लद्दाख-लेह वासियों की वेदना, प्रार्थना और प्रदर्शन 

लेह में शहीद स्मारक पार्क 3,500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह उन तीन लद्दाख वासियों को समर्पित है जो 27 अगस्त, 1989 को लेह के पोलो मैदान में अनुसूचित जनजाति (एसटी) और केंद्र शासित प्रदेश (यूटी) के दर्जे के लिए हुए आंदोलन के दौरान सुरक्षा बलों द्वारा की गई गोलीबारी में मारे गए थे।

यहीं पर पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक इस साल 10 सितंबर से तीन हफ़्ते की भूख हड़ताल पर बैठे थे। अब वे कठोर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए), 1980 के तहत हिरासत में लिए गए हैं। वांगचुक को 24 सितंबर को हड़ताल वापस लेनी पड़ी। जब एक हिंसा में चार स्थानीय लोगों की मौत हो गई और लगभग 90 लोग घायल हो गए। ऐसी हिंसा लेह-लद्दाख में शायद ही कभी हुई हो। लोग सड़कों पर उतरकर राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची लागू करने की मांग कर रहे थे। जो संविधान का वह हिस्सा है जो आदिवासी बहुल क्षेत्रों के लिए विशेष प्रावधानों की गारंटी देता है। हिंसा में, पार्क के बाहर लगभग 80 कारें क्षतिग्रस्त पाई गईं। स्थानीय लोगों का कहना है कि दर्जनों लोग अभी भी पुलिस हिरासत में हैं।

गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) की सदस्य डोल्मा फुनसुख (30 साल) हिंसा भड़कने और शहर में कर्फ्यू लगने के एक हफ्ते बाद स्मारक पार्क में मौजूद हैं। लेह में कर्फ्यू में आठ घंटे की ढील दी जा रही है। फुनसुख बताते हैं कि वह विरोध स्थल से अपना सामान लेने आए हैं। वह बताते हैं कि, “मैं यह देखने आया हूं कि क्या वे गद्दे और गद्दियां यहां हैं, जो मैं भूख हड़ताल के दौरान साथ लाता था। वह सब कुछ अभी भी वहां जस का तस हैं। वह बताते हैं कि मुझे यकीन है कि कोई उन्हें चुरायेगा नहीं। लेह में सब कुछ सुरक्षित रहता है। कोई भी चीज कोई चुराता नहीं है।” 

उनका कहना है कि वांगचुक के जेल में होने का मतलब है कि विरोध की राजनीति फिलहाल पीछे छूट सकती है। वे कहते हैं कि “मैं 24 सितंबर की तारीख़ कभी नहीं भूल सकता। वे दर्द के साथ कहते हैं कि उस दिन बूढ़े पुरुषों और महिलाओं तक को भी नहीं बख्शा गया और उन्हें लाठियों से पीटा गया। धुएं के गोले दागे गए। मैंने कभी नहीं सोचा था कि लद्दाख में ऐसा दृश्य भी हो सकता है। मैं मुश्किल से पार्क से बाहर निकल पाया। क्योंकि सुरक्षा बल अंदर घुस आए।” 

लेह में हिंसा भड़के हुए एक हफ़्ते से ज़्यादा समय बीत चुका है। लोग अभी भी अविश्वास और सदमे की भावना से जूझ रहे हैं। यह सब कुछ एक ऐसे केंद्र शासित प्रदेश में हुआ, जहां राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार भारत में सबसे कम अपराध दर है।

शहीद स्मारक पार्क से मात्र 1 किमी दूरी पर मिट्टी के रंग का सचिवालय है। जिसकी विशिष्ट शिंगस्को (नक्काशीदार) खिड़कियां हैं। वहां हिंसा के स्पष्ट निशान दिखाई देते हैं।

लद्दाख स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषद (LAHDC), जिसका गठन 1995 में विकेन्द्रीकृत शासन प्रक्रिया को सुगम बनाने के लिए किया गया था। यहीं स्थित है।

लेह-मनाली राजमार्ग की ओर वाली खिड़कियां चकनाचूर हो गई हैं। कांच के टुकड़े ज़मीन पर बिखरे पड़े हैं। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि ज़्यादातर मौतें और चोटें सचिवालय के बाहर हुईं। डेढ़ किलोमीटर दूर स्थित भाजपा मुख्यालय की तीन मंज़िला इमारत पर अभी भी काली कालिख जमी हुई है।

