ग्राउंड रिपोर्ट: मनरेगा में रोजगार पाने के लिए इंतजार कर रहे मजदूर!

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सागर। मनरेगा का उद्देश्य ग्रामीण परिवारों की आजीविका सुरक्षा को बढ़ाना है। मनरेगा यानी महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना प्रत्येक ग्रामीण परिवार को वर्ष में 100 दिनों की गारंटीकृत मजदूरी देने का दावा करती है। वर्ष 2005 में अपने अस्तित्व में आयी यह योजना पंचायत राज संस्थाओं को भी मजबूत करती है। यह योजना सुनिश्चित करती है कि, पात्र परिवारों को न्यूनतम स्तर के रोजगार से गरीबी कम करने में मदद मिलती है। मनरेगा के उद्देश्य से तो यही लगता है कि, यह योजना ग्रामीण विकास के लिए समर्पित है। लेकिन, जब हम ग्रामीण स्तर पर मनरेगा की स्थिति जानते हैं, तब हमें जमीनी हकीकत कुछ और ही नजर आती है।

मनरेगा की स्थिति का जायज़ा लेने के लिए हमने मध्यप्रदेश के सागर जिले में कुछ गांव का भ्रमण किया। पहले हम सागर से करीब 20-22 किलोमीटर दूर सेमरा गांव पहुंचे। गांव की आबादी तकरीबन 1500 है। गांव की कच्ची सड़क पर बिछे मटेरियल से यह लगता है कि, गांव में विकास के कार्य अधूरे पड़े हैं।

मनरेगा पर चर्चा करने वाले पंचमलाल और राधेश्याम 

गांव की अधूरी सड़क के पास कुछ लोग हमें खाली बैठे मगर, बतियाते दिखते हैं। उनके पास पहुंचकर हम हाल-चाल पूछते हुए मनरेगा पर बातचीत का सिलसिला शुरू करते हैं। तब चंदन सहित कुछ लोग हमें बताते हैं कि, ‘जून माह से लेकर अब तक मनरेगा में कोई काम नहीं मिला। मनरेगा योजना के तहत कुआं, सड़क, तालाब, नाली अन्य निर्माण के कार्य मिलते हैं। यदि 100 आदमी को काम की जरूरत है। तब मनरेगा में मुश्किल से 10 लोगों को काम मिलता है। काम भी 8-10 दिन का ही मिलता है।

‘मनरेगा का एक काम निकलने पर 10 से लेकर लगभग 30 लोगों को ही काम मिल पाता है। वहीं, मनरेगा में मजदूरी बहुत कम है। कुछ मजदूरी भी बढ़ाई जानी चाहिए। गांव में करीब 1500 से ज्यादा आबादी हैं। इस आबादी में ज्यादा से ज्यादा 400 लोगों को मनरेगा में काम मिल पाता होगा। बाकी लोग काम के लिए इंदौर, भोपाल, दिल्ली, मुम्बई जैसे शहरों में जाते हैं। घर परिवार की देखभाल के कारण हम काम के लिए बाहर नहीं जा पाते।

चबूतरे पर बैठे सेमरा गांव के लोग

ऐसे में महीने में हमें दो-चार दिन का काम किसान लोगों के पास मिल पाता है, बाकी हम बेरोजगार बैठे रहते हैं। बरसात के मौसम में हम जैसे बहुत से लोग काम ना मिलने से बेरोजगार बैठे हैं। मनरेगा को लेकर सरपंच भी करे तो क्या करे? पूछने पर वह बताते हैं कि, मनरेगा का काम ऊपर से ज्यादा आ नहीं रहा। रोजगार न मिलने की समस्या हमारे गांव सहित आसपास के कई गांव की है।

इसके आगे देवी और लेखन बताते हैं कि, ‘मनरेगा में 200-250 रुपए दिन की मजदूरी मिलती है। ऐसे में कई लोग मजदूरी में रोजाना 500 रुपए तक पाने के लिए सागर मजदूरी करने जाते हैं। मनरेगा में यदि काम बढ़ जाए। वहीं, दैनिक मजदूरी 500 रुपये तक हो जाये तो लोग काम के लिए आगे भी आयेंगे और ढंग से अपनी आजीविका भी चला पायेंगे।

