ईरान से युद्ध खत्म करने के लिए डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन को जिस 14 सूत्री सहमति-पत्र (एमओयू) पर दस्तखत करने पड़े, अमेरिका के राजनीतिक हलकों एवं मीडिया की चर्चाओं में उसके लिए ‘समर्पण’, ‘पराजय’, ‘retreat’ (कदम वापस खींचने को मजबूर होना), ‘सेटबैक’ (तगड़ा झटका) आदि जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी के नेताओं और उनसे जुड़े मीडिया तंत्र ने इसे समर्पण बताया है, जबकि न्यू-कॉन्स (न्यू कंजरवेटिव्स समूह, जो दुनिया पर अमेरिका का वर्चस्व अक्षुण्ण बनाए रखने के पैरोकार हैं) ने इसे पराजय के रूप में पेश किया है।
अक्सर न्यू-कंजरवेटिव विचारों को जगह देने वाली पत्रिका- फॉरेन पॉलिसी- ने एक विश्लेषण- ईरान वियतनाम से भी बुरी हार हैः युद्ध का चुना गया रास्ता अमेरिका के लिए विनाशकारी साबित हुआ- शीर्षक से प्रकाशित किया। यहां 51 साल पहले के वियतनाम युद्ध में अमेरिका की हुई हार से तुलना महत्त्वपूर्ण है। विश्लेषक पॉल मसग्रेव की दलील है कि वियतनाम से हुई करारी शिकस्त के बावजूद तब दुनिया पर अमेरिकी वर्चस्व पर कोई प्रश्न नहीं उठा था। जबकि ईरान युद्ध के परिणाम ने इस पर बुनियादी सवाल उठा दिए हैं। कैसे?
इस सिलसिले में फॉरेन पॉलिसी में छपे लेख में इन तथ्यों का जिक्र किया गया हैः
- ईरान संघर्ष में अमेरिकी हथियारों का तकनीकी रूप से श्रेष्ठ प्रदर्शन देखने को मिला, लेकिन उस पर अमेरिकी शस्त्रागार के खालीपन/कमी का साया पड़ गया है। उससे सवाल उठा है कि इस्लामी गणराज्य ईरान से अधिक शक्तिशाली किसी दुश्मन के साथ युद्ध हुआ, तो क्या होगा? क्या उस चुनौती के लिए अमेरिका तैयार है?
- इस संघर्ष में हाई-टेक युद्ध में अमेरिका की क्षमता दुनिया ने देखी। लेकिन ‘डेटाबेस त्रुटि’ के परिणामस्वरूप (मिनाब में) मारी गई ईरानी स्कूली छात्राओं के खून से सने बैगों का साया उस पर हमेशा पड़ा रहेगा।
- हालांकि अमेरिकी रक्षा प्रणालियों (defensive systems) ने ईरानी मिसाइलों और वन-वे अटैक ड्रोन के खिलाफ अच्छा प्रदर्शन किया, फिर भी ईरान उन प्रणालियों को भेदकर बड़ा नुकसान पहुंचाने में सफल रहा। इससे यह सवाल खड़ा हुआ है कि अधिक मजबूत दुश्मन के खिलाफ या अधिक लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष में अमेरिकी प्रणालियां कितनी कारगर साबित होंगी?
