राजा नहुष, उनका किला और उनकी बेटियां: पुरातत्व, मिथक और इतिहास के संदर्भ में

जल-प्रलय की प्राचीन कथा पूरी दुनिया में सुनाई जाती है। अपने देश में भी इसकी कथा है। इस कथा को लेकर कई मिथक गढ़े गये। इन्हीं मिथकों में देवता और मनुष्य हैं। इन्हीं मनुष्यों में एक राजा का उद्भव होता है। भारत में मनु और उसके बाद की पीढ़ी का पूरे क्रम का किस्सा सुनाया जाता है। इन्हीं राजाओं में से एक का नाम नहुष है। उसकी महानता और सम्मान देवताओं से ऊपर चला गया था। देवता एक सीमांकन की तरह है जिसके ऊपर होना खतरे की घंटी है।

कथा में बताया गया है कि उसमें घमंड आ गया और उसने देवताओं से दुर्व्यवहार किया। राजा नहुष को दंड दिया गया और धकियाकर जमीन पर फेंक दिया। नहुष का अंत हो गया लेकिन उसकी पीढ़ियाँ चलती रहीं। इनसे वंशावलियां बनी जिस पर क्षत्रियों ने दावा किया और उनसे चंद्रवंश अैर सूर्यवंश के राजत्व का पद धारण किया।

ऐसा लगता है कि राजा नहुष का किस्सा राजत्व हासिल करने वाले समूहों को देव पद से अलग करने के लिए किया गया और इस पर दावा करने का अधिकार क्षत्रियों से छीन लेने के लिए गढ़ा गया। लेकिन, ऐसा हुआ नहीं। इस राजत्व पर दावेदारी कभी कम न हुई और राजत्व हासिल करने के लिए युद्धों की श्रृंखला बढ़ती ही गई। मध्यकाल में राजत्व हासिल करने वाले सामंतों और राजाओं की भीड़ पैदा हो गई।

ये खुद को न सिर्फ चंद्रवंशी और सूर्यवंशी होने का दावा कर रहे थे, अपने पदनामों में देवताओं का पूरा समूह ही खड़ा कर लिया। इसी राजत्व के सहारे बहुविध जाति का होने के बावजूद उन्होंने खुद को एक क्षत्रिय वंश का हिस्सा बताया और आपस में विवाह संबंधों में बंधे। देवता ब्राम्हण बनकर अवतरित हो उनका राज्याभिषेक करते रहे और जब भी मौका मिला राजत्व पर दावा उन्होंने भी अन्यों की तरह किया।

राजा नहुष देवलोक से धकियाकर भगा देने के बाद धरती पर कितने समय तक राजा रहे बताना मुश्किल है। लेकिन, उनका नाम उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में पूर्ववती आजमगढ़ और आज के मऊ जिला के घोसी तहसील में एक भग्न और खेत में तब्दील हो गई जगह पर उपलब्ध है।

लगभग एक वर्ग किमी और वर्तमान में सतह से लगभग 30 फीट ऊंचा ध्वंसावशेष आज भी राजा नहुष का किला के नाम से जाना जाता है। अंग्रेजी हुकूमत के दौरान भी सर्वेक्षणों में इसे लेकर रूचि बनी रही और इस पर रिपोर्टें लिखी गई। 1960 के दशक में पुरातत्व विभाग ने इसकी प्रायोगिक खुदाई में की जिसमें एक पाषाण काल का औजार और कुषाण काल के पुरावशेष मिले।

पुरातत्व विभाग ने पर आगे काम नहीं किया जबकि मैदानी क्षेत्रों में मिलने वाली पाषाण औजार एक नई तरह की परिघटना थी। इस संदर्भ में बिहार के छपरा जिले में चिरांद की पुरातात्कि अन्वेषण में कहीं अधिक काम हुआ और वहां मिले तथ्यों ने गंगा के मैदानी इलाकों पुरावशेषों के इतिहास को नई दृष्टि दे दी। राजा नहुष का किला का अनुसंधान इस सबसे महरूम बना रहा।

प्रतापगढ़ के सराय नाहर राय की खोज भी इस दिशा में अध्ययन करने में मील का पत्थर बन गया। लेकिन, पूर्वांचल की इस जगह को वह सम्मान हासिल नहीं हो सका।

राजा नहुष से जुड़ी कथा में कितना मिथक है और कितना यथार्थ, यह परखने की जरूरत है। लेकिन, इससे जुड़ी हुई जगह का दायरा पुरातत्व की परिभाषा में एक आरम्भिक नगर व्यवस्था का हवाला जरूर उपस्थित करता है। यह जगह प्रायोगिक खुदाई के आरम्भिक रिपोर्ट में मिट्टी की दीवाल से किलेबंद है और इसके अवशेष कुषाणकाल तक हैं। यहां ईंटों की संरचनाएं भी हैं जो संख्या में कम हैं। चिकने काले मृदभांड हैं जो मौर्यकालीन विशेषता लिए हुए हैं।