हमारी चर्चा का हिस्सा बनने के लिए दिनेश पवार भी चले आते हैं। उनका कहना है कि, ‘मनरेगा के तहत हमको कोई काम नहीं मिलता। कमाने के लिए बाहर जाते हैं। बाहर की मजदूरी हमारे जेब में रोजाना 500 रुपए तक डाल देती है। हमने मनरेगा में एक ही दिन काम किया है। जिसमें मजदूरी 200 रुपए मिली थी। बाकी उसके बाद हमें मनरेगा में कोई काम मिला ही नहीं।
गांव में हम आगे की ओर कदम बढ़ाते हैं तब हमारी मुलाकात चंगु और खछोरी से होती है। ये दोनों अहिरवार समुदाय से ताल्लुक रखते हैं।

नाली पर बैठे मनरेगा पर बात करने वाले दिनेश पवार

चंगू अहिरवार बयां करते हैं कि, ‘हमारी काम संबंधी समस्याओं के लिए कोई हमारे साथ नहीं खड़ा। ना हमें मनरेगा के तहत कोई काम मिल रहा और ना मनरेगा के आलावा कहीं काम मिल रहा है। बड़ी मुश्किलात में हम अपना जीवन काट रहे हैं। बुराई-भलाई के कारण मनरेगा के बारे में हम ज्यादा कुछ बोल भी नहीं सकते।’

चंगु के पास ही बीड़ी बना रहे होते हैं खछोरी अहिरवार। वे बोलते हैं कि, ‘हम बेरोजगार हैं हमारी शिकायत जहां करना है जिसको वो करे। हम तो अपनी समस्या बतायेंगे ही। हमारी काम संबंधी दिक्कतों को दूर करने कोई नहीं आता है। सरकार की तरफ से मनरेगा में जो काम निकलते हैं उनका हमें पता तक नहीं चलता। तालाब वगैरह के काम गांव में हुए हैं। मगर, काम के लिए हमें नहीं बुलाया गया। तालाब का काम मशीनों से किया गया है। हम लोगों को कोई जानकारी नहीं कि, मनरेगा क्या है? मनरेगा का काम कैसे होता है?’

गांव‌ की संकरी गली हमें गांव के भीतर ले जाती है। गांव में दो-चार कच्चे घरों के पास हम रहीश दांगी, गोविंद चढ़ार, अरविन्द सिंह सहित कुछ लोगों से रूबरू होते है। मनरेगा को लेकर गोविंद चढ़ार कहते हैं कि, ‘मनरेगा के तहत यहां कोई काम-धाम नहीं है। पहले आंगनबाड़ी बनी थी, तब कुछ लोगों को काम मिला था। मगर, हमें नहीं मिल पाया था। परिवार के भरण-पोषण के लिए लड़का बाहर कमाने जाता है। गांव में दो-चार दिन का काम मिलना भी मुश्किल हो जाता है।’

आगे रहीश दांगी बताते हैं कि, ‘गांव में कोई काम नहीं है। हमारी दो‌ एकड़ जमीन हैं। जिससे अन्न उगाकर हम खा पाते हैं। रहीश का दावा है कि, गांव की 1500 से‌ ज्यादा आबादी में से 500-600 लोग बाहर काम के लिए जाते हैं। जिनमें कई परिवार के पूरे लोग घर में ताला डालकर काम पर जाते हैं।’

अरविंद सिंह अपनी बात रखते हुए बोलते हैं कि, ‘गरीब आदमी को मनरेगा में काम की सबसे ज्यादा आवश्यकता है। लेकिन, मनरेगा में काम मिलता भी है तो‌ ऐसे लोगों को दिया जाता है, जो सक्षम है। अरविंद का दावा है कि, मनरेगा में फैला भ्रष्टाचार मनरेगा को असफल बनाने की राह ले‌ जा रहा है।’

आगे पंचमलाल और राधेश्याम अपने विचार रखते हुए कहते हैं कि, ‘मनरेगा योजना का हमें कोई अता-पता नहीं। आप ही आये तब हम आपके मुंह से सुन रहे हैं मनरेगा के बारें में। जब आप जैसा कोई आता है तभी मनरेगा की चर्चा होती है।’

आगे हम सेमरा गांव से मुड़ते हुए करीबन 3 किमी चलते हैं तब हम लालेपुर गांव की धरती पर पहुंचते हैं। गांव में सड़क किनारे एक चबूतरे पर कुछ लोग एकजुट बैठे हुए थे। इन लोगों के चेहरे की हताशा बता रही थी कि, इन्हें बेरोजगारी का दर्द कचोट रहा है। आपस में बतियाते ये लोग बेरोजगारी के कारण अपना समय व्यतीत कर रहे हैं।

