“प्रॉफिट एंड जेनोसाइड” रिपोर्ट, सेंटर फॉर फाइनेंशियल अकाउंटेबिलिटी द्वारा प्रकाशित, भारत और इज़राइल के कारोबारी रिश्तों का विवरण देती है, जिसमें भारत की बड़ी कंपनियों की इज़राइली अर्थव्यवस्था में रक्षा, टेक्नोलॉजी, कृषि, स्वास्थ्य और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में किए गए निवेश का विस्तार से वर्णन है। यह रिपोर्ट उस समय आई है जब संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय अदालतों ने ग़ाज़ा पट्टी में इज़राइल की सैन्य कार्रवाइयों को ‘जनसंहार’ करार दिया है, और कई देशों, कंपनियों के व्यवहार को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस छिड़ी हुई है।
रिपोर्ट बताती है कि संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय अदालतों के मुताबिक ग़ाज़ा में जो हो रहा है, वो जानबूझकर जीवन के बुनियादी ढांचे को नष्ट करना, हत्याएं, मानसिक/शारीरिक नुकसान, जन्म पर रोक जैसे जनसंहार के कृत्य हैं। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में साफ़ कहा गया है कि इज़राइली सरकार व सेना ने जानबूझकर ऐसी रणनीति अपनाई है, और दूसरे देशों की भूमिका, खासकर ‘मौन’ साधने या सहयोग देने वाले देशों की, भी सवालों के घेरे में है—यहाँ भारत का नाम भी आया है।
भारत का नीति परिवर्तन
भारत, जो ऐतिहासिक रूप से फिलिस्तीन का समर्थक रहा है, अब इज़राइल का सामरिक सहयोगी बन गया है। 2014 के बाद संबंधों में तेजी से ‘मित्रता’ बढ़ी—व्यापार और रक्षा समझौते, हथियार, टेक्नोलॉजी, कृषि-जल उद्योग में आपसी सौदे काफी बढ़े। रिपोर्ट में मोदी सरकार और नेतन्याहू के बीच बढ़ती नज़दीकी और भारत की “मानवीय-नैतिक ज़िम्मेदारी छोड़, आर्थिक लाभ” पर केंद्रित हो चुकी नीति की आलोचना की गई है।
रक्षा और आर्म्स डील
– 2016-21 के बीच इज़राइल को निर्यात किए गए हथियारों का 45% हिस्सा भारत से गया।
– “अडानी डिफेंस सिस्टम”, “रिलायंस डिफेंस”, “भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड”, “हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स” जैसे सरकारी व निजी महारथी कंपनियां संयुक्त रक्षा प्रोजेक्ट्स, हथियार, मिसाइल, ड्रोन्स तथा निगरानी टेक्नोलॉजी में इज़राइली भागीदार हैं।
– इन तकनीकों का ग़ाज़ा में बड़े पैमाने पर सैन्य इस्तेमाल हुआ है।
टेक्रोलॉजी, शिक्षा और कृषि
– “टाटा”, “इन्फोसिस”, “विप्रो”, “रेलायंस”, “ओला इलेक्ट्रिक” जैसी दिग्गज टेक कंपनियां इज़राइली स्टार्टअप्स, क्लाउड, साइबर इंटेलिजेंस, एडटेक आदि में करोड़ों डालर निवेश कर चुकी हैं।
– भारतीय कृषि कंपनियां (जैसे जैन इरिगेशन) इज़राइली वाटर-टेक, माइक्रो-इरिगेशन का लाभ भारत के सूखाग्रस्त क्षेत्रों में ले रही हैं, लेकिन इज़राइल इन्हीं तकनीकों के ज़रिए वेस्ट बैंक और ग़ाज़ा की जमीन पर नियंत्रण बनाए रखता है।
फाइनेंस, इंश्योरेंस और सॉफ्ट पावर
– भारतीय सार्वजनिक बैंकों–खासकर “स्टेट बैंक ऑफ इंडिया” ने 2007 में इज़राइल में शाखा खोलकर भारतीय निवेश को औपचारिक समर्थन दिया।
– “टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज” द्वारा इज़रायली बैंकों को डिजिटल बैंकिंग समाधान दिए जा रहे हैं।
– कॉलेज, शिक्षण संस्थान, रिसर्च प्रोजेक्ट भी इज़राइली विश्वविद्यालयों के साथ जुड़े हैं—इन विश्वविद्यालयों का इज़राइली सेनाओं के साथ सीधा रिश्ता रहा है।
नैतिक और कानूनी सवाल
रिपोर्ट में सवाल उठाया गया है कि क्या वैश्विक कंपनियों, खासकर भारतीय कॉर्पोरेट्स की इन्वेस्टमेंट्स “सिर्फ” व्यापार है, या वे जानबूझकर जनसंहार वाली अर्थव्यवस्था को ताक़त देने के दोष में शामिल हैं?
– संयुक्त राष्ट्र की गाइडलाइंस के अनुसार, कोई भी राज्य या कंपनी युद्ध-अपराध में शामिल देश को हथियार नहीं बेच सकता।
– भारत ने उस अवधि में इज़राइल को हथियार निर्यात किए, जब अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने इज़राइल के जनसंहार को मान्यता दी और युद्ध विराम की अपील की थी।
– भारत की नीति अब दोहरापन दिखाती है— एक ओर संयुक्त राष्ट्र में संघर्ष विराम के पक्ष में वोट, तो दूसरी ओर हथियार व टेक्नोलॉजी सप्लाई।
– रिपोर्ट यह भी कहती है कि सीएसआर, मानवाधिकार और न्याय की भारतीय परंपरा, इन निवेशों से घोर विरोधाभासी हो गई है।
भारतीय समाज और विरोध
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में विभिन्न नागरिक संस्थाओं, छात्रों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और वामपंथी दलों ने इज़राइल के खिलाफ सख़्त विरोध दर्ज किया है—विशेषकर अडानी, टाटा, रिलायंस जैसी कंपनियों व सरकार के रवैये के विरुद्ध। दूसरी ओर, सामाजिक मीडिया पर, हिंदू राष्ट्रवादी शक्तियों ने इज़राइल के पक्ष को भी बहुत तेज़ी से उभारा।
रिपोर्ट का कहना है कि भारत को अपने निर्माणकर्ता, समाज और अंतरराष्ट्रीय क़ानून के प्रति जिम्मेदार व्यवहार अपनाना चाहिए। पूंजी निवेश में ‘मानवाधिकार की ड्यू डिलिजेंस’ को नीति बनाना चाहिए ताकि किसी तरह से जनसंहार, रंगभेद या अवैध कब्ज़ा समर्थन न मिले। आर्थिक व व्यापारिक कूटनीति को पुनः न्याय, स्वतंत्रता और भारतीय संविधान की मूल भावना के हिसाब से ढालना चाहिए। रिपोर्ट में यह भी आग्रह किया गया है कि देश का नागरिक समाज उपभोक्ता कंपनियों, सरकार को जवाबदेह बनाए कि ‘मुनाफे के लिए जनसंहार’ में वे शामिल न हों।