आगजनी के दौरान कार्यालय के बोर्ड से विशाल पार्टी का बैनर गायब हो गया है। इमारत की सुरक्षा और भी बढ़ा दी गई है और यह भवन अनजान लोगों के लिए वर्जित स्थान घोषित कर दिया गया है। यह बात इमारत की सुरक्षा कर रहे पुलिसकर्मियों ने बताई।

लेह के एक अस्पताल के एक वरिष्ठ डॉक्टर ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि मैं यहां 25 साल से सेवा कर रहा हूं। उन्होंने कहा कि अपनी 24 साल की सेवा में यह पहली बार था जब मैं लेह में इस तरह की चोटों का  इलाज कर रहा हूं। अस्पताल में आखिरी बार ऐसी अफरा-तफरी और चीख-चिल्लाहट का दृश्य 2010 में बादल फटने की घटना के समय देखा था। जिसमें 255 स्थानीय लोग मरे थे।,” 

लेह में किसी भी डॉक्टर को आज की तारीख में आजादी नहीं है कि वह मीडिया से घायलों या मारे गए लोगों के बारे में बात कर सके। डॉक्टर ने बताया कि स्थिति इतनी भयावह थी कि जो डॉक्टर और अन्य विभागों के लोग हैं, वे भी उन्हें भी घायलों के इलाज और देखरेख में लगाना पड़ा। जैसे नेत्र विभाग और पैथालॉजी के डॉक्टर। ये लोग भी घायल नागरिकों का इलाज कर रहे हैं। 

डॉक्टर ने बताया कि “हमने इस हिंसा के शिकार उन चारों लेह वासियों को होश में लाने की कोशिश की। हालांकि उन्हें मृत अवस्था में लाया गया था।  हमें 46 बार खून चढ़ाना पड़ा। खून देने के लिए लोग लेह के सभी इलाकों से आए थे। नाम न छपने की शर्त पर एक वरिष्ठ डॉक्टर ने बताया कि 20 घायल लोगों को गोलियां लगीं थी, उनके शरीर में छर्रे थे। जब उन्हें लाया गया था।”

11 घायल अभी भी अस्पताल में हैं। जिनमें से सात को पुलिस हिरासत से छोड़ दिया गया है। एक पुलिस अधिकारी ने कहा कि अधिकांश घायलों को एक-एक करके जल्द ही रिहा कर दिया जाएगा।

एलीज़र जोल्डन मेमोरियल कॉलेज का 18 वर्षीय वाणिज्य विभाग का छात्र कांपते हुए बताता है कि “जब विरोध प्रदर्शन शुरू हुए, तब मैं अपने कॉलेज के बाहर था। मैं कॉलेज से बाहर आया और एक गर्म वस्तु (गोली) मेरे पैर में चुभ गई। मैं ज़मीन पर गिर पड़ा।” उसे विशेष उपचार के लिए श्रीनगर के एक अस्पताल में भेज दिया गया है, क्योंकि उसके माता-पिता को डर है कि उसके पैर में कोई छर्रे जैसी वस्तु या छर्रा फंसा है। लेह में हुए विरोध प्रदर्शनों में ज़्यादातर घायल 20 और 30 साल की उम्र के थे। 

सरकार के इन बयानों कि वांगचुक के आंदोलन में विदेशी शक्तियों का हाथ है, उनका पाकिस्तान से संबंध है, इस बात ने लद्दाख के युवाओं के गुस्से को भड़का दिया है। स्थानीय लोग उस नैरेटिव पर भी सवाल उठाते हैं जिसमें सभी लद्दाखियों को राष्ट्र-विरोधी बताया गया है।

45 वर्षीय ज़ानू टुंडुप अपने जीजा पूर्व सैनिक त्सावांग थारचित की मौत के बारे में बताते हैं, जो उस प्रदर्शन में शामिल थे और लेह हिंसा में मारे गए।  