इन लोगों में से एक दिन्नु प्रजापति बताते हैं कि, ‘गांव की आबादी 1500 के इर्द-गिर्द है। काम-धंधा ना होने की वजह से हम लोग एक दूसरे से गप्पेबाजी करते हुए समय काट रहे हैं। मजदूरी की एक उम्मीद मनरेगा योजना रहती है। लेकिन, मनरेगा योजना में भी काम नहीं मिल रहा।’

दिन्नु के बोल थमते नहीं कि, ‘राकेश रजक बोलते हैं कि, हम में से किसी को भी मनरेगा के तहत काम नहीं मिला। गांव में काम का साधन मुख्यतः खेती-किसानी और बीड़ी है। मैं एक बीड़ी श्रमिक हूं। बीड़ी का काम ही हमारा पेट भरता है।’

नितेश रजक का कहना हैं कि, ‘हमें मेहनत-मजदूरी मिलती है तो केवल किसानों के पास ही मिलती है। बाकी हमारे पास आय का कोई विशेष साधन नहीं हैं। अगर, मनरेगा में भी कुछ काम मिलता तब रोजी-रोटी चलाने में थोड़ी आसानी होती।’

चंद्रकांत पांडे हमें खुद की स्थिति से परिचय करवाते हुए बताते हैं कि, ‘हम गरीबी में जी रहे हैं। आज तक हमने मनरेगा जैसी कई योजनाओं का लाभ नहीं जाना कि, कैसा होता है? गांव की बड़ी आबादी अब शहरों में पलायन कर रही है। ग्रामीण लोगों की आंखें अब शहरों में काम तलाशती फिरती है। मगर, अब सम्मानजनक काम ना शहरों में मिल रहा है और ना गांवों में मिल रहा है।’

एक अन्य शख्स का कहना है कि, ‘कल‌ मेरा परिवार और आस-पास के लोग, लड़का-बच्चा इंदौर से काम करके आये हैं। महीनों इंदौर जैसे अन्य शहरों में काम करने के बाद‌ लोग रक्षाबंधन जैसे त्योहारों पर रिश्तेदार की तरह अपने घर आते हैं। फिर, दो-चार दिन त्यौहार मनाकर काम के लिए शहर चले जाते हैं। अगर, इन लोगों को गांव में मनरेगा के तहत काम मिलता तो ये लोग काम के लिए ‌शहरों में क्यों ठोकरें खाते-फिरते?’

गांव में अंदर की ओर हम जाते हैं तब हमें सन्नाटा नजर आता है। हम कुछ लोगों से और मनरेगा पर बात करना चाह रहे थे, मगर जब लोग हमें नहीं मिल पाये तब हमने अपने पैरो की दिशा पिपरिया गांव की तरफ मोड़ ली।

लालेपुर गांव से पांच किमीं दूरी के दायरे में बसा है पिपरिया गांव। गांव (आबादी करीब 1000) को देखने में लगता है कि, गांव विकास के कई कार्यों से वंचित हैं। एक कच्ची सड़क हमें पिपरिया गांव के अंदर ले जाती है। जब हम पिपरिया गांव‌ के अंदर पहुंचते हैं तब एक मंदिर के पास लोगों से हमारी भेंट होती है। इन लोगों से हमने जब मनरेगा पर संवाद किया तब गोकुल शुक्ला कहते हैं कि, ‘हमारे पास मनरेगा के जॉब कार्ड वगैरह भी है। पर अब तक मनरेगा में कोई मजदूरी नहीं मिली। जॉब कार्ड देखने पर लगता है कि, अब इनका क्या उपयोग करें? मगर, फिर सोचते हैं कि, कभी तो जाब कार्ड हमारा वक्त बदलेंगे। हमें काम दिलायेंगे। आज के समय गांव में बेरोजगार लोगों की भीड़ यहां-वहां घूमती और बैठी मिल‌ जायेगी। उनके पास कोई काम नहीं है।’

ब्रजेश बताते हैं कि, ‘हम मजदूरी के बलबूते जिंदगी जी रहे हैं। लेकिन, अब मजदूरी मिलना इतना आसान नहीं। मजदूरों का सारा काम मशीनें खा रही है। मनरेगा योजना से मजदूरों को लाभ पहुंचाया जा सकता है। लेकिन, मनरेगा में कोई काम नहीं मिल रहा है।’

पवन अहिरवार अपना दर्द बयां करते हुए बोलते हैं कि, ‘अब मजदूर जबरदस्ती अपनी जिंदगी काट रहा है। हम कहने को मजदूर हैं, हमें मनरेगा से लेकर गांव और आस-पास के एरिया में कोई काम नहीं मिल रहा है। आज बेरोजगारी का आलम यह है कि, हम कोई भी काम तलाशते फिरते हैं।’