पाषाण काल के औजारों की उपस्थिति इस स्थल पर सभ्यता के विकसित होने को रेखांकित करता है। राजा नहुष से जुड़ी कथा में राजा नहुष का होना कल्पनाशीलता से जुड़ा हो सकता है लेकिन यहां पर सभ्यता का विकसित होते हुए नगर व्यवस्था में परिवर्तित होने के ठोस प्रमाण उपलब्ध हैं।

राजा नहुष की कहानी में देवता, ब्राम्हण और क्षत्रिय समुदायों की उपस्थिति है। शेष समुदाय प्रजा है और वह किस वर्ण या जाति का है इसके बारे में कथा में बताने की जहमत नहीं उठाई गई। वर्चस्वाशाली समूह कथा को अपनी निगाह से देखता और गढ़ता है। राजत्व पर दावेदारी इन्हीं समुदायों की थी और उन्होंने इस दावेदारी के अनुरूप न सिर्फ कहानियां गढ़ीं, इसके मिथकीय चरित्र गढ़े, साथ ही इसकी धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्य भी गढ़े।

इसका अंतिम परिणाम यही रहा कि जब भी इन कथित वर्चस्वशाली समुदायों से बाहर से आने वाली जाति या वर्ण समुदाय से किसी ने राजत्व पर दावा किया तब उसने भी खुद को क्षत्रिय या ब्राम्हण वंश का हिस्सा होने का दावा किया। यह ‘सांस्कृतिकरण’ की प्रक्रिया नहीं है, जैसा कि कई विद्वानों ने दावा किया। यह राजत्व के विशेषाधिकारों को हासिल करने का एक तरीका था।

पूर्वांचल के एक छोटे से कस्बे में राजा नहुष की कहानी कहां से आई, यह बताना मुश्किल है। लेकिन, यह जगह इलाहाबाद से बहुत दूर नहीं है जो मनु की कहानी के केंद्र में है और सूर्यवंश और चंद्रवंश के उद्भव की कथा भी गढ़ी गई। पुरातत्व साक्ष्य आर्यों की कहानी से अधिक यहां के आदिम समूहों के रहने, विकसित होने की कथा बताते हैं।

पूर्वांचल के पुरावशेष भी आर्यों से इतर उन समूहों की कथा अधिक कहते हैं जिन्हें व्रात्य कहा जाता था। यहां के पुरावशेषों की संस्कृति को आर्यों की संस्कृति से अलग करते हुए डा. पुरूषोत्तम सिंह ने इसे ‘नरहन संस्कृति’ का नाम दिया था। यहां यह कह देना उपयुक्त होगा कि कई विद्वान यह दावा करते हैं कि व्रात्य आर्य ही थे। लेकिन, आर्य कही जाने वाला साहित्य व्रात्यों को अपने से इतर समूह के तौर पर ही चिन्हित करता है।

व्रात्यों ने अपने बारे में क्या लिखा, इसकी जानकारी नहीं है। अधिकतम लेखन आर्य समूहों से आया, तब कहानी भी इसी समूहों के हिस्से से आई, और वे अपने वर्चस्व की कथा को प्रस्तुत करते हुए आये। पूर्वांचल के इस छोटे से कस्बे में राजा नहुष का किला जो अब टीला के तौर पर जाना जाता है, इसी वर्चस्वशाली समूहों द्वारा कही गई कथा। जाहिर है आर्य पत्थर के औजार प्रयोग में नहीं लाते थे। वे घोड़े और रथपर चढ़कर आये थे।

ऐेसे में, राजा नहुष के किले मिले पुरावशेष का आरम्भिक भाग इस आर्य कथा का हिस्सा नहीं है और जो कुषाण काल तक विकसित हुआ।  

अपने देश और समाज में और लोग कहां से अवतरित हुए और क्या बने, इसकी कहानी अलग से ही दर्ज होती रही है और आज भी विवादित बनी हुई है। वर्चस्वशाली समूह अक्सर अपने से इतर समूहों को बर्बर, असभ्य और आमतौर पर वर्णसंकर बताता रहा है और उसकी कोशिश रही है कि इसी आधार पर उन्हें संपत्ति और धार्मिक अधिकारों से वंचित कर दिया जाए या समाज के बाहरी किनारों पर ठेल दिया जाए।