- रणनीतिक रूप से इसके परिणाम कहीं अधिक गंभीर हैं। अमेरिका ने ईरान में एक तरह का शासन-परिवर्तन तो हासिल किया, लेकिन तेहरान को आज्ञाकारी पिछलग्गू बनाने के बजाय इस युद्ध ने ईरान को और अधिक कट्टरपंथी (hard-liner) बना दिया है। ईरान की कमान प्रभावी रूप से ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स’ (IRGC) के हाथों में आ गई है।
- इजराइली और अमेरिकी हथियार युद्ध के शुरुआती दिनों में अपनी क्रूरता में चाहे कितने ही प्रभावी रहे हों, आखिरकार उन्होंने सैन्य कार्रवाइयों से समाधान (kinetic solutions) की सीमाओं को ही प्रदर्शित किया, जिसका ईरान को बड़ा फायदा हुआ है। ईरान का परमाणु कार्यक्रम अब तक इजराइल और अमेरिका के दो दौर के संयुक्त हवाई हमलों को झेल चुका है। यह संभावना बहुत कम है कि तीसरा दौर इससे बेहतर साबित होगा।
- दुनिया पर अमेरिकी वर्चस्व के ऊपर इसके प्रभाव कहीं अधिक गहरे होंगे। क्षेत्रीय सहयोगी देश- जिनमें से कइयों ने कथित तौर पर इस दुस्साहस (युद्ध) के खिलाफ तर्क दिया- उन्हें इस लड़ाई के नतीजे का सबसे बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ा। सबसे खास बात यह रही कि ईरान यह समझ गया कि होरमुज जलडमरूमध्य से आवाजाही को ठप करने की उसकी क्षमता उसे वैश्विक स्तर पर एक बड़ा आर्थिक प्रभाव दिला सकती है।
- नौवहन की स्वतंत्रता (freedom of navigation) को सुनिश्चित करना दो शताब्दियों से भी अधिक समय से अमेरिका का एक मुख्य रणनीतिक उद्देश्य रहा है। राष्ट्रपति थॉमस जेफरसन ने 1800 के दशक की शुरुआत में भू-मध्यसागरीय शक्तियों को दिए जाने वाले टैक्स को रोकने के लिए नौसेना भेजी थी। होरमुज जलडमरूमध्य से मुक्त आवाजाही का संभावित अंत व्यापारिक मार्गों के शस्त्रीकरण (weaponization) का संकेत है, जिससे विश्व व्यापार का स्वरूप स्थायी से बदल सकता है। (https://archive.is/rsAQV#selection-3807.0-3818.0)
तो जाहिर है कि ईरान पर हमला करना फौरी और दीर्घकालिक दोनों नजरिए से अमेरिका के लिए महंगा पड़ा। सार यह है कि ये युद्ध अमेरिका की सैनिक शक्ति की सीमाओं को स्पष्ट कर गया है। ऐसा उस वक्त हुआ है, जब आर्थिक क्षेत्र में अमेरिका की उत्पादक क्षमता का पराभव जग-जाहिर है और नई तकनीक में उसकी अग्रणी हैसियत को चीन से गंभीर चुनौतियां मिल रही हैं। साथ ही लोकतंत्र एवं मानव अधिकारों का पैरोकार होने, खुला समाज होने, और अवसर की भूमि होने के कथानकों से गढ़ा गया उसका सॉफ्ट पॉवर भी जर्जर अवस्था में है।
यही वजह है कि ईरान युद्ध में अमेरिकी सैनिकों की जान के लिहाज से बहुत कम नुकसान के बावजूद पॉल मसग्रेव जैसे विश्लेषक इसके परिणाम को अमेरिका के लिए वियतनाम से भी बड़ी हार मान रहे हैं। वियतनाम में अमेरिका को सैन्य के साथ विचारधारात्मक पराजय का भी सामना करना पड़ा था। कम्युनिस्ट विचारधारा से लैस लगभग निरस्त्र वियतनाम-वासियों ने तब दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति को निर्णायक रूप से हरा दिया था। लेकिन तब अमेरिका की आर्थिक एवं तकनीकी क्षमता बेजोड़ थी। लोकतंत्र एवं खुला समाज होने के उसके दावों को भी तब लगभग बिना आलोचना के स्वीकार किया जाता था।
वैसे, अमेरिका को हार का मुंह तो पांच साल पहले अफगानिस्तान में भी देखना पड़ा था। मगर उसका संदर्भ अलग एवं सीमित था। वहां 20 साल चले युद्ध में तालिबान ने गुरिल्ला वॉर जैसे तरीकों से अमेरिका को थका कर अपनी सेनाएं ले भागने के लिए मजबूर किया। इसके अलावा इराक और लीबिया में भी भारी विनाश करने के बावजूद अमेरिका उन देशों में अपने घोषित सैन्य उद्देश्यों को प्राप्त नहीं सका था। ये और बात है कि वहां के ऊर्जा संसाधनों पर कब्जा जमाने का अघोषित मकसद उसने हासिल कर लिया था।
