जगदलपुर। पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ की छत्तीसगढ़ ईकाई के तत्वावधान में बस्तर की आदिवासी महिलाओं के द्वारा “बस्तर में आदिवासियों की हत्याएं कैसे रोकें” विषय पर परिचर्चा एवं जन-सुनवाई का आयोजन संभाग मुख्यालय जगदलपुर में 24 से 26 अगस्त 2024 को किया गया। 100 से अधिक पीड़ित बस्तर के विभिन्न स्थानों से इस परिचर्चा एवं जन-सुनवाई में सम्मिलित हुए।
इस परिचर्चा और सार्वजनिक सुनवाई के उद्देश्य हैं :
- अनगिनत निर्दोष आदिवासी ग्रामीणों की गैर-न्यायिक हत्याओं और जेल में उनकी अवैध हिरासत की स्थितियों पर एक जांच।
- बस्तर में लगातार बढ़ती फर्जी मुठभेड़ की घटनाओं के संदर्भ में पीड़ित परिवार के सदस्यों, प्रत्यक्षदर्शियों और ग्रामीणों की गवाही।
- संघर्ष क्षेत्र में स्वदेशी जनजातीय लोगों की सुरक्षा के लिए संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों के आधार पर विफलता के मुख्य कारण और कानूनी उपाय।
- न्याय के लिए संघर्षरत उत्पीड़ित आदिवासियों के पक्ष में बुद्धिजीवियों का एकजुटता वक्तव्य।
- आदिवासी लोगों के संवैधानिक अधिकार और उनके अनुपालन के लिए लोकतांत्रिक राज्य की जवाबदेही।
डॉ. कॉलिन गोंसाल्वेस भारत के सर्वोच्च न्यायालय के एक नामी वरिष्ठ अधिवक्ता हैं। वे मानवाधिकार संरक्षण, श्रम क़ानूनों और जनहित क़ानूनों के विशेषज्ञ हैं।
उन्हें “भारत के सबसे हाशिए पर पड़े और कमजोर नागरिकों के लिए मौलिक मानवाधिकारों को सुरक्षित करने के लिए तीन दशकों से अधिक समय तक जनहित याचिकाओं के उनके अथक और अभिनव उपयोग” के लिए वर्ष 2017 का ‘राइट लाइवलीहुड अवॉर्ड’ से सम्मानित किया गया है। पीयूसीएल के सहयोगी व समर्थक के रूप में वो इस कार्यक्रम में विशेष रूप से सम्मिलित हुए।
इस कार्यक्रम में भारत के सर्वोच्च न्यायालय, नयी दिल्ली के सेवानिवृत्त न्यायाधीश तथा मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश जस्टिस (रिटायर्ड) ए. के. पटनायक भी शामिल होने वाले थे, लेकिन किसी कारणवश वे इसमें शामिल नहीं हो पाए।
प्रथम सत्र का विषय था- “बस्तर में न्यायोत्तर हत्याओं, निर्दोष आदिवासी ग्रामीणों की अवैध हिरासत और जेल में हिरासत की स्थितियों पर एक नजर”। सत्र को सोनी सोरी और हिडमे मरकम, वरिष्ठ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने संबोधित किया।
उन्होंने बताया कि स्थानीय ग्रामीणों और समाचारों के मुताबिक अब तक बस्तर में सन 2024 में मुठभेड़ की 46 घटनाएं हुई हैं, जिसमें करीब 168 आदिवासियों की जान जा चुकी हैं। इन सभी मुठभेड़ों और मौतों पर ग्रामीणों ने गंभीर सवाल उठाये हैं।
दूसरे, पांचवे और छठवें सत्र में पीड़ितों ने अपनी आप-बीती सुनाई। जन-सुनवाई के माध्यम से बस्तर के 70 से अधिक लोगों का वीडियो बयान दर्ज किया गया है।
सभी ने स्वेच्छा से अपनी पीड़ा बताई कि कैसे उनके परिजनों को माओवादियों के नाम पर प्रताड़ित किया गया है, फर्जी मुकदमों में जेलों में बंद किया गया है, मुठभेड़ों मे हत्या की गयी है और महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया है।
अंदरुनी इलाकों में घटने वाली ऐसी ज्यादातर घटनाएं बाहर नहीं आ पाती हैं। बयान दर्ज करवाने वाले पीड़ितों में महिलाएं, पुरुष, युवा और बच्चे शामिल थे। पीड़ित परिवारों ने कहा कि अपनों को खोने के बाद न्याय के लिए वे दर-दर भटक रहे हैं।