आगे हमें भैया राम रावत बतलाते हैं कि, ‘मजदूर की जिंदगी जीने में बड़ी कठिनाईयां हैं। रोजगार के लिए यहां वहां हाथ-पैर जोड़ना पड़ता है। मनरेगा हमें रोजगार नहीं दे पाती। जैसे-तैसे हमें किसानों के यहां ही मजदूरी मिलती है। पैसे की तंगी से मजदूरों के बच्चों का भविष्य, सपने, पढ़ाई सब बर्बाद हो जाता है। 15-16 साल से मेरा 40 हजार का कर्ज है। इस कर्ज को मैं चुकता नहीं कर पा रहा हूं। मनरेगा जैसी योजना में काम मिलता तब शायद कर्ज़ चुकता कर पाता।’

मथुरा लोधी अपना हाल बताते हुए कहते हैं कि, ‘हम मनरेगा के काम का इंतजार करते रहते हैं, लेकिन मनरेगा काम ही नहीं दे पाती। परिवार भूखा ना रह जाए इसलिए राजगढ़ जैसे शहर में काम करने जाते हैं। पूछने पर‌ वह बताते हैं कि, सागर में एक माह काम करने पर 5-6 हजार रुपए मिलता है। वहीं, राजगढ़ में एक महीने के काम का 12 हजार रुपए मिल जाता है। इसलिए वहां काम करने जाते हैं।’

एक बुजुर्ग चिंता व्यक्त करते हुए कहते हैं कि, ‘कम कमाई और बढ़ती महंगाई के बीच युवा वर्ग पिस रहा है। आज की हालत देखकर बड़ी चिंता होती है कि, युवाओं का भविष्य कैसा होगा? युवाओं के लिए मनरेगा जैसे सरकारी कामों की कोई व्यवस्था नहीं हो पा रही। सागर में 6-7 हजार रुपए कमाने के लिए जाता युवा 3-4 हजार का किराया, पेट्रोल का खर्च फूंक रहा है।,
बुजुर्ग आगे बोलते हैं कि, ‘मनरेगा जैसे काम में मशीन इंसान का काम छीन रही हैं। गांव में सड़क निर्माण जैसे कई कार्यों की जरूरत है। इन कार्यों में मनरेगा के अंतर्गत कई लोगों को रोजगार दिया जा सकता है।’

सागर में मनरेगा की स्थिति देखते हैं तब आंकड़ों से पता चलता है कि, सागर में मनरेगा में पंजीकृत लोगों की संख्या 287753 है। जबकि, पंजीकृत परिवारों की संख्या 499575 हैं। चालू वर्ष में हटाये गए जाब कार्ड की संख्या में इतने 15668 परिवार शामिल हैं। जबकि, व्यक्तियों की संख्या 42661 है। चालू वर्ष में शामिल जॉब कार्ड की संख्या में 20840 परिवार शामिल हैं। वहीं, 32868 लोग शामिल हैं।

मनरेगा को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर ग्रामीण विकास मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि, 15 दिसंबर, 2022 तक मनरेगा के अंतर्गत कुल 11.37 करोड़ परिवारों को रोजगार मिला और कुल 289.24 करोड़ व्यक्ति-दिवस रोजगार सृजित किया गया। वहीं, मनरेगा के 2024-25 में सक्रिय कार्यकर्ता 13.13 करोड़ हैं। योजना से वर्ष 2024-25 में 4.22 करोड़ परिवार लाभान्वित भी हुए हैं। वर्ष 2024-25 में मनरेगा की डीबीटी लेन-देन 21.76 करोड़ का है। वहीं, भारत सरकार ने महात्मा गांधी नरेगा के तहत बजट अनुमान 2023-24 में 60,000 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं। इसके अलावा, अनुदान की पहली अनुपूरक मांग में बजटीय आवंटन को बढ़ाकर 74,524.29 करोड़ रुपये कर दिया गया है।

गौर फरमाने योग्य है कि, ग्रामीण स्तर पर मनरेगा लोगों के रोजगार के लिए एक विशेष योजना है। यदि, मनरेगा की खामियों को सुधारा जाए, तब ग्रामीण समुदाय के लिए ढंग से रोजगार के अवसर सृजित किए जा सकते हैं। वहीं, मनरेगा से मिला रोजगार लोगों के आर्थिक विकास में मददगार साबित हो सकता है।

(सतीश भारतीय स्वतंत्र पत्रकार हैं, वह मध्यप्रदेश में रहते हैं)

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