बहरहाल, ईरान युद्ध का संदर्भ उन लड़ाइयों से बिल्कुल अलग है। ईरान ने प्रत्यक्ष युद्ध में अमेरिकी ताकत की सीमाओं को उजागर किया, जिसकी पहले से चीन और रूस के साथ अघोषित धुरी बनी हुई है। चीन अमेरिकी साम्राज्यवाद के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन कर उभरा है। वह उन तमाम देशों के लिए परोक्ष सहायक एवं सहारा बना हुआ है, जो पश्चिमी साम्राज्यवाद की मर्जी के खिलाफ जाकर अपनी संप्रभुता की रक्षा एवं संप्रभु विकास परियोजनाओं पर अमल के लिए संघर्षरत हैं। इसीलिए ईरान की “जीत” को अमेरिकी/ पश्चिमी वर्चस्व के खिलाफ एक महत्त्वपूर्ण, यहां तक कि युगांतकारी घटनाक्रम के रूप में भी देखा गया है।
यह याद रखना चाहिए कि डॉनल्ड ट्रंप ने दूसरी बार राष्ट्रपति पद संभालते ही दूसरे विश्व युद्ध के बाद निर्मित हुई विश्व व्यवस्था में तोड़-फोड़ मचा दी। इस क्रम में उन्होंने संप्रभुता के सिद्धांत को घोषित रूप से ठुकरा दिया। ट्रंप प्रशासन ने संप्रभु देशों में तब तक परोक्ष माध्यमों से होने वाले हस्तक्षेप को प्रत्यक्ष एवं घोषित नीति का हिस्सा बना दिया। उसने अंतरराष्ट्रीय कानून को खुलेआम ठुकराने और खुद अमेरिका निर्मित “नियम-आधारित व्यवस्था” की धज्जियां उड़ानी शुरू कर दी। ईरान युद्ध के पहले इसकी ठोस मिसालें व्यापार युद्ध एवं वेनेजुएला पर किया गया अवैध एवं अनुचित हमला था, जिसमें वहां के राष्ट्रपति निकोलस मदुरो और उनकी पत्नी का अपहरण कर लिया गया।
बहरहाल, इन घटनाक्रम को महज एक नेता या प्रशासन के निर्णय का परिणाम समझना गलती होगी। दरअसल, यह अमेरिकी शासक वर्ग का सामूहिक निर्णय है। जब आर्थिक एवं तकनीकी क्षेत्रों तथा प्राकृतिक संसाधनों एवं विश्व बाजार पर नियंत्रण रखना कठिन होता जा रहा हो, तब नियमों का लबादा ओढ़ने, और सभ्यता एवं उच्चतर मूल्यों का बखान करने का शौक अमेरिकी शासक वर्ग को भारी एवं महंगा महसूस होने लगा। उस स्थिति में दुनिया को दोनों विश्व युद्धों से पहले के दौर में ले जाना ज्यादा उसे ज्यादा माफिक लगा है। उन्होंने उम्मीद जोड़ी है कि जिसकी लाठी-उसकी भैंस के सिद्धांत को फिर से खुलेआम अपना कर दुनिया पर वे वापस अपना कब्जा जमा सकेंगे। (इस बात को म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने खुलेआम कह भी डाला था।)
वेनेजुएला के बाद अमेरिका की इसी नीति का अगला निशाना ईरान बना। लेकिन ईरान ने अश्वमेध यज्ञ पर निकले अमेरिकी घोड़े को फारस की खाड़ी में ही फिलहाल बांध दिया है। बहरहाल, पश्चिमी साम्राज्यवाद से पीड़ित देशों एवं समुदायों के लिए सामने अहम सवाल यह खड़ा हुआ है कि क्या इससे दुनिया को साम्राज्यवाद से मुक्ति मिलने की गुंजाइश निकल आई है?
व्लादीमीर लेनिन ने साम्राज्यवाद को एकाधिकारी पूंजीवाद की चरम अवस्था कहा था। अगर साम्राज्यवाद की हमारी भी समझ यही है, तो ईरान की “जीत” के बावजूद इस प्रश्न का उत्तर पाना अभी आसान नहीं है। बेशक, अमेरिका की शक्ति में ह्रास और उसके बरक्स चीन के एक बड़ी ताकत के रूप में उभरने से यह बहस ज़रूर खड़ी हुई है कि क्या अब सचमुच उस साम्राज्यवाद से मुक्ति मिल सकती है, जिसने तकरीबन 500 साल से दुनिया के ज्यादातर हिस्सों को अपने शिकंजे में लिए रखा है?