सरकार सुन नहीं रही है और आदिवासी बेमौत मारे जा रहे हैं। आदिवासियों ने कहा कि बस्तर में तीन दशक से जारी खूनखराबा बंद होना चाहिए। इसमें हर तरफ से आदिवासी ही मारे जा रहे हैं, उनका अस्तित्व खतरे में है।
बड़ी संख्या में पीड़ित लोग बीजापुर, दंतेवाड़ा, सुकमा, नारायणपुर, कोंडगांव और बस्तर के अनेक क्षेत्रों से आने वाले थे। लेकिन पुलिस ने काफी लोगों को बीच रास्ते मे रोक दिया। इंद्रावती नदी के पार माड़ इलाके के भी काफी लोग इस कार्यक्रम में आकर अपनी आपबीती नहीं सुना सके।
इस जनसुनवाई के दौरान आदिवासी युवा लोगों ने गोंडी व हिंदी में स्वलिखित-स्वरचित अनेक गीत भी प्रस्तुत किए, जिसमें उन्होंने अपनी पीड़ा और व्यथा को व्यक्त किया, न्याय की मांग की और संविधान के अनुसार देश के नागरिक के रूप मे आत्म-सम्मान और शांति के साथ जीने की लालसा प्रगट की।
तीसरे सत्र को उच्चत्तम न्यायालय, नयी दिल्ली के वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. कॉलिन गोन्साल्वेज ने संबोधित किया। कॉलिन गोंसाल्विज ने बताया कि ऐसा नहीं है कि बस्तर से पहले इस तरह के मामले देश में कहीं नहीं हुए।
2022 से पहले मणिपुर मे हालत इससे भी खराब थे, जहां हर साल सेना और अर्धसैनिक बलों पर फर्जी मुठभेड़ के द्वारा 300 से अधिक हत्याओं के मामले सामने आते थे। ऐसे में उनकी टीम ने ठीक इसी तरह मणिपुर जाकर पीड़ितों के वीडियो बयान दर्ज किए और उनकी तरफ से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले को गंभीरता से लिया और सारी घटनाओं की जांच के आदेश दिए, जिसके लिये दूसरे राज्य के सेवानिवृत्त पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) समेत अन्य लोगों की टीम तैयार की गई। उन्होंने मौके पर पहुंचकर स्थानीय लोगों से बात कर वीडियो डॉक्यूमेंट तैयार किया।
इसकी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में पेश की, कोर्ट ने जवाबदेही तय की और आवश्यक निर्णय सुनाए। इसी का नतीजा रहा कि यहां पिछले दो साल में इस तरह की घटनाएं 2-3 तक सिमट गईं हैं। जब मणिपुर में घटनाएं रुक सकती हैं, तो बस्तर में क्यों नहीं? इसीलिए अब यहां भी मणिपुर पैर्टन में काम किया जाएगा।
उन्होंने आरोप लगाए कि बस्तर के हालात गाजा जैसे हो गए हैं। भारत में ऐसा कोई राज्य नहीं है, जहां इस तरह की हत्याएं हो रही हों। उन्होंने पुलिसिया कार्यप्रणाली पर गंभीर आरोप लगाए। उनके अनुसार पुलिस आदिवासियों की हत्या के लिए जिम्मेदार है। एक तरह से छत्तीसगढ़ खतरनाक राज्य बन चुका है।
चौथे सत्र का विषय था- “छत्तीसगढ़ की स्थिति पर एक नजर”। सत्र को पीयूसीएल छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष डिग्री प्रसाद चौहान ने संबोधित किया। उन्होंने बस्तर के आदिवासियों और समस्त नागरिकों को सब तरह की हिंसा और प्रताड़ना का सामना एकजुटता के साथ करने का आह्वान किया। उन्होंने पेसा एक्ट के सांप्रदायिकरण पर भी चिंता व्यक्त की।
सातवें सत्र का विषय था-“संघर्ष क्षेत्रों में आदिवासियों के अधिकार”। सत्र को डॉ. कॉलिन गोन्साल्वेज ने संबोधित किया। केंद्र सरकार के 2026 तक नक्सलवाद मुक्त बयान पर सवाल करते हुए उन्होंने कहा कि, यदि सरकार अपने तरीके से नक्सलवाद खत्म करने की बात कह रही है, तो ऐसी घटनाएं आदिवासियों के अस्तित्व को खत्म कर रहीं है।
उन्होंने कहा, एडसमेंटा और ताड़मेटला जैसे मामलों में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने घटनाओं को फर्जी बता दिया है। इसके बाद भी इन घटनाओं को लेकर जिम्मेदारी तय नहीं हो रही, जो बेहद दुखद है। सरकार को चाहिए कि वह गलत घटनाओं के लिये जिम्मेदारी तय करें। इससे पुलिस द्वारा बेकसूर आदिवासियों पर हमले रुकेंगे।
