करतार सिंह सराभा बलिदान दिवस 16 नवंबर और जालंधर में आयोजित गदरी मेला, 2025

16 नवंबर को सरदार करतार सिंह सराभा, भाई बख्शीश सिंह, भाई सुरेन सिंह पुत्र ईशर सिंह, भाई सुरेन सिंह पुत्र बूड़ सिंह ,भाई हरनाम सिंह, श्री विष्णु गणेश पिंगले और भाई जगत सिंह को फांसी पर चढ़ा दिया गया। इस अवसर पर बाबा सोहन सिंह भकना, जो कि गदर पार्टी के प्रारंभ में उसके प्रेसिडेंट थे, ने एक खत लिखा था, जिसका शीर्षक था,” मेरा जनरल करतार सिंह सराभा।”

करतार सिंह सराभा पार्टी की स्थापना के समय उसके 21 सदस्यों में से एक थे। भारतीयों में खासकर पंजाबियों में देश की आजादी के लिए जागृति लाने हेतु एक गदर अखबार (हिंदी , उर्दू , पंजाबी, अंग्रेजी, गुजराती आदि) चलाया करते थे। इसके पंजाबी भाषा विभाग के संपादक करतार सिंह सराभा थे। 

भगत सिंह ने तो बाद में “चांद” पत्र में करतार सिंह सराभा पर कई निबंध लिखे थे। (लेख स्रोत: चमनलाल द्वारा गदर पार्टी हीरो सराभा पर हिंदी में लिखित, एनबीटी द्वारा प्रकाशित पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद)। वह उन्हें अपना गुरु, साथी, कामरेड मानते थे। इसी पुस्तक में सराभा पर भगत सिंह के लेख का चांद पत्र (नवंबर , 1928 अंक) में छपा एक आठ पेज का पत्र है। भगत सिंह लिखते हैं:

“करतार सिंह सराभा ना जाने कहां से एक तूफान की तरह आए, एक ज्वाला की तरह चमके और क्रांति की भावना लोगों के दिलों में जलाकर न जाने कहां गायब हो गए। यह जानकर आश्चर्य होता है कि वह मात्र 19 साल की आयु में कितनी उपलब्धियां हासिल कर चुके थे। ऐसा साहस , ऐसा आत्मविश्वास, बलिदान की ऐसी भावना और ऐसी लगन किसी में होना बहुत ही दुर्लभ है। ऐसे लोग भारत में बहुत ही कम जन्मे हैं और सराभा उन सब में शीर्ष पर हैं। “

आगे लिखते हैं कि ,”वह सराभा गांव में 1896 में पैदा हुए जो कि जिला लुधियाना में था। (आज भी वहां गदर पार्टी का झंडा लहराता है) वह अपने माता-पिता के इकलौते पुत्र थे। उनका लालन-पालन उनके पिता की असमय मृत्यु हो जाने के कारण उनके दादा ने किया। चाचा ने भी पढ़ाया। उसके बाद आगे पढ़ाई हेतु वह 1912 की उम्र में मात्र 16 साल के आयु में सैन फ्रांसिसको, अमेरिका पहुंचे। 

फांसी के समय जब उनके दादा उनसे मिलने पहुंचे तो उन्होंने कहा।

” दादाजी हमारा वह संबंधी कहां है ?” 

उत्तर मिला कि वह तो प्लेग में मर गया। फिर दूसरे के बारे में पूछा वह तो हैजा से मर गया तो करतार सिंह सराभा बोले कि “क्या आप चाहते हैं कि मैं भी बीमार हो कर महीनों पड़ा रहकर एक दर्दनाक मौत मरूं? क्या उससे मेरी जो आज मृत्यु हो रही है वह हजार गुना बेहतर नहीं है?

 दादाजी के पास कहने के लिए कुछ नहीं था।” 

हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन के अध्यक्ष शहीद चंद्रशेखर आजाद की तरह ही महिलाओं के सम्मान के बारे में करतार सिंह सराभा का दृष्टिकोण बहुत ऊंचा था।

आजादी हेतु हथियार एकत्र करने के लिए जब एक लूट की गई तो एक साथी की नीयत एक लड़की पर डोल गई। करतार सिंह सराभा ने पिस्तौल निकाल ली और उससे उसका काम तमाम करने वाले थे। उससे पहले उन्होंने उसे एक मौका देते हुए कहा कि अगर तुझे यह लड़की माफ कर देगी तो मैं तुझे छोड़ दूंगा। लड़की के माफ करने पर ही करतार माने। मात्र 6 महीने में ही करतार सिंह सराभा ने अखबार के छापने , बांटने से लेकर हवाई जहाज उड़ाने तक  कई काम सीख लिए।

उस समय खासकर कनाडा, अमेरिका के हजारों विदेशी भारतीय लोगों (नब्बे फीसदी कम पढ़े लिखे पंजाबी और डॉ हरदयाल, बरकतउल्ला, और कुछ बंगाली बुद्धिजीवी लोगों भी शामिल) ने अपने त्वचा के रंग के कारण गोरे लोगों की घृणा को और अपमान को महसूस किया। बल्कि बड़ी ही गहराई से अपने दिलों में महसूस किया।

अमेरिका के आजाद होने और खुले लोकतांत्रिक वातावरण का लाभ उठाकर खुलकर अपने विचारों का प्रचार किया। इसके कारण भी अंग्रेज आंदोलन को आसानी से कुचल सके। आखिर मात्र दस हजार हथियारबंद अनिवासी भारतीयों का दल अमेरिका, कनाडा आदि से आकर बिना आम पंजाबी समाज के समर्थन  के कैसे कड़ी टक्कर देता? खासकर उस समय धर्म की शीर्ष सिख धार्मिक जत्थेबंदियों ने भी उनका साथ नहीं दिया, आंदोलन के दमन के बाद अंग्रेजों को सरोपा तक भेंट किया।

(किसान आंदोलन 2020 में गुरु ग्रंथ साहब के अपमान पर पंजाब के एक अल्पबुद्धि व्यक्ति का कत्ल करने की जिम्मेदारी लेने वाला नीले वस्त्र का सिख वेशधारी नेता अमित शाह के साथ बाद में एक तस्वीर में दिखा याद आता है?) 

जैसे पंजाब के राजाओं ने 1857 के गदर में अंग्रेजों का साथ दिया। इस तरह आजादी के दूसरे और बीसवीं सदी के इस 1915 के आजादी युद्ध में भी खराब तरह से योजनाओं को कार्यांन्वित करने, जर्मनी पर जरूरत से ज्यादा भरोसा करने के कारण आंदोलन असफल रहा। 50 से ज्यादा गदरी वीरों को मौत की सजा दी गई। कितने ही वीर लोगों की अंडमान काले पानी की सजा में मौत हुई। कुल मिलाकर इसमें 200 गदर वींरो ने अपनी शहादत दी थी।

पिछले 35 सालों से गदरी बाबो द्वारा जालंधर में स्थापित ” देशभगत यादगार हाल ”  में हर साल एक गदरी मेला लगता है जिसमें देश विदेश खासकर पंजाब के अनिवासी और दीगर क्रांतिकारी लोग इकट्ठा होते हैं। देश के अंदर या बाहर दूसरी जगह का जिक्र करें तो इस बार के गदरी यादगार कार्यक्रम को कनाडा में भी आयोजित किया गया।

जालंधर, पंजाब के इस दर्शनीय मेले के 12 घंटे की रिकॉर्डिंग यूट्यूब पर उपलब्ध है (वीडियो का शीर्षक है, – मेला गदरी बाबिया दा 2025)। इस बार का मेला महिला गदरी नेता गुलाब कौर को समर्पित किया है।

मेले के सांस्कृतिक पक्ष को देखने वाले साथी अमोलक सिंह ने बताया कि गदरी झंडे का गीत लिखने का श्रेय आप लोग मुझे देते हैं जबकि इसका श्रेय देश को चलाने वाले कई करोड़ किसानों मजदूरों का है जो अब अपने खून पसीने से इस गीत को रचते हैं, और जीवन का संघर्ष करते हैं।

एक बुजुर्ग पंजाबी महिला का जिक्र करते हुए वह बता रहे थे कि यह महिला अपने गांव वालों को बार-बार फोन करके बता रही थी कि अगर बच्चों को कुछ सीखना है तो सबसे बढ़िया स्कूल यही जालंधर का देशभक्ति यादगार हाल है, स्कूलों में कुछ नहीं सिखाया जाता।

इस बार मेले में जम्मू कश्मीर के सीपीएम के विधायक कामरेड युसूफ तारिगामी का भी आधे घंटे का भाषण हुआ है जिसमें उन्होंने 370 की संवैधानिकता पर संविधान सभा के जिक्र का उचित ही सही तर्क रखा।

कश्मीर के कुनन और पोशपोरा कांड , 2009 शोपियां बलात्कार और मणिपुर कांड आदि पर बोलते हुए नाटककार नवशरण कौर ने भी अपनी बात रखी। ये भी बताया कि भारत सरकार द्वारा प्रतिबंधित दो दर्जन पुस्तकों में एक कुनन और पोसपोरा गांव की महिलाओं द्वारा लिखित यह अत्याचार की पुस्तकाकार कहानी भी है जिस पर मोदी सरकार ने प्रतिबंध लगाया है। इस बार के गदरी मेले में गाजा में वीरतापूर्ण संघर्ष चला रहे फलस्तीन के योद्धाओं को भी याद किया गया।

और 5 साल से इस देश में चार्ज शीट का इंतजार कर रहे, (ध्यान दें कि पासपोर्टधारक न होने पर भी दस साल पहले भारत के गृह मंत्री के उमर के दो बार पाकिस्तान जाने का आरोप झेल चुके इसका जिक्र कभी सुना नहीं पर होना चाहिए) जेएनयू के छात्र उमर खालिद का भी बार-बार कई वक्ताओं ने जिक्र किया।

(उमेश चंदोला की रिपोर्ट)

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