वर्तमान समय में इस कहानी को मुसलमानों के संदर्भ में देखा जा सकता है। यह कहानी बहुत कुछ वैसी ही है जब यूरोप में पूंजीवाद ने अपनी राजनीतिक पहचान और सत्ता हासिल की। तब उसने सबसे पहले खुद का सभ्य बताया और फिर अन्यों को असभ्य की श्रेणी में डालते हुए उन्हें कई सारे खुद से हीन समझे जाने वाले शब्दों से विभूषित करना शुरू किया। ज्ञान के क्षेत्र ‘ओरिएंटल’ शब्द की खोज नई नहीं थी लेकिन, इसका प्रयोग पूंजीवाद के उद्भव के साथ एकदम नये अर्थ में प्रयुक्त हुआ।

इस पर शानदार टिप्पणी एडुवर्ड सईद ने अपनी पुस्तक ‘ओरिएंटलिज्म’ में किया। इसे ऐतिहासिक संदर्भ में पढ़ना हो तब इसे भारत में औरंगजेब के काल तक ब्रिटिश और डच ईस्ट इंडिया कंपनी की गतिविधियों और उनके द्वारा मुगल दरबार में अपने राजाओं की चिठ्ठीयों को प्रस्तुत करने के इतिहास में पढ़ना चाहिए। उस समय वे मुगल दरबार में दंडवत होते हुए जाते थे।

उस समय के इनके अधिकारी ही बतौर लेखक आगरा, दिल्ली जैसे शहरों की तुलना में लंदन और पेरिस को कम से कमतर मानते थे। लेकिन, महज 100 साल के भीतर इन्हीं कंपनियों के निदेशक दुनिया में और भारत में भी सभ्यता के उन्मेषक और उसके अग्रिम योद्धा बन गये। खुद भारत के ही कई विद्वानों की नजर में वे भारत में सभ्यता-निर्माण के वाहक हो गये।
ऐसे में, सभ्यता की कहानी में कब कौन सा पक्ष मिथक में बदल जाए, अनुमान करना कठिन होता है।

लेकिन, यथार्थ इन कहानियों में भी उपस्थित रहता है। खासकर, जनसमूहों के बीच कही जा रही कहानियों में। ऐसी एक और कहानी राजा नहुष की बेटियों की है। यह कथा कम प्रचलित है और पुराणों में तो इसका जिक्र नहीं मिलता। बेटियां राजत्व हासिल नहीं कर सकती थीं। ऐसे में, उन्हें हासिल करने के लिए देव समूहों का हिस्सा था। समस्या यह थी कि ये देवियां ब्राम्हणणों के देव समूह का हिस्सा नहीं बनीं। उनकी स्वायत्त स्थिति थी।

वर्चस्वशाली समूह आमतौर पर स्वायत्त सत्ता को स्वीकार नहीं करता है। भारत जैसी वर्ण आधारित समूह में, जिसमें अधिकारों की सोपान भरी व्यवस्था है। यह संभव है कि इस क्षेत्र में स्वायत्त पहचान वाली देवियों को अभिशापग्रस्त राजा नहुष से जोड़ दिया गया और उन्हें उनकी बेटी बता दिया गया।

राजा नहुष का टीला- मेरा गांव उत्तर प्रदेश के मऊ के मधुबन तहसील में है। इसी जगह से हर्ष का एक ताम्रपत्र मिला था जिसमें जमीन पर जोतदारी के विवाद को हल करने के निर्देश दिये गये हैं। इस क्षेत्र में कई ऐसी जगहें हैं जहां से मौर्यकालन, कुषाणकालीन अवशेष मिलते रहे हैं और साथ ही मध्ययुगीन मूर्तियां और सल्तनतकालीन निर्माण को भी देखा जा सकता है। यहां मैं राजा नहुष के किला के बारे में लिख रहा हूं जिसे आमतौर पर नहुष का टीला कहा जाता है।

यह स्थल मेरे गांव से 16 किमी दूर घोसी से जुड़ी हुई है। यह छोटा सा कस्बा है। यहां तहसील है और इसी नाम का संसदीय क्षेत्र है। यह ब्रिटिश जमाने में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक केंद्र था। यहीं पर नहुष का टीला है। ब्रिटिश दौर में कई सर्वेक्षकों ने इस नहुष के टीले का अध्ययन किया जो मुख्यतः इस टीले से जुड़ी कहानियों से आगे नहीं बढ़ सका। सामान्य सतह से 30 फीट ऊंचा और विस्तार में लगभग एक किमी की लंबाई-चैड़ाई में फैला यह स्थल आज भी आकर्षक है।

उपरोक्त ऊंचाई कुछ ही स्थलों पर है। इसी स्थल प्रयोग के स्तर पर पुरातत्व विभाग द्वारा 1960 के दशक में टेंच खुदाई हुई।
इसकी रिपोर्ट इंडियन आर्कियोलाॅजी 1968-69ः ए रीव्यू में छपी थी, जो इस प्रकार है- ‘‘श्री जे.एस नेगी के साथ सर्वश्री वी.डी. मिश्रा, एम.सी. दीक्षित, एम.एन. राय और एस.एन. प्रसाद आजमगढ़ जिला के उप-विभागीय मुख्यालय घोसी के निकट एक टीला जिसे स्थानीय तौर पर नहुस-का-टीला कहा जााता है का अन्वेषण किया और पाया, यह किला मिट्टी के दिवाल से किलेबंद है।

इसके तीन दरवाजे उत्तर, पश्चिम और दक्षिण की ओर हैं, के अवशेष मिले। यहां से मिले बर्तन निम्न हैंः 1- काला और लाल बर्तन, सादा और चित्रित दोनों ही तरह के। 2- उत्तरी काला पाॅलिसदार मृदभांड, जिसमें चित्रित मृदभांड भी हैं। 3- काला चिकना मृदभांड। 4- सादा भूरे रंग का मृदभांड, और 5- सादा लाल मृदभांड।

इस जगह से जो अन्य तथ्य मिले उसमें मिट्टी की बनी आकृतियां, जो इंसान और पशु दोनों की हैं और एक कठोर पत्थर, चर्ट का टुकड़ा (फ्लैक)। प्राचीन तथ्य ऐसे नहीं मिले जो कुषाण काल के हों, इस जगह को ईसा के दूसरी-तीसरी शती तक छोड़ दिया गया था।’’ राजा नहुष के टीले वाले क्षेत्र में जून, 2010 में जल बोर्ड द्वारा पानी की तलाश में हो रही खुदाई के समय यहां से कुषाणकाल की माने जाने वाली मूर्तियां और अन्य पुरावशेष मिले।

नवम्बर, 2025 में इस टीले या किले का अध्ययन करने के उद्देश्य से मैं वहां गया। इसके कुछ ही हिस्से बचे हुए हैं। बाकी कई एकड़ के पूरे फैलाव में खेती हो रही है। नई पीढ़ी को इस टीले के बारे में जानकारी बेहद कम है। जिस समय हम वहां पहुंचे थे, इसी टीले पर बने खेतों में सरसों, मटर और गेंहू बो दिया गया था। कुछ जगहों पर अभी भी धान की फसल लगी हुई थी। चौड़े मेड़, जो मूल संरचना में हैं, से होते हुए इन टीलों पर जाया जा सकता है।

सबसे ऊपर सतह पर कुषाण कालीन ईंट यहां-वहां दिख जाती है। टीलों के पास कुछ ईंट इस काल की पूर्ववर्ती है, लेकिन मौर्यकाल की तुलना में अधिक मोटी हैं। लाल, काला चिकना मृदभांड के छोटे-छोटे टुकड़े खेतों और टीलों के किनारे थोड़ी मात्रा में अब भी दिख रहे हैं। खेती कर रहे किसान बताते हैं कि इस पर मकान निर्माण नहीं हो सकता। केवल खेती की अनुमति है। घोसी बाजार में इस टीले पर उगने वाला मटर काफी स्वाटिष्ट और लोकप्रिय माना जाता है।

इस टीले की मटर के नाम से जाना जाता है। इस टीले पर दो जगह खाई जैसी संरचना है जो 200 मीटर से अधिक लंबी है। पुरातत्व विभाग के अन्वेषण में इसे मिट्टी की दीवाल से बनी संरचना माना गया है। हालांकि कुछ जगहों पर ईंट की संरचना है। लेकिन, ईंटों की संख्या कम दिख रही थी। आज नहुष का टीला मुख्यत खेती योग्य जमीन में बदल गया है।

नहुष के टीले की मुख्य संरचना कुषाण काल तक खत्म होते हुए दिखती है। लेकिन, इससे सटे हुए गांव में शिवाला/शिवमंदिर बाद के समय में बना हुआ है। इस मंदिर में सफेद संगमरमर की बनी हुई चतुर्मुखी शिवलिंग, ब्रम्हा, भैरव, गणेश और पार्वती की मूर्तियाँ हैं जो मध्ययुगीन लगती हैं। 14वीं शती तक शिव की एकल मुर्ती का निर्माण और खासकर चतुर्मुखी शिवलिंग का निर्माण बेहद कम हो चुका था।

इस काल तक शिव के साथ कार्तिकेय, पार्वती, नन्दी और गणेश की मूर्तियां एक ही साथ बनते हुए दिखती हैं। यहां ये मूर्तियां न सिर्फ अलग-अलग है, अलग-अलग स्थापित भी हैं। इस मंदिर के गर्भगृह में एक सिर को देखा जा सकता है जिसका शिल्प गुप्तकाल की है। उपरोक्त मूर्तियों का शिल्प भी गुप्त काल ही है। मंदिर में लगी कुछ ईंटें लाखौरी हैं।

