वर्धा। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में बुनियादी शैक्षणिक सुविधाओं और लंबित मांगों को लेकर 8 जुलाई से जारी छात्र आंदोलन अब विश्वविद्यालय परिसर से निकलकर वर्धा के जिलाधिकारी कार्यालय तक पहुंच गया है।
छात्रों का आरोप है कि उनकी मांगों पर संवाद करने के बजाय विश्वविद्यालय प्रशासन ने उनके खिलाफ दमनात्मक कार्रवाई का रास्ता अपनाया। पहले छह छात्रों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई और इसके बाद 1 सितंबर से छात्रों के विश्वविद्यालय परिसर और छात्रावास में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इसके विरोध में छात्र 3 सितंबर से जिलाधिकारी कार्यालय के पास गांधी प्रतिमा स्थल पर अनिश्चितकालीन सत्याग्रह कर रहे हैं।
छात्र पिछले 8 जुलाई से स्त्री अध्ययन एवं फिल्म अध्ययन विभाग की वापसी, 2022 से अटकी पड़ी पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया की बहाली, डिप्लोमा कोर्स शुरू किए जाने और छात्रों की बुनियादी समस्याओं के समाधान की मांग कर रहे हैं। इनमें 24 घंटे लाइब्रेरी, रीडिंग रूम, सभी छात्रावासों में मेस की व्यवस्था, सभी छात्रावासों में वातानुकूलित रीडिंग रूम, साफ पानी, गुणवत्तापूर्ण एवं पौष्टिक भोजन जैसी मांगें शामिल हैं।
छात्रों का कहना है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने पिछले 6 जुलाई से प्रशासनिक भवन के गेट बंद कर रखे हैं। इसके कारण छात्रों को अपने जरूरी कार्यालयी कामों के लिए प्रशासनिक अधिकारियों तक पहुंचने में लगातार परेशानियों का सामना करना पड़ रहा था। इसी के विरोध में छात्रों ने 20 अगस्त को कुलपति कार्यालय का घेराव किया था।
छात्रों के अनुसार उनकी मांग स्पष्ट थी कि कुलपति प्रोफेसर कुमुद शर्मा छात्रों के बीच आएं, उनसे संवाद करें और प्रशासनिक भवन के बंद दरवाजे खोलें। छात्रों का आरोप है कि संवाद के बजाय उन्हें कार्रवाई और भविष्य खराब करने की धमकी दी गई। कुलानुशासक राकेश मिश्रा एवं प्रभारी कुलानुशासक संदीप सापताले द्वारा एफआईआर की धमकी दिए जाने के बाद उसी रात करीब 11 बजे छह छात्रों को चिन्हित कर उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई।
छात्रों का कहना है कि एफआईआर का निशाना बनाए गए छह छात्रों में तीन दलित और तीन ओबीसी समुदाय से आते हैं। इसी आधार पर आंदोलनरत छात्रों ने विश्वविद्यालय प्रशासन पर दलित-पिछड़े छात्रों को चिन्हित कर उनके खिलाफ कार्रवाई करने का आरोप लगाया है।
पहले निलंबन, फिर एफआईआर और अब विश्वविद्यालय से बाहर
छात्रों का आरोप है कि विश्वविद्यालय में उनके खिलाफ कार्रवाई का यह सिलसिला नया नहीं है। एफआईआर में नामजद छह छात्रों में से शोधार्थी रामचंद्र, निरंजन कुमार और राजेश कुमार यादव को वर्ष 2024 में भी विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा निलंबित किया गया था। छात्रों के अनुसार लगभग दो वर्ष बाद बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच के आदेश के बाद उनकी बहाली हुई।
आंदोलनरत राकेश अहिरवार का आरोप है कि बुनियादी शैक्षणिक अधिकारों और सुविधाओं की मांग उठाने वाले छात्रों को बार-बार प्रशासनिक कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है। उनका कहना है कि पहले निलंबन, फिर एफआईआर और अब विश्वविद्यालय एवं छात्रावास में प्रवेश प्रतिबंधित किए जाने की कार्रवाई छात्रों पर लगातार बढ़ते संस्थागत दबाव को दर्शाती है।
