) है, जबकि पहले स्थान पर तेलंगाना (रु.3,56,564) । 

विनिर्माण क्षेत्र में बिहार के केवल 5.7% लोग रोजगार में हैं और इस मामले में वह 29 राज्यों में 23वीं पायदान पर है, जबकि गुजरात (23.7%) पहले और पश्चिम बंगाल (18.7%) दूसरी पायदान पर हैं।

सेवा क्षेत्र में बिहार के केवल 25.5% लोग रोजगार में हैं और वह 29 राज्यों में 21वीं पायदान पर है, जबकि केरल (44.2%) पहली और हरियाणा (39.1%) दूसरी पायदान पर हैं।

शिक्षा का हाल :

कक्षा 1 से 8वीं तक में नामांकन में बिहार 97% के साथ 29 राज्यों में 18वें स्थान पर है, जबकि कई राज्यों में यह 100% है।

9वीं-10वीं कक्षा में स्कूल छोड़ देने वाले (ड्रॉपआउट) बच्चों के मामले में भी बिहार 20.5% के साथ 29 राज्यों में 27वें स्थान पर है, जबकि हिमांचल प्रदेश 1.5% के साथ पहले और तमिलनाडु 4.5% के साथ दूसरे स्थान पर है।

11वीं-12वीं कक्षा में कुल नामांकन अनुपात बिहार में मात्र 35.9% है और वह 29 राज्यों में 28वीं पायदान पर है, जवकि हिमांचल प्रदेश 94.1% के साथ पहली और केरल 85% के साथ दूसरी पायदान पर हैं।

उच्च शिक्षा (18 से 23 साल) में सकल नामांकन अनुपात बिहार में मात्र 17.1% है, यानि स्कूली शिक्षा पूरी करने वाले केवल 17.1% बच्चे ही कॉलेज शिक्षा में प्रवेश ले पाते हैं, और वह 28वीं पायदान पर है, जबकि वहीं 47% के साथ तमिलनाडु पहली और 43.1% के साथ हिमांचल प्रदेश दूसरे पायदान पर हैं।

पर्यावरण का हाल :

सामाजिक-आर्थिक सूचकांकों में अपनी खराब रैंकिंग के बावजूद, बिहार ने पर्यावरणीय संकेतकों में अच्छा प्रदर्शन किया। राज्य ने प्रति 1,000 जनसंख्या पर केवल 0.61 टन प्लास्टिक उत्पन्न किया और 29 राज्यों में छठे स्थान पर रहा, जबकि झारखंड पहले और आंध्र प्रदेश दूसरे स्थान पर रहे।

इसी तरह प्रति व्यक्ति जीवाश्म ईंधन की खपत भी बिहार में सबसे कम रही। हालाँकि, यह ध्यान देने योग्य है कि जीवाश्म ईंधन की खपत में कमी कम औद्योगिक गतिविधियों के कारण भी हो सकती है।

हम देख रहे हैं कि पोषण, स्वास्थ्य, रोजगार, अर्थव्यवस्था, शिक्षा और महिला सशक्तीकरण संबंधी सभी संकेतकों में बिहार पिछले 20 सालों में कभी भी सर्वश्रेष्ठ 15 राज्यों की रैंकिंग में भी शामिल नहीं हो पाया है। वह 29 राज्यों में लगातार अंतिम दो-तीन में बना हुआ है।

इस बीच बिहार पर तथाकथित ‘जंगलराज’ से लेकर ‘डबल इंजन सरकार’, सबका राज्य रहा, बल्कि ‘सुशासन बाबू’ नीतीश कुमार ही सबसे लंबे कार्यकाल तक यहां के मुख्यमंत्री रहे हैं।

क्या कारण है कि बिहार की किस्मत सँवर नहीं रही? यहां के नौनिहालों की मौतों और कुपोषण का गुनहगार कौन है? बच्चे ठीक से विकसित नहीं हो रहे, ठिगने और दुर्बल हो रहे हैं और पढ़ाई छोड़कर रोजगार की तलाश में अनारक्षित ट्रेनों के दरबों में ठुंस कर देश-दुनिया के अन्य कोनों में पलायित होने को अभिशप्त हैं। उन शहरों में भी उन्हें ऊंची-ऊंची बहुमंजिला इमारतों से लटककर रंग-रोगन और खिड़कियों के शीशे साफ करने जैसे बहुतेरे कामों के दौरान जान हथेली पर लिये रहना होता है, इसके बावजूद वे वहां अनपेक्षित होते हैं और आये दिन जलालत झेलनी पड़ती है।

उपरोक्त सारे आंकड़े तो समग्र बिहार के हैं। बिहार के भीतर भी तो असमानता के इतने संस्तर हैं जिनसे इन अभावों और वंचनाओं के असली शिकारों के हालात की भयावहता का अंदाजा भी लगाना मुश्किल है।

बिहार में भी आपको हर तरफ ग़रीबी और बदहाली के सागर के बीच कहीं-कहीं समृद्धि के टापू नजर आएंगे। शहर और गांव, सवर्ण और पिछड़े-दलित, पुरुषों-महिलाओं, खेतिहरों-भूमिहीनों इन सबके बीच उपरोक्त आंकड़ों को बांटकर देखेंगे तो बिहार की अधिकांश ग्रामीण-पिछड़ा-दलित-स्त्री-भूमिहीन-अल्पसंख्यक आबादी के बीच अल्पायु में मृत्यु, जच्चा-बच्चा मृत्यु, कुपोषण, अशिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव, साफ-सफाई (सैनिटेशन) ढांचों की कमी, बेरोजगारी, अल्प रोजगार की स्थितियां, बंधुआ मजदूरी जैसी नारकीय हालात की मार सबसे ज्यादा पड़ती है। वहां ये आंकड़े कई गुना ज्यादा भयावह हो जाते हैं।

क्या वर्तमान चुनावों से बिहार अपने शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, महिला सशक्तीकरण, बेहतर उद्योग-धंधों, विनिर्माण संयंत्रों, बढ़ी हुई प्रति व्यक्ति आय, बढ़ते रोजगार अवसरों, बेहतर खेती-किसानी तथा ग़रीबी और असमानता से मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ेगा?

क्या वहां की अधिकांश आबादी अपने आर्थिक शोषण, सामाजिक उत्पीडन, ग़रीबी, बेरोजगारी, ग़ैर-बराबरी और जलालत के भँवर से बाहर निकलकर एक बेहतर कल के सपने देख पायेगी?

क्या एक गौरवशाली अतीत वाली यह धरती अपनी आत्महीनता के इस तिलिस्म को तोड़ पायेगी?

आइए, हम निराश होने की जगह इन प्रश्नों के उत्तर के रूप में एक उम्मीद भरी ‘हाँ’ बोलें!

प्रस्तुति : शैलेश

(आंकड़े 28.10.2025 के ‘द हिंदू’ में नीतिका फ्रांसिस के लेख से)

Leave a Reply