निर्विवाद रूप से साम्राज्यवाद के केंद्र के रूप में अमेरिकी शक्ति के ह्रास का खास महत्व है। फिर भी इस संबंध कुछ विशेषज्ञों ने उचित चेतावनी दी है, जिन्हें नज़रअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। मसलन, समाजशास्त्री नेल बोनिला यह महत्त्वपूर्ण कथन हैः
“साम्राज्य कोई (एक) देश नहीं होता। वर्तमान में वह एक अंतरराष्ट्रीय, ऐतिहासिक रूप से विकसित हुई सामाजिक संरचना या वर्गीय परियोजना है, जो पूंजीवाद और पश्चिमी आधुनिकता से जुड़ी हुई है। यह विश्व-प्रणाली के माध्यम से संचालित होती है, जिसके केंद्र में अटलांटिक के दोनों पार (यूरोप और अमेरिका) स्थित शासक वर्ग हैं। लेकिन परिधि पर मौजूद उसके सहयोगी भी उसका हिस्सा हैं। कॉरपोरेट, वित्तीय, सैन्य एवं संस्थागत नेटवर्क का यह एक सघन तंत्र है, जो कई बदलावों के बावजूद बचा रहा है। उसके गुरुत्वाकर्षण का केंद्र समय के साथ बदलता रहा है— आइबेरियन साम्राज्यों से लेकर डच वाणिज्यिक सर्वोच्चता तक और ब्रिटिश आधिपत्य से लेकर अमेरिका-केंद्रित और फिर अटलांटिक-पार वित्तीय-सुरक्षा संरचना तक।….
इतिहास इस विचार को बार-बार गलत साबित करता आया है कि किसी एक राज्य का पतन सिस्टम के पतन के समान है। ब्रिटेन से आधिपत्य का अमेरिकी हाथों में आना बदलाव पूंजी संचय के प्रणालीगत चक्र (systematic cycle of capital accumulation) का हिस्सा था। यह ब्रिटेन द्वारा अमेरिका को बैटन सौंपने जैसा था। तब ब्रिटिश अभिजात वर्ग को पुनर्गठित कर एंग्लो-अमेरिकन वित्तीय एवं कॉरपोरेट नेटवर्क में शामिल कर लिया गया। उससे साम्राज्य औपचारिक क्षेत्रीय सीमा से निकल कर अनौपचारिक वित्तीय प्रभुत्व में बदल गया।”
बोनिला के अनुसार, “हमें इस अंतर को समझना चाहिए कि बहु ध्रुवीयता अनिवार्य रूप से साम्राज्यवाद-विरोधी नहीं है। किसी एक देश का पतन किसी शासक वर्ग का खत्म होना नहीं है। पोस्ट-लिबरल (उदारवादी व्यवस्था के बाद के युग) का अर्थ पोस्ट-इम्पीरियल (साम्राज्यवाद के बाद का युग) नहीं है।”
इस कथन का अर्थ है कि अमेरिका के ह्रास के बाद भी साम्राज्यवाद बना रह सकता है। मुमकिन है कि उसका केंद्र बदले। लेकिन बिना ऐसा हुए भी अंतरराष्ट्रीय पूंजीपति वर्ग के गठजोड़ के रूप में यह अस्तित्व में बना रह सकता है। इस समझ के मुताबिक फर्क तब पड़ेगा, जब संप्रभु परियोजनाएं पूंजीवाद विरोधी यानी समाजवादी चरित्र ग्रहण करेंगी। वरना, संप्रभु देशों के पूंजीपति अपने हित में अंतरराष्ट्रीय गुट के रूप कार्य करते रहेंगे।
तो सवाल यह उठता है कि फिर अमेरिका के कथित ह्रास, विभिन्न देशों के अपनी संप्रभुता को जताने, ब्रिक्स+, शंघाई सहयोग संगठन, और यूरेशियन आर्थिक संघ जैसे देश-समूहों के उभरने का क्या ऐतिहासिक महत्व है? क्या यह घटनाक्रम अनिवार्य रूप से दुनिया के आम जन के हित में है?