छात्र शिवपूजन ने आरोप लगाते हुए कहा कि दलित और ओबीसी समुदाय से आने वाले छात्रों को लगातार चिन्हित किया जा रहा है। उनका कहना है कि विश्वविद्यालय में सामाजिक रूप से वंचित समुदायों के छात्रों की आवाज को दबाने के लिए प्रशासनिक कार्रवाई और संस्थागत दबाव का इस्तेमाल किया जा रहा है।
परिसर से बाहर किया, आंदोलन स्थल की सुविधाएं भी बंद करने का आरोप
1 सितंबर को विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा सभी छात्रों के विश्वविद्यालय परिसर और छात्रावास में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद आंदोलन और अधिक तीखा हो गया। छात्रों के अनुसार जिस प्रशासनिक भवन के सामने वे लंबे समय से आंदोलन कर रहे थे, वहां की बिजली भी बंद कर दी गई।
आंदोलनरत छात्रों का आरोप है कि रात के समय आंदोलन स्थल पर उपलब्ध वॉशरूम और पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं भी बंद कर दी गईं। छात्रों का कहना है कि जब प्रशासन से शैक्षणिक और बुनियादी सुविधाओं की मांग की गई तो जवाब में आंदोलनकारियों को उन्हीं बुनियादी सुविधाओं से वंचित किया गया।
छात्रों का कहना है कि विश्वविद्यालय परिसर से बाहर किए जाने के बाद उन्होंने आंदोलन को विश्वविद्यालय की चारदीवारी से बाहर ले जाने का फैसला किया। इसी के तहत 3 सितंबर से वर्धा शहर में जिलाधिकारी कार्यालय के पास गांधी प्रतिमा स्थल पर अनिश्चितकालीन सत्याग्रह शुरू किया गया है।
छात्रों की प्रमुख मांगों में एफआईआर वापस लेना, प्रतिबंध वापस लेना और जिन माँगों को लेकर छात्र आंदोलनरत हैं पूरी करना शामिल है।
सड़क पर पहुंचा विश्वविद्यालय का छात्र संघर्ष
छात्रों के आंदोलन को समर्थन देने के लिए आंदोलन स्थल पर भारतीय लोकशाही अभियान, एनएसयूआई, सीआईआईटू, बीएसपी, वंचित बहुजन अघाडी और अन्य संगठनों के प्रतिनिधि पहुंचे।
आंदोलनरत शोधार्थी निरंजन ने कहा कि विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा दलित-पिछड़े छात्रों के संवैधानिक अधिकारों का हनन करने की यह पहली घटना नहीं है। उनका आरोप है कि विश्वविद्यालय में छात्रों के खिलाफ कार्रवाई करते समय निर्धारित अधिनियमों और प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया जाता और छात्रों को अपनी छोटी-छोटी समस्याओं के समाधान के लिए भी उच्च न्यायालय, नागपुर खंडपीठ की शरण लेनी पड़ती है।
उन्होंने कहा, “हम लोगों को परिसर से बाहर करने के संदर्भ में देखा जाए तो आपको स्पष्ट नजर आ जाएगा कि सुबह 10 बजे के करीब सभी 06 छात्रों को नोटिस आता है और हमें परिसर से बाहर निकाल दिया जाता है। छात्रावास से छात्रों के बुनियादी सभी सामान — कपड़े, किताबें और जरूरी दिनचर्या के सभी सामान — विश्वविद्यालय प्रशासन ने जब्त कर लिए हैं। छात्र जिस कपड़े में थे, उसी कपड़े और हालत में हैं।”
छात्रों का कहना है कि विश्वविद्यालय प्रशासन का रवैया छात्रों की समस्याओं का समाधान करने के बजाय उनकी आवाज दबाने वाला है। उनके अनुसार छह छात्रों पर एफआईआर, विश्वविद्यालय एवं छात्रावास में प्रवेश प्रतिबंध और आंदोलन स्थल पर बुनियादी सुविधाएं बंद किए जाने जैसी कार्रवाइयां छात्र आंदोलन को दबाने के प्रयास हैं।
छात्रों ने स्पष्ट किया है कि जब तक उनकी मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं होती, उनका अनिश्चितकालीन सत्याग्रह जारी रहेगा। छात्रों का कहना है कि प्रशासनिक दबाव, FIR और प्रतिबंध के बावजूद वे अपनी शैक्षणिक एवं बुनियादी मांगों से पीछे नहीं हटेंगे।
(प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित)