टीजीटी पेपर में गलतियों की कैसे तय करेंगे जिम्मेदारी : इलाहाबाद हाईकोर्ट

टीजीटी अंग्रेजी के एक प्रश्नपत्र में 33 सवाल गलत या आउट ऑफ सेलेबस पूछे जाने पर नाराज़ इलाहाबाद हाई कोर्ट ने माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन आयोग से पूछा है कि भविष्य में इस प्रकार की गलती न हो इसके लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं? कोर्ट ने प्रश्नपत्रों के अलग-अलग सेट तैयार करने लेकर अंतिम रूप से उनके चयन में आयोग की भूमिका पर भी सवाल उठाया। कोर्ट ने हैरानी जताई कि आयोग में कोई ऐसा सिस्टम नहीं है जो प्रश्नपत्रों के चयन में अपने विवेक का इस्तेमाल करे, तैयार किए गए प्रश्न सही है या गलत यह देखे।

मामले की सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन ने चयन आयोग के सचिव और परीक्षा नियंत्रक को तलब किया था। बुधवार को दोनों अधिकारी हाजिर हुए। उनकी ओर से दाखिल हलफनामे में प्रश्नपत्र तैयार करने की प्रकिया की जानकारी कोर्ट को दी गई, जिन एजेंसियों से प्रश्नपत्र तैयार करवाए जाते है उनसे आयोग के बीच हुए मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग का प्रोफार्मा सील बंद लिफाफे में कोर्ट पेश किया गया।

आयोग के वकील के शाही ने कोर्ट को बताया कि प्रश्नपत्र अलग-अलग एजेंसियों से तैयार करवाए जाते हैं। दो एजेंसियां दो दो सेट पेपर तैयार कर आयोग को सौंपती हैं। फिर चेयरमैन उनमें से किसी एक सेट का रैंडम चयन करते हैं। कोर्ट ने जानना चाहा कि एजेंसियों द्वारा तैयार प्रश्न सही हैं या गलत इसकी जांच कैसे होती है। कोर्ट ने इस बात पर हैरानी जताई कि आयोग अध्यक्ष टाॅस से प्रश्न पत्र का चयन करते हैं जबकि प्रश्नों की विश्वसनीयता देखने का आयोग के पास कोई मैकेनिज्म नहीं है।

कोर्ट ने कहा मौजूदा विवाद में 33 प्रश्नों के गलत या आउट ऑफ सेलेबस होने का आरोप है। कुल 125 प्रश्नों का लगभग 25 फीसदी, अगर 50 प्रतिशत सवाल गलत हो तो आयोग क्या करेगा, क्या परीक्षा रद्द की जाएगी। आयोग की ओर से कहा गया कि गलत सवालों के अंक समान रूप से अन्य प्रश्नों में वितरित कर दिए जाते हैं।

एजेंसी पर गलत सवाल के लिए एक लाख रुपए प्रति सवाल जुर्माना लगाने का भी प्रावधान है। कोर्ट ने कहा आयोग के कार्यों में पारदर्शिता होनी चाहिए, क्योंकि छात्रों को प्रकिया की जानकारी नहीं है। ऐसे में गलत लोग उनका फायदा उठाते हैं।

कोर्ट ने यह भी पूछा कि आर्थिक दंड के अलावा एजेंसी पर क्या कोई और कार्रवाई जैसे ब्लैक लिस्ट करने की व्यवस्था है। याचियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राधा कांत ओझा ने कहा कि आयोग इस बात का खुलासा नहीं कर रहा है कि इन 33 प्रश्नों में से वो कौन से प्रश्न हैं जो गलत है।

आयोग का कहना था छात्रों की आपत्तियों पर विचार करने के बाद 25 प्रश्न आउट ऑफ सेलेबस पाए गए हैं जबकि आठ सवाल सही पाए गए हैं। राधाकांत ओझा ने कहा कि उन आठ प्रश्नों की भी जानकारी प्रतियोगियों को दी जाए ताकि उनमें से यदि कोई प्रश्न आउट ऑफ सेलेबस हो तो उस पर आपत्ति की जा सके। कोर्ट ने 17 अगस्त तक आयोग को वह आठ प्रश्न याचियों को बताने का निर्देश दिया है।

हाई कोर्ट ने आयोग के सचिव से कहा है कि वह भविष्य में ऐसी गलतियों को रोकने के लिए कदम उठाएं। कोर्ट ने कहा कि आयोग क्या प्रक्रिया अपनाएगा इसमें अदालत दखल नहीं देगी, मगर कदम उठाना जरूरी है। इस मामले में अगली सुनवाई एक सितंबर को होगी।

(जनचौक ब्यूरो)

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