कुछ समय पहले तक बस्तर में सलवा जुडूम चल रहा था, जिसकी आड़ में हथियारबंद लोग आदिवासियों को मार रहे थे। सर्वोच्च न्यायालय ने जब इस पर रोक लगाई तो आदिवासियों को मारने के लिए अधिकृत तौर पर डीआरजी बना दी गई। डॉ. कॉलिन गोन्साल्वेज ने कहा कि, हम सुप्रीम कोर्ट से मांग करने वाले हैं कि डीआरजी के काम के दायरे को तय किया जाए।
गोंसाल्वेस ने कहा कि बस्तर में पुलिस और सुरक्षाबलों को दिये जाने वाले इनाम और मेडल का ऑडिट होना चाहिए। पुलिस और सुरक्षा बलों ने कितने लोगों को मारा है, इसकी जांच स्वतंत्र एजेंसी से होनी चाहिए। छत्तीसगढ़ में पुलिस और सुरक्षा बलों को दिये जा रहे फंड और काम का सही ऑडिट नहीं हो रहा है।
बस्तर में पुलिस और सुरक्षा बल माइनिंग कंपनियों के वॉचमैन के तौर पर काम कर रहे है। माइनिंग (खनन) के लिए आदिवासियों को खत्म किया जा रहा है, जबकि खात्मा नक्सलियों का होना चाहिए। नक्सलवादियों द्वारा की जा रही घटनाओं पर भी उन्होंने दुःख जताया।
डॉ. गोंसाल्वेस ने कहा कि सरकार को मालूम है कि कौन नक्सली है और कौन आदिवासी। फिर भी लगातार आदिवासियों की हत्या हो रही है, जो अविलंब बंद होनी चाहिए। पुलिस और नक्सलियों के बीच जो युद्ध चल रहा है उसमें आदिवासियों को बाहर किया जाना चाहिए।
जब भी कोई एनकाउंटर होता है, तब नक्सलियों और पुलिस के बीच आदिवासियों को लाकर खड़ा कर दिया जाता है। सरकार को यह सब करना बंद करना चाहिए। सरकार को रास्ता पता है कि समस्या का समाधान किस तरह करना है। जो नक्सली हैं उन्हें जेल में डाल दिया जाए, लेकिन जो आदिवासी बेकसूर हैं, उनकी हत्याएं बंद होनी चाहिए।
आठवें सत्र का विषय था- “बस्तर में आदिवासी अधिकारों की सुरक्षा”। सत्र को वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता गौतम बंदोपाध्याय व वी. एन. प्रसाद राव, रिसर्चर व पत्रकार आकाश पोयाम, बिलासपुर उच्च न्यायालय के अधिवक्ता किशोर नारायण व रजनी सोरेन, जगदलपुर जिला एवं सत्र न्यायालय के अधिवक्ता सोनसिंग झाली ने संबोधित किया।
एक विशेष सत्र मे आदिवासी ईसाइयों पर हो रही हत्या, हिंसा, प्रताड़ना, सामाजिक-बहिष्कार पर परिचर्चा और जन-सुनवाई का आयोजन किया गया। इस सत्र मे 10 पीड़ितों ने अपनी व्यथा सुनाई।
नौवें सत्र का विषय था- “परिचर्चा एवं जन-सुनवाई का निष्कर्ष”। अंत में आगामी योजना पर विचार-विमर्श किया गया। इन वीडियो डॉक्यूमेंट के जरिए 15 से 20 पीड़ित आदिवासी याचिकाकर्ता की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई जाएगी कि किस प्रकार बस्तर में पुलिस, डीआरजी और अर्धसैनिक बलों के द्वारा मानव अधिकारों का हनन किया जा है।
याचिका में इन एनकाउंटरों की जांच एक स्वतंत्र जांच कमेटी से करवाने की मांग जाएगी, जिसमें सेवानिवृत्त न्यायाधीश, दूसरे प्रदेश के सेवानिवृत्त पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) व अधिकारी सम्मिलित हों।
आदिवासियों को न्याय न मिलने की स्थिति में इन वीडियो डॉक्यूमेंट को संयुक्त राष्ट्र संघ में भी दिखाया जाएगा, जिससे कि बस्तर के आदिवासियों के मानव अधिकारों के हनन पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस हो और इसे रोका जा सके।
(पीयूसीएल, छत्तीसगढ़ की प्रेस विज्ञप्ति)
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