इन सवालों का उत्तर काफी कुछ इस समझ पर निर्भर है कि चीन की व्यवस्था को हम कैसे देखते हैं? इसलिए कि आज इन घटनाक्रमों की पृष्ठभूमि में चीन की मौजूदगी है। मौजूदा अंतरराष्ट्रीय अंतर्विरोध की वह एक प्रमुख धुरी के रूप में सामने आया है। मगर चीन की व्यवस्था के चरित्र संबंधी प्रश्न पर दुनिया बंटी हुई है। एक धड़ा मार्क्सवादी/ वामपंथी चिंतकों का है, जो चीन को समाजवाद की सफलता का प्रतीक मानता है। इसी धारा के अनेक चिंतक उसे समाजवाद के बजाय समाजवाद की तरफ बढ़ रही व्यवस्था के रूप में चित्रित करते हैं। जबकि एक समूह उग्र वामपंथी विचारकों का है, जो मानते हैं कि चीन पूंजीवाद को अपना चुका है।
मार्क्सवादी विश्लेषक थेरिन ऑर्नल्ड के मुताबिक इस बहस के क्रम में असल मुद्दा चीन की सोशलिस्ट मार्केट इकॉनमी के चरित्र की समझ है। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी अपनी व्यवस्था को इसी शब्दावली के जरिए व्यक्त करती है। ऑर्नल्ड के मुताबिक,
“चीन में राज्य स्वामित्व वाले उद्यम (SME) ना तो समाजवादी हाथों में एक तटस्थ साधन हैं और ना ही वे चीनी विशेषताओं वाले पूंजीवाद का उपकरण हैं। चीन एक अंतर्विरोधी व्यवस्था है, जिसमें समाजवादी राज्य और पूंजीवादी बाजार के बीच संरचनात्मक तनाव हमेशा मौजूद रहता है। यह ऐसा तनाव है, जिसे स्वामित्व के रूपों की जांच कर, भू-राजनीतिक निष्ठाओं की घोषणा कर, या पार्टी के समाजवादी आशय पर जोर देकर हल नहीं किया जा सकता। राज्य के बारे में मार्क्सवादी सिद्धांत इस तनाव का कठोरता से विश्लेषण करने के लिए सैद्धांतिक उपकरण उपलब्ध कराता है: यह पूछने के लिए कि बाजार संबंध कम्युनिस्ट पार्टी शासित राज्य में किस तरह के संरचनात्मक दबाव लाते हैं, और पार्टी-राज्य का संस्थागत स्वरूप बदले में उन दबावों पर कौन-सी विशिष्ट सीमाएं लगाता है।….
यह ढांचा प्रश्न खड़ा करता है कि क्या सोशलिस्ट मार्केट इकॉनमी एक संक्रमणकालीन स्वरूप है, जिसमें समाजवादी संस्थागत क्षमताएं बाजार संबंधों को उत्तरोत्तर सीमित कर रही हैं- या संचय की अनिवार्यताएं पार्टी-राज्य को लगातार अपने में समाहित करती जा रही हैं? इसका उत्तर पहले से नहीं दिया जा सकता। यह एक अनुभवजन्य और सैद्धांतिक दांव है, न कि कोई आधारभूत धारणा। लेकिन यह सही प्रश्न है, और इसे सही ढंग से सूत्रबद्ध करना अपने आप में एक राजनीतिक उपलब्धि है। जो वामपंथ इस प्रश्न को कठोरता से नहीं उठा सकता, वह इसका उत्तर नहीं दे सकता। जो वामपंथ जो उसका उत्तर नहीं दे सकता, वह उन राजनीतिक चुनौतियों के लिए तैयार नहीं है, जो सोशलिस्ट मार्केट इकॉनमी के अंतर्विरोध पेश करते हैं।”
(https://cosmonautmag.com/2026/04/toward-a-marxist-state-theory-of-the-socialist-market-economy/)
कहने का तात्पर्य यह है कि पश्चिमी साम्राज्यवाद से मुक्ति की संभावना इस प्रश्न से गहरे रूप में जुड़ी हुई है कि चीनी प्रकृति के समाजवाद का क्या वास्तविक स्वरूप क्या है? अगर वह समाजवाद ओर अग्रसर संक्रमणकालीन व्यवस्था है, तो उसका साम्राज्यवाद से अंतर्विरोध बढ़ना अपरिहार्य है। इस रूप में उससे जुड़े देशों की संप्रभु परियोजनाओं को ठोस सहारा मिलेगा। साथ ही चीन की सफलता समाजवाद के प्रति एक नया आकर्षण दुनिया भर में पैदा करेगी। उससे पूंजीवाद के लिए चुनौतियां खड़ी होंगी, जो अंततः साम्राज्यवाद की ताबूत में कील साबित होंगी। जो लोग ताजा घटनाक्रम में ऐसा होने के संकेत देख रहे हैं, जाहिरा तौर पर ईरान की “जीत” तथा संप्रभु देशों के बीच सहयोग एवं एकजुटता से उनका उत्साहित होना लाजिमी है। इस रूप में ईरान युद्ध युग परिवर्तन की जारी महागाथा का एक सुनहरा अध्याय है। यह स्तंभकार ऐसे ही लोगों में एक है!
(सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार हैं।)