मेरे जीजा जी एक पूर्व सैनिक थे। वे 1999 के कारगिल युद्ध में पाकिस्तानी घुसपैठियों से तोलोलिंग पहाड़ी और द्रास सेक्टर पर पुनः कब्ज़ा करते समय भारतीय सेना की बहादुरी की कहानियां सुनाते थे। उन्होंने स्वयं युद्ध लड़ा और अपने दो बेटों को देश की सेवा के लिए आर्मी स्कूल भेजा। उनके पिता भी सेना में थे। उन्हें अंधाधुंध गोलियां मारी गईं, जिसमें सीने में दो गोलियां लगीं। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि पहले उनकी पिटाई की गई और फिर उन्हें गोली मारी गई।” 

परिवार अभी भी लेह शहर से 125 किमी दूर खालसी तहसील के स्कुर बुचन स्थित पैतृक गांव में अंतिम संस्कार को पूरा करने के लिए अनुष्ठान कर रहा है।

स्थानीय लोग विरोध-प्रदर्शनों में मारे गए लोगों को “शहीद” मानते हैं। उन्होंने 2 अक्टूबर को महात्मा गांधी के जन्मदिन पर मठों में विशेष प्रार्थनाओं का आयोजन किया था। 

स्थानीय लोकप्रिय लोगों के वीडियो ब्लॉगिंग को करीब ठप कर दिया गया है। यह सब सुरक्षा बलों की कार्रवाई के बाद हुआ है। कई लोगों को चुप करा दिया है। लेह एपेक्स बॉडी (LAB) के एक युवा सदस्य ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “एक रैप कलाकार को विरोध प्रदर्शनों पर वीडियो बनाना बंद करने या परिणाम भुगतने की धमकी दी गई थी। उसने ऐसा करना बंद कर दिया।”

वे आगे कहते हैं कि “ऐसी धमकियां दी गई हैं कि जिनके नाम प्राथमिकी (एफआईआर) में दर्ज हैं, उन्हें कभी नौकरी नहीं मिलेगी। सरकारी कर्मचारियों को चेतावनी दी गई है कि वे अपनी राय ऑनलाइन पोस्ट न करें। युवाओं को हिरासत में लिया जाता है और पूछताछ के बाद छोड़ दिया जाता है। इस तरह नियंत्रण कायम किया गया है।” 

पिछले चार वर्षों में सड़कों पर जो विरोध-प्रदर्शन हुए हैं, जिनमें से अधिकतर शांतिपूर्ण रहे हैं, जिनका नेतृत्व एलएबी और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस ने किया है। यह अलायंस लद्दाख के लेह और कारगिल क्षेत्रों के सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक संगठनों का समूह है। उनका चार सूत्री एजेंडा है: राज्य का दर्जा, छठी अनुसूची में शामिल होना, एक अतिरिक्त लोकसभा सीट, और एक स्वतंत्र भर्ती एजेंसी या लोकसेवा आयोग। उनका संदेश समाज के हर वर्ग मुख्यतः बेरोज़गार युवाओं तक पहुंच गया है।

डॉ. मुतासिफ लद्दाखी का कहना है कि लद्दाख और केंद्र ने आम सहमति बनाने के लिए कई दौर की बातचीत की है, लेकिन अब तक कोई नतीजा नहीं निकला है। “केंद्र द्वारा किए गए अधूरे वादे और टालमटोल की रणनीति लद्दाख में गुस्से भरे विरोध प्रदर्शनों को हवा दे रही है,” डॉ. मुतासिफ जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग से डॉक्टरेट की उपाधि हासिल किए अध्येता हैं। वे आगे बताते हैं कि “2019 के बाद, जब लद्दाख को एक केंद्र शासित प्रदेश [पूर्ववर्ती जम्मू और कश्मीर राज्य से] बनाया गया। उसके बाद  इस क्षेत्र को बाहरी नौकरशाहों (लद्दाख के बाहर के) की दया पर छोड़ दिया गया। उन्हें इस क्षेत्र की बहुत कम समझ है और स्थानीय संवेदनशीलताओं के बारे में बहुत कम जानकारी है।”

पीरज़ादा आशिक की की लेह रिपोर्ट ( अनुवाद- सिद्धार्थ, स्रोत- द हिंदू, 6 अक्टूबर 2025, दिल्ली संस्करण)

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