इस मंदिर परिसर का मालिकाना हक इसी गांव के एक जमींदार का माना जाता रहा है जो अब इस गांव गाँव नहीं रहता है। मंदिर का रखरखाव गांव का एक गरीब परिवार करता है जो ब्राम्हण नहीं है। वह परिवार मंदिर परिसर में ही रहता है और उसकी साफ सफाई करता है। यह परिवार बताता है कि इस मंदिर के पुनर्निर्माण की बात चल रही है। यह परिवार डर रहा है कि यदि योगी सरकार की ओर यह कराया जाएगा तब हमें यहां से निकाल दिया जाएगा।

वह इस अफवाह से भी डरे हुए थे कि मंदिर सार्वजनिक स्थल होते हैं, इसलिए इसे सरकार अपने कब्जे में ले लेगी।

राजा नहुष की बेटियां- एक कथा प्रचलित है कि राजा नहुष की चार बेटियां थीं। यह पुराणों में वर्णित है, ऐसा नहीं लगता। लेकिन, अभी भी पुरानी पीढ़ी के लोग यह कथा बताते हैं। ये बेटियां हैं- खुरहट की सीया देवी, मधुबन के पास सुग्गी देवी, कुलकी देवी और बेल्थरा रोड के पास सोना देवी। इन देवियों की कथा तक जाने से पहले यह बताना जरूरी है कि राजा नहुष के टीले का जो पुरावशेषों की कालावधि है वह मुख्यतः कुषाण काल तक जाता है।

इसके आसपास के क्षेत्रों में पाये गये टीलों का ज्यादातर सतह पर मिले अवशेष मुख्यतः कुषाण काल तक पहुंचते हैं। कुछ ही जगहें हैं जहां से बाद के समय के अवशेष हासिल होते हैं। जिसमें से मधुबन तहसील का क्षेत्र मुख्य है जहां से गुप्त काल, हर्ष काल और मध्यकालीन निर्माणों के छोटे अवशेष मिले हैं।

इन देवियों की अलग-अलग कहानी है। ये सप्तमातृकाओं की धारणा से अलग हैं, लेकिन उनकी क्षमता इन सप्तमातृकाओं की तरह है। सप्तमातृकाएं आमतौर पर किसी खास कार्य, जैसे किसी राक्षस के संहार के लिए अवतरित हुईं। लेकिन, राजा नहुष की मानी गई बेटियां ऐसी नहीं हैं। वे हर तरह के शुभकार्य के लिए सहयोगी मानी गई हैं और प्रत्येक शुभकार्य का हिस्सा हैं।

सोनाडीह बच्चों की रक्षक और संकट की निवारक मानी जाती है। ये बेटियां रोजमर्रा के जीवन को बेहतर बनाने और इस पर आये संकट की निवारक मानी जाती हैं। सोनादेवी, जिसके स्थान को सोनाडीह कहा जाता है, को दुर्गा, चामुंडा, परमेश्वरी से बड़ी और श्रेष्ठ माना जाता है। लेकिन, आजकल कुछ पुजारी इन्हीं देवियों का उन्हें अवतार बताने लगे हैं।

इस तरह की बहुत सी देवियां पूरे पूर्वांचल में हैं और वे पूजनीय हैं और उनके अलग-अलग नाम है जिसके साथ देवताओं के नाम नहीं आते। इन देवियों की पूजा एक तरह की शक्ति साधना है। इनके पुजारी मुख्य साधू, ओझा, सोखा आदि होते हैं जो तंत्र विद्या के पारंगत माने जाते हैं। इन देवियों की पूजा महिलाओं द्वारा तो की जाती है लेकिन, उन्हें इसकी साधना से दूर रखा जाता है।

इसके पीछे यह माना जाता है कि यदि कोई महिला इन देवियों की साधना करेगी तो वह जल्द ही उसे वैसी ही दैवी शक्ति हासिल हो जाएगी। ऐसे में दो देवियों का बल उसमें समाहित हो जाएगा, जिसे संभालना मुश्किल हो जाएगा।

सबसे पहले कहानी सोनाडीह की पढ़ी जानी चाहिए जो शुरू होती है फतेहपुर ताल रतोय के उद्भव से जो मधुबन से 6 किमी पूरब की ओर है। यह पूर्वांचल के सबसे विशाल तालों में से एक है। पूर्वांचल की भौगोलिक संरचना में विशाल तालों का सबसे अधिक निर्माण सरयू/घाघरा नदी के प्रवाह में आये बदलावों से हुआ है। यह नदी अब आजमगढ़, मऊ और गोरखपुर का सीमांत बनाते हुए बह रही है और अपने पीछे कई सारी नदियों के अवशेष भी छोड़ती गई है।

आज भी जब इसमें बाढ़ आती है तब इसका बहाव का मुख्य जोर आजमगढ़ के ढ़लान की ओर बढ़ता है।

बहरहाल, सोनाडीह की कहानी में उसके पिता एक क्षत्रिय राजा है जिसने असुरों को हरा कर उन्हें कछार और देवारा क्षेत्र की ओर ठेल दिया। एक दिन राजा की बेटी जब जंगल की ओर सैर करने निकली तब एक असुर युवा उसे देखकर मोहित हो गया। राजा की बेटी अपने महल वापस आ गई। वह युवा असुर अपने मित्रों के साथ उस महल के आसपास आने लगा। राजा उन असुरों की उपस्थिति से घबरा गया। उसने अपने ब्राम्हण पुरोहित से राय मशविरा किया।

ब्राम्हण पुरोहित ने असुर युवा से बात की। असुर युवा ने राजा की बेटी से शादी का प्रस्ताव किया। जब ब्राम्हण पुरोहित ने मना किया तब उस असुर युवा ने राजा के महल पर हमला करने का निर्णय सुना दिया। राजा और ब्राम्हण पुरोहित दोनों ने ही इस मसले पर काफी सलाह मशविरा किया और वे इस निर्णय पर पहुंचे कि शादी की स्वीकार करने के लिए ऐसी शर्त उनके सामने रख दिया जाए जिसे पूरा करने में वे असमर्थ हों।

राजा युद्ध करने से कतरा रहा था ऐसे में पुरोहित के सामने ऐसे लक्ष्य को तय करना ही विकल्प रह गया था, लेकिन ऐसा विकल्प जो पूरा ही न हो सके। ऐसे में असुर शादी के प्रस्ताव से पीछे हट जाएंगे। ब्राम्हण पुरोहित ने असुर युवा के सामने प्रस्ताव दिया कि मधुबन से लगभग डेढ़ कोस पूरब से आगे जो ढलान शुरू होती है, वहां से सीध में जितनी दूर आंख से दिखाई देता है उतना लंबा और चौड़ा तालाब कल सुबह होने तक खोद दो तब राजा अपनी बेटी की शादी तुमसे जरूर कर देंगे।

उस असुर युवा ने इस चुनौती का स्वीकार कर लिया और अपने गोतियों को आवाज लगाई। हजारों असुर खांची और कुदाल लिए इकठ्ठा हो गये। खुदाई शुरू हुई। जब ब्राम्हण पुरोहित ने देखा कि यह काम सुबह तक होना तय है तब उसने एक चालाकी दिखाई। उसने सुबह के एक पहर पहले ही एक ताड़ के पेड़ पर एक कारिंदे को चढ़ाकर चलनी के पीछे दीयों की रोशनी को ऐसे दिखाया जैसे सूबह का सूरज निकल रहा हो।

ऐसा होना देखकर असुर हैरान हो उठे, वे उगते सूरज के भ्रम के भ्रम से धोखा खा चुके थे, उन्होंने पूरब में उस सूरज को देखा और अपनी हार को स्वीकार कर उन्होंने अपनी खांची को एक जगह पटककर अपने घरों की ओर चले गये। खांचीझार नाम से इस ओर एक जगह आज भी अस्तित्व में है जो टीले की शक्ल में है।

अभी यह कहानी खत्म नहीं हुई है। उस राजा की बेटी ने जब उनके साथ हुई धोखाधड़ी के बारे में जाना तब वह बेहद दुखी हुई और उसने उस असुर युवा के साथ ही शादी करने का अपना निर्णय अपने पिता को सुना दिया। अंततः राजा और ब्राम्हण पुरोहित को शादी मंजूर करनी पड़ी। शादी के पहले उस लड़की ने असुर युवा से पूछा, ‘‘तुम मुझे इस महल से कैसे ले जाओगे?’’ उसने कहा, ‘‘पैदल।’’

तब उस लड़की ने कहा, ‘‘तुम आगे चलोगे और मैं तुम्हारे पीछे चलूंगी। यह मेरे यहां का रिवाज है। तुम मुझ पर भरोसा करना, मैं तुम्हारे साथ जीवन भर रहूंगी। बस, घर पहुंचने के पहले रास्ते में पीछे मुड़कर मुझे मत देखना।’’ शादी की रस्म के बाद लड़की पिता के घर से विदा होकर पैदल ही उस असुर युवा के पीछे चली। एक जगह लड़की ने पानी पीया। एक नाले को पार कर आगे जाते हुए दोपहर होने को आई। असुर युवा से नहीं रहा गया।

लड़की ने जिस रिवाज को बताया था, वह उसका रिवाज नहीं था। उसने मुड़कर अपनी जीवनसंगिनी को देखा और वहीं तड़पकर मर गया। कथा है कि उसी स्थल पर वह लड़की अपनी वरण किए हुए पति के साथ सती हो गई। कुछ और कथा में वह लड़की अपने जीवन के अंत तक उसके शव के साथ बहुत वर्षों तक जिंदा रही।

इस कहानी से जुड़े हुए स्थल मधुबन के आसपास हैं। इस असुर युवा को आज भी सुअर की बलि चढ़ाया जाता है और लड़की को देवी मानकर उसे दूध का बना भोग चढ़ाया जाता है। मधुबन और आगे बलिया की तरफ असुरों की कहानी और उनकी पूजा कम से 30 साल पहले तक होती रही है और इस जगह पर लगने वाला मेला काफी लोकप्रिय था।

इस परम्परा में आज कमी आई है लेकिन जिनकी आस्था है उस जगह पर आज भी जाते हैं। आज सोनाडीह पर हिंदू देवियों , खासकर सप्तमातृकाओं का रंग चढ़ाया जा रहा है।

कुलकी देवी मेरे गांव की देवी हैं। यह भी एक टीले पर स्थित है। यहां ‘पुरानी और बड़ी ईंट’ से बनी संरचना थी जो नये निर्माण में दबती चली गई है। खेतों में इसके चंद टुकड़े अब भी देखें जा सकते हैं। बर्तनों के टुकड़े छर्री में बदल गये हैं। पास के भट्ठे ने इस टीले का काफी नुकसान किया। हाल ही में वहां मंदिर का निर्माण कराया गया जिसकी नींव खोदते हुए ‘कुरूई से बने हुए छोटे-छोटे कुंए जैसी संरचना’ मिली। लोगों को समझ में नहीं आया और उसे निर्माण का हिस्सा बना दिया गया।

मेरे अध्ययन के अनुसार इसकी ऊपरी सरंचना में मिली ईंट कुषाणकाल की हैं। छर्रीयों में बड़ी संख्या काले मदृभांड की है। मेरे बचपन के समय में यहां देवी का चैरा था और एक हनुमान जी की मूर्ति। अभी मूर्तियों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है। इस देवी की पूजा किसी भी जाति के लोग कर सकते हैं। यहां ब्राम्हण पुजारी, मेरी जानकारी में नहीं रहे हैं। यह सात्तिक देवी मानी जाती है जिन्हें पूड़ी, खीर, हलवा चढ़ाया जाता है।

इस कुलकी देवी से 3 किमी दूर सुग्गी देवी का चैरा है। इस स्थल के बारे में आजमगढ़ के अध्येयताओं में रविन्द्र सनातन, दयाशंकर मिश्र, फूलचंद्र त्रिपाठी ने मौर्य कालीन बताया है। इस स्थल से मौर्यकालीन संरचनाएं मिलने का उल्लेख कई पुस्तकों में आया है। यहां ‘चैरा’ शब्द की व्याख्या करते हुए चलना उपयुक्त होगा। यह एक चबूतरे पर बनी हुई छोटा सा स्तूपाकार संरचना होती है। कई बारे चबूतरे में, और कई बार स्तूपाकार संरचना में छोटा सा ताखा होता है जिसमें दीया जलाया जाता है।

सुग्गी चैरी की संरचना ऐसी ही थी। पुराने समय में सुग्गी चैरी के पास ही एक शिवलिंग को भी स्थापित कर दिया गया था। इसी के पास में एक सुरंगनुमा संरचना थी जिस पर आज एक बड़ा मंदिर बन चुका है। इस नवम्बर, 2025 को इस जगह की यात्रा के दौरान सुग्गी चैरी नाम की कोई जगह नहीं बची है। अब वहां सिर्फ शिवलिंग है। इस जगह की बाड़ेबंदी कर दी गई है और इस पर सुग्गा बाबा लिख दिया गया है। मैंने नई और पुरानी पीढ़ी दोनों लोगों से बात किया।

नई पीढ़ी सिर्फ सुग्गा बाबा को जानती है जो शिव हैं और जिन्हें सावन के महीने में पानी चढ़ाया जाता है। उन पर कांवड़-यात्रा का प्रभाव अधिक है। पुरानी पीढ़ी के लोग सुग्गी चैरी के बारे में बता तो रहे थे, लेकिन वे इस देवी को शिव के साथ जोड़कर कहानी सुना रहे थे। सिर्फ दो लोग ही ऐसे थे जिन्होंने यह बताया कि सुग्गी देवी अपनी बहनों में सबकी चहेती थीं और इनसे मिलने के लिए सोनाडीह आती थीं।

एक कहानी यह भी है कि सोनादेवी यहीं सुग्गी चैरी में आकर सो गई, तब उन्हें लोगों ने आसन पर बिठाकर कंधे पर सोनाडीह ले गये। जहां भी उन्हें विश्राम के लिए उतारा गया, वहां-वहां उन स्थलों को पवित्र माना गया और वहां पर डीह बनाया गया।
सुग्गी चैरी के खोह मानी जाने वाली जगह पर कुछ वर्षों पहले मंदिर निर्माण हुआ जिसके प्रवेश द्वार के ताखे में बुद्ध की भूस्पर्शीय मुद्रा वाली मूर्ति को देखा जा सकता है। इस मंदिर के अंदर राम, सीता और लक्ष्मण की मूर्ति की स्थापना की गई है।

साथ ही, दुर्गा और अन्य देवियों की स्थापना को देखा जा सकता है। एक स्थल इस मंदिर के पुराने जमाने के पुजारी की समाधि स्थल भी है। यहां के पुजारी से जब मैंने पूछा कि इस बाहर वाले ताखे में जो मूर्ति है, वह किसकी है? वह महाशय बहुत देर तक कथा सुनाते रहे, लेकिन इस मूर्ति के बारे में नहीं बता सके।

यहां यह रेखांकित करना उपयुक्त होगा कि बुद्ध की यह मूर्ति सफेद संगमरमर की है और कुछ हद तक दुर्वासा में मिली बुद्ध की मूर्ति से समानता रखती है। सुग्गी चैरी बरहज-मधुबन के प्राचीन काल से चले आ रहे रास्ते पर है और घाघरा की एक धारा के पास है। यहां से घाघरा नदी महज दो किमी दूर है और बाढ़ के समय में यह हिस्सा डूब क्षेत्र में आ जाता है। मेरे गांव के पूरब में इस नदी के अवशेषों को देखा जा सकता है।

इन्हीं छोड़े गये अवशेषों के टीलों पर पुरानी सभ्यताओं की निशानियों को आज भी खोजा सकता है। बहुत सी देवियां इन्हीं टीलों और नदी के किनारों पर हैं। इनके चैरे प्राचीन स्तूपाकार आकृतियों में बने हुए थे जो आकार में काफी छोटे होते हैं। यह माना जाता है कि ऐसे निर्माणों की परम्परा ही में मौर्यकाल के बड़े स्तूपों में विकसित हुए। लौरियानंदगढ़ के बौद्ध स्तूप की निचली परतो में पुराने छोटे स्तूपों का अवशेष भारत में स्तूपों के निर्माण की कहानी को काफी पीछे ले जाता है।

इन देवियों के डीह, चैरों का निर्माण इसी परम्परा का हिस्सा है। गुप्तकाल में ऐसी देवियों को मूर्त रूप देने का प्रचलन आया और इन्हें पांच और फिर सात मातृकाओं का निर्माण हुआ। इस निर्माण की धारा मध्य भारत, खासकर मालवा और ग्वालियर क्षेत्र में विकसित हुई। बाद के काल में, खासकर 12वीं शती में इन देवियों की संख्या 64 पहुंच गई और कई बार इन्हें योगिनी कहा गया।

आज के दौर में, जब हिंदुत्व राष्ट्रवाद की गरम हवा बह रही है, देवी और देवता अचानक ही बड़े आकार में बदलते जा रहे हैं उसमें राजा नहुष और उनकी बेटियां अपने अस्तित्व और पहचान के लड़ते हुए दिख रही हैं। राजा नहुष के टीले पर मीठे मटर पैदा हो रहे हैं और सुग्गी देवी सुग्गा बाबा में बदल दी गई हैं। यह सिर्फ हमारी प्राचीन कथानकों और देवियों का ही नाश नहीं है, यह हमारे पुरातत्व, इतिहास और पहचान का भी नाश है।

विघ्वंस के इस दौर में निर्माण के नाम पर सिर्फ धर्म की वह गाथा रह गई है जिसका सिर्फ हिंसक वर्तमान है और संहार की जमीन पर चलने वाला भविष्य है। इसमें न तो तो इतिहास है, न पुरातत्व और न ही सभ्यताओं को याद दिलाने वाली संस्कृति जो आज भी हमारे जीवन का हिस्सा हैं। किसी भी सभ्यता का निर्माण इतिहास के बिना संभव नहीं है। बेहतर सभ्यता निर्माण के लिए इतिहास के साथ बेहतर व्यवहार एक अनिवार्य पक्ष है। इसे हमें कभी नहीं भूलना चाहिए।

इतिहास विध्वंस के समय में इतिहास के इन मिथकों, उनसे जुड़ी कथाओं को सहेजना नहीं भूलना चाहिए। ये हमारे इतिहास का वे जीवंत हिस्सा हैं जिसमें पुरातत्व की ठोस उपस्थिति और जीवन के मूल्य सुरक्